तवामग्न आदित्यास आस्यं तवां जिह्वां शुचयश्चक्रिरेकवे |
तवां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे तवे देवा हविरदन्त्याहुतम ||यह मंत्र अग्नि के मुख–जिह्वा–यज्ञ–देवसंयोजन को अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर ढंग से प्रकट करता है। यह पूरे सूक्त का केन्द्रीय दार्शनिक मंत्र माना जा सकता है। आइए इसे शांत भाव से खोलते हैं।
तवाम् अग्न आदित्यास आस्यम्
तवां जिह्वां शुचयश्चक्रिरे कवये |
तवां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे
तवे देवा हविरदन्त्याहुतम् ||
तवाम् अग्ने – हे अग्नि! तुम्हें ही
आदित्यासः आस्यम् – आदित्य (दैवी शक्तियाँ) मुख रूप में मानते हैं
तवाम् जिह्वाम् – तुम्हें ही जिह्वा
शुचयः – पवित्र जन / ऋषि
चक्रिरे – बनाते हैं
कवये – ज्ञानस्वरूप, द्रष्टा अग्नि के लिए
तवाम् रातिषाचः – दान/ऋतु के संवाहक
अध्वरेषु – यज्ञों में
सश्चिरे – निरंतर संलग्न रहते हैं
तवे देवा: – तुम्हारे माध्यम से ही देव
हविः अदन्ति – आहुति ग्रहण करते हैं
आहुतम् – जो समर्पित की गई है
हे अग्नि!
देवता तुम्हें अपना मुख मानते हैं।
पवित्र ऋषियों ने तुम्हें
ज्ञानस्वरूप जिह्वा बनाया है।
दान और ऋतु की शक्तियाँ
यज्ञों में तुम्हारे साथ चलती हैं।
और तुम्हारे द्वारा ही
देव आहुति को ग्रहण करते हैं।
आदित्यास आस्यम्
देव सीधे कुछ नहीं लेते।
हर समर्पण माध्यम से जाता है।
👉 जीवन में भी:
तवां जिह्वां शुचयः चक्रिरे
अग्नि केवल जलाती नहीं,
व्यक्त करती है।
👉 विचार तभी देव तक पहुँचता है जब:
यह मंत्र कहता है:
👉 Interface सही नहीं तो Output नहीं।
तवे देवा हविरदन्ति
देव “नीचे” नहीं उतरते,
हमारी चेतना ऊपर उठती है।
यह मंत्र कहता है:
यह मंत्र विशेष रूप से उपयोगी है जब:
👉 क्योंकि यह मंत्र Expression + Reception को शुद्ध करता है।
अब अग्नि:
यहाँ से सूक्त आगे बढ़कर
अग्नि को साक्षी और संरक्षक रूप में लाता है।
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