सूत्र: समानानेकधर्माध्यवसायातन्यतरधर्माध्यवसायात्वा न संशयः ।।
सरल व्याख्या: यदि कोई व्यक्ति एक से अधिक धर्म/कर्म में लगा हुआ है और दूसरे धर्म/कर्म से भिन्न है, तो संशय नहीं होता।
सूत्र: विप्रत्तिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायात्च ।।
सरल व्याख्या: यदि विप्रतिपत्ति (विरोधी विचार) की व्यवस्था नहीं हो, तब भी संशय नहीं होता।
सूत्र: विप्रत्तिपत्तौ च संप्रत्तिपत्तेः ।।
सरल व्याख्या: विप्रतिपत्ति और संप्रत्तिपत्ति दोनों में संशय के नियम लागू होते हैं।
सूत्र: अव्यवस्था आत्मनि व्यवस्थितत्वात्च अव्यवस्थायाः ।।
सरल व्याख्या: स्वयं में व्यवस्थित न होना अव्यवस्था कहलाता है।
सूत्र: तथा अत्यन्तसंशयः तद्धर्मसातत्योपपत्तेः ।।
सरल व्याख्या: यदि अत्यधिक संशय है, तो यह धर्म के सतत अनुपालन से संबंधित होता है।
सूत्र: यथोक्ताध्यवसायातेव तद्विशेषापेक्षात्संशये न असंशयः न अत्यन्तसंशयः वा ।।
सरल व्याख्या: जैसा कि पहले कहा गया, यदि किसी विशेष परिस्थिति में लागू होता है, तो न संशय और न अत्यधिक संशय होता है।
सूत्र: यत्र संशयः तत्र एवं उत्तरोत्तरप्रसङ्गः ।।
सरल व्याख्या: जहाँ संशय होता है, वहाँ उत्तरोत्तर प्रसंग से इसे सुलझाया जाता है।
सूत्र: प्रत्यक्षादीनां अप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष और अन्य प्रमाण त्रिकाल सिद्धि में अप्रामाण्य माने जाते हैं।
सूत्र: पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ न इन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः ।।
सरल व्याख्या: पहले प्रमाण सिद्धि में प्रत्यक्ष का सन्निकर्ष नहीं होता।
सूत्र: पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः ।।
सरल व्याख्या: पश्चात् सिद्धि में प्रमेय केवल प्रमाण से सिद्ध होता है।
सूत्र: युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावः बुद्धीनाम् ।।
सरल व्याख्या: जब दो सिद्धियाँ समान समय में होती हैं, तो बुद्धियों में क्रमबद्धता नहीं होती।
सूत्र: त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ।।
सरल व्याख्या: त्रिकाल सिद्धि में प्रतिषेध से उपपत्ति होती है।
सूत्र: सर्वप्रमाणप्रतिषेधात्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ।।
सरल व्याख्या: सभी प्रमाणों के विरोध से उपपत्ति होती है।
सूत्र: तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ।।
सरल व्याख्या: सभी प्रमाणों के विपरीत नहीं होने पर भी उपपत्ति होती है।
सूत्र: त्रैकाल्याप्रतिषेधः च शब्दातातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः ।।
सरल व्याख्या: त्रिकाल प्रतिषेध और शब्दादि से सिद्धि प्राप्त होती है।
सूत्र: प्रमेयया च तुलाप्रामाण्यवत् ।।
सरल व्याख्या: प्रमेय की तुला प्रमाण के अनुसार की जाती है।
सूत्र: प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ।।
सरल व्याख्या: प्रमाण के आधार पर सिद्धि में अन्य प्रमाणों का संदर्भ लिया जाता है।
सूत्र: तद्विनिवृत्तेः वा प्रमाणसिद्धिवत्प्रमेयसिद्धिः ।।
सरल व्याख्या: जब पूर्व प्रमाण निरस्त हो, तब प्रमेय सिद्धि की जाती है।
सूत्र: न, प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत्तत्सिद्धेः ।।
सरल व्याख्या: प्रकाश या दीपक जैसी सिद्धियों से सिद्धांत की पुष्टि होती है।
सूत्र: क्वचित्निवृत्तिदर्शनातनिवृत्तिदर्शनात्च क्वचितनेकान्तः ।।
सरल व्याख्या: कभी निवृत्ति दृष्टि और कभी अन्य दृष्टियों से सिद्धांत का भिन्न परिणाम।
सूत्र: प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिः असमग्रवचनात् ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष का ज्ञान पूरी तरह से वाक्यों से नहीं मिलता, इसे अनुभव द्वारा समझा जाता है।
सूत्र: न आत्ममनसोः सन्निकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः ।।
सरल व्याख्या: यदि मन और आत्मा में सन्निकर्ष नहीं है, तब भी प्रत्यक्ष का ज्ञान उत्पन्न होता है।
सूत्र: दिग्देशकालाकाशेषु अपि एवं प्रसङ्गः ।।
सरल व्याख्या: दिशा, समय और आकाश में भी यही नियम लागू होता है।
सूत्र: ज्ञानलिङ्गत्वातात्मनः न अनवरोधः ।।
सरल व्याख्या: आत्मा में ज्ञान का लक्षण होने से कोई बाधा नहीं आती।
सूत्र: तदयौगपद्यलिङ्गत्वात्च न मनसः ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष का लक्षण मन से अलग रहता है।
सूत्र: प्रत्यक्षनिमित्तत्वात्च इन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य स्वशब्देन वचनम् ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष का कारण इन्द्रिय और वस्तु का सन्निकर्ष होता है।
सूत्र: सुप्तव्यासक्तमनसां च इन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षनिमित्तत्वात् ।।
सरल व्याख्या: नींद में भी मन और इन्द्रिय का सन्निकर्ष प्रत्यक्ष के कारण बनता है।
सूत्र: तैः च अपदेशः ज्ञानविशेषाणाम् ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान का विशेष लक्षण प्राप्त होता है।
सूत्र: व्याहतत्वातहेतुः ।।
सरल व्याख्या: कारण स्पष्ट होने से प्रत्यक्ष सिद्ध होता है।
सूत्र: न अर्थविशेषप्राबल्यात् ।।
सरल व्याख्या: किसी विशेष अर्थ की अधिकता प्रत्यक्ष को प्रभावित नहीं करती।
सूत्र: प्रत्यक्षं अनुमानं एकदेशग्रहणातुपलब्धेः ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष और अनुमान एक ही दिशा में ग्रहण किए जाते हैं।
सूत्र: न, प्रत्यक्षेण यावत्तावतपि उपलम्भात् ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष के जरिए जितना संभव है, उतना ही ज्ञान प्राप्त होता है।
सूत्र: न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् ।।
सरल व्याख्या: एक ही दिशा से सब कुछ ज्ञात नहीं होता।
सूत्र: साध्यत्वातवयविनि सन्देहः ।।
सरल व्याख्या: साध्य वस्तु होने से अवयव में संदेह उत्पन्न होता है।
सूत्र: सर्वाग्रहणं अवयव्यसिद्धेः ।।
सरल व्याख्या: अवयव सिद्धि में सर्वाग्रहण किया जाता है।
सूत्र: धारणाकर्षणोपपत्तेः च ।।
सरल व्याख्या: धारण और आकर्षण से उपपत्ति होती है।
सूत्र: सेनावनवत्ग्रहणं इति चेत्न अतीन्द्रियत्वातणूनाम् ।।
सरल व्याख्या: इन्द्रिय से परे भी ज्ञान ग्रहण हो सकता है।
सूत्र: रोधोपघातसादृश्येभ्यः व्यभिचारातनुमानं अप्रमाणम् ।।
सरल व्याख्या: विरोध और व्यभिचार से अनुमान अप्रमाण माना जाता है।
सूत्र: न, एकदेशत्राससादृश्येभ्यः अर्थान्तरभावात् ।।
सरल व्याख्या: एक दिशा के सादृश्य से अन्य अर्थ की उपपत्ति नहीं होती।
सूत्र: वर्तमानाभावः, पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः ।।
सरल व्याख्या: वर्तमान में जो नहीं है, उसका ज्ञान पतित अवस्था से समझा जाता है।
सूत्र: तयोः अपि अभावः वर्तमानाभावे, तदपेक्षत्वात् ।।
सरल व्याख्या: दोनों में अभाव के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है।
सूत्र: न अतीतानागतयोः इतरेतरापेक्षा सिद्धिः ।।
सरल व्याख्या: अतीत और भविष्य की तुलना से निष्कर्ष निकाला जाता है।
सूत्र: वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ।।
सरल व्याख्या: वर्तमान के अभाव में सभी ग्रहण प्रत्यक्ष उपपत्ति से होते हैं।
सूत्र: कृतताकर्त्तव्यतोपपत्तेः तु उभयथा ग्रहणम् ।।
सरल व्याख्या: कर्तव्य और कृत दोनों से ज्ञान ग्रहण किया जाता है।
सूत्र: अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यातुपमानासिद्धिः ।।
सरल व्याख्या: अत्यधिक एकदेश साधर्म्य से उपमान सिद्धि होती है।
सूत्र: प्रसिद्धसाधर्म्यातुपमानसिद्धेः यथोक्तदोषानुपपत्तिः ।।
सरल व्याख्या: प्रसिद्ध साधर्म्य से उपमान सिद्धि में दोष का निराकरण होता है।
सूत्र: प्रत्यक्षेण अप्रत्यक्षसिद्धेः ।।
सरल व्याख्या: प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है।
सूत्र: न अप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थं उपमानस्य पश्यामः ।।
सरल व्याख्या: अप्रत्यक्ष में प्रमाणार्थ को उपमान से देखा जाता है।
सूत्र: तथा इति उपसंहारातुपमानसिद्धेः न अविशेषः ।।
सरल व्याख्या: उपसंहार में उपमान सिद्धि के विशेष विवरण नहीं हैं।
सूत्र: शब्दः अनुमानं अर्थस्य अनुपलब्धेः अनुमेयत्वात् ।।
सरल व्याख्या: शब्द से अनुमान तब मान्य होता है जब अर्थ अनुपलब्ध हो।
सूत्र: उपलब्धेः अद्विप्रवृत्तित्वात् ।।
सरल व्याख्या: उपलब्धि में द्विप्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए।
सूत्र: सम्बन्धात्च ।।
सरल व्याख्या: केवल सम्बन्ध होने पर उपमान मान्य होता है।
सूत्र: आप्तोपदेशसामर्थ्यात्शब्दातर्थसम्प्रत्ययः ।।
सरल व्याख्या: आप्तोपदेश की क्षमता और शब्दार्थ का प्रमाण उपमान के लिए पर्याप्त है।
सूत्र: पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेः च सम्बन्धाभावः ।।
सरल व्याख्या: पूर्णता की अनुपलब्धता और सम्बन्ध की कमी।
सूत्र: शब्दार्थव्यवस्थानातप्रतिषेधः ।।
सरल व्याख्या: शब्दार्थ व्यवस्थित न होने पर विरोध होता है।
सूत्र: न, सामयिकत्वात्शब्दार्थसम्प्रत्ययस्य ।।
सरल :व्याख्या शब्दार्थसम्प्रत्यय का मतलब है – शब्द के अर्थ का सही ढंग से समझना या उसके प्रमाण की मान्यता।
सूत्र: जातिविशेषे च अनियमात् ।।
सरल व्याख्या: जाति विशेष के मामलों में नियम का पालन नहीं होना।
सूत्र: तदप्रामाण्यं अनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ।।
सरल व्याख्या: इसके प्रमाण का आधार झूठी आपत्ति या पूर्व दोष नहीं होता।
सूत्र: न, कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् ।।
सरल व्याख्या: कर्ता, कर्म और साधन की असंगति से प्रमाण प्रभावित नहीं होता।
सूत्र: अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ।।
सरल व्याख्या: प्राप्त करने और समय के भेद से दोष नहीं उत्पन्न होता।
सूत्र: अनुवादोपपत्तेः च ।।
सरल व्याख्या: अनुवाद की उपपत्ति भी प्रमाण का आधार होती है।
सूत्र: वाक्यविभागस्य च अर्थग्रहणात् ।।
सरल व्याख्या: वाक्य के भाग और अर्थ को ग्रहण करने से प्रमाण मिलता है।
सूत्र: विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ।।
सरल व्याख्या: विधि और अर्थ की वाक्यविनियोग से प्रमाण प्राप्त होता है।
सूत्र: विधिः विधायकः ।।
सरल व्याख्या: विधि का पालन करने वाला ही उसका निर्माता माना जाता है।
सूत्र: स्तुतिः निन्दा परकृतिः पुराकल्पः इति अर्थवादः ।।
सरल व्याख्या: स्तुति, निंदा, परकृति और पुराकल्प से अर्थ की व्याख्या होती है।
सूत्र: विधिविहितस्य अनुवचनं अनुवादः ।।
सरल व्याख्या: विधि के अनुसार अनुवचन और अनुवाद किया जाता है।
सूत्र: न अनुवादपुनरुक्तयोः विशेषः, शब्दाभ्यासोपपत्तेः ।।
सरल व्याख्या: अनुवाद और पुनरुक्ति में कोई विशेष अंतर नहीं, शब्दाभ्यास पर्याप्त है।
सूत्र: शीघ्रतरगमनोपदेशवतभ्यासात्न अविशेषः ।।
सरल व्याख्या: शीघ्र गमन और उपदेश के अभ्यास से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता।
सूत्र: मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत्च तत्प्रामाण्यम्, आप्तप्रामाण्यात् ।।
सरल व्याख्या: मंत्र, आयुर्वेद और आप्तप्रामाण्य से प्रमाण की पुष्टि होती है।
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