भय, तनाव और असुरक्षा से रक्षा: ऋग्वेद का शक्तिशाली अभय मंत्र

भय, तनाव और असुरक्षा से रक्षा: ऋग्वेद का शक्तिशाली अभय मंत्र


 वेदानुसार आचरण

नकिर्देवा मिनीयसि नकिरा योपयामसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।

पक्षेभिरपिकक्षेभिरत्राभि संरभामहे ॥। ऋ० १० । १३४ । ७ ।।

(देवाः) है दिव्यगुणसंपन्न विद्वान् महात्माओं! (नकिः) न तो (मिनीमसि) हम हिंसा करते हैं, (नकि: ) और न ही ( आा+ योप- यामसि) हम फूट डालते हैं । ( मन्त्रश्रुत्यम् ) वेदमन्त्र के ज्ञानानुसार (चरामसि) हम आचरण करते हैं। (अत्र) इस संसार में (कक्षेभिः) तिनके समान तुच्छ (पक्षेभिः) साथियों के साथ (अ्रपि) भी (सम्) मिलकर= एक होकर (अभि +रभामहे) सम्मुख उद्योग करते हैं। वेद हिंसा और फूट का निषेध करता है। वेद तुच्छ-से-तुच्छ सहायक लेकर भी समानता का व्यवहार करते हुए उद्योग करने का उपदेश करता है ।

 ऋग्वेद 10.134.7 का मंत्र प्रस्तुत किया है। नीचे इसका पदच्छेद, भावार्थ और संक्षिप्त व्याख्या दे रहा हूँ—


🔹 मंत्र (ऋग्वेद 10.134.7)

नकिर्देवा मिनीयसि नकिरा योपयामसि।

मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।

पक्षेभिरपि कक्षेभिरत्राभि संरभामहे ॥


🔹 पदच्छेद

न किः देवाः – कोई भी देव

मिनीयसि – हमें हानि पहुँचा सके

न किः आ – कोई भी

योपयामसि – रोक सके / बाधा डाल सके

मन्त्र-श्रुत्यम् – मंत्रों से सुशोभित / वेदश्रवणयुक्त मार्ग पर

चरामसि – हम चलते हैं

पक्षेभिः अपि – पंखों के समान सहारा लेकर

कक्षेभिः – काँखों / आश्रयों से भी

अत्र – यहाँ

अभि संरभामहे – हम दृढ़तापूर्वक आश्रय लेते हैं / सुरक्षित रहते हैं


🔹 सरल भावार्थ (हिंदी)

हम ऐसे वेदमंत्रों के अनुयायी हैं कि

कोई भी देवता या शक्ति हमें हानि नहीं पहुँचा सकती,

कोई हमें रोक नहीं सकता।

हम मंत्रश्रुति (वेदमार्ग) पर चलते हुए

यहाँ पंखों और कक्षों (सभी प्रकार के सहारों) से

पूर्ण सुरक्षा और दृढ़ आश्रय प्राप्त करते हैं।


🔹 दार्शनिक व्याख्या

यह मंत्र वेदमार्ग पर चलने वाले साधक के अभय और आत्मविश्वास को प्रकट करता है।

• “नकिर्देवा मिनीयसि” –

जो मनुष्य धर्म, यज्ञ और मंत्रपालन में स्थित है,

उसे कोई भी दैवी या अदैवी शक्ति नुकसान नहीं पहुँचा सकती।

• “मन्त्रश्रुत्यं चरामसि” –

वेदश्रवण, जप और साधना जीवन का मार्ग है।

• “पक्षेभिरपि कक्षेभिः” –

ईश्वर की कृपा से साधक को ऐसे सहारे मिलते हैं

मानो उसे पंख लग गए हों।

👉 यह मंत्र अभय, संरक्षण, आत्मबल और आध्यात्मिक सुरक्षा का प्रतीक है।

   ऋग्वेद 10.134.7 के मंत्र का शास्त्रीय एवं व्यवहारिक जप-विधान दिया जा रहा है—

🔱 मंत्र

नकिर्देवा मिनीयसि नकिरा योपयामसि।

मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।

पक्षेभिरपि कक्षेभिरत्राभि संरभामहे ॥


1️⃣ जप का उद्देश्य

• अभय-प्राप्ति (भय, बाधा, शत्रु, नकारात्मक प्रभाव से रक्षा)

• मानसिक दृढ़ता व आत्मविश्वास

• दैवी संरक्षण एवं साधना-सफलता

वेदमार्ग में स्थिरता


2️⃣ जप का समय (काल)

✅ ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4:00–5:30) – सर्वोत्तम

✅ संध्या काल (प्रातः या सायं)

❌ रात्रि 12 के बाद जप न करें (विशेष साधना छोड़कर)


3️⃣ आसन एवं दिशा

• आसन: कुशासन / ऊनी आसन / स्वच्छ वस्त्र

• दिशा: पूर्व या उत्तरमुख

• भूमि पर सीधे न बैठें (ऊर्जा क्षय से बचाव)


4️⃣ शुद्धि-विधान

1. स्नान या हाथ-पैर, मुख शुद्ध करें

2. शांत स्थान पर बैठें

3. 3 बार गहरी श्वास लेकर मन को स्थिर करें

4. संकल्प करें—

संकल्प मंत्र (सरल)

“मैं अभय, रक्षा एवं आत्मबल की प्राप्ति हेतु इस वैदिक मंत्र का जप कर रहा/रही हूँ।”


5️⃣ जप की संख्या

• नित्य जप: 11 या 21 बार

• विशेष साधना: 108 बार

• अनुष्ठान: 1008 जप (11 या 21 दिनों में)

👉 माला आवश्यक नहीं, गणना उँगलियों से या मौन गिनती से करें

(वैदिक मंत्रों में रुद्राक्ष माला अनिवार्य नहीं)


6️⃣ जप की विधि

• स्वर मध्यम, स्पष्ट उच्चारण

• पहले 1 बार ऊँकार (ॐ) का मानसिक उच्चारण

• फिर मंत्र का जप

• अंत में क्षणभर मौन


7️⃣ ध्यान-भाव

जप करते समय यह भावना रखें—

“ईश्वर की दिव्य शक्ति मेरे चारों ओर सुरक्षा-कवच बना रही है।

मैं निर्भय, सुरक्षित और स्थिर हूँ।”


8️⃣ साधना-काल की सावधानियाँ

✔ सात्त्विक आहार

✔ सत्य, संयम, ब्रह्मचर्य (यथाशक्ति)

❌ क्रोध, अपवित्र भाषण, नशा

❌ जप के बीच बातचीत न करें


9️⃣ जप का फल

• भय व अनिश्चितता का क्षय

• आत्मबल एवं तेज की वृद्धि

• दुष्ट-प्रभावों से रक्षा

• साधक में दैवी आश्रय का अनुभवनीचे ऋग्वेद 10.134.7 मंत्र का आधुनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग सरल, स्पष्ट और दैनिक जीवन से जुड़ा हुआ प्रस्तुत है—


🌿 आधुनिक जीवन में इस मंत्र का उपयोग

1️⃣ भय, तनाव और एंग्ज़ायटी में

आज का मनुष्य भविष्य-चिन्ता, नौकरी-दबाव, आर्थिक असुरक्षा से ग्रस्त रहता है।

👉 इस मंत्र का जप करने से—

  • मन में अभय का भाव आता है
  • नकारात्मक विचार कमजोर होते हैं
  • मानसिक स्थिरता बढ़ती है

व्यवहारिक प्रयोग
सुबह उठते ही 11 बार मंत्र का जप → दिनभर मानसिक सुरक्षा बनी रहती है।


2️⃣ कार्यस्थल (Office / Business) में

  • ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, षड्यंत्र
  • बॉस या क्लाइंट का दबाव

👉 “नकिर्देवा मिनीयसि” का भाव यह देता है कि
कोई भी शक्ति आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती, यदि आप धर्मपथ पर हैं।

उपयोग
ऑफिस जाने से पहले 5 मिनट मौन जप → आत्मविश्वास में स्पष्ट वृद्धि।


3️⃣ विद्यार्थियों एवं प्रतियोगी परीक्षा में

  • डर, असफलता-भय, आत्मसंदेह

👉 मंत्र से—

  • स्मरण-शक्ति बढ़ती है
  • डर कम होकर धैर्य आता है

उपयोग
पढ़ाई से पहले 7 या 11 बार जप → एकाग्रता बढ़ती है।


4️⃣ सोशल मीडिया और नकारात्मक प्रभाव

आज डिजिटल नकारात्मकता, ट्रोलिंग, मानसिक विष बहुत है।

👉 “मन्त्रश्रुत्यं चरामसि”
अर्थात्— मैं शुद्ध विचारों के मार्ग पर चलता हूँ।

उपयोग
फोन खोलने से पहले 1 बार मानसिक जप → अनावश्यक मानसिक प्रदूषण से रक्षा।


5️⃣ यात्रा और असुरक्षा-भाव में

  • लंबी यात्रा
  • अनजान स्थान
  • रात्रि में भय

👉 “पक्षेभिरपि कक्षेभिरत्राभि संरभामहे”
ईश्वर की सुरक्षा-कवच भावना देता है।

उपयोग
यात्रा शुरू करते समय 3 बार जप → आत्मविश्वास व सुरक्षा-भाव।


6️⃣ गृहस्थ जीवन और पारिवारिक तनाव

  • कलह
  • असुरक्षा
  • आर्थिक चिंता

👉 यह मंत्र परिवार के लिए अभय-सूत्र जैसा कार्य करता है।

उपयोग
घर में दीपक के सामने सायं 11 बार जप → घर का वातावरण शांत होता है।


7️⃣ निर्णय-क्षमता और आत्मबल

आज व्यक्ति निर्णय लेने से डरता है।

👉 इस मंत्र से—

  • अंदरूनी शक्ति जाग्रत होती है
  • निर्णय में दृढ़ता आती है

उपयोग
महत्वपूर्ण निर्णय से पहले 5 मिनट जप।


🔑 आधुनिक जीवन का सार

यह मंत्र कोई चमत्कार नहीं,
बल्कि आंतरिक मनोबल + दैवी संरक्षण की चेतना है।



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