अभय सूक्त मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ

अभय सूक्त मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ


 ओ३म् यतो यतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु।

 शन्नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः।।   (यजुर्वेदसंहिता - 36.22)

यह यजुर्वेद संहिता (36.22) का अत्यन्त मंगलमय मंत्र है। नीचे इसका पदच्छेद, सरल अर्थ, भावार्थ और प्रयोग स्पष्ट रूप से दे रहा हूँ—


📜 मंत्र


यतो यतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥


✍️ पदच्छेद

  • यतः यतः — जहाँ-जहाँ से
  • समिहसे — आप आते हैं / प्रकट होते हैं
  • ततः — वहाँ-वहाँ से
  • नः — हमें
  • अभयं — निर्भयता
  • कुरु — प्रदान कीजिए
  • शम् — कल्याण / शान्ति
  • प्रजाभ्यः — प्रजाओं के लिए
  • पशुभ्यः — पशुओं के लिए

📖 सरल हिन्दी अर्थ

हे परमेश्वर!
आप जहाँ-जहाँ से हमारे समीप आते हैं,
वहाँ-वहाँ से हमें निर्भयता प्रदान करें।
हमारी संतानों (प्रजा) के लिए भी कल्याण करें
और हमारे पशुओं के लिए भी अभय दें।


🌼 भावार्थ (तात्त्विक अर्थ)

यह मंत्र सर्वांगीण अभय की कामना करता है—
केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन-तंत्र के लिए।

  • भय से मुक्त मानव समाज
  • सुरक्षित एवं स्वस्थ संतान
  • संरक्षण में पशु और प्रकृति
  • हर दिशा से आने वाले भय का नाश

यह वैदिक दृष्टि की करुणा और सार्वभौमिकता को दर्शाता है।


🕉️ प्रयोग / साधना में उपयोग

  • प्रातः संध्या या यज्ञ में
  • भय, असुरक्षा, संकट के समय जप हेतु
  • घर, परिवार और गौशाला की शान्ति के लिए
  • सामाजिक मंगलकामना में

📿 जप संख्या: 11, 21 या 108 बार
🕯️ भाव: अभय, करुणा और विश्व-कल्याण


🕉️ यजुर्वेद मंत्र 36.22 का अर्थ, भावार्थ और लाभ

(अभय और शांति का वैदिक मंत्र)

यजुर्वेद मंत्र 36.22 का अर्थ | अभय और शांति का वैदिक मंत्र यजुर्वेद संहिता 36.22 मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ, भावार्थ और लाभ जानिए। यह वैदिक मंत्र अभय, शांति, प्रजा और पशुओं के कल्याण की कामना करता है।


📌 Focus Keywords

  • यजुर्वेद मंत्र 36.22
  • यजुर्वेद मंत्र का अर्थ
  • अभय का वैदिक मंत्र
  • वैदिक शांति मंत्र
  • यजुर्वेद संहिता हिंदी अर्थ

📜 यजुर्वेद मंत्र 36.22 (मूल मंत्र)


यतो यतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु।
शन्नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥
(यजुर्वेद संहिता 36.22)


✍️ पदच्छेद

यतः यतः | समिहसे | ततः | नः | अभयं | कुरु |
शम् | नः | कुरु | प्रजाभ्यः | अभयं | नः | पशुभ्यः |


📖 यजुर्वेद मंत्र 36.22 का सरल हिन्दी अर्थ

हे परमेश्वर!
आप जहाँ-जहाँ से हमारे जीवन में प्रकट होते हैं,
वहाँ-वहाँ से हमें निर्भयता प्रदान करें।
हमारी संतानों (प्रजा) के लिए कल्याण करें
और हमारे पशुओं को भी भय से मुक्त रखें।


🌼 भावार्थ (तात्त्विक व्याख्या)

यह मंत्र सर्वव्यापक अभय की कामना करता है।
वैदिक दृष्टि में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि—

  • समाज
  • संतान
  • पशु
  • सम्पूर्ण सृष्टि

सभी का सुरक्षा और शांति में जीवन परम लक्ष्य है।
यह मंत्र ईश्वर की करुणा, संरक्षण और सर्वकल्याण भावना को प्रकट करता है।


🕯️ इस मंत्र के आध्यात्मिक लाभ

  • भय और असुरक्षा का नाश
  • मानसिक शांति और आत्मबल
  • परिवार और संतानों की रक्षा
  • पशुओं और प्रकृति के प्रति करुणा
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार

📿 मंत्र जप विधि

  • समय: प्रातः या संध्या
  • जप संख्या: 11, 21 या 108 बार
  • भाव: अभय, शांति और लोक-कल्याण

🕉️ वैदिक संदेश

यजुर्वेद का यह मंत्र सिखाता है कि सच्चा धर्म वही है जो

“सबके लिए सुरक्षा, शांति और निर्भयता की कामना करे।”


🔗 निष्कर्ष

यजुर्वेद मंत्र 36.22 केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि
एक सार्वभौमिक जीवन-दृष्टि है,
जो मानव, पशु और समाज—सभी के कल्याण का मार्ग दिखाती है।


🕉️ अभय सूक्त मंत्र का अर्थ, भावार्थ और लाभ

(चारों दिशाओं से निर्भयता की वैदिक प्रार्थना)

अभय सूक्त मंत्र का अर्थ | चारों दिशाओं से निर्भयता का वैदिक मंत्र अभय सूक्त के वैदिक मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ, भावार्थ और आध्यात्मिक लाभ जानिए। यह मंत्र अंतरिक्ष, पृथ्वी, आकाश और चारों दिशाओं से अभय की कामना करता है।


📌 Focus Keywords

  • अभय सूक्त मंत्र
  • अभय का वैदिक मंत्र
  • वैदिक शांति मंत्र
  • चारों दिशाओं से अभय
  • वेद मंत्र हिन्दी अर्थ

📜 अभय सूक्त मंत्र (मूल पाठ)


नः अभयं नः कार्त्यन्तरिक्षमभ्यं
द्यावापृथिवी उभे इमे।
अभयं पश्चादभ्यं पुरस्ताद्
उत्तरादधराद्भयं नो अस्तु॥


✍️ पदच्छेद

नः | अभयम् | नः | कर्तु | अन्तरिक्षम् | अभयम् |
द्यावापृथिवी | उभे | इमे |
अभयम् | पश्चात् | अभयम् | पुरस्तात् |
उत्तरात् | अधरात् | अभयम् | नः | अस्तु |


📖 अभय सूक्त मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ

हे परमेश्वर!
हमें अंतरिक्ष से भी अभय प्राप्त हो,
आकाश और पृथ्वी—ये दोनों हमें निर्भय रखें।
पीछे से, आगे से, ऊपर से और नीचे से
हर दिशा में हमें भय से मुक्ति प्राप्त हो।


🌼 भावार्थ (तात्त्विक व्याख्या)

यह मंत्र पूर्ण सुरक्षा और सर्वांगीण निर्भयता की वैदिक कामना है। वैदिक ऋषि जानते थे कि भय केवल एक दिशा से नहीं आता,
इसलिए यह प्रार्थना—

  • अंतरिक्ष
  • पृथ्वी
  • आकाश
  • चारों दिशाएँ

सबसे अभय चाहती है।
यह मंत्र जीवन में आत्मिक साहस, मानसिक शांति और दैवी संरक्षण को जाग्रत करता है।


🕯️ इस मंत्र के आध्यात्मिक लाभ

  • चारों दिशाओं से भय का नाश
  • मानसिक अस्थिरता और चिंता से मुक्ति
  • नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
  • आत्मबल और साहस की वृद्धि
  • परिवार और गृह की सुरक्षा

📿 मंत्र जप विधि

  • समय: प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या संध्या
  • जप संख्या: 11, 21 या 108 बार
  • भाव: निर्भयता, शांति और संरक्षण

🕉️ वैदिक संदेश

यह अभय सूक्त सिखाता है कि

“जहाँ अभय है, वहीं धर्म है और वहीं शांति है।”


🔗 निष्कर्ष

अभय सूक्त का यह मंत्र जीवन को
डर, अशांति और असुरक्षा से मुक्त कर
पूर्ण निर्भयता और संतुलन प्रदान करता है।


🙏
नीचे अथर्ववेद (19.15.5–6) के मंत्र की सरल, शुद्ध व्याख्या प्रस्तुत है—


🕉️ मंत्र


अभयं मित्रादभयममित्राद्
अभयं ज्ञातादभयं प्ररोक्षतः।
अभयं नक्तमभयं दिवा नः,
सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥
(अथर्ववेद संहिता 19.15.5–6)


📖 सरल अर्थ

हमें मित्रों से भी अभय प्राप्त हो
और शत्रुओं से भी अभय मिले।
हमें परिचित से भी भय न हो
और अपरिचित या दूरस्थ से भी भय न हो।
हमें रात में भी निर्भयता मिले
और दिन में भी निर्भयता प्राप्त हो।
मेरे लिए सभी दिशाएँ और सभी आशाएँ मित्र बन जाएँ।


🌼 भावार्थ

यह मंत्र पूर्ण निर्भयता की सर्वोच्च वैदिक प्रार्थना है।
यह केवल शत्रु से रक्षा नहीं माँगता,
बल्कि यह भी कहता है कि—

  • मित्र से भी भय न हो
  • अपने से भी डर न लगे
  • अज्ञात, अंधकार और भविष्य से भी भय न रहे

दिन–रात, भीतर–बाहर, ज्ञात–अज्ञात —
हर स्तर पर अभय हो।

मंत्र का अंतिम भाव अत्यन्त गहन है:

“जब मन निर्भय हो जाता है, तब पूरी सृष्टि मित्र बन जाती है।”


🕯️ आध्यात्मिक संकेत

  • भय का मूल बाहर नहीं, मन के भीतर होता है
  • अभय की स्थिति में द्वेष समाप्त हो जाता है
  • जहाँ अभय है, वहीं मैत्री और शांति है

यह मंत्र व्यक्ति को
भय से ऊपर उठाकर विश्व-मैत्री की अवस्था में ले जाता है।


📿 प्रयोग

  • भय, तनाव या असुरक्षा के समय
  • रात्रि जप के लिए विशेष उपयुक्त
  • ध्यान से पहले या बाद
  • आत्मबल और साहस बढ़ाने हेतु

🙏
नीचे प्रस्तुत है अथर्ववेद (19.15.5–6) के इस मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या—वैदिक, उपनिषदिक और मनोवैज्ञानिक स्तरों को जोड़ते हुए।


🕉️ मंत्र


अभयं मित्रादभयममित्राद्
अभयं ज्ञातादभयं प्ररोक्षतः।
अभयं नक्तमभयं दिवा नः,
सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥
(अथर्ववेद संहिता 19.15.5–6)


1. अभय : भय-निवृत्ति नहीं, भय-उत्तीर्णता

वैदिक दर्शन में अभय का अर्थ केवल “भय का न होना” नहीं है।
अभय वह अवस्था है जहाँ—

  • भय उत्पन्न ही नहीं होता
  • भय का कारण ही समाप्त हो जाता है

उपनिषद कहते हैं—

“द्वितीयाद्वै भयम् भवति”
(दूसरे की अनुभूति से ही भय जन्म लेता है)

अतः अभय = अद्वैत की अनुभूति।


2. “मित्र” और “अमित्र” : बाह्य नहीं, आन्तरिक विभाजन

मंत्र कहता है—
“अभयं मित्रात्, अभयम् अमित्रात्”

यह केवल सामाजिक सम्बन्धों की बात नहीं है।
दार्शनिक दृष्टि से—

  • मित्र = जो मन के अनुकूल है
  • अमित्र = जो मन के प्रतिकूल है

जब मन द्वन्द्व में है,
तो मित्र भी भय देता है और शत्रु भी।
अभय तब आता है जब मन का पक्षपात समाप्त होता है।


3. ज्ञात और प्ररोक्ष : स्मृति और भविष्य का भय

ज्ञात से भय =
बीते हुए अनुभवों, स्मृतियों, आघातों का भय

प्ररोक्ष से भय =
भविष्य, अज्ञात, अनिश्चितता का भय

यह मंत्र कहता है—
अभय तब है जब मन
न अतीत में अटका हो
न भविष्य में काँप रहा हो

अभय = वर्तमान में पूर्ण स्थित होना।


4. दिन और रात : चेतन और अचेतन मन

दिन = जाग्रत चेतना
रात = अवचेतन, स्वप्न, अज्ञान

रात्रि में भय अधिक होता है क्योंकि
अहंकार शिथिल पड़ता है।

यह मंत्र अचेतन स्तर तक
अभय का संचार चाहता है—
जहाँ स्वप्न भी शान्त हों।


5. “सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु” : विश्व-मैत्री का शिखर

यह मंत्र का दार्शनिक शिखर है।

आशा = दिशा + अपेक्षा + भविष्य

जब सभी आशाएँ मित्र बन जाती हैं,
तो—

  • अपेक्षा भय नहीं देती
  • भविष्य शत्रु नहीं रहता
  • दिशा भटकाती नहीं

यह वही अवस्था है जिसे बौद्ध दर्शन में
मैत्री भाव,
योग में निर्भयता,
और वेदान्त में जीवन्मुक्ति कहा गया है।


6. निष्कर्ष : अभय = आत्मसत्ता में प्रतिष्ठा

अभय का अंतिम रहस्य यह है—

“जो आत्मा में स्थित है,
उसे संसार से भय नहीं हो सकता।”

यह मंत्र किसी बाहरी रक्षा की याचना नहीं,
बल्कि आत्मिक स्थिति का उद्घोष है।

जब अभय प्रकट होता है—
तो शत्रु नहीं रहता,
रात्रि नहीं डराती,
भविष्य मित्र बन जाता है,
और सम्पूर्ण जगत् सहचर हो जाता है।


🙏
नीचे प्रस्तुत है ऋग्वेद संहिता (9.67.21) के इस मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या—वैदिक सोम-दर्शन, चेतना और भय-तत्त्व के आलोक में।


🕉️ मंत्र


यद् अन्ति यच्च दूरके भयं विन्दति मामिः।
पवमान वि तज्जहि॥
(ऋग्वेद संहिता 9.67.21)


1. “अन्ति” और “दूरक” : भय का द्वि-आयाम

मंत्र कहता है—
“यद् अन्ति यच्च दूरके भयं विन्दति”

अन्ति = समीप, निकट
दूरक = दूर, अप्रकट

यह बताता है कि भय—

  • केवल निकट संकट से नहीं
  • बल्कि दूरस्थ आशंका से भी उत्पन्न होता है

दार्शनिक रूप से—

  • निकट भय = वर्तमान अनुभव
  • दूर भय = कल्पना, अनुमान, भविष्य

मनुष्य अधिकतर दूर के भय से पीड़ित रहता है।


2. “मामिः” : सीमित अहं का प्रतीक

मामिः शब्द का भाव है—
“मुझ तक पहुँचने वाला”

यह अहंकार-संबद्ध चेतना को दर्शाता है—
वह “मैं” जो स्वयं को
शरीर, नाम और परिस्थिति से जोड़ लेता है।

भय उसी “मैं” को होता है
जो सीमित है।
असीम आत्मा को भय नहीं।


3. “पवमान” : शुद्ध होती चेतना

यह मंत्र सोम-स्तुति का है।

पवमान =
जो स्वयं को शुद्ध करता हुआ बहता है

दार्शनिक अर्थ में—

  • सोम = प्राण, आनन्द, चेतना-धारा
  • पवमान = परिशुद्ध होती हुई चेतना

यह चेतना जब प्रवाहित होती है,
तो मन के मल—
भय, शंका, असुरक्षा—
स्वतः धुल जाते हैं।


4. “वि तज्जहि” : भय का उच्छेदन, दमन नहीं

वि तज्जहि का अर्थ केवल “हटा दो” नहीं है।
“वि” उपसर्ग विघटन का बोध कराता है।

अर्थात्—

  • भय को दबाना नहीं
  • भय से लड़ना नहीं
  • बल्कि भय की जड़ को भंग कर देना

जड़ = अज्ञान + अहं-केन्द्रितता।


5. सोम-दर्शन और अभय की अवस्था

ऋग्वैदिक सोम कोई बाह्य द्रव्य नहीं,
वह आनन्द-स्रोत है।

जब चेतना सोम-भाव में आती है—

  • मन प्रसन्न होता है
  • अहं शिथिल होता है
  • भय अप्रासंगिक हो जाता है

उपनिषद कहता है—

“आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते”

आनन्द में भय का स्थान नहीं।


6. दार्शनिक निष्कर्ष

यह मंत्र कहता है—

“जो भय निकट है या दूर,
वह तभी तक है जब तक
चेतना अशुद्ध और अहं-केन्द्रित है।”

जब पवमान सोम—
अर्थात् शुद्ध, आनन्दमय चेतना—
प्रवाहित होती है,
तो भय नष्ट नहीं,
अप्रासंगिक हो जाता है।

यही वैदिक अभय का रहस्य है।


🙏
नीचे आपके दिए गए मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत है—वैदिक ब्रह्माण्ड-दृष्टि, प्राण-तत्त्व और अभय की अन्तःचेतना के स्तर पर।


🕉️ मंत्र

यथा द्यौश्च पृथिवी च न विभीतो न रिष्यतः।
एवा मे प्राण मा बिभेः॥


1. द्यौः और पृथिवी : ब्रह्माण्डीय स्थैर्य का प्रतीक

द्यौः (आकाश/स्वर्ग) और पृथिवी
वैदिक दर्शन में केवल भौतिक तत्त्व नहीं हैं, बल्कि—

  • द्यौः = विस्तार, चेतना, व्यापकता
  • पृथिवी = आधार, धैर्य, स्थिरता

ये दोनों—

  • न भयभीत होते हैं
  • न विचलित होते हैं
  • न अपने धर्म से गिरते हैं

यह ब्रह्माण्ड का अचल संतुलन है।


2. “न विभीतः, न रिष्यतः” : धर्म-स्थिति

यहाँ भय का अभाव केवल भावनात्मक नहीं,
बल्कि धर्म में प्रतिष्ठा का सूचक है।

  • जो अपने स्वभाव (स्वधर्म) में स्थित है
  • वह भयभीत नहीं होता
  • और उसका नाश नहीं होता

उपनिषद कहता है—

“स्वधर्मे निधनं श्रेयः”


3. प्राण : जीवन-शक्ति, अहं नहीं

मंत्र का केन्द्रीय बिंदु है— “एवा मे प्राण मा बिभेः”

यहाँ “प्राण” केवल श्वास नहीं है।

प्राण =

  • जीवन की मूल ऊर्जा
  • चेतना और शरीर के बीच का सेतु
  • समस्त क्रियाओं का आधार

भय वास्तव में प्राण का संकुचन है।
जब भय आता है—

  • श्वास उथली हो जाती है
  • जीवन-प्रवाह रुकता-सा लगता है

4. बाह्य ब्रह्माण्ड से आन्तरिक अनुकरण

यह मंत्र एक गहन वैदिक विधि सिखाता है—

बाह्य ब्रह्माण्ड जैसा है,
वैसा ही आन्तरिक जीवन बने।

जैसे—

  • आकाश भयमुक्त है
  • पृथिवी स्थिर है

वैसे ही—

  • मेरा प्राण निर्भय हो
  • मेरी जीवन-शक्ति अविचल रहे

यह सूक्ष्म ब्रह्माण्ड (पिण्ड) और
स्थूल ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड) का ऐक्य है।


5. भय का मूल : प्राण से विच्छेद

दार्शनिक रूप से—

  • भय = प्राण से दूरी
  • निर्भयता = प्राण में प्रतिष्ठा

जब चेतना—

  • शरीर या परिस्थिति से चिपक जाती है
  • तब प्राण अस्थिर होता है

लेकिन जब चेतना—

  • ब्रह्माण्डीय लय में आती है
  • तब प्राण स्वतः निर्भय हो जाता है

6. साधना-सूत्र (अन्तर्निहित)

यह मंत्र केवल प्रार्थना नहीं,
अन्तर-साधना का सूत्र है—

  • श्वास लेते समय
    “एवा मे प्राण”
  • छोड़ते समय
    “मा बिभेः”

इससे—

  • भय शिथिल होता है
  • प्राण स्थिर होता है
  • मन ब्रह्माण्डीय लय से जुड़ता है

7. दार्शनिक निष्कर्ष

यह मंत्र कहता है—

“जो ब्रह्माण्ड के समान
अपने प्राण में स्थिर हो जाता है,
उसे भय छू नहीं सकता।”

अभय कोई वस्तु नहीं,
वह स्थिति है—
जहाँ जीवन-शक्ति स्वयं को
अनन्त व्यवस्था का अंग जान लेती है।


🙏
नीचे प्रस्तुत है आपके दिए हुए मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या—वैदिक सत्य-दर्शन, मन, स्वधर्म और मृत्यु-बोध के आलोक में।


🕉️ मंत्र

सत्यमेवाभिजानिमो, नानृते कूर्महे मनः।
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभ्यं न नः॥


1. “सत्यमेवाभिजानिमो” : सत्य = बौद्धिक नहीं, अस्तित्वगत

यहाँ सत्य का अर्थ केवल
“सही बात बोलना” नहीं है।

वैदिक दर्शन में—

  • सत्य = जो है
  • जो बदलता नहीं
  • जो काल, स्थिति और देह से परे है

अभिजानिमो का अर्थ है—
“हमने जाना है”,
पर यह जानना सूचना नहीं,
अनुभूति है।

अर्थात्—

“हम सत्य को जानते नहीं,
हम सत्य में स्थित हैं।”


2. “नानृते कूर्महे मनः” : मन की दिशा ही जीवन की दिशा

अनृत = असत्य, भ्रम, माया
कूर्महे मनः = मन को प्रवृत्त करना

यहाँ साधक घोषणा करता है—

“हम अपने मन को
असत्य की ओर प्रवृत्त नहीं करते।”

दार्शनिक रूप से—

  • असत्य = जो क्षणिक है
  • जो भय उत्पन्न करता है
  • जो अहं को पोषित करता है

मन जहाँ जाता है,
वहीं जीवन बहने लगता है।


3. सत्य और निर्भयता का गुप्त सम्बन्ध

उपनिषद कहते हैं—

“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”

सत्य में स्थित मन—

  • विभाजित नहीं होता
  • भयभीत नहीं होता
  • मृत्यु से आतंकित नहीं होता

क्योंकि भय हमेशा
अस्थायी से चिपकने से आता है।


4. “स्वधर्ममनुतिष्ठामः” : कर्तव्य नहीं, स्वभाव में प्रतिष्ठा

स्वधर्म यहाँ
सामाजिक भूमिका नहीं है।

स्वधर्म =

  • अपनी आत्मा का स्वभाव
  • अपनी चेतना की लय
  • अपना सत्य रूप

जब व्यक्ति—

  • दूसरों का धर्म जीता है
  • या अपेक्षाओं में जीता है

तो भीतर द्वन्द्व होता है,
और वहीं से भय जन्म लेता है।


5. मृत्यु का भय : असत्य जीवन का परिणाम

मंत्र का अंतिम भाग अत्यन्त गहन है—

“तस्मान् मृत्युभ्यं न नः”
= इसलिए हमें मृत्यु का भय नहीं।

यह कोई कामना नहीं,
यह तार्किक परिणाम है।

क्योंकि—

  • जो सत्य में जीता है
  • जो मन को असत्य से हटाता है
  • जो स्वधर्म में स्थित है

वह जानता है—

मृत्यु परिवर्तन है,
न कि विनाश।


6. दार्शनिक सूत्र : क्यों सत्य मृत्यु-भय हरता है?

  • असत्य = अहं = भय
  • सत्य = आत्मा = अभय

मृत्यु का भय
शरीर को “मैं” मानने से है।

जो आत्मा को “मैं” जानता है,
उसके लिए मृत्यु
केवल एक घटना है,
अन्त नहीं।


7. समग्र निष्कर्ष

यह मंत्र घोषणा करता है—

“हम सत्य में स्थित हैं,
हमारा मन भ्रम की ओर नहीं जाता,
हम अपने स्वभाव में जीते हैं,
इसलिए मृत्यु भी हमें भयभीत नहीं कर सकती।”

यह मंत्र
आचार, चेतना और मुक्ति—
तीनों को एक सूत्र में बाँध देता है।


🙏
नीचे आपके दिए गए मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत है—नैतिकता, वाणी, कर्म और अमृत्युभय (मृत्यु-भय से परे अवस्था) के वैदिक रहस्य के आलोक में।


🕉️ मंत्र

नैषां दुष्चरितं ब्रूमस्तस्मानमृत्युभयं न नः॥


1. “नैषां दुष्चरितं ब्रूमः” : वाणी का शुद्धिकरण

यहाँ दुष्चरित केवल गलत कर्म नहीं है,
बल्कि—

  • दूसरों के दोषों का निरन्तर चिन्तन
  • निन्दा, आरोप और मानसिक हिंसा
  • वाणी और मन का कलुष

ब्रूमः = हम बोलते हैं, व्यक्त करते हैं।

मंत्र कहता है—

“हम दूसरों के दुष्कर्मों का उच्चारण नहीं करते।”

दार्शनिक रूप से यह बहुत गहरा सूत्र है:
जिसे हम बोलते हैं,
उसी में चेतना निवास करने लगती है।


2. दोष-दृष्टि और मृत्यु-भय का सम्बन्ध

दोष देखने वाला मन—

  • विभाजन करता है
  • “मैं” और “वह” बनाता है
  • स्वयं को अलग और असुरक्षित अनुभव करता है

यही विभाजन
भय का मूल है।

उपनिषद कहते हैं—

“द्वितीयाद्वै भयम् भवति”
(दूसरे की अनुभूति से ही भय उत्पन्न होता है)


3. निन्दा = कर्म-बन्धन

वैदिक दर्शन में—

  • केवल कर्म ही नहीं
  • कर्म-भाव भी बन्धन उत्पन्न करता है

दूसरों के दुष्चरित का प्रचार—

  • मन को विषाक्त करता है
  • अहं को पुष्ट करता है
  • चेतना को नीचे की ओर खींचता है

ऐसी चेतना
मृत्यु से भयभीत रहती है,
क्योंकि वह संकीर्ण है।


4. “तस्मान् अमृत्युभयं न नः” : अमृत्युभय की अवस्था

अमृत्युभय का अर्थ है—
मृत्यु से परे का भय,
अर्थात् मृत्यु-भय का अभाव।

यह कोई आशा नहीं,
यह स्वाभाविक फल है।

जब—

  • मन निन्दा से मुक्त हो
  • वाणी शुद्ध हो
  • चेतना करुणा में स्थित हो

तो व्यक्ति स्वयं को
अलग इकाई नहीं,
समग्र जीवन-प्रवाह का अंग अनुभव करता है।

और जो समग्र है,
वह नष्ट कैसे होगा?


5. मौन, करुणा और अभय

यह मंत्र अप्रत्यक्ष रूप से
मौन और करुणा की साधना सिखाता है।

  • जहाँ निन्दा नहीं
  • वहाँ वैर नहीं
  • जहाँ वैर नहीं
  • वहाँ भय नहीं

और जहाँ भय नहीं,
वहाँ मृत्यु भी
केवल रूपान्तरण बन जाती है।


6. गहन सूत्र (Hidden Sutra)

दोष-दृष्टि = मृत्यु-भय
करुणा-दृष्टि = अमृत-स्थिति

यह मंत्र बताता है कि
मुक्ति का मार्ग
बड़ी तपस्या से नहीं,
दृष्टि-परिवर्तन से खुलता है।


7. समग्र निष्कर्ष

यह मंत्र कहता है—

“हम किसी के दुष्चरित का उच्चारण नहीं करते,
इसलिए हमारी चेतना कलुषित नहीं होती,
और इसी कारण
मृत्यु भी हमें भयभीत नहीं कर सकती।”

यह नैतिक व्रत नहीं,
यह अस्तित्वगत रहस्य है।

जो निन्दा से मुक्त है,
वह भय से मुक्त है।
और जो भय से मुक्त है,
वह अमृत के समीप है।


🙏
नीचे आपके दिए हुए मंत्र की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत है—वैदिक अतिथि-धर्म, अहं-त्याग, साझा-भोग और मृत्यु-भय से मुक्ति के गूढ़ तत्त्व के आलोक में।


🕉️ मंत्र

अतिथिन्नन्नपानेन भृत्यन्त्यशनेन च।
सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः॥


1. अतिथि : बाह्य व्यक्ति नहीं, जीवन का आगमन

वैदिक दृष्टि में अतिथि केवल कोई बाहर से आया व्यक्ति नहीं है।
अतिथि = अ-तिथि — जो समय बाँधकर नहीं आता।

दार्शनिक अर्थ में—

  • अतिथि = जीवन की अनपेक्षित घटना
  • अतिथि = दूसरा व्यक्ति
  • अतिथि = स्वयं “दूसरे” का अस्तित्व

अतिथि को स्वीकार करना =
अनिश्चितता को स्वीकार करना

और जो अनिश्चितता को स्वीकार कर लेता है,
उसे मृत्यु से भय नहीं रहता।


2. अन्न–पान और अशना : जीवन-ऊर्जा का प्रवाह

अन्न, पान, अशन
केवल भोजन नहीं हैं।

ये—

  • प्राण-ऊर्जा के रूप
  • जीवन के प्रवाह के माध्यम

जब व्यक्ति—

  • पहले दूसरे को खिलाता है
  • स्वयं बाद में ग्रहण करता है

तो वह घोषणा करता है—

“जीवन मेरा निजी भोग नहीं है।”

यहीं से अहं ढीला पड़ता है।


3. भृत्य : अधीन नहीं, आश्रित चेतना

भृत्य को भोजन देना
केवल सामाजिक दया नहीं है।

भृत्य =

  • वह जो मुझ पर निर्भर है
  • वह जो मेरी शक्ति से जी रहा है

दार्शनिक रूप से— यह स्वीकार है कि
मेरे अस्तित्व से
दूसरों का अस्तित्व जुड़ा है।

यह बोध
व्यक्ति को अलग-थलग इकाई नहीं रहने देता।


4. “सम्भोज्य शेषमश्नीमः” : साझा-भोग का रहस्य

यह मंत्र का केन्द्रीय सूत्र है।

पहले—

  • अतिथि
  • आश्रित
  • दूसरा

फिर—

  • स्वयं

यह क्रम बताता है—

“मैं केन्द्र नहीं हूँ।”

जहाँ “मैं केन्द्र नहीं”
वहाँ मृत्यु-भय टिक नहीं सकता।

क्योंकि मृत्यु-भय
हमेशा उस “मैं” को होता है
जो स्वयं को सब कुछ मानता है।


5. मृत्यु-भय क्यों मिटता है?

“तस्मान् मृत्युभयं न नः”
यह कोई प्रार्थना नहीं,
यह स्वाभाविक फल है।

कारण स्पष्ट है—

  • जो जीवन बाँटता है
  • जो स्वयं को प्रवाह का अंग जानता है
  • जो भोग को साझा करता है

वह जान लेता है—

जीवन किसी एक देह में बन्द नहीं है।

और जो जीवन को प्रवाह जानता है,
वह मृत्यु को रुकावट नहीं,
परिवर्तन समझता है।


6. अतिथि-धर्म = अमृत-धर्म

उपनिषद कहते हैं—

“त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”

यह मंत्र उसी त्याग को
दैनिक जीवन में उतारता है—

  • त्याग का अर्थ वस्तु छोड़ना नहीं
  • त्याग = “केन्द्र” छोड़ना

जब केन्द्र छूटता है,
तो मृत्यु का डर भी छूट जाता है।


7. दार्शनिक निष्कर्ष

यह मंत्र कहता है—

“जो पहले दूसरों को जीवन देता है,
और स्वयं शेष में जीता है,
वह जान लेता है कि
जीवन उससे बड़ा है—
इसलिए मृत्यु उसे भयभीत नहीं कर सकती।”

अतिथि-धर्म यहाँ
नैतिक नियम नहीं,
अमृतत्व की साधना है।



🙏
नीचे आपके दिए गए श्लोकों की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत है—महाभारतीय धर्म-दृष्टि, आचार, तेजस् और मृत्यु-भय से अतिक्रमण के आलोक में।


🕉️ श्लोक

शान्ता दन्ताः क्षमाशीलाः स्थितदानपरायणाः।
पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभ्यं न नः॥
तेजस्रावसाच्च तस्मान्मृत्युभ्यं न नः॥

(महाभारत, वनपर्व 184.18–21)


1. शान्त और दन्त : इन्द्रिय-विजय = अमृत की पहली सीढ़ी

शान्त = बाह्य शान्ति नहीं,
बल्कि अन्तःकलह का अभाव

दन्त = जिसने इन्द्रियों को दबाया नहीं,
बल्कि उनका स्वामी बन गया।

दार्शनिक रूप से—

  • इन्द्रिय-असंयम = मृत्यु-भय
  • इन्द्रिय-विजय = अभय

क्योंकि मृत्यु का भय
उसी को होता है
जो भोग से चिपका होता है।


2. क्षमाशीलता : अहं के विघटन की शक्ति

क्षमा नैतिक उदारता नहीं,
बल्कि गहन आत्मबोध है।

जो क्षमा करता है—

  • वह स्वयं को आहत “अहं” नहीं मानता
  • वह चोट को अपनी सत्ता तक पहुँचने नहीं देता

अहं जितना बड़ा,
मृत्यु-भय उतना गहरा।

क्षमा = अहं का क्षय
अहं-क्षय = मृत्यु-भय का क्षय


3. स्थितदानपरायणता : देना, परन्तु स्थिति में

यहाँ दान का अर्थ केवल वस्तु देना नहीं।

स्थितदान =

  • अस्थिर भावुकता से नहीं
  • अपेक्षा या अहं से नहीं
  • बल्कि आन्तरिक स्थिरता से दिया गया दान

ऐसा दान
दाता को कर्ता नहीं बनाता,
बल्कि माध्यम बना देता है।

और जो माध्यम है,
वह नष्ट कैसे होगा?


4. पुण्यदेशनिवास : स्थान का नहीं, चेतना का विधान

पुण्यदेश कोई भौगोलिक क्षेत्र नहीं है।

दार्शनिक अर्थ—

  • जहाँ हिंसा नहीं
  • जहाँ असत्य नहीं
  • जहाँ लोभ नहीं

वह चेतना-प्रदेश पुण्यदेश है।

जो ऐसी चेतना में निवास करता है,
वह जीवन को विखण्डित नहीं देखता,
इसलिए मृत्यु उसे भय नहीं देती।


5. तेजस्रावसः : दमन नहीं, प्रखर पवित्रता

यह श्लोक का अत्यन्त सूक्ष्म सूत्र है।

तेजस् =

  • आत्मबल
  • विवेक
  • चेतना की ज्वाला

स्राव = प्रवाह

अर्थात्—

  • तेजस् भीतर दबा नहीं
  • अहंकार बनकर फूटा नहीं
  • बल्कि धर्म में प्रवाहित हुआ

ऐसा तेजस्—

  • भय को जला देता है
  • पर क्रूर नहीं बनता

यह तपस् का परिष्कृत रूप है।


6. मृत्यु-भय क्यों नहीं रहता?

हर पंक्ति के बाद आता है—

“तस्मान् मृत्युभयं न नः”

यह कामना नहीं,
यह स्वाभाविक निष्कर्ष है।

क्योंकि—

  • जो शान्त है, वह बिखरता नहीं
  • जो दन्त है, वह भोग में डूबता नहीं
  • जो क्षमाशील है, वह संकुचित नहीं
  • जो देता है, वह सीमित नहीं
  • जो तेजस्वी है, वह निर्बल नहीं

मृत्यु का भय
सदैव दुर्बल, संकीर्ण
और अहं-केन्द्रित चेतना को होता है।


7. समग्र दार्शनिक सूत्र

आचार = चेतना का विस्तार
विस्तार = अभय
अभय = अमृत-समीपता

यह श्लोक बताता है— मृत्यु से मुक्ति
किसी एक साधना से नहीं,
बल्कि सम्पूर्ण जीवन-चर्या से आती है।


8. अन्तिम निष्कर्ष

महाभारत यहाँ यह घोषणा करता है—

“जो जीवन में शान्त, संयमी, क्षमाशील, दानी,
पुण्य-चेतना में स्थित और तेजस्वी है,
उसके लिए मृत्यु केवल
एक परिवर्तन है,
भय नहीं।”

यह धर्म-शास्त्र नहीं,
यह अस्तित्व-शास्त्र है।




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