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नीचे प्रस्तुत है “मृत्युभय-विजय साधना-पथ (क्रमबद्ध अभ्यास)” — यह कोई कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि चेतना-परिवर्तन की वैज्ञानिक वैदिक प्रक्रिया है। इसे आप जीवन-पद्धति की तरह अपनाते हैं।
🕉️ मृत्यु-भय-विजय साधना-पथ
(क्रमबद्ध, व्यवहारिक, अन्तःसाधना)
🔶 साधना का मूल सिद्धान्त
भय को हटाना नहीं,
भय उत्पन्न करने वाले ‘मैं’ को समझना।
इस साधना में 7 क्रमिक चरण हैं।
हर चरण पिछले पर टिकता है।
चरण 1️⃣ : सत्य-प्रतिष्ठा साधना
(बौद्धिक नहीं, अस्तित्वगत)
अभ्यास
- प्रतिदिन 5 मिनट शांत बैठकर यह वाक्य मन में रखें:
“सत्यमेवाभिजानिमो”
भाव
- मैं जो हूँ, वह बदलने वाला नहीं
- शरीर, भूमिका, नाम — सब परिवर्तनशील हैं
फल
- अस्थायी से आसक्ति ढीली पड़ती है
- मृत्यु-भय की जड़ हिलती है
📌 जब तक सत्य बौद्धिक है, भय रहेगा।
जब सत्य अनुभूत होता है, भय ढहने लगता है।
चरण 2️⃣ : वाणी-शुद्धि साधना
(दोष-दृष्टि का विसर्जन)
अभ्यास
- एक व्रत:
“नैषां दुष्चरितं ब्रूमः”
- 24 घंटे किसी की निन्दा नहीं
- मन में आए दोष-विचार को भी मौन से काट दें
भाव
- दोष-दृष्टि = विभाजन
- विभाजन = भय
फल
- मन हल्का
- भीतर शत्रु-भाव कम
📌 जिस दिन निन्दा बन्द,
उस दिन मृत्यु-भय कमजोर।
चरण 3️⃣ : श्वास-प्राण अभय अभ्यास
(प्राण को निर्भय करना)
अभ्यास (दिन में 2 बार)
- श्वास लेते समय:
“एवा मे प्राण”
- श्वास छोड़ते समय:
“मा बिभेः”
10–15 चक्र
भाव
- प्राण मेरा नहीं, ब्रह्माण्डीय है
- मैं जीवन-प्रवाह हूँ
फल
- भय के समय भी श्वास स्थिर
- प्राण-संकुचन टूटता है
📌 जो श्वास से नहीं डरता,
वह मृत्यु से नहीं डरेगा।
चरण 4️⃣ : साझा-भोग साधना
(अहं-केन्द्र का विसर्जन)
अभ्यास
- प्रतिदिन कुछ न कुछ पहले देना, फिर स्वयं लेना
- भोजन, समय, श्रम, ध्यान — कुछ भी
“सम्भोज्य शेषमश्नीमः”
भाव
- जीवन मेरा निजी उपभोग नहीं
फल
- “मैं” ढीला
- मृत्यु-भय स्वतः कम
📌 मृत्यु-भय उसी को है
जो सब कुछ अपने लिए जीता है।
चरण 5️⃣ : क्षमा-विघटन साधना
(अहं को गलाना)
अभ्यास
- जिसने दुख दिया, उसे मन में कहें:
“तू मेरी चेतना का शत्रु नहीं”
भाव
- क्षमा = कमजोर होना नहीं
- क्षमा = अहं का पिघलना
फल
- आन्तरिक शान्ति
- मृत्यु-भय का बड़ा स्तम्भ गिरता है
📌 अहं जितना कठोर,
मृत्यु-भय उतना तीखा।
चरण 6️⃣ : आचार-स्थिरता साधना
(जीवन = साधना)
महाभारत सूत्र को जीवन में उतारें:
- शान्त — प्रतिक्रिया कम
- दन्त — इन्द्रियों का स्वामित्व
- दान — अपेक्षा-रहित
- तेजस् — विवेकयुक्त साहस
भाव
- मैं जैसा जीता हूँ, वैसा मरूँगा
फल
- जीवन में अखण्डता
- मृत्यु अजनबी नहीं लगती
📌 जो जीवन को सँभाल लेता है,
वह मृत्यु से नहीं घबराता।
चरण 7️⃣ : मृत्यु-स्मृति (भय नहीं, बोध)
अभ्यास (सप्ताह में 1 बार)
- शांत बैठकर केवल इतना देखें:
“यह देह भी एक घटना है”
कोई डर नहीं,
कोई कल्पना नहीं —
केवल तथ्य।
भाव
- मृत्यु शत्रु नहीं
- परिवर्तन है
फल
- भय का अन्तिम क्षरण
- गहन वैराग्य नहीं, गहन शान्ति
📌 जिसे मृत्यु ज्ञात हो जाती है,
उससे भय चला जाता है।
🔚 साधना-पथ का निष्कर्ष
मृत्युभय-विजय
किसी एक जप से नहीं,
बल्कि जीवन की दिशा बदलने से होता है।
जब—
- सत्य में प्रतिष्ठा
- अहं का क्षय
- करुणा का विस्तार
- प्राण की निर्भयता
एक साथ घटित होते हैं,
तब मंत्र अपने-आप सच हो जाता है:
“तस्मान् मृत्युभयं न नः”

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