वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधाना: ।
यदेषां श्रेष्ठ यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि: ॥
ऋ० १० । ७१ ।१ ।
(वृहस्पते) हे वेदाधिपते महेश ! (प्रथमम् ) पहले सृष्टि के आारम्भ में (नामधेयम् ) नाम (दधानाः ) रखते हुए [महर्षि (यत्) जों [वचन (प्रैरत) प्रेरते हैं, उच्चारण करते हैं (वाचः:) [वह] वाणी का (अग्रम्) मुख्य, प्रधान, श्रेष्ट है। (यत्) जो (एषाम् ) इनमें से (श्रेष्ठ्म) श्रेष्ट होता है। (यत्) और [जो] (अरिप्रम्) निर्दोष, पाप-शून्य (आसीत्) होता है (तत्) वह, (एषाम्) इनके (गुहा) हृदय-गुहा में (निहितम्) रखा हुआ। (प्रेणा) [इनके] प्रेम से (आविः) प्रकट होती है।
जब सर्गारम्भ में मनुष्य उत्पन्न हुए, और उन्होंने चारों ओर परिदृश्यमान पदार्थों के नामकरण की इच्छा की तब परमगुरु सर्व-विद्यानिधान भगवान् ने उनमें वाणी की प्रेरणा की। वही वाणी का प्रथम प्रकाश है। वह वाणी किनको मिली ? वेद कहता है, जो सर्गारम्भ के मनुष्यों में से श्रेष्ठ एवं निर्दोष होने के साथ प्रभु की कल्याणी वाणी के प्रचार के लिए भी उत्कट भावना रखते थे। सर्व- व्यापक अन्तर्यामी प्रभु ने उनके हृद्य में प्रेरणा की ।
'यदेषां श्रेष्ठ यदरिप्रमासीत’ का एक अर्थ यह भी है कि जो ज्ञान श्रेष्ठ= सबसे उत्तम और अरिप्र =निर्दोष =भ्रम विप्रलिप्सा आदि दोषों से शुन्य था, वह इनको दिया गया। तात्पर्य यह कि सृष्टि के अरम्भ में मनुष्य को वाणी के साथ ज्ञान भी दिया गया, अर्थात् शब्दार्थसम्बन्धयुक्त ज्ञान दिया गया।
प्रश्न होता है जिनको सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान दिया जाता है, कदाचित् वे उसमें अपने भाव मिला देते हों ! इसका समाधान निम्नलिखित मन्त्र में किया गया है-
यह मंत्र ऋग्वेद (10.71.2) से सम्बद्ध है। नीचे इसका
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि—
उपनिषद् कहते हैं—
यतो वाचो निवर्तन्ते (तैत्तिरीय)
👉 वाणी का मूल = मौन-ब्रह्म।
श्रेष्ठम् / अरिप्रम् संकेत करते हैं—
वही आत्मा / ब्रह्म है।
गुहां प्रविष्टौ आत्मानौ (1.3.1)
शब्द का स्रोत शब्द नहीं है।वाणी का मूल मौन है।और वही मौन ब्रह्मप्रत्येक के हृदय में निहित है।
जो—
👉 वही इस मंत्र का साक्षात् अर्थ है।
नीचे प्रस्तुत है
(ऋग्वेद 10.71.2 के आलोक में — “निहितं गुहावि”)
यह अभ्यास मौन–ब्रह्म के प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ले जाता है।
गुहा कोई शारीरिक गुफा नहीं—
👉 यह हृदय-चेतना का आन्तरिक केन्द्र है,
जहाँ वाणी, विचार और अहंकार शान्त हो जाते हैं।
कठोपनिषद्—
गुहां प्रविष्टौ आत्मानौ
भीतर यह भाव—
“अब मैं बाहर से भीतर लौट रहा हूँ।”
ध्यान दें—
कोई शब्द रोकें नहीं।
केवल देखें—
“शब्द दिखाई दे रहा है—मैं शब्द नहीं हूँ।”
यहाँ वाणी अपने मूल की ओर लौटने लगती है।
अब देखें—
धीरे से पहचानें—
“यह नाम–रूप है, मैं इनका साक्षी हूँ।”
नाम–रूप ढीले पड़ते हैं—
👉 चेतना शुद्ध होती जाती है।
अब ध्यान करें—
प्रश्न उठाएँ (बिना उत्तर खोजे)—
“विचार किससे उठ रहे हैं?”
यहीं प्रेणा प्रकट होती है—
वह मौन चेतना जो सबको प्रेरित करती है।
अब कोई प्रश्न नहीं।
कोई नाम नहीं।
कोई कल्पना नहीं।
जो शेष रहता है—
👉 उसी में ठहरें।
यही है—
“तदेषां निहितं गुहावि”
वह सत्य जो गुहा में निहित है।
साक्षी बने रहना ही साधना है।
👉 ये लक्षण हैं, लक्ष्य नहीं।
दिन में कभी भी—
यही चलती–फिरती गुहा–साधना है।
गुहा में कुछ पाने नहीं जाते,
वहाँ सब छोड़कर जाते हैं।
जो बचता है—
वही वाणी का मूल,
वही उच्छिष्ट,
वही ब्रह्म।
नीचे प्रस्तुत है
(गुहा–प्रवेश एवं मृत्युभय–विजय हेतु, गृहस्थों के लिए उपयुक्त)
नियम: जप नहीं—स्मरण + साक्षीभाव।
प्रत्येक ऋचा केवल दिशा-सूचक है; ठहरना मौन में है।
शांत बैठें, आँखें बंद।
मन में संकल्प—
“मैं शब्द से मौन की ओर,
देह से साक्षी की ओर लौट रहा हूँ।”
ऋचा (मन में एक बार):
वाचो अग्रं यत्प्रैरत… निहितं गुहावि: ।
अभ्यास:
उठते शब्दों को देखें। रोकें नहीं।
भाव रखें—“वाणी का मूल मौन है।”
शब्द स्वयं ढीले पड़ने लगें।
ऋचा (स्मरण):
केनेषितं पतति प्रेषितं मनः…
अभ्यास:
श्वास-प्रश्वास को देखें।
प्रश्न उठाएँ—“विचार किससे उठते हैं?”
उत्तर न खोजें; प्रेरणा को देखें।
ऋचा (स्मरण):
गुहां प्रविष्टौ आत्मानौ…
अभ्यास:
ध्यान हृदय-क्षेत्र में टिकाएँ (कोई कल्पना नहीं)।
जो भी उठे—देखें।
जो शेष रहे—उसी में ठहरें।
ऋचा (भाव-स्मरण):
उच्छिष्टात् सर्वं जायते…
अभ्यास:
कर्म, विचार, भाव—सब थमने दें।
जो अवशिष्ट मौन बचे—वही उच्छिष्ट।
उसमें सहज विश्राम।
ऋचा (स्मरण):
न जायते म्रियते वा कदाचित्…
अभ्यास:
देखें—जो देख रहा है, वह बदलता नहीं।
मृत्यु विचार है; द्रष्टा अचल।
ऋचा (स्मरण):
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।
अभ्यास:
आँखें खोलें।
भाव रखें—“यह पूर्णता दिनभर साथ है।”
शब्द से मौन,
कर्म से साक्षी,
भय से अमृत—
यही वैदिक ध्यान।
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