यह श्लोक विद्या की अद्वितीय महिमा को अत्यंत स्पष्ट और तर्कपूर्ण रूप से स्थापित करता है। नीचे इसे शब्दार्थ → सरल व्याख्या → गूढ़ भावार्थ → आधुनिक संदर्भ → निष्कर्ष के क्रम में प्रस्तुत कर रहा हूँ,
सर्वद्रव्येषु विद्यैव, द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
इस श्लोक का सीधा अर्थ है—
सभी प्रकार की संपत्तियों में
विद्या को ही सर्वोत्तम संपत्ति कहा गया है,
क्योंकि—
विद्या को कोई छीन नहीं सकता,
उसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता
और वह कभी नष्ट नहीं होती।
यह श्लोक तीन ठोस कारणों से विद्या को सर्वोच्च सिद्ध करता है—
👉 विद्या व्यक्ति के भीतर होती है।
👉 विद्या का कोई मूल्य नहीं—
वह अनंत मूल्य रखती है।
👉 विद्या बाँटने से बढ़ती है,
घटती नहीं।
आज का युग:
इन सबमें—
केवल विद्या ही वह संपत्ति है
जो हर परिस्थिति में साथ देती है।
💰 धन संकट में साथ छोड़ सकता है
📉 पद बदल सकते हैं
🔥 संपत्ति नष्ट हो सकती है
लेकिन—
📚 विद्या हर स्थिति में मनुष्य को सक्षम बनाती है।
इसलिए शास्त्र स्पष्ट कहते हैं—
सभी पदार्थों में
विद्या ही सर्वोत्तम पदार्थ है।
जो विद्या को जीवन का धन बना लेता है,
वह कभी दरिद्र नहीं होता।
संयोजयति विधैव, नीचगापि नरं सरित् ।
समुद्रमिव दुर्धर्ष, नृपं भाग्यमतः परम् ।।
अतिसामान्य मनुष्य में भी स्थित विद्या, उस मनुष्य को राजा से उसी प्रकार मिला देती है, जैसे नीचे की ओर प्रवाहित होने वाली भी नदी (नौकादि में स्थित) मनुष्य को प्रचण्ड समुद्र तक पहुँचा देती है । इसके पश्चात् मनुष्य के पूर्वोपार्जित कर्म भी उसके साथ होते हैं ।
विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्म ततः सुखम् ।। (हितोपदेशः (प्रस्तावना) - ४-६)
विद्या मनुष्य में नम्रता का आधान करती है । मनुष्य नम्रता से सत्पात्रता (योग्यता) को प्राप्त होता है । पात्रता से धन को प्राप्त करता है और धन से धर्म को तथा धर्म से सुख को प्राप्त करता है ।
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते, निर्गन्धा इव किंशुकाः ।। (हितोपदेशः (प्रस्तावना) - ३९)
जो सुन्दर रूप और यौवन से सम्पन्न तथा बड़े कुल में भी जन्मे हुए हों, किन्तु यदि विद्या से रहित हों, तो ऐसे मनुष्य वैसे ही शोभित नहीं होते, जैसे गन्धरहित ढाक के फूल ।
विद्या बृंहणानामुत्कृष्टतमम् ।। (चरकसंहिता (सूत्रस्थानम्) -)
मन, बुद्धि शरीरादि का विकास करने वाले पदार्थों में विद्या सर्वश्रेष्ठ है ।
मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते, कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् ।
कीर्त्ति च दिक्षु विमलां वितनोति लक्ष्मीं, किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।। (भोजप्रबन्धः - ५)
विद्या, मनुष्य की माता के समान रक्षा करती है, पिता के समान उसे हितकारक कर्म में नियुक्त करती है और पत्नी के समान उसके कष्टों को मिटाकर उसे सुप्रसन्न करती है । उसके यश को सब दिशाओं में फैलाती है और उसके ऐश्वर्य को बढ़ाती है । इस प्रकार विद्या कल्पलता के समान मनुष्य का कौन कौन सा कार्य सिद्ध नहीं करती !
हर्तुर्याति च गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत् सर्वदा, हार्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।।
जो चोर की दृष्टि में नहीं आता, जो सदा शान्ति प्रदान करता है, याचकों को दिन रात देने पर भी जो अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होता है और जो युगयुगान्तरों में भी नाश को
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं, विद्याख्यमन्तर्धनं, येषां तान् प्रति मानमुज्झत नृपाः । कस्तैः सह स्पर्धते ।।
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं, हारा न चन्द्रोज्ज्वला, (नीतिशतकम् - १६) न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं, नालङ्कृता मूर्धजाः ।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं, या संस्कृता धार्यते, क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणम् ।। (नीतिशतकम् -१९)
मनुष्य को न बाजूबन्द सुशोभित कर सकते हैं न चन्द्रमा से चमकते हार; न उसे स्नान सुन्दर बना सकता है और न चन्दनादि का लेपन; न सुन्दर पुष्प और न सजे संवरे केश। एकमात्र वह विद्यामयी वाणी ही मनुष्य को सुशोभित कर सकती है, जो कि सुसंस्कारों से युक्त हो । वास्तव में अन्य भौतिक आभूषण अतितुच्छ हैं और विद्यारूपी आभूषण ही सच्चा आभूषण है ।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं, प्रच्छन्नगुप्तं धनं, विद्या भोगकरी यशः सुखकरी, विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने, विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं, विद्याविहीनः पशुः ।। (नीतिशतकम् - २०)
विद्या मनुष्य का महत्त्ववर्धक असली सौन्दर्य है और छिपा हुआ सुरक्षित घन है; विद्या भोगों को देने वाली और कीर्ति तथा सुख को उत्पन्न करने वाली है; विद्या गुरुओं का भी गुरु है । विदेश में विद्या ही बन्धु है और विद्या परम देवता है । विद्या ही राजाओं के यहाँ आदर पाती है, धन नहीं, अतः विद्या से रहित मनुष्य पशु के समान है ।
अनेकसंशयोच्छेदि, परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं, यस्य नास्त्यन्ध एव सः ।। (हितोपदेशः (प्रस्तावना) -१०)
अनेक सन्देहों को मिटाने वाला और परोक्ष वस्तु का भी ज्ञान कराने वाला शास्त्र (विद्या) सब मनुष्यों का असली नेत्र है । वह विद्या रूपी नेत्र जिसके पास नहीं है, वह चक्षु वाला होते हुए भी अन्धा है ।
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीताऽवरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्म, स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।। (मनुस्मृतिः -)
मनुष्य; श्रद्धा रखता हुआ अपने से कम गुण वाले व्यक्ति से भी विद्या ग्रहण कर ले। नीच व्यक्ति से भी श्रेष्ठ धर्म को और निन्दित कुल से भी उत्तम स्त्री को ग्रहण कर ले।
प्राप्त नहीं होता, ऐसा विद्या रूपी धन जिन विद्वानों के पास है, उनके प्रति हे राजा लोगो ! अपने अभिमान को त्याग दो। ऐसे विद्याधनियों से कौन स्पर्धा कर सकता है?
विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम, गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि ।
असूपकायाऽनुजवेऽयताय, न मा ब्रूया वीर्यवती यथा स्याम् ।। (निरुक्त. २.४)
विद्या ब्राह्मण (विद्वान्) के समीप आई और बोली - हे विद्वन् ! मेरी रक्षा कर, मैं तेरा कोष हूँ। गुणों में दोष ढूँढ़ने वाले, कुटिल और आलसी मनुष्य को तू मेरा प्रवचन मत करना, जिससे कि मैं सामर्थ्यवती-तेज वाली बनी रहूँ ।
आलस्यं मदमोहौ च, चापलं गोष्ठिरेव ।
स्तब्धता चाभिमानित्वं, तथाऽत्यागित्वमेव च ।।
एते वै सप्त दोषाः स्युः, सदा विद्यार्थिनां मताः ।।
आलस्य, नशा करना और मोह, चञ्चलता, गप्पें लगाना, जड़ता, अभिमान और त्याग का अभाव; ये सात दोष प्रायः विद्यार्थियों में आ जाया करते हैं । (जो विद्या चाहें उन्हें इनको त्याग देना चाहिये ।)
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां, विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ।। (महाभारतम्, उद्योगपर्व - ४०.५,६)
सुख (आरामतलबी) चाहने वाले को विद्या कहाँ से प्राप्त हो सकती है और सच्चे अर्थों में विद्या के अभिलाषी को विद्याग्रहणकाल में सुख (आरामतलबी) नहीं मिल सकती । सुख से रहने का अभ्यासी विद्या की कामना त्याग दे और विद्या का अभिलाषी सुख के अभ्यास को त्याग दे ।
असूयैकपदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः ।
अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा, विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ।। (महाभारतम्, उद्योगपर्व - ४०.४)
किसी के गुणों में दोष देखना एकदम मरण के समान है और निन्दा तथा बकवास करना ऐश्वर्य का नाश करना है । सेवापूर्वक सीखने की लालसा न होना, उतावलापन और स्वयं की प्रशंसा करना ये तीन विद्या के शत्रु हैं ।
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