यह मंत्र यजुर्वेद 31.7 (पुरुषसूक्त) का है। नीचे इसका पदच्छेद, सरल हिन्दी भावार्थ और संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत है—
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥
उस सर्वहुत यज्ञ से—जिसमें सम्पूर्ण जगत की आहुति दी गई—
ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र उत्पन्न हुए।
उसी से छन्दों की रचना हुई
और उसी से यजुर्वेद प्रकट हुआ।
यह मंत्र बताता है कि—
नीचे प्रस्तुत है यजुर्वेद 31.7 की
“तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत” —
यहाँ यज्ञ किसी कर्मकाण्ड मात्र का नाम नहीं, बल्कि ब्रह्म की स्वप्रकाश लीला है।
ब्रह्म—
उपनिषद् की वाणी है—
“ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः” (गीता 4.24)
अर्थात् सृष्टि एक महायज्ञ है, जिसमें ब्रह्म स्वयं को ही प्रकट करता है।
“ऋचः सामानि जज्ञिरे” —
ऋग और साम कोई ग्रंथ नहीं, वे ब्रह्म के स्पन्दन (Vibration) हैं।
यह सिद्ध करता है कि
👉 ज्ञान और उपासना अलग नहीं, दोनों ब्रह्म के ही आयाम हैं।
“छन्दांसि जज्ञिरे” —
अनन्त ब्रह्म जब व्यवहार-जगत् में उतरता है, तो वह मर्यादा (छन्द) ग्रहण करता है।
छन्द का दार्शनिक अर्थ—
अर्थात् ब्रह्म अराजक नहीं, ऋत (Cosmic Order) है।
“यजुस्तस्मादजायत” —
यजुर्वेद केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि
👉 ज्ञान को जीवन में उतारने की विधि है।
ब्रह्मज्ञान—
इसलिए यजुर्वेद कहता है—
“ज्ञान = जीवन-यज्ञ”
यह मंत्र एक ही सत्य उद्घाटित करता है—
ब्रह्म ही शब्द है
ब्रह्म ही अर्थ है
ब्रह्म ही क्रिया है
और ब्रह्म ही अनुभूति है
वेद, छन्द, कर्म—सब उसी एक अद्वैत ब्रह्म के विविध रूप हैं।
इस मंत्र का साधनात्मक निष्कर्ष—
यज्ञ = अहंकार की आहुति
वेद = आत्मबोध का शब्द
ब्रह्मज्ञान = भय-शून्य अमरता
नीचे प्रस्तुत है यजुर्वेद 31.7 की
मंत्र — “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत…”
उपनिषद् प्रश्न उठाते हैं—
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ?
(मुण्डकोपनिषद् 1.1.3)
हे गुरुदेव! वह कौन-सा तत्व है, जिसके जान लेने से सब कुछ जाना जाता है?
उत्तर— वही यज्ञरूप ब्रह्म।
बृहदारण्यक कहता है—
अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः
यज्ञ ही समस्त जगत् की नाभि है।
👉 अतः यज्ञ = ब्रह्म की सृजन-चेतना।
“ऋचः … जज्ञिरे”
ऐतरेय उपनिषद् उद्घोष करता है—
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् (1.1.1)
आरम्भ में केवल आत्मा ही था।
जब आत्मा ने स्व-चेतना की—
इसलिए ऋग्वेद = आत्मज्ञान का उद्घोष।
“सामानि जज्ञिरे”
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है—
स एष सोमो राजा (1.1.9)
वही ब्रह्म सोम है—रसस्वरूप।
ज्ञान जब रस बनता है,
तो वह साम हो जाता है।
👉 सामवेद = ब्रह्मानन्द की गानात्मक अनुभूति।
“छन्दांसि जज्ञिरे”
तैत्तिरीय उपनिषद् (2.7) कहता है—
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म
ब्रह्म ही ऋत (Cosmic Order) है।
छन्द—
अर्थात् जगत् अराजक नहीं,
ब्रह्म का लयबद्ध नृत्य है।
“यजुस्तस्मादजायत”
ईशोपनिषद् स्पष्ट करता है—
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः (2)
कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो।
यह उपनिषद्-संवाद बताता है—
यजुर्वेद = ज्ञानयुक्त कर्म।
केन उपनिषद् प्रश्न करता है—
केनेषितं पतति प्रेषितं मनः ?
मन किसके प्रेरण से चलता है?
उत्तर—
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनः (1.2)
वह जो सुनने वाले का भी श्रोता है।
👉 वेद का शब्द वहीं विलीन होता है
👉 जहाँ मौन-ब्रह्म प्रकट होता है।
वेद कहते हैं—
ब्रह्म को जानो
उपनिषद् कहते हैं—
तुम वही ब्रह्म हो
यजुर्वेद 31.7 कहता है—
वह ब्रह्म स्वयं वेद बनकर प्रकट हुआ
अन्ततः—
न वेदः वेदं जानाति, आत्मैवात्मानं वेत्ति
वेद नहीं, आत्मा ही आत्मा को जानती है।
नीचे प्रस्तुत है
(यजुर्वेद 31.7 को आधार बनाकर, उपनिषद्-संवाद सहित)
सूत्र — ब्रह्म ही सृष्टि का कारण है।
वेद-आधार
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत…
उपनिषद्-संवाद
सदेव सोम्येदमग्र आसीत् (छान्दोग्य 6.2.1)
विवेचन
सृष्टि किसी बाह्य कारण से नहीं, बल्कि ब्रह्म की स्वलीला से प्रकट होती है।
यज्ञ यहाँ कारण-कार्य-अभेद का संकेत है—ब्रह्म ही कारण भी है और कार्य भी।
सूत्र — शब्दरूप ब्रह्म से परे परब्रह्म है।
वेद-आधार
ऋचः सामानि जज्ञिरे
उपनिषद्-संवाद
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह
(तैत्तिरीय 2.9)
विवेचन
वेद = शब्दब्रह्म।
परन्तु शब्द का उद्देश्य मौन की ओर ले जाना है।
जो वेदों का भी साक्षी है, वही परब्रह्म।
सूत्र — ज्ञान ही ब्रह्म का प्रथम प्रकाश है।
उपनिषद्-संवाद
प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय 3.3)
विवेचन
ऋग्वेद किसी मत का संग्रह नहीं,
वह आत्मा की प्रथम जागृति है।
ज्ञान कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्व-प्रकाश है।
सूत्र — ब्रह्म का स्वरूप आनन्द है।
उपनिषद्-संवाद
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्तिरीय 3.6)
विवेचन
जब ज्ञान में रस भरता है,
तब वह साम बनता है।
आनन्द कोई अनुभूति नहीं,
वह ब्रह्म की पहचान है।
सूत्र — ब्रह्म ऋत (Cosmic Order) के रूप में प्रकट होता है।
उपनिषद्-संवाद
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके (कठ 1.3.1)
विवेचन
छन्द अनन्त को बाँधता नहीं,
बल्कि उसे लय देता है।
इसी से सृष्टि में नियम, धर्म और मर्यादा है।
सूत्र — ज्ञान और कर्म का अभेद ही ब्रह्ममार्ग है।
उपनिषद्-संवाद
कुर्वन्नेवेह कर्माणि… (ईश 2)
विवेचन
जो ज्ञान कर्म से अलग है, वह अधूरा है।
यजुर्वेद सिखाता है—
👉 जीवन ही यज्ञ है।
सूत्र — अहंकार की आहुति ही मोक्ष है।
उपनिषद्-संवाद
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः (मुण्डक 3.2.4)
विवेचन
यहाँ बल = अहंकार का त्याग।
जब ‘मैं कर्ता हूँ’ जलता है,
तभी ब्रह्म प्रकट होता है।
सूत्र — एकमेव अद्वितीयम्।
उपनिषद्-संवाद
नेह नानास्ति किञ्चन (बृहदारण्यक 4.4.19)
विवेचन
वेद, उपनिषद्, यज्ञ, साधना—
सब अंततः एक ही सत्य की ओर संकेत हैं।
ब्रह्म न जाना जाता है, न पाया जाता है—
वह केवल पहचाना जाता है।
जब—
वही ब्रह्मज्ञान है।
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