🙏
नीचे प्रस्तुत है “मृत्युभय-विजय दर्शन” — सभी वैदिक, अथर्ववैदिक, ऋग्वैदिक और महाभारतीय सूत्रों का समन्वित, गहन दार्शनिक निरूपण। यह न तो प्रवचन है, न नीति-सूची, बल्कि अस्तित्वगत दर्शन है।
🕉️ मृत्यु-भय-विजय दर्शन
(वैदिक–उपनिषदिक–महाभारतीय समन्वय)
1. मृत्यु-भय क्या है? — समस्या की जड़
मृत्यु-भय मृत्यु से नहीं होता।
मृत्यु तो एक घटना है।
भय होता है —
- असत्य से तादात्म्य के कारण
- अहं-केन्द्रित जीवन के कारण
- संकीर्ण “मैं” के कारण
उपनिषद का मूल सूत्र है —
द्वितीयाद्वै भयम् भवति
(जहाँ द्वैत है, वहीं भय है)
अतः
मृत्यु-भय = द्वैत-बोध का परिणाम
2. वैदिक समाधान : अभय, न कि अमरता की माँग
वेद कभी यह नहीं कहते — “मृत्यु न हो”
वेद कहते हैं — “भय न हो”
इसलिए सूत्र बार-बार आता है —
तस्मान् मृत्युभयं न नः
यह प्रार्थना नहीं,
यह चेतना की स्थिति है।
3. प्रथम स्तम्भ : सत्य में प्रतिष्ठा
सत्यमेवाभिजानिमो, नानृते कूर्महे मनः
सत्य = जो बदलता नहीं
असत्य = जो क्षणिक है
जो क्षणिक को “मैं” मानता है,
वह मृत्यु से डरेगा।
जो सत्य में स्थित है,
उसके लिए मृत्यु
केवल आवरण-परिवर्तन है।
👉 सत्य = अभय का आधार
4. द्वितीय स्तम्भ : वाणी और दृष्टि की शुद्धि
नैषां दुष्चरितं ब्रूमः
दोष-दृष्टि —
- अहं को पुष्ट करती है
- “मैं–वह” को गहरा करती है
- भय को जन्म देती है
जो निन्दा से मुक्त है,
वह विभाजन से मुक्त है।
👉 वाणी-शुद्धि = भय-क्षय
5. तृतीय स्तम्भ : साझा-जीवन (अहं का विसर्जन)
अतिथिन्नन्नपानेन… सम्भोज्य शेषमश्नीमः
यह सामाजिक नियम नहीं,
यह अहं-विघटन की साधना है।
जो पहले देता है, फिर स्वयं ग्रहण करता है, वह जान लेता है —
“जीवन मेरा निजी स्वामित्व नहीं।”
👉 अहं जितना पतला, मृत्यु-भय उतना क्षीण
6. चतुर्थ स्तम्भ : आचार = अस्तित्व की भाषा
महाभारत कहता है —
शान्ता दन्ताः क्षमाशीलाः…
ये नैतिक गुण नहीं,
ये चेतना की अवस्थाएँ हैं।
- शान्त = आन्तरिक संघर्ष का अभाव
- दन्त = इन्द्रिय-स्वामित्व
- क्षमा = अहं का क्षय
- दान = केन्द्र का विसर्जन
- तेजस् = विवेकयुक्त शक्ति
👉 आचार जितना परिष्कृत, भय उतना क्षीण
7. पंचम स्तम्भ : प्राण और चेतना का ऐक्य
एवा मे प्राण मा बिभेः
भय = प्राण का संकुचन
अभय = प्राण का विस्तार
जब श्वास भी भयभीत हो जाती है,
तो मृत्यु का भय गहरा होता है।
जब प्राण ब्रह्माण्डीय लय में आता है, तो व्यक्ति जान लेता है —
“मैं जीवन-प्रवाह हूँ,
केवल एक देह नहीं।”
8. चरम सूत्र : अमृतत्व क्या है?
अमृतत्व = देह का न मरना ❌
अमृतत्व = भय का न रहना ✅
वेद का निष्कर्ष —
जो भय से मुक्त है,
वही अमृत के समीप है।
इसलिए हर मंत्र का अंत है —
तस्मान् मृत्युभयं न नः
9. समग्र दर्शन (एक वाक्य में)
सत्य में स्थित,
अहं से मुक्त,
करुणा में विस्तृत,
आचार में परिष्कृत चेतना —
मृत्यु को घटना मानती है,
भय नहीं।
10. अन्तिम घोषणा (वैदिक स्वर)
मृत्यु-भय-विजय
किसी एक जप,
किसी एक योग,
या किसी एक विश्वास से नहीं होता।
वह होता है —
- जीवन-दृष्टि बदलने से
- केन्द्र “मैं” से हटाने से
- सत्य में टिक जाने से
तब मृत्यु आती है…
पर भय नहीं आता।
.jpeg)
0 टिप्पणियाँ