तवमग्ने सुभ्र्त उत्तमं वयस्तव सपार्हे वर्ण आ सन्द्र्शि शरियः | तवं वाजः परतरणो बर्हन्नसि तवं रयिर्बहुलो विश्वतस पर्थुः ||
बहुत सुंदर मंत्र है—यह अग्नि के तेज, ऐश्वर्य और सार्वभौमिक समृद्धि के स्वरूप को प्रकट करता है। चलिए इसे उसी क्रम में खोलते हैं, जैसे आपने पूरे सूक्त को क्रमशः रखा है।
तवम् अग्ने सुभृत उत्तमं वयः
तव स्पार्हे वर्ण आ सन्दृशि श्रियः ।
तवं वाजः प्रतरणो बृहन्नसि
तवं रयिर्बहुलो विश्वतस् पृथुः ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
सुभृतः – सु-धारित, उत्तम प्रकार से पोषित
उत्तमं वयः – श्रेष्ठ जीवन-शक्ति / उत्कर्ष
तव स्पार्हे वर्णः – तुम्हारा आकर्षक, काम्य तेज
आ सन्दृशि श्रियः – समस्त ऐश्वर्य का प्रत्यक्ष दर्शन
तवं वाजः – तुम ही शक्ति / विजय
प्रतरणः – संघर्ष में पार लगाने वाले
बृहन् असि – महान, व्यापक हो
तवं रयिः – तुम ही संपदा
बहुलः – प्रचुर
विश्वतः पृथुः – चारों दिशाओं में विस्तृत
हे अग्नि!
तुम उत्तम प्रकार से पोषित
श्रेष्ठ जीवन-ऊर्जा हो।
तुम्हारा तेज ऐसा है
जिसमें ऐश्वर्य साक्षात् दिखाई देता है।
तुम ही विजय की शक्ति हो,
संघर्ष पार कराने वाले,
और महान हो।
तुम ही वह संपदा हो
जो प्रचुर है
और सभी दिशाओं में फैलती है।
यह केवल “जीवन” नहीं,
श्रेष्ठ जीवन-स्तर (Optimal State) है।
👉 आज की भाषा में:
आ सन्दृशि श्रियः
अग्नि का वैभव छुपा हुआ नहीं होता।
वह दिखाई देता है।
👉 जहाँ सही अग्नि है:
अग्नि बाधा हटाती नहीं,
बाधा के पार ले जाती है।
👉 यह बहुत सूक्ष्म अंतर है।
संपदा किसी एक जगह बंधी नहीं।
👉 समृद्धि तब टिकती है जब वह चारों ओर फैली हो।
यह मंत्र कहता है:
इस मंत्र का जप करें जब:
अब तक अग्नि:
अगला मंत्र प्रायः अग्नि को
संरक्षक और मार्गदर्शक रूप में स्थापित करता है।
0 टिप्पणियाँ