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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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मृत्युभय-विजय साधना-पथ (क्रमबद्ध अभ्यास)

 

मृत्युभय-विजय साधना-पथ (क्रमबद्ध अभ्यास)

🙏
नीचे प्रस्तुत है “मृत्युभय-विजय साधना-पथ (क्रमबद्ध अभ्यास)” — यह कोई कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि चेतना-परिवर्तन की वैज्ञानिक वैदिक प्रक्रिया है। इसे आप जीवन-पद्धति की तरह अपनाते हैं।


🕉️ मृत्यु-भय-विजय साधना-पथ

(क्रमबद्ध, व्यवहारिक, अन्तःसाधना)


🔶 साधना का मूल सिद्धान्त

भय को हटाना नहीं,
भय उत्पन्न करने वाले ‘मैं’ को समझना।

इस साधना में 7 क्रमिक चरण हैं।
हर चरण पिछले पर टिकता है।


चरण 1️⃣ : सत्य-प्रतिष्ठा साधना

(बौद्धिक नहीं, अस्तित्वगत)

अभ्यास

  • प्रतिदिन 5 मिनट शांत बैठकर यह वाक्य मन में रखें:

    “सत्यमेवाभिजानिमो”

भाव

  • मैं जो हूँ, वह बदलने वाला नहीं
  • शरीर, भूमिका, नाम — सब परिवर्तनशील हैं

फल

  • अस्थायी से आसक्ति ढीली पड़ती है
  • मृत्यु-भय की जड़ हिलती है

📌 जब तक सत्य बौद्धिक है, भय रहेगा।
जब सत्य अनुभूत होता है, भय ढहने लगता है।


चरण 2️⃣ : वाणी-शुद्धि साधना

(दोष-दृष्टि का विसर्जन)

अभ्यास

  • एक व्रत:

    “नैषां दुष्चरितं ब्रूमः”

  • 24 घंटे किसी की निन्दा नहीं
  • मन में आए दोष-विचार को भी मौन से काट दें

भाव

  • दोष-दृष्टि = विभाजन
  • विभाजन = भय

फल

  • मन हल्का
  • भीतर शत्रु-भाव कम

📌 जिस दिन निन्दा बन्द,
उस दिन मृत्यु-भय कमजोर।


चरण 3️⃣ : श्वास-प्राण अभय अभ्यास

(प्राण को निर्भय करना)

अभ्यास (दिन में 2 बार)

  • श्वास लेते समय:

    “एवा मे प्राण”

  • श्वास छोड़ते समय:

    “मा बिभेः”

10–15 चक्र

भाव

  • प्राण मेरा नहीं, ब्रह्माण्डीय है
  • मैं जीवन-प्रवाह हूँ

फल

  • भय के समय भी श्वास स्थिर
  • प्राण-संकुचन टूटता है

📌 जो श्वास से नहीं डरता,
वह मृत्यु से नहीं डरेगा।


चरण 4️⃣ : साझा-भोग साधना

(अहं-केन्द्र का विसर्जन)

अभ्यास

  • प्रतिदिन कुछ न कुछ पहले देना, फिर स्वयं लेना
  • भोजन, समय, श्रम, ध्यान — कुछ भी

“सम्भोज्य शेषमश्नीमः”

भाव

  • जीवन मेरा निजी उपभोग नहीं

फल

  • “मैं” ढीला
  • मृत्यु-भय स्वतः कम

📌 मृत्यु-भय उसी को है
जो सब कुछ अपने लिए जीता है।


चरण 5️⃣ : क्षमा-विघटन साधना

(अहं को गलाना)

अभ्यास

  • जिसने दुख दिया, उसे मन में कहें:

    “तू मेरी चेतना का शत्रु नहीं”

भाव

  • क्षमा = कमजोर होना नहीं
  • क्षमा = अहं का पिघलना

फल

  • आन्तरिक शान्ति
  • मृत्यु-भय का बड़ा स्तम्भ गिरता है

📌 अहं जितना कठोर,
मृत्यु-भय उतना तीखा।


चरण 6️⃣ : आचार-स्थिरता साधना

(जीवन = साधना)

महाभारत सूत्र को जीवन में उतारें:

  • शान्त — प्रतिक्रिया कम
  • दन्त — इन्द्रियों का स्वामित्व
  • दान — अपेक्षा-रहित
  • तेजस् — विवेकयुक्त साहस

भाव

  • मैं जैसा जीता हूँ, वैसा मरूँगा

फल

  • जीवन में अखण्डता
  • मृत्यु अजनबी नहीं लगती

📌 जो जीवन को सँभाल लेता है,
वह मृत्यु से नहीं घबराता।


चरण 7️⃣ : मृत्यु-स्मृति (भय नहीं, बोध)

अभ्यास (सप्ताह में 1 बार)

  • शांत बैठकर केवल इतना देखें:

    “यह देह भी एक घटना है”

कोई डर नहीं,
कोई कल्पना नहीं —
केवल तथ्य

भाव

  • मृत्यु शत्रु नहीं
  • परिवर्तन है

फल

  • भय का अन्तिम क्षरण
  • गहन वैराग्य नहीं, गहन शान्ति

📌 जिसे मृत्यु ज्ञात हो जाती है,
उससे भय चला जाता है।


🔚 साधना-पथ का निष्कर्ष

मृत्युभय-विजय
किसी एक जप से नहीं,
बल्कि जीवन की दिशा बदलने से होता है।

जब—

  • सत्य में प्रतिष्ठा
  • अहं का क्षय
  • करुणा का विस्तार
  • प्राण की निर्भयता

एक साथ घटित होते हैं,

तब मंत्र अपने-आप सच हो जाता है:

“तस्मान् मृत्युभयं न नः”



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