जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Patañjali Yogadarshan – Sādhana Pāda

Sanskrit

Sutra 1
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥

नातपस्विनो योगः सिद्ध्यति। अनादिकर्मक्लेशवासनाचित्रा प्रत्युपस्थितविषयजाला चाशुद्धिर्नान्तरेण तपः सम्भेदमापद्यते। स्वाध्यायः प्रणवादिपवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राध्ययनं वा। ईश्वरप्रणिधानं सर्वक्रियाणां परमगुरावर्पणं तत्फलसंन्यासो वा।
Sutra 2
समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥

स ह्यासेव्यमानः समाधिं भावयति क्लेशांश्च प्रतनूकरोति । प्रतनूकृतान्क्लेशान्प्रसङ्ख्यानाग्निना दग्धबीजकल्पानप्रसवधर्मिणः करिष्यतीति । तेषां तनूकरणात्पुनः क्लेशैरपरामृष्टा सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिः सूक्ष्मा प्रज्ञा समाप्ताधिकारा प्रतिप्रसवाय कल्पिष्यत इति ॥२॥
Sutra 3
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

क्लेशा इति । पञ्च विपर्यया इत्यर्थः । ते स्यन्दमाना गुणाधिकारं द्रढयन्ति, परिणाममवस्थापयन्ति, कार्यकारणस्रोत उन्नमयन्ति, परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय कर्मविपाकं चाभिनिर्हरन्तीति ॥३॥
Sutra 4
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

अत्राविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिरुत्तरेषामस्मितादीनां चतुर्विधकल्पानां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् । तत्र का प्रसुप्तिः ? चेतसि शक्तिमात्रप्रतिष्ठानां बीजभावोपगमः । तस्य प्रबोध आलम्बने सम्मुखीभावः । प्रसङ्ख्यानवतो दग्धक्लेशबीजस्य सम्मुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति । दग्धबीजस्य कुतः प्ररोह इति । अतः क्षीणक्लेशः कुशलश्चरमदेह इत्युच्यते । तत्रैव सा गधबीजभावा पञ्चमी क्लेशावस्था नान्यत्रेति । सतां क्लेशानां तदा बीजसामर्थ्यं दग्धमिति विषयस्य सम्मुखीभावेऽपि सति न भवत्येषां प्रबोध इति । उक्ता प्रसुप्तिर्दग्धबीजानामप्ररोहश्च । तनुत्वमुच्यते—प्रतिपक्षभावनोपहताः क्लेशास्तनवो भवन्ति । तथा विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः । कथं ? रागकाले क्रोधस्यादर्शनात। न हि रागकाले क्रोधः समुदाचरति । रागश्च क्वचिद्दृश्यमानो न विषयान्तरे नास्ति । नैकस्यां स्त्रियां चैत्रो रक्त इत्यन्यासु स्त्रीषु विरक्त इति । किन्तु तत्र रागो लब्धवृत्तिरन्यत्र तु भविष्यद्वृत्तिरिति । स हि तदा प्रसुप्ततनुविच्छिन्नो भवति । विषये यो लब्धवृत्तिः स उदारः । सर्व एवैते क्लेशविषयत्वं नातिक्रामन्ति । कस्तर्हि विच्छिन्नः प्रसुप्ततनुविच्छिन्नः प्रसुप्ततनुरुदारो वा क्लेश इति । उच्यते—सत्यमेवैतत। किन्तु विशिष्टानामेवेइतेषां विच्छिन्नादित्वम् । यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्वव्यञ्जकाञ्जनेनाभिव्यक्त इति । सर्व एवामी क्लेशा अविद्याभेदाः । कस्मात्? सर्वेष्वविद्यैवाभिप्लवते । यदविद्यया वस्त्वाकार्यते, तदेवानुशेरते क्लेशा विपर्यासप्रत्ययकाले उपलभ्यन्ते क्षीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति ॥४॥

Hindi

Sutra 1
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र और भाष्य योग के व्यावहारिक पक्ष, यानी क्रियायोग (तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान) के महत्व को समझाता है। * तप का महत्व: भाष्यकार कहते हैं कि बिना 'तप' (अनुशासन और कठिन परिश्रम) के योग सिद्ध नहीं होता। हमारी अशुद्धि (अज्ञान) अनादि काल के कर्मों, क्लेशों और वासनाओं से रंगी हुई है। यह संसार के विषयों के जाल के रूप में हमारे सामने खड़ी है। बिना तप के इस अशुद्धि को नष्ट करना संभव नहीं है। इसीलिए योग में तप को स्वीकार किया गया है। * तप की सीमा: तप ऐसा होना चाहिए जो चित्त की प्रसन्नता (मानसिक शांति) में बाधा न डाले। यानी शरीर को सुखाना मात्र तप नहीं है, बल्कि चित्त को निर्मल रखना असली उद्देश्य है। * स्वाध्याय: ॐ (प्रणव) जैसे पवित्र मंत्रों का जाप करना या मोक्ष दिलाने वाले शास्त्रों (उपनिषद, गीता आदि) का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है। * ईश्वर प्रणिधान: अपने सभी कर्मों को 'परम गुरु' (ईश्वर) को अर्पित कर देना और कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर देना ईश्वर प्रणिधान है।
Sutra 2
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह भाष्य समझाता है कि जब कोई साधक 'क्रियायोग' (तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) का निरंतर अभ्यास करता है, तो उसके जीवन में क्या परिवर्तन आते हैं: * समाधि की सिद्धि और क्लेशों का क्षय: क्रियायोग का सेवन (निरंतर अभ्यास) करने से चित्त समाधि की ओर अग्रसर होता है और पंच-क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) अत्यंत कमजोर (तनू) हो जाते हैं। * दग्ध-बीज अवस्था: जब ये क्लेश कमजोर पड़ जाते हैं, तब 'विवेक-ज्ञान' (प्रसंख्यान) की अग्नि द्वारा इन्हें दग्ध-बीज (भुने हुए बीज) की तरह बना दिया जाता है। जिस प्रकार भुना हुआ बीज फिर से अंकुरित नहीं हो सकता, वैसे ही विवेक-ज्ञान से जले हुए क्लेश दोबारा जन्म नहीं ले सकते। * कैवल्य की ओर: क्लेशों के कमजोर होने से बुद्धि (सत्त्व) और पुरुष (आत्मा) के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है। इसके बाद सूक्ष्म प्रज्ञा (बुद्धि) अपना कार्य समाप्त कर लेती है और प्रकृति के गुणों में विलीन होने (प्रतिप्रसव) के योग्य हो जाती है, जिससे मोक्ष प्राप्त होता है।
Sutra 3
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार यहाँ क्लेशों के कार्य और उनके प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं: * क्लेशों का स्वरूप: यहाँ कहा गया है कि क्लेश पाँच प्रकार के 'विपर्यय' (मिथ्या ज्ञान या अज्ञान) हैं। (ये पाँच क्लेश हैं: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश)। * गुणों के अधिकार को दृढ़ करना: ये क्लेश जब सक्रिय होते हैं (स्यन्दमाना), तो ये 'गुणों' (सत्त्व, रज, तम) के अधिकार को और मज़बूत कर देते हैं। यानी हम प्रकृति के चक्र में और गहरे फँसते चले जाते हैं। * जगत के चक्र को बनाए रखना: ये क्लेश संसार के परिणाम (परिवर्तन) को स्थिर बनाए रखते हैं और कार्य-कारण की धारा (Cause and Effect) को प्रवाहित करते रहते हैं। * कर्मफल का निर्माण: ये क्लेश आपस में एक-दूसरे की सहायता करके (परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय) 'कर्म-विपाक' यानी कर्मों के फल (जाति, आयु और भोग) को उत्पन्न करते हैं।
Sutra 4
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) १. अविद्या: सभी क्लेशों की भूमि भाष्यकार कहते हैं कि 'अविद्या' (अज्ञान) ही अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन चारों क्लेशों की प्रसवभूमि (जन्मदाता) है। ये चारों क्लेश चार स्थितियों में पाए जाते हैं: २. क्लेशों की चार अवस्थाएं: * प्रसुप्त (Dormant): जब क्लेश चित्त में केवल शक्ति रूप (बीज रूप) में विद्यमान रहते हैं और किसी विषय के सामने आने पर भी जागते नहीं। (जैसे छोटे बच्चे में संस्कार रूप में राग-द्वेष होते हैं पर प्रकट नहीं होते)। * तनु (Attenuated): जब 'प्रतिपक्ष भावना' (योग अभ्यास) के द्वारा क्लेशों को कमजोर कर दिया जाता है। वे होते तो हैं, पर प्रभावी नहीं होते। * विच्छिन्न (Interrupted): जब एक क्लेश के कारण दूसरा क्लेश दब जाता है। उदाहरण: जब चैत्र किसी एक स्त्री से प्रेम (राग) कर रहा होता है, तब उसे क्रोध नहीं आता। इसका मतलब यह नहीं कि क्रोध खत्म हो गया, वह बस उस समय के लिए छिप गया है। * उदार (Active): जब क्लेश पूरी तरह सक्रिय होकर व्यवहार में प्रकट होता है (जैसे क्रोध आने पर चिल्लाना)। ३. दग्ध-बीज अवस्था (Burned Seed): जिस साधक ने 'प्रसंख्यान' (विवेक ज्ञान) प्राप्त कर लिया है, उसके क्लेश दग्ध-बीज (जले हुए बीज) के समान हो जाते हैं। विषय सामने होने पर भी उनमें अंकुरण (जागृति) नहीं होती। ऐसे महापुरुष को 'चरमदेह' (जिसका यह अंतिम जन्म है) कहा जाता है।

English

Sutra 1
English Explanation This passage is a commentary on the first verse of the Sadhana Pada of Patanjali's Yoga Sutras, which defines Kriya Yoga (Yoga in action). * Necessity of Tapas (Austerity): The commentary states that Yoga cannot be attained without Tapas (self-discipline/austerity). Our impurities are complex, colored by beginningless karmas, afflictions (kleshas), and latent impressions (vasanas). These impurities manifest as a net of worldly attractions. Without the fire of Tapas, this impurity cannot be broken down or destroyed. * The Limit of Tapas: It emphasizes that Tapas should be practiced only to the extent that it does not disturb the tranquility of the mind (Chitta-Prasadan). It should be a balanced practice, not self-torture. * Svadhyaya (Self-Study): This involves the chanting of sacred syllables like Om (Pranava) or the study of scriptures that lead to liberation (Moksha Shastras). * Ishvara Pranidhana (Devotion): This means surrendering all actions to the Supreme Teacher (God) and renouncing the fruits of those actions.
Sutra 2
English Explanation This passage explains the purpose and results of practicing Kriya Yoga, according to Vyasa’s commentary on Yoga Sutra 2.2: * Cultivating Samadhi & Thinning Afflictions: By consistently practicing Kriya Yoga, the aspirant cultivates the state of Samadhi (meditative absorption) and makes the Kleshas (afflictions like ignorance and attachment) very thin or attenuated (Pratanu). * The Burned-Seed Metaphor: Once the afflictions are thinned, they are reduced to a state comparable to "burned seeds" (Dagdha-beeja) by the fire of discriminative discernment (Prasankhyana). Just as a roasted seed can no longer sprout, these scorched afflictions lose their power to generate future suffering or rebirth. * Realization of the Self: When these afflictions no longer interfere, the fine intuitive wisdom (Prajna) recognizes the absolute distinction between the pure Consciousness (Purusha) and the intellect (Sattva). Having completed its purpose, the intellect then dissolves back into its cause, leading to ultimate liberation.
Sutra 3
English Explanation This commentary explains the functional nature of the Kleshas (Afflictions) and how they bind an individual to the cycle of suffering. * Nature of Kleshas: The Kleshas are described as the five forms of Viparyaya (error or false knowledge). They are the root causes of all mental distortions. * Strengthening the Sway of Nature: When these afflictions are active (Syandamana), they strengthen the influence of the Gunas (Sattva, Rajas, Tamas) over the mind, making it harder to realize the true Self. * Sustaining the Cause-Effect Chain: They maintain the continuous flow of cause and effect (Karya-Karana) and keep the worldly transformations constant. Manifestation of Karma: By supporting each other, these afflictions orchestrate the ripening of Karma (Karma-Vipaka), which results in our birth, life span, and the varied experiences of pleasure and pain.
Sutra 4
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.4 explains how Avidya (Ignorance) serves as the breeding ground for all other afflictions and describes the psychological states of these Kleshas. 1. Avidya as the Source: Avidya is the "field" (kshetram) from which the other four—Egoism, Attachment, Aversion, and Fear of Death—emerge. They exist in four distinct modes: 2. The Four Stages of Afflictions: * Prasupta (Dormant): The afflictions exist as potential seeds in the mind but are not currently active. * Tanu (Thin/Weakened): Through yogic practices (counter-thoughts), the power of the kleshas is significantly reduced or thinned. * Vichinna (Interrupted): A state where one affliction is temporarily suppressed by another. Example: When you are intensely in love (Attachment), anger (Aversion) is not visible. It isn’t gone; it is just temporarily interrupted or latent. * Udara (Aroused/Fully Manifest): When the affliction is actively operating and dominating the mind and behavior. 3. The State of the Burned Seed: For a realized yogi, these kleshas reach a fifth state—Dagdha-beeja. Like a burned seed that can never sprout even in fertile soil, the afflictions of a wise person never rise again, even in the presence of tempting objects. Such an individual is called Charamadeha (one who is in their final body/reincarnation).

Sanskrit

Sutra 5 – Avidyā
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

अनित्ये कार्ये नित्यख्यातिः । तद्यथा, ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः, अमृता दिवौकस इति । तथाशुचौ परमबीभत्से काये । उक्तं च— स्थानाद्बीजादुपष्ठम्बान्निःस्यन्दान्निधनादपि । कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः ॥ इत्यशुचौ शरीरे शुचिख्यातिर्दृश्यते । नवेव शशाङ्कलेखाकमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयन्तीवेति कस्य केनाभिसम्बन्धः ? भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्यय इति । एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययस्तथैवानर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः । तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति—परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः [यो.सू. २.१५] इति । तत्र सुखख्यातिरविद्या । तथानात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे, पुरुषोपकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति । तथैतदत्रोक्तम्—व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्वमात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य सम्पदमनुनन्दत्यात्मसम्पदं मन्वानस्तस्य व्यापदमनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्वानः स सर्वोऽतिबुद्ध इति । एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसन्तानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति । तस्याश्चामित्रागोष्पदवद्वस्तुसतत्त्वं विज्ञेयम् । यथा नामित्रौ मित्राभावः न मित्रमात्रं किन्तु तद्विरुद्धः सपत्नः । तथा चागोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं किन्तु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम् । एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः, किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति ॥५॥
Sutra 6 – Asmitā
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥

पुरुषो दृक्शक्तिर्बुद्धिर्दर्शनशक्तिरित्येतयोरेकस्वरूपापत्तिरिवास्मिता क्लेश उच्यते । भोक्तृभोग्यशक्त्योरत्यन्तविभक्तयोरत्यन्तासङ्कीर्णयोरविभागप्राप्ताविव सत्यां भोगः कल्पते । स्वरूपप्रतिलम्भे तु तयोः कैवल्यमेव भवति कुतो भोग इति । तथा चोक्तं—बुद्धितः परं पुरुषमाकारशीलविद्यादिभिर्विभक्तमपश्यन्कुर्यात्तत्रात्मबुद्धिं मोहेनेति ॥६॥
Sutra 7 – Rāga
सुखानुशयी रागः ॥७॥

सुखाभिजातस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति ॥७॥
Sutra 8 – Dveṣa
दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो देस्तत्साधने वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेष इति ॥८॥

Hindi

Sutra 5
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) अविद्या का अर्थ है: अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में क्रमशः नित्य, शुचि, सुख और आत्म बुद्धि होना। * अनित्य में नित्य बुद्धि: जो वस्तुएं नष्ट होने वाली हैं (जैसे शरीर, पृथ्वी, तारे), उन्हें स्थायी या अमर मान लेना। उदाहरण के लिए, यह मानना कि "देवता अमर हैं" या "यह पृथ्वी हमेशा रहेगी।" * अशुचि (अपवित्र) में शुचि (पवित्र) बुद्धि: शरीर स्वभाव से अशुचि है (स्थान, बीज, रक्त-मांस आदि के कारण)। पण्डित इसे अपवित्र जानते हैं, लेकिन अविद्या के कारण लोग एक सुंदर स्त्री या पुरुष के शरीर को 'चंद्रमा जैसा सुंदर' या 'अमृत जैसा' मानकर उसमें पवित्रता का भ्रम पाल लेते हैं। * दुःख में सुख बुद्धि: ज्ञानी के लिए संसार के सभी भोग अंततः दुःखदायी हैं (परिणाम, ताप और संस्कार दुःख के कारण), लेकिन अज्ञानी उनमें सुख ढूँढता है। इसे अविद्या कहा गया है। * अनात्म में आत्म बुद्धि: जो जड़ है (जैसे धन-संपत्ति, शरीर या मन), उसे अपना 'स्वयं' या 'आत्मा' मान लेना। जब शरीर स्वस्थ होता है, तो व्यक्ति सोचता है "मैं संपन्न हूँ," और शरीर बीमार होने पर सोचता है "मैं दुखी हूँ।" यह अनात्म को आत्मा मान लेना है। अविद्या का वास्तविक अर्थ: जैसे 'अमित्र' का अर्थ केवल मित्र का अभाव नहीं, बल्कि मित्र का 'शत्रु' (विरोधी) है। जैसे 'अगोष्पद' का अर्थ गाय के खुर के निशान का अभाव नहीं, बल्कि एक विशाल स्थान है। वैसे ही अविद्या केवल 'विद्या का अभाव' नहीं है, बल्कि विद्या का विपरीत ज्ञान है।
Sutra 6
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र समझाता है कि हमारी 'अस्मिता' या 'अहंकार' कैसे पैदा होता है। * दो शक्तियों का संयोग: यहाँ दो अलग-अलग शक्तियों की बात की गई है: * दृक्शक्ति (Purusha): यह आत्मा या विशुद्ध चेतना है, जो केवल देखने वाली (Witness) है। * दर्शनशक्ति (Buddhi): यह बुद्धि या चित्त है, जो देखने का साधन (Instrument) है। * अस्मिता की परिभाषा: जब ये दोनों शक्तियाँ (आत्मा और बुद्धि), जो स्वभाव से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग और भिन्न हैं, एक जैसी दिखने लगती हैं (मानो वे एक ही हों), तो उसे 'अस्मिता' क्लेश कहा जाता है। * भोग का कारण: जब तक इन दोनों शक्तियों के बीच 'अविभाग' (Identity) बना रहता है, तब तक ही 'भोग' (सांसारिक सुख-दुःख का अनुभव) संभव होता है। हम सोचते हैं, "बुद्धि दुखी है तो मैं दुखी हूँ।" * कैवल्य (मोक्ष): जब व्यक्ति को यह बोध हो जाता है कि देखने वाला (आत्मा) और देखने का साधन (बुद्धि) अलग-अलग हैं, तो 'भोग' समाप्त हो जाता है और कैवल्य (मुक्ति) की प्राप्ति होती है। * निष्कर्ष: मोह के कारण व्यक्ति बुद्धि से परे रहने वाले पुरुष (आत्मा) को पहचान नहीं पाता और बुद्धि के गुणों को ही अपना स्वरूप मान लेता है।
Sutra 7
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र समझाता है कि राग (लगाव) कैसे उत्पन्न होता है और इसका स्वभाव क्या है: * अनुभव का आधार: जिस व्यक्ति ने पहले कभी सुख का अनुभव किया है, उसके भीतर उस सुख की एक स्मृति (याद) बस जाती है। * राग की प्रक्रिया: जब वह व्यक्ति दोबारा वैसी ही स्थिति या वस्तु के संपर्क में आता है, तो पुरानी सुखद यादें जाग उठती हैं। * परिभाषा: सुख की उस स्मृति के कारण, वर्तमान में सुख के प्रति या सुख देने वाले साधनों (वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति) के प्रति जो गिद्धता (Lust/Greed), तृष्णा (Craving), या लोभ (Longing) पैदा होता है, उसे ही 'राग' कहा जाता है। * निष्कर्ष: राग केवल प्रेम नहीं है, बल्कि एक ऐसी खिंचाव भरी लालसा है जो चित्त को चंचल बनाती है और व्यक्ति को उस सुख पर निर्भर कर देती है
Sutra 8
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र समझाता है कि द्वेष (नफरत या घृणा) का जन्म कैसे होता है: * अनुभव का आधार: जिस व्यक्ति को अतीत में कभी दुःख का अनुभव हुआ है, उसके चित्त में उस दुःख की एक स्मृति (दुःखानुस्मृति) अंकित हो जाती है। * द्वेष की प्रक्रिया: जब वह व्यक्ति उस दुःख को देने वाले साधन (व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति) के संपर्क में फिर से आता है, तो उसके भीतर एक नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है। * परिभाषा: दुःख या दुःख देने वाले साधनों के प्रति जो प्रतिघ (विरोध का भाव), मन्यु (भीतर की जलन), जिघांसा (उस दुःख को नष्ट करने या उससे दूर भागने की इच्छा) या क्रोध पैदा होता है, उसे 'द्वेष' कहा जाता है। * निष्कर्ष: जिस तरह 'राग' हमें सुख की ओर खींचता है, 'द्वेष' हमें दुःख के साधनों से दूर ढकेलता है। दोनों ही स्थितियाँ चित्त को अशांत करती हैं।

English

Sutra 5
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.5 defines Avidya (Ignorance) as a four-fold structural error in perception. It is not a mere absence of knowledge, but a "positive misconception." The Four Pillars of Avidya: * Eternal in the Evanescent (Anitya): Perceiving perishable things like the body, the earth, or celestial bodies as eternal or permanent. * Pure in the Impure (Ashuchi): Regarding the physical body—which is inherently impure due to its origin (seed), location, and secretions—as pure, beautiful, or divine. The text explains how we romanticize the physical form (e.g., comparing a face to the moon) despite its biological reality. * Pleasure in Pain (Dukha): Regarding worldly experiences as pleasurable, whereas a wise person sees that they ultimately lead to suffering due to change (parinama), anxiety (tapa), and habituation (samskara). * Self in Non-Self (Anatman): Identifying the 'Self' (Purusha) with external objects, the physical body, or the fluctuating mind (Chitta). Mistaking the assets or liabilities of the body/mind as one's own identity. The Philosophical Nature of Avidya: The text uses linguistic analogies to define Avidya: * Just as 'A-mitra' (non-friend) doesn't just mean no friend, but a 'foe' (opposite of friend). * Just as 'A-goshpada' doesn't just mean no cow-print, but a 'vast area'. Similarly, Avidya is not the absence of proof or knowledge; it is a distinct, contrary state of knowledge that opposes wisdom (Vidya).
Sutra 6
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.6 defines Asmita (Egoism), the second klesha. It explains the false identification of the Self with the mind. * The Two Powers: The text distinguishes between: * Drik-shakti (Purusha): The power of consciousness, the pure Seer. * Darshana-shakti (Buddhi): The power of seeing, the intellect or the instrument of perception. * Definition of Asmita: Asmita is the state where these two distinct entities—the Seer and the instrument of seeing—appear to be one and the same. It is the "I-am-ness" that arises from confusing the soul with the mind. * The Mechanism of Experience (Bhoga): Worldly experience (Bhoga) is only possible as long as there is an apparent lack of distinction between the enjoyer (Purusha) and the enjoyed (Buddhi). We mistakenly feel that the changes in our mind are changes in our actual Self. * Path to Liberation (Kaivalya): Once the true nature of both is realized and their separation is understood, Bhoga ceases, and one attains Kaivalya (Liberation). * Quote Insight: Out of delusion (Moha), one fails to see the Purusha as distinct from the intellect in terms of form, character, and wisdom, and thus wrongly identifies with the intellect.
Sutra 7
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.7 defines Raga (Attachment), the third klesha. It explains the psychological mechanics of desire. * Basis of Experience: Raga is rooted in the previous experience of pleasure (Sukha). * The Role of Memory: When a person who has enjoyed a particular pleasure remembers it (Sukhanusmriti), a psychological imprint is triggered. * Definition: That greed (Gardha), thirst (Trishna), or longing (Lobha) directed toward pleasure or the means of attaining that pleasure (objects, people, or situations) is called Raga. * Key Insight: Raga is a magnetic pull or an intense craving that binds the mind to external objects, making the individual believe that their happiness depends on those external factors.
Sutra 8
Aversion (dveṣa) follows pain. English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.8 defines Dvesha (Aversion), the fourth klesha. It explains the mechanics of resentment and repulsion. * Basis of Experience: Dvesha is rooted in the previous experience of pain or suffering (Dukha). * The Role of Memory: The mind retains a memory of that pain (Dukhanusmriti). When confronted with the cause of that pain again, the mind reacts defensively. * Definition: That resistance (Pratigha), hidden resentment (Manyu), desire to strike back or avoid (Jighansa), or anger (Krodha) directed toward pain or the objects that cause pain is called Dvesha. * Key Insight: Dvesha is an emotional repulsion. While Raga attracts us to objects, Dvesha repels us. Both are considered "afflictions" because they both keep the mind reactive and dependent on external circumstances.

Sanskrit

Sutra 9
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति, मा न भूवं भूयासमिति । न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः । एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते, स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षानुमानागमैरसम्भावितौ मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति । यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वापरान्तस्य रूढः । कस्मात्समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति ॥९॥
Sutra 10
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

ते पञ्चक्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधिकारे चेतसि प्रलीने सह तेनैवास्तं गच्छन्ति ॥१०॥
Sutra 11
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥

क्लेशानां या वृत्तयः स्थूलास्ताः क्रियायोगेन तनूकृताः सत्यः प्रसङ्ख्यानेन ध्यानेन हातव्या यावत्सूक्ष्मीकृता यावद्दग्धबीजकल्पा इति । यथा च वस्त्राणां स्थूलो मलः पूर्वं निर्धूयते पश्चात्सूक्ष्मो यत्नेनोपायेन चापनीयते, तथा स्वल्पप्रतिपक्षाः स्थूला वृत्तयः क्लेशानां, सूक्ष्मास्तु महाप्रतिपक्षा इति ॥११॥
Sutra 12
क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥

तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः कामलोभमोहक्रोधप्रसवः । स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च । तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपःसमाधिभिर्निर्वर्तित ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति । तथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरुपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते । यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः, तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन परिणत इति । तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः । क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति ॥१२॥
Sutra 13
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥

सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भो भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुषावनद्धाः शालितुण्डला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति, नापनीततुषा दग्धबीजभावा वा, तथा क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति, नापनीतक्लेशो न प्रसङ्ख्यानदग्धक्लेशबीजभावो वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोग इति । तत्रेदं विचार्यते—किमेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणमथैकं कर्मानेकं जन्माक्षिपतीति ? द्वितीया विचारणा—किमनेकं कर्मानेकं जन्म निर्वर्तयत्यथानेकं कर्मैकं जन्म निर्वर्तयतीति ? न तावदेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणम् । कस्मात्? अनादिकालप्रचितस्यासङ्ख्येयस्यावशिष्टस्य कर्मणः साम्प्रतिकस्य च फलक्रमानियमादनाश्वासो लोकस्य प्रसक्तः । स चानिष्ट इति । न चैकं कर्मानेकस्य जन्मनः कारणम् । कस्मात्? अनेकेषु कर्मस्वेकैकमेव कर्मानेकस्य जन्मनः कारणमित्यवशिष्टस्य विपाककालाभावः प्रसक्तः च चाप्यनिष्ट इति । न चानेकं कर्मानेकस्य जन्मनःकारणम् । कस्मात्? तदनेकं जन्म युगपन्न सम्भवतीति क्रमेणैव वाच्यम् । तथा च पूर्वदोषानुषङ्गः । तस्माज्जन्मप्रायणान्तरे कृतः पुण्यापुण्यकर्माशयप्रचयो विचित्रः प्रधानोपसर्जनभावेनावस्थितः प्रायणाभिव्यक्त एकप्रघट्टकेन मिलित्वा मरणं प्रसाध्य सम्मूर्च्छित एकमेव जन्म करोति । तच्च जन्म तेनैव कर्मणा लब्धायुष्कं भवति । तस्मिन्नायुषि तेनैव कर्मणा भोगः सम्पद्यत इति । असौ कर्माशयो जन्मायुर्भोगहेतुत्वात्त्रिविधपाकोऽभिधीयत इति । अत एकभविक कर्माशय उक्त इति । दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारम्भी भोगहेतुत्वात्, द्विपाकारम्भी वा भोगायुर्हेतुत्वान्नदीश्वरवन्नहुषवद्वेति । क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्वर्तिताभिस्तु वासनाभिरनादिकालसम्मूर्च्छितमिदं चित्तं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततमित्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः । यस्त्वयं कर्माशय एष एवैकभविक उक्त इति । ये संस्काराः स्मृतिहेतवस्ता वासनास्ताश्चानादिकालीना इति । यस्त्वसावेकभविकः कर्माशय स नियतविपाकश्चानियतविपाकश्च । तत्रादृष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्यैवायं नियमो न त्वदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियतविपाकस्य । कस्मात्? यो ह्यदृष्टजन्मवेदनीयोऽनियतविपाकस्तस्य त्रयी गतिः—कृतस्याविपक्वस्य नाशः प्रधानकर्मण्यावापगमनं वा, नियतविपाकप्रधानकर्मणाभिभूतस्य वा चिरमवस्थानमिति । तत्र कृतस्याविपक्वस्य नाशो यथा शुक्लकर्मोदयादिहैव नाशः कृष्णस्य । यत्रेदमुक्तम्— द्वे द्वे ह वै कर्मणी वेदितव्ये पापकस्यैको राशिः पुण्यकृतोऽपहन्ति । तदिच्छस्व कर्माणि सुकृतानि कर्तुं इहैव ते कर्म कवयो वेदयन्ते ॥ प्रधानकर्मण्यावापगमनम् । यत्रेदमुक्तम्—« स्यात्स्वल्पः सङ्गरः सपरिहारः सप्रत्यवमर्षः कुशलस्य नापकर्षायालम् । कस्मात्? कुशलं हि मे बह्वन्यदस्ति यत्रायमावापं गतः स्वर्गेऽप्यपकर्षमल्पं करिष्यति » इति । नियतविपाकप्रधानकर्मणाभिभूतस्य वा चिरमवस्थानम् । कथमिति ? अदृष्टजन्मवेदनीयस्यैव नियतविपाकस्य कर्मणः समानं मरणमभिव्यक्तिकारणमुक्तम्, न त्वदृष्टजन्मवेदनीयानियतविपाकस्य । यत्त्वदृष्टजन्मवेदनीयं कर्मानियतविपाकं तन्नश्येदावापं वा गच्छेदभिभूतं वा चिरमप्युपासीत, यावत्समानं कर्माभिव्यञ्जकं निमित्तमस्य न विपाकाभिभूतं करोतीति तद्विपाकस्यैव देशकालनिमित्तानवधारणादियं कर्मगतिश्चित्रा दुर्विज्ञाता चेति । न चोत्सर्गस्यापवादान्निवृत्तिरित्येकभविकः कर्माशयोऽनुज्ञायत इति ॥१३॥

Hindi

Sutra 9
जीवन के प्रति आसक्ति और मृत्यु का भय अभिनिवेश कहलाता है। हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार यहाँ 'अभिनिवेश' के स्वरूप और उसके कारणों को समझा रहे हैं: * जीने की नित्य इच्छा: हर प्राणी के भीतर यह प्रार्थना या इच्छा नित्य बनी रहती है कि— "मैं कभी समाप्त न होऊँ, मैं सदा बना रहूँ" (मा न भूवं भूयासमिति)। यह अस्तित्व को बचाए रखने की तीव्र इच्छा ही अभिनिवेश है। * पूर्वजन्म का प्रमाण: भाष्यकार तर्क देते हैं कि जिसने मृत्यु का अनुभव न किया हो, उसके भीतर मृत्यु का इतना गहरा डर हो ही नहीं सकता। चूँकि इस जन्म में अभी मृत्यु हुई नहीं है, इसलिए यह डर पिछले जन्मों में बार-बार अनुभव किए गए मृत्यु के दुखों की स्मृति से आता है। * स्वरसवाही (स्वाभाविक प्रवाह): यह क्लेश इतना गहरा है कि यह 'स्वरसवाही' (अपने आप बहने वाला) है। एक छोटा कीड़ा जो अभी-अभी पैदा हुआ है, वह भी मृत्यु के डर से कांपता है। उसने न तो मृत्यु के बारे में पढ़ा है (आगम), न प्रत्यक्ष देखा है, और न ही अनुमान लगाया है, फिर भी वह मौत से डरता है। यह उसके पूर्वजन्म के संस्कारों का प्रमाण है। * विद्वान और मूर्ख में समानता: यह डर जितना एक अत्यंत मूर्ख व्यक्ति में होता है, उतना ही एक विद्वान (जिसे जन्म और मृत्यु का दार्शनिक ज्ञान है) में भी 'रूढ़' (जड़ जमाए हुए) होता है। * कारण: इसका कारण यह है कि चाहे कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, मृत्यु के समय होने वाला दुखों का अनुभव (वासना) दोनों के चित्त में समान रूप से संचित है।
Sutra 10
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र क्लेशों के 'प्रतिप्रसव' (लय या विनाश) की उच्चतम अवस्था का वर्णन करता है: * दग्ध-बीज अवस्था: जब योगी साधना (विवेक ज्ञान) के माध्यम से उन पाँचों क्लेशों (अविद्या, अस्मिता आदि) को 'दग्ध-बीज' (भुने हुए बीज) की तरह बना देता है, तब वे शक्तिहीन हो जाते हैं। * चेतसि प्रलीने (चित्त का लय): क्लेश चित्त (मन/बुद्धि) के आश्रय में रहते हैं। जब योगी का कार्य समाप्त हो जाता है और वह 'कैवल्य' (मुक्ति) की ओर बढ़ता है, तब उसका चित्त अपने कारण (मूल प्रकृति) में विलीन होने लगता है। * पूर्ण विनाश: जैसे ही चित्त अपने कारण में लीन होता है, उसके साथ ही वे दग्ध-बीज रूपी क्लेश भी सदा के लिए अस्त (नष्ट) हो जाते हैं। * निष्कर्ष: सूक्ष्म क्लेशों को केवल दबाया नहीं जाता, बल्कि चित्त के विलय के साथ उनका अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है। इसे 'प्रतिप्रसव' कहते हैं।
Sutra 11
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) यह सूत्र क्लेशों को मिटाने की व्यावहारिक प्रक्रिया और उसके चरणों को समझाता है: * स्थूल वृत्तियों का त्याग: क्लेशों की जो वृत्तियाँ 'स्थूल' (यानी जो विचार, क्रोध, लोभ या क्रिया के रूप में मन में साफ दिखाई देती हैं) हैं, उन्हें पहले 'क्रियायोग' (तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान) के द्वारा कमजोर (तनु) किया जाता है। इसके बाद, उन्हें ध्यान (Meditation) और प्रसंख्यान (विवेक ज्ञान) के द्वारा पूरी तरह त्याग देना चाहिए। * दग्ध-बीज का लक्ष्य: यह प्रक्रिया तब तक जारी रखनी चाहिए जब तक कि वे क्लेश सूक्ष्म न हो जाएं और अंततः 'दग्ध-बीज' (जले हुए बीज) के समान शक्तिहीन न हो जाएं। * वस्त्र का उदाहरण: भाष्यकार एक बहुत ही सुंदर उदाहरण देते हैं—जैसे गंदे कपड़ों को धोते समय पहले 'स्थूल मल' (ऊपर की धूल-मिट्टी) को झाड़कर या सादे पानी से साफ किया जाता है, और उसके बाद 'सूक्ष्म मल' (गहरे दाग) को विशेष यत्न (साबुन या अन्य रसायनों) द्वारा हटाया जाता है। * प्रतिपक्ष (विरोधी साधन): स्थूल वृत्तियाँ थोड़े से प्रयास (स्वल्प प्रतिपक्ष) से दूर हो जाती हैं, लेकिन सूक्ष्म वृत्तियाँ (संस्कार) 'महा-प्रतिपक्ष' (उच्च स्तरीय साधना और विवेक ख्याति) की मांग करती हैं।
Sutra 12
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार कर्माशय के स्वरूप और उसके पकने (फल देने) की प्रक्रिया को समझा रहे हैं: * कर्माशय का जन्म: पुण्य और अपुण्य (पाप) कर्मों का जो समूह हमारे चित्त में संचित होता है, उसका मूल कारण काम, लोभ, मोह और क्रोध है। यही कर्माशय है। * फल मिलने के दो प्रकार: * दृष्टजन्मवेदनीय: वे कर्म जिनका फल इसी जन्म में मिल जाता है। * अदृष्टजन्मवेदनीय: वे कर्म जिनका फल अगले जन्मों में मिलता है। * तीव्र कर्मों का तत्काल फल (सद्यः परिपाक): * पुण्य: यदि कोई व्यक्ति अत्यंत तीव्र संवेग (वैराग्य), मंत्र, तप, या समाधि के द्वारा, अथवा ईश्वर, देवताओं या महान ऋषियों की अनन्य आराधना करता है, तो उस पुण्य कर्माशय का फल इसी जन्म में तुरंत मिल जाता है। * पाप: यदि कोई व्यक्ति डरे हुए, बीमार, असहाय या विश्वासपात्र व्यक्तियों और तपस्वियों को बार-बार कष्ट पहुँचाता है, तो उस तीव्र पाप का फल भी इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। * पौराणिक उदाहरण: * नन्दीश्वर: उन्होंने मनुष्य रूप छोड़कर इसी जन्म में अपने तीव्र तप से 'देवत्व' प्राप्त किया। * नहुष: इंद्र पद पर होने के बाद भी अपने पाप कर्मों (अहंकार) के कारण वे तुरंत 'सर्प' (तिर्यक योनि) बन गए। * विशेष नियम: नारकीय जीवों के लिए 'दृष्टजन्मवेदनीय' (उसी जन्म में फल) कर्माशय नहीं होता, और जिनके क्लेश नष्ट हो चुके हैं (मुक्त पुरुष), उनके लिए 'अदृष्टजन्मवेदनीय' (अगले जन्म वाला) कर्माशय नहीं बचता।।
Sutra 13
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार यहाँ कर्मों के फलित होने के विज्ञान को समझा रहे हैं: १. मूल शर्त: क्लेशों की उपस्थिति जैसे धान का बीज यदि छिलके (तुष) से ढका हो और जला न हो, तभी वह अंकुरित हो सकता है। वैसे ही, जब तक चित्त में 'क्लेश' (अविद्या आदि) मौजूद हैं, तभी तक कर्माशय फल देता है। यदि क्लेश नष्ट हो गए, तो कर्मों का अंकुरण नहीं होता। २. त्रिविध विपाक (तीन तरह के फल): एक जन्म के कर्माशय से तीन फल मिलते हैं: * जाति: किस योनि में जन्म होगा (मनुष्य, पशु, देव आदि)। * आयु: उस जन्म का जीवनकाल कितना होगा। * भोग: जीवन में मिलने वाले सुख और दुःख के अनुभव। ३. एकभविक कर्माशय (One-birth Karma Theory): भाष्यकार विभिन्न तर्कों को काटकर यह सिद्धांत स्थापित करते हैं कि: मृत्यु के समय, जीवनभर के संचित कर्मों में से मुख्य कर्म एक साथ मिलकर 'एक नए जन्म' की रचना करते हैं। इसे 'एकभविक' (एक जन्म देने वाला) कर्माशय कहते हैं। ४. कर्मों की गति और तीन स्थितियाँ: कुछ कर्मों का फल निश्चित होता है (नियत विपाक), लेकिन कुछ का अनिश्चित (अनियत विपाक)। अनिश्चित कर्मों के साथ तीन बातें हो सकती हैं: * नाश: प्रबल पुण्य कर्मों के उदय से पुराने पाप कर्मों का फल मिलने से पहले ही नाश हो जाना। * आवाप (Merge): मुख्य कर्म के साथ छोटा कर्म मिल जाना (जैसे बड़े पुण्य के साथ छोटा पाप स्वर्ग में थोड़ा सा कष्ट दे)। * अभिभूत (Suspension): किसी प्रबल कर्म के कारण छोटे कर्म का फल बहुत लंबे समय तक के लिए दब जाना।

English

Sutra 9
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.9 defines Abhinivesha (the instinctive clinging to life or the fear of death). It is the most deep-seated affliction. * The Constant Desire to Exist: Every living being has an inherent, perpetual affirmation: "May I never cease to be; may I continue to exist." This primal urge to survive is Abhinivesha. * Evidence of Past Lives: The commentator argues that such a profound fear of death cannot exist in someone who hasn't experienced death before. Since the being is currently alive, this instinctive dread originates from the memories of the suffering of death experienced in previous incarnations. * Svarasavahi (Spontaneous Flow): This affliction flows by its own potency. Even a tiny insect, just born, trembles at the prospect of death. This fear of annihilation (uccheda) isn't learned through perception, inference, or scripture in this life; it is an intuitive memory of past trauma. * Universality: This fear is not limited to the ignorant. It is equally "rooted" (rudhah) in the learned scholar who conceptually understands the beginning and end of life. * Reason: Whether one is wise (kushala) or unwise (akushala), the subconscious impression (vasana) of the agony of death is present in the mental continuum of both, inherited from a beginningless cycle of births.
Sutra 10
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.10 explains the final resolution or dissolution of the subtle kleshas. * The Scorched-Seed State: Once the five afflictions have been reduced to the state of "scorched seeds" (Dagdha-beeja) through discriminative wisdom, they lose their potential to sprout into active thoughts or actions. * Dissolution of the Mind (Chitta-Pralaya): The afflictions reside in the Chitta (the mind-field). For a liberated Yogi, when the purpose of the mind is fulfilled, the mind itself begins to dissolve back into its primary cause (Prakriti). * Final Extinction: As the mind merges back into its source, the scorched-seed kleshas vanish along with it. This process is called Pratiprasava (involution or reverse-emergence). * Key Insight: Subtle afflictions are not just controlled; they are eliminated by dissolving the very vessel (the mind) that contains them.
Sutra 11
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.11 describes the systematic removal of the 'active states' (vrittis) of the afflictions. * Elimination through Meditation: The 'gross' manifestations of the kleshas (active thoughts of anger, greed, etc.), which were previously weakened by Kriya Yoga, must now be completely abandoned through Dhyana (Meditation) and discriminative awareness. * Aim of Scorched Seeds: The goal is to refine these afflictions until they become subtle and eventually reach the state of 'scorched seeds' (Dagdha-beeja), losing their capacity to disturb the mind ever again. * The Laundry Analogy: The commentator provides a practical example: Just as when cleaning a cloth, the gross dirt is first shaken off or rinsed away, and then the subtle, deep-seated stains are removed with special effort and specific agents. * Gross vs. Subtle: Gross mental modifications are relatively easy to counter (Svalpa-pratipaksha), but the subtle impressions (samskaras) require "Great Measures" (Maha-pratipaksha), such as profound spiritual insight.
Sutra 12
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.12 explores the concept of Karmashaya (the latent reservoir of karma) and when its fruits manifest. * Origin of Karmashaya: The accumulation of virtuous (Punya) and non-virtuous (Apunya) karma is birthed from Desire (Kama), Greed (Lobha), Delusion (Moha), and Anger (Krodha). * Timing of Fruition: * Drishta-janma-vedaniya: Karma that is experienced/ripened in the current lifetime. * Adrishta-janma-vedaniya: Karma that is experienced in future lifetimes. * Immediate Fruition of Intense Actions: * Virtue: Intense devotion, mantra practice, austerity, or the worship of Ishvara and great Sages can cause virtuous karma to ripen immediately in the present life. * Vice: Intense cruelty or repeated injury inflicted upon the fearful, the sick, the helpless, or the saintly results in sinful karma ripening right away. * Mythological Precedents: * Nandishvara: He transformed from a human to a divine being (Devatva) in the same life due to his intense devotion. * Nahusha: Despite being the King of Gods (Indra), his sinful conduct caused him to fall and transform into a serpent instantly. * Specific Exceptions: Beings in hell do not have current-life ripening karma (their suffering is the fruit of past actions), and those whose afflictions are destroyed (the liberated) have no future-life ripening karma..
Sutra 13
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.13 explains the mechanics of Karmic Fruition (Vipaka). It provides a logical framework for how actions translate into destiny. 1. The Prerequisite: Existence of Kleshas Just as a grain of rice can sprout only if it is enclosed in its husk (tusha) and is not roasted, so too the reservoir of karma (Karmashaya) bears fruit only when it is rooted in Kleshas (afflictions like ignorance). If the Kleshas are destroyed by wisdom, the karma becomes sterile. 2. The Triple Fruit (Trividha Vipaka): The karmic reservoir determines three specific aspects of the next life: * Jati: The species or class of birth (e.g., human, animal, celestial). * Ayus: The life span or duration of that life. * Bhoga: The quality of experiences (pleasure and pain). 3. The 'Ekabhavika' Theory: The commentator refutes the idea that one action leads to one birth, or one action leads to many births. Instead, he proposes that at the moment of death, the diverse karmic impressions collected throughout the life unify to project one single subsequent birth. This is known as the Ekabhavika (one-birth) reservoir. 4. Three Fates of 'Uncertain' Karma: Not all actions bear fruit immediately. Some "uncertain" karmas may: * Be Destroyed (Nasha): Powerful virtuous acts can neutralize the effects of past negative deeds before they manifest. * Be Merged (Avapa): A minor negative act might become a small "stain" within a larger virtuous result (e.g., minor discomfort in a heavenly life). * Be Suspended (Abhibhuta): A karma might stay dormant for a very long time because a more dominant karma is currently playing out.

Sanskrit

Sutra 14
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥

ते जन्मायुर्भागाः पुण्यहेतुकाः सुखफला, अपुण्यहेतुकाः दुःखफला इति । यथा चेदं दुःखं प्रतिकूलात्मकमेवं विशेषसुखकालेऽपि दुःखमस्त्येव प्रतिकूलात्मकं योगिनः ॥१४॥
Sutra 15
परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

सर्वस्यायं रागानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनः सुखानुभव इति तत्रास्ति रागजः कर्माशयः । तथा च द्वेष्टि दुःखसाधनानि मुह्यति चेति द्वेषमोहकृतोऽप्यस्ति कर्माशयः । तथा चोक्तम् । नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति हिंसाकृतोऽप्यस्ति शारीरः कर्माशय इति । विषयसुखं चाविद्येत्युक्तम् । या भोगेष्विन्द्रियाणां तृप्तेरुपशान्तिस्तत्सुखम् । या लौल्यादनुपशान्तिस्तद्दुःखम् । न चेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कर्तुं शक्यम् । कस्मात्? यतो भोगाभ्यासमनुविवर्धन्ते रागाः कौशलानि चेन्द्रियाणामिति तस्मादनुपायः । सुखस्य भोगाभ्यास इति । स खल्वयं वृश्चिकविषभीत इवाशीविशेण दष्टो यः सुखार्थी विषयानुवासितो महति दुःखपङ्के निमग्न इति । एषा परिणामदुःखता नाम प्रतिकूला सुखान्वस्थायामपि योगिनमेव क्लिश्नाति । अथ का तापदुःखता ? सर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानुभव इति । तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः । सुखसाधनानि च प्रार्थयामानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते । ततः परमनुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचिनोति । स कर्माशयो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते । का पुनः संस्कारदुःखता ? सुखानुभवात्सुखसंस्काराशयो दुःखानुभवादपि दुःखसंस्काराशय इति ? एवं कर्मभ्यो विपाकेऽनुभूयमाने सुखे दुःखे वा पुनः कर्माशयप्रचय इति । एवमिदमनादिदुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मकत्वादुद्वेजयति । कस्मात्? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति । यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति न चान्येषु गात्रावयवेषु । एवमेतानि दुःखान्यक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव क्लिश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम् । इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवाविद्यया हातव्य एवाहङ्कारममकारानुपातिनं जातं जातं बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्तास्त्रिपर्वाणस्तापा अनुप्लवन्ते । तदेवमनादिदुःखस्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । गुणवृत्त्यविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः । प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा बुद्धिगुणाः परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय शान्तं घोरं मूढं वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवारम्भन्ते । चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् । रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुद्ध्यन्ते । सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते । एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्यया इति सर्वे सर्वरूपा भवति । गुणप्रधानभावकृतस्त्वेषां विशेष इति । तस्माद्दुःखमेव सर्वविवेकिन इति । तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमविद्या । तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः । यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्यूहं—रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति । एवमिदमपि शास्त्रं चतुर्व्यूहमेव । तद्यथा—संसारः संसारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः । प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः । संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं वा हेयं वा न भवितुमर्हति । हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः । उभयप्रत्याख्याने च शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम् ॥१५॥
Sutra 16
हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

दुःखमतीतमुपभोगेनातिवाहितं न हेयपक्षे वर्तते वर्तमानं च स्वक्षणे भोगारूढमिति न तत्क्षणान्तरे हेयतामापद्यते तस्माद्यदेवानागतं दुःखं तदेवाक्षिपात्रकल्पं योगिनं क्लिश्नाति, नेतरं प्रतिपत्तारम् । तदेव हेयतामापद्यते ॥१६॥

Hindi

Sutra 14
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार यहाँ कर्म के फल की प्रकृति और 'योगी' की दृष्टि को समझा रहे हैं: १. कर्म और उनके परिणाम: * पुण्यहेतुकाः (Virtuous actions): वे कर्म जो धर्म और परोपकार से प्रेरित होते हैं, उनका फल 'सुख' के रूप में मिलता है। * अपुण्यहेतुकाः (Non-virtuous actions): वे कर्म जो पाप या अधर्म से प्रेरित होते हैं, उनका फल 'दुःख' के रूप में मिलता है। अर्थात, जो जाति (जन्म), आयु और भोग हमें प्राप्त हुए हैं, उनमें सुख-दुःख की मात्रा हमारे पिछले जन्मों के पुण्य-पाप पर निर्भर करती है। २. योगी की विशिष्ट दृष्टि: भाष्यकार यहाँ एक बहुत ही गहरी बात कहते हैं— "योगी के लिए सुख भी दुःख ही है।" जैसे साधारण व्यक्ति दुःख को 'प्रतिकूल' (कष्टकारी) मानता है, वैसे ही एक योगी 'विशेष सुख' के समय भी उसे दुःख के समान ही अनुभव करता है। योगी ऐसा क्यों सोचता है? क्योंकि वह जानता है कि आज जो सुख है, वह कल समाप्त हो जाएगा (परिणाम दुःख), उसे खोने का डर बना रहेगा (ताप दुःख), और वह सुख नए संस्कारों को जन्म देगा जो फिर से जन्म-मरण के चक्र में फँसाएंगे (संस्कार दुःख)।
Sutra 15
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) १. विवेकी के लिए सब दुःख क्यों है? (चार कारण): भाष्यकार समझाते हैं कि साधारण व्यक्ति जिसे सुख मानता है, योगी उसे इन चार कारणों से दुःख मानता है: * परिणाम दुःख: आज का सुख कल समाप्त हो जाएगा। सुख की समाप्ति का विचार ही दुखी कर देता है। जैसे कोई बिच्छू के डर से भागकर सांप के मुँह में जा गिरे, वैसे ही सुख की चाहत अंततः दुःख के दलदल में ले जाती है। * ताप दुःख: सुख के साधनों को जुटाने में दूसरों से द्वेष, जलन और संघर्ष करना पड़ता है। यह मानसिक संताप हमेशा बना रहता है। * संस्कार दुःख: सुख भोगने से मन में उसकी आदत (संस्कार) पड़ जाती है। जब वह वस्तु नहीं मिलती, तो तड़प पैदा होती है। * गुणवृत्ति विरोध: हमारी बुद्धि सत्त्व, रज और तम गुणों से बनी है। ये गुण आपस में टकराते रहते हैं, जिससे मन कभी शांत, कभी घोर (क्रोधित), तो कभी मूढ़ बना रहता है। सुख में भी दुःख के गुण छिपे रहते हैं। २. योगी की संवेदनशीलता (आँख की पुतली का उदाहरण): भाष्यकार कहते हैं कि "विद्वान या योगी आँख की पुतली के समान होता है" (अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वान)। जैसे ऊन का एक छोटा सा रेशा हाथ पर रखने से पता नहीं चलता, लेकिन आँख में गिर जाए तो असह्य दुःख देता है, वैसे ही संसार के सूक्ष्म दुःख केवल योगी को ही चुभते हैं, साधारण मनुष्य को नहीं। ३. योग का चतुर्व्यूह (Medical Model of Yoga): जैसे चिकित्सा शास्त्र के चार अंग होते हैं, वैसे ही योग शास्त्र के चार अंग हैं: * हेय (संसार): दुःख से भरा यह जन्म-मरण का चक्र (रोग के समान)। * हेय-हेतु (कारण): आत्मा और बुद्धि का संयोग (रोग का कारण)। * हान (मोक्ष): दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति (स्वास्थ्य के समान)। * हानोपाय (उपाय): सम्यग्दर्शन या विवेक ज्ञान (औषधि के समान)।
Sutra 16
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार दुखों को तीन श्रेणियों में बाँटकर समझाते हैं कि कौन सा दुःख 'हेय' (त्यागने योग्य) है: * अतीत (Beete hue) दुःख: जो दुःख हम पहले ही भोग चुके हैं, वे समाप्त हो चुके हैं। वे अब हमारे नियंत्रण में नहीं हैं और न ही उन्हें त्यागने का कोई अर्थ है क्योंकि वे बीत चुके हैं। * वर्तमान (Chalte hue) दुःख: जो दुःख अभी इसी क्षण भोगा जा रहा है, वह हमारे अनुभव का हिस्सा बन चुका है। वह अपने ही क्षण में घटित हो रहा है, इसलिए उसे उस क्षण विशेष में बदला नहीं जा सकता। * अनागत (Coming) दुःख: वह दुःख जो अभी आया नहीं है, लेकिन भविष्य में आने वाला है। भाष्यकार कहते हैं कि केवल यही दुःख है जिसे योग के माध्यम से रोका जा सकता है या त्यागा जा सकता है। योगी की विशिष्टता: जैसे पिछले सूत्र में कहा गया था, भविष्य का यह दुःख भी केवल 'अक्षिपात्रकल्प' (आँख की पुतली के समान संवेदनशील) योगी को ही कष्ट देता है। साधारण व्यक्ति भविष्य के प्रति लापरवाह रहता है, लेकिन योगी उसे पहले ही पहचानकर 'विवेक ज्ञान' से काट देता है।

English

Sutra 14
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.14 defines the nature of the fruits (Vipaka) described in the previous verse—Life, Span, and Experience. 1. The Law of Retribution: * Punya-hetukah (Virtuous Cause): Actions rooted in merit result in Pleasure (Sukha). * Apunya-hetukah (Vicious Cause): Actions rooted in demerit result in Pain (Dukha). The quality of our birth, our longevity, and our experiences are direct reflections of our moral past. 2. The Perspective of a Yogi: The commentator adds a profound philosophical layer: For a Yogi, even pleasure is seen as pain. While an ordinary person only finds suffering "unfavorable" (pratikula), a Yogi perceives even moments of intense pleasure as ultimately unfavorable. Why does the Yogi perceive pleasure as pain? The Yogi understands that pleasure is fleeting (leads to the pain of change), is accompanied by the anxiety of losing it (the pain of distress), and creates new subconscious impressions that bind the soul to further rebirths (the pain of habituation).
Sutra 15
English Explanation This is the commentary on Yoga Sutra 2.15, which famously concludes that "to the discerning, all is suffering." It presents the logic behind this detachment and introduces the "Four-fold structure" of Yoga. 1. Why even Pleasure is Pain (Four Dimensions): * Parinama (Change): Pleasure is transient. The inevitable end of pleasure causes anxiety and pain. Trying to find permanent happiness in objects is like running from a scorpion only to be bitten by a cobra. * Tapa (Anxiety/Conflict): Maintaining objects of pleasure involves competition, envy, and the harming of others, which accumulates negative karma and mental heat. * Samskara (Habituation): Every pleasure leaves a subconscious imprint that creates a craving for repetition. When the craving isn't met, it results in agony. * Guna-Vritti-Virodha (Conflict of Qualities): The mind is composed of three Gunas (Sattva, Rajas, Tamas) which are constantly in flux. Even in a state of pleasure, the seeds of agitation and dullness are present. 2. The Sensitive Eye of the Yogi: The text gives a profound analogy: "The wise man is like an eyeball" (Akshipatrakalpo hi vidvan). A tiny thread of wool doesn't hurt when placed on the skin, but it causes intense pain if it falls into the eye. Similarly, the subtle impurities of the world cause suffering only to the refined consciousness of a Yogi, while the common man remains numb to them. 3. The Four-fold Medical Model of Yoga (Chaturvyuha): Just as medicine has four parts, Yoga philosophy follows this structure: * Heya (The Ailment): The cycle of suffering (Samsara). * Heya-hetu (The Cause): The false union of the Seer (Purusha) and the Seen (Prakriti). * Hana (The Cure): Liberation or the end of suffering (Moksha). * Hanopaya (The Prescription): Right vision or discriminative wisdom (Viveka-khyati).
Sutra 16
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.16 addresses the question: "Which suffering can actually be avoided?" * Past Suffering (Atita Dukha): Pain that has already been experienced is gone. It does not fall within the scope of "avoidable" because its function is fulfilled. * Present Suffering (Vartamana Dukha): Pain that is being felt in the current moment is already in the process of fruition. It is being "consumed" in its own moment and cannot be undone at that exact second. * Future Suffering (Anagata Dukha): This is the pain that has not yet manifested. The text declares that only future suffering is avoidable. The Yogi's Insight: Only the Yogi, whose sensitivity is like that of a delicate eye, feels the weight of future suffering before it arrives. For the common person, suffering is only real when it strikes. The goal of Yoga is to prevent the "seeds" of future pain from ever sprouting. दुःख का समय-चक्र (The Time-Cycle of Suffering)

Sanskrit

Sutra 17
द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

द्रष्टा बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः । दृश्या बुद्धिसत्त्वोपारूढाः सर्वे धर्माः । तदेतद्दृश्यमयस्कान्तमणिकल्पं सन्निधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य दृशिरूपस्य स्वामिनः । अनुभवकर्मविषतामापन्नमन्यस्वरूपेण प्रतिलब्धात्मकम् । स्वतन्त्रमपि परार्थत्वात्परतन्त्रम् । तयोर्दृग्दर्शनशक्त्योरनादिरर्थकृतः संयोगो हेयहेतुः दुःखस्य कारणमित्यर्थः । तथा चोक्तम्—तत्संयोगहेतुवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतीकारः । कस्मात्? दुःखहेतोः परिहार्यस्य प्रतीकारदर्शनात। तद्यथा पादतलस्य भेद्यता, कण्टकस्य भेत्तृत्वं, परिहारः, कण्टकस्य पादानधिष्ठानं पादत्राणव्यवहितेन वाधिष्ठानम् । एतत्त्रयं यो वेद लोके स तत्र प्रतीकारमारम्भमाणो भेदजं दुःखं नाप्नोति । कस्मात्? त्रित्वोपलब्धिसामर्थ्यादिति । अत्रापि तापकस्य रजसः सत्त्वमेव तप्यम् । कथं तपिक्रियायाः कर्मस्थत्वात्, सत्त्वे कर्मणि तपिक्रिया नापरिणामिनि निष्क्रिये क्षेत्रज्ञे । दर्शितविषयत्वात्सत्त्वे तु तप्यमाने तदाकारानुरोधी पुरुषोऽनुतप्यत इति ॥१७॥)
Sutra 18
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

प्रकाशशीलं सत्त्वम् । क्रियाशीलं रजः । स्थितिशीलं तम इति । एते गुणाः परस्परोपरक्तप्रविभागाः संयोगविभागधर्मणीतरेतरोपाश्रयेणोपार्जितमूर्तयः परस्पराङ्गाङ्गित्वेऽप्यसम्भिन्नशक्तिप्रविभागाः । तुल्यजातीयातुल्यजातीयशक्तिभेदानुपातिनः । प्रधानवेलायामुपदर्शितसन्निधाना गुणत्वेऽपि च व्यापारमात्रेण प्रधानान्तर्नीतानुमितास्तिताः पुरुषार्थकर्तव्यतया प्रयुक्तसामर्थ्याः सन्निधिमात्रोपकारिणोऽयस्कान्तमणिकल्पाः । प्रत्ययमन्तरेणैकतमस्य वृत्तिमनुवर्तमानाः प्रधानशब्दवाच्या भवन्ति । एतद्दृश्यमित्युच्यते । तदेतद्दृश्यं भूतेन्द्रियात्मकं भूतभावेन पृथिव्यादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमते । तथेन्द्रियभावेन श्रोत्रादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमत इति । तत्तु नाप्रयोजनम्, अपि तु प्रयोजनमुररीकृत्य प्रवर्तत इति भोगापवर्गार्थं हि तद्दृश्यं पुरुषस्येति । तत्रेष्टानिष्टगुणस्वरूपावधारणमविभागापन्नं भोगः । भोक्तुः स्वरूपावधारणमपवर्ग इति द्वयोरतिरिक्तमन्यद्दर्शनं नास्ति । तथा चोक्तं—अयं तु खलु त्रिषु गुणेषु कर्तृष्वकर्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे तत्क्रियासाक्षिण्युपनीयमानान्सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन्त दर्शनमन्यच्छङ्कत इति । तावेतौ भोगापवर्गौ बुद्धिकृतौ बुद्धावेव वर्तमानौ कथं पुरुषे व्यपदिश्येते इति । यथा च जयः पराजयो वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते, स हि तस्य फलस्य भोक्तेति । एवं बन्धमोक्षौ बुद्धावेव वर्तमानौ पुरुषे व्यपदिश्येते बुद्धेरेव पुरुषार्थापरिसमाप्तिर्बन्धस्तदर्थावसायो मोक्ष इति । एतेन ग्रहणधारणोहापोहतत्त्वज्ञानाभिनिवेशा बुद्धौ वर्तमानाः पुरुषेऽध्यारोपितसद्भावाः । स हि तत्फलस्य भोक्तेति ॥१८॥
Sutra 19
विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥

तत्राकाशवाय्वग्न्युदकभूमयो भूतानि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्राणामविशेषाणां विशेषाः । तथा श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बुद्धीन्द्रियाणि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि । एकादशं मनः सर्वार्थम् । इत्येतान्यस्मितालक्षणस्याविशेषस्य विशेषाः । गुणानामेष षोडशको विशेषपरिणामः । षडविशेषाः । तद्यथा—शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रं चेत्येकद्वित्रिचतुष्पञ्चलक्षणाः शब्दादयः पञ्चाविशेषाः, षष्ठश्चाविशेषोऽस्मितामात्र इति । एते सत्तामात्रस्यात्मनो महतः षदविशेषपरिणामाः । यत्तत्परमविशेषेभ्यो लिङ्गमात्रं महत्तत्त्वं तस्मिन्नेते, सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय विवृद्धिकाष्ठामनुभवन्ति । प्रतिसंमृज्यमानाश्च तस्मिन्नेव सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय यत्तन्निःसत्तासत्तं निःसदसन्निरसदव्यक्तमलिङ्गं प्रधानं तत्प्रतियन्तीति । एष तेषां लिङ्गमात्रः परिणामः । निःसत्ताऽसत्तं चालिङ्गपरिणाम इति । अलिङ्गावस्थायां न पुरुषार्थो हेतुः । नालिङ्गावस्थायामादौ पुरुषार्थता कारणं भवतीति । न तस्याः पुरुषार्थता कारणं भवति । नासौ पुरुषार्थकृतेति नित्याख्यायते । त्रयाणां त्ववस्थाविशेषाणामादौ पुरुषार्थता कारणं भवति । स चार्थो हेतुर्निमित्तं कारणं भवतीत्यनित्याख्यायते । गुणास्तु सर्वधर्मानुपातिनो न प्रत्यस्तमयन्ते नोपजायन्ते । व्यक्तिभिरेवातीतानागतव्ययागमवतीभिर्गुणान्वयिनीभिरुपजननापायधर्मका इव प्रत्यवभासन्ते । यथा देवदत्तो दरिद्राति । कस्मात्? यतोऽस्य म्रियन्ते गाव इति । गवामेव मरणात्तस्य दरिद्रता न स्वरूपहानादिति समः समाधिः । लिङ्गमात्रमलिङ्गस्य प्रत्यासन्नं, तत्र तत्संसृष्टं विविच्यते क्रमानतिवृत्तेः । तथा षडविशेषा लिङ्गमात्रे संसृष्टा विविच्यन्ते । परिणामक्रमनियमात। तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते । तथा चोक्तं पुरस्तात। न विशेषेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्तीति विशेषाणां नास्ति तत्त्वान्तरपरिणामः । तेषां तु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्यायिष्यन्ते ॥१९॥

Hindi

Sutra 17
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) १. द्रष्टा और दृश्य का स्वरूप: * द्रष्टा (The Seer): पुरुष (आत्मा) जो बुद्धि का प्रतिसंवेदी है, यानी बुद्धि में होने वाली हलचलों को देखने वाला चेतन तत्व है। * दृश्य (The Seen): बुद्धि में स्थित सभी धर्म और विषय। यह दृश्य 'चुम्बक' (अयस्कान्तमणि) की तरह है, जो केवल पास होने मात्र से (सन्निधि) आत्मा को प्रभावित करता है। २. दुःख का कारण - संयोग: इन दोनों शक्तियों (द्रष्टा और दृश्य) का जो अनादि संयोग है, वही दुःख का असली कारण है। दृश्य स्वयं स्वतंत्र होते हुए भी 'पुरुष' के भोग के लिए होने के कारण परतंत्र जैसा व्यवहार करता है। जब आत्मा स्वयं को बुद्धि के साथ एक मान लेती है, तब दुःख शुरू होता है। ३. कांटे और पैर का उदाहरण: भाष्यकार इसे एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण से समझाते हैं: * पैर का तलवा: भेद्य (छेदने योग्य वस्तु)। * कांटा: भेत्ता (छेदने वाला साधन)। * समाधान: पैर को कांटे पर न रखना, या 'जूता' (पादत्राण) पहनकर कांटे पर चलना। जो इन तीनों को जानता है, वह कांटे से होने वाले दुःख से बच जाता है। इसी प्रकार, जो द्रष्टा, दृश्य और उनके संयोग के रहस्य को जान लेता है, वह संसार के दुखों से बच जाता है। ४. दुःख किसे होता है? तप (दुःख) केवल सत्त्व (बुद्धि) को होता है क्योंकि क्रिया हमेशा कर्म (Object) में होती है। 'पुरुष' तो अपरिवर्तनीय और निष्क्रिय है। लेकिन, चूँकि बुद्धि पुरुष को विषय दिखाती है, इसलिए बुद्धि के दुखी होने पर पुरुष भी उसके आकार के अनुरूप 'अनुतप्त' (दुखी जैसा) प्रतीत होता है।
Sutra 18
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) इस सूत्र में गुणों के चार 'पर्व' (अवस्थाएँ) बताए गए हैं: * विशेष (Specific): इसमें ५ स्थूल भूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और ११ इन्द्रियाँ (५ ज्ञानेंद्रियाँ, ५ कर्मेंद्रियाँ और १ मन) आती हैं। ये अंतिम परिणाम हैं जो हमें संसार में दिखाई देते हैं। * अविशेष (Unspecific): इसमें ५ तन्मात्रायें (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) और 'अस्मिता' (अहंकार) आते हैं। ये सूक्ष्म हैं और सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते। * लिङ्गमात्र (The Differentiated): इसका अर्थ है 'महत् तत्व' या 'बुद्धि'। यह प्रकृति का पहला विकार है जहाँ से सृष्टि का बीज फूटता है। * अलिङ्ग (The Undifferentiated): यह 'मूल प्रकृति' है। यहाँ तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) साम्यावस्था में होते हैं। इसका कोई कारण नहीं है; यह सबका मूल कारण है।
Sutra 19
हिंदी व्याख्या (Hindi Explanation) भाष्यकार यहाँ गुणों के चार स्तरों को विस्तार से समझा रहे हैं: १. विशेष (The 16 Specifics): ये गुणों के अंतिम और स्थूल परिणाम हैं। इनमें शामिल हैं: * ५ स्थूल भूत: आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। * ५ ज्ञानेन्द्रियाँ: कान, त्वचा, आँख, जीभ और नाक। * ५ कर्मेन्द्रियाँ: वाणी, हाथ, पैर, मलत्याग और जननेन्द्रिय। * १ मन: जो उभय (दोनों) रूप है। इन १६ तत्वों के आगे कोई नया 'तत्व' नहीं बनता, केवल इनके रूप बदलते हैं। २. अविशेष (The 6 Unspecifics): ये सूक्ष्म अवस्थाएँ हैं जो 'विशेष' को जन्म देती हैं: * ५ तन्मात्र: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। * अस्मिता (अहंकार): 'मैं हूँ' का भाव। ३. लिङ्गमात्र (The Differentiated/Mahat): यह 'महत् तत्व' या 'बुद्धि' है। यह प्रकृति का पहला अंकुर है। इसमें सभी सूक्ष्म और स्थूल तत्व विलीन रहते हैं। यह 'सत्तामात्र' है। ४. अलिङ्ग (The Undifferentiated/Prakriti): यह मूल अवस्था है जहाँ न सत्य है न असत्य, न अस्तित्व है न अनस्तित्व। यह नित्य है क्योंकि यह किसी 'पुरुषार्थ' (भोग या मोक्ष) के कारण पैदा नहीं हुई, बल्कि स्वयं कारण है। बाकी तीनों अवस्थाएं (विशेष, अविशेष, लिङ्ग) अनित्य हैं क्योंकि वे पुरुष के प्रयोजन के लिए उत्पन्न होती हैं।

English

Sutra 17
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.17 identifies the root cause of avoidable suffering: the "union" (Samyoga) between the Seer and the Seen. 1. The Seer and the Seen: * Drasta (The Seer): The Purusha (Pure Consciousness) who reflects the movements of the intellect (Buddhi). * Drishya (The Seen): All phenomena and attributes residing in the intellect. The Seen is compared to a magnet (Ayaskantamani); it acts upon the Seer simply by its proximity, serving the Seer as an object of experience. 2. Samyoga: The Root Cause: The beginningless association between the power of Consciousness and the power of Perception is the cause of suffering. Although the Seen is independent in its own nature, it exists for the sake of the Seer (Pararthatvat), leading to a false identification. 3. The Thorns and Shoes Analogy: To illustrate how to avoid suffering, the text provides a practical analogy: * The Sole of the Foot: That which is capable of being pierced (Bhedya). * The Thorn: That which pierces (Bhetta). * The Remedy: Avoiding the thorn or using footwear (Padatrana) as a barrier. One who understands this triad acts to prevent the pain. Similarly, in Yoga, identifying the Seer and Seen as distinct acts as the "footwear" against the thorns of worldly pain. 4. Who Suffers?: Pain (Tapa) occurs in the Sattva (Intellect) because the process of change belongs to the object, not the subject. The Purusha is changeless and inactive. However, because the intellect presents its experiences to the Seer, the Seer appears to suffer following the form of the intellect's distress.
Sutra 18
English Explanation This commentary on Yoga Sutra 2.19 describes the four stages of the Gunas (qualities of nature), mapping the entire evolutionary ladder of Prakriti. * Vishesha (The Specific/Gross): This includes the 5 Mahabhutas (Elements) and the 11 Indriyas (Senses and Mind). These are the final tangible manifestations we interact with. * Avishesha (The Unspecific/Subtle): This includes the 5 Tanmatras (Subtle Essences like sound, touch, etc.) and Asmita (Ego). They are the subtle blueprints behind the gross elements. * Linga-matra (The Differentiated/Sign): This refers to Mahat or the Intellect (Buddhi). It is the first manifest sign of evolution from Prakriti. * Alinga (The Undifferentiated/Signless): This is the Primal Nature (Mula Prakriti). It is the state where the three Gunas are in perfect equilibrium. It has no cause itself but is the cause of everything else
Sutra 19
English Explanation This text provides a deep dive into the Cosmic Evolution of the three Gunas. It describes how the unmanifested reality transforms into the tangible universe. 1. Vishesha (16 Specific Results): These are the final "nodes" of evolution. Once nature reaches this stage, it doesn't create new categories of elements, only structural changes. * 5 Gross Elements: Ether, Air, Fire, Water, Earth. * 10 Organs: 5 Sensory organs and 5 Action organs. * 1 Mind: The coordinator of all senses. 2. Avishesha (6 Subtle Causes): These are the "blueprints" for the specific elements. * 5 Tanmatras: Subtle essences of sound, touch, sight, taste, and smell. * Asmita-matra: Pure ego or the "I-sense." 3. Lingamatra (Mahat/Intellect): This is the Intellect or the Great Self. It is the first "sign" (Linga) of manifestation. Everything in the universe remains in a potential state within this Mahat. 4. Alinga (The Signless/Root Nature): This is Pradhana or Mula Prakriti. It is eternal and beyond cause and effect. It doesn't exist for a "purpose" initially; it is the ultimate equilibrium of the Gunas.

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