तवे अग्ने विश्वे अन्र्तासो अद्रुह आसा देवा हविरदन्त्याहुतम | तवया मर्तासः सवदन्त आसुतिं तवं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः |
तवे अग्ने विश्वे अनृतासो अद्रुह
आसा देवा हविरदन्त्याहुतम् |
तवया मर्तासः स्वदन्त आसुतिं
तवं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः ||
तवे अग्ने – हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा
विश्वे – सभी
अनृतासः – असत्यरहित, ऋत में स्थित
अद्रुहः – अहिंसक, द्रोह-रहित
आसाः देवा: – ऐसे देव
हविः अदन्ति – आहुति ग्रहण करते हैं
आहुतम् – जो समर्पित की गई है
तवया – तुम्हारे माध्यम से
मर्तासः – मनुष्य
स्वदन्ति – तृप्त होते हैं
आसुतिम् – यज्ञरस / फल
तवं गर्भः – तुम गर्भ हो
वीरुधाम् – वनस्पतियों का
जज्ञिषे – उत्पन्न होते हो
शुचिः – पवित्र रूप में
हे अग्नि!
तुम्हारे माध्यम से ही
सभी सत्यनिष्ठ और द्रोह-रहित देव
आहुति को ग्रहण करते हैं।
तुम्हारे द्वारा ही
मनुष्य अपने कर्मों का फल पाते हैं।
और तुम ही
वनस्पतियों के गर्भ में
पवित्र रूप से जन्म लेते हो।
तवे… देवा हविरदन्ति
यहाँ क्रांतिकारी बात है:
देव स्वतंत्र नहीं, ऋत (Cosmic Law) के अधीन हैं।
👉 अगर प्रक्रिया शुद्ध नहीं,
तो देव भी फल नहीं देते।
तवया मर्तासः स्वदन्त
देव और मनुष्य में भेद नहीं—
दोनों अग्नि-माध्यम से ही तृप्त होते हैं।
👉 कर्म + शुद्ध माध्यम = फल
👉 बिना माध्यम = व्यर्थ प्रयास
तवं गर्भो वीरुधाम्
अग्नि केवल बाहर की आग नहीं—
वह बीज में छिपी जीवन-ऊर्जा है।
हर स्तर पर “शुचि” आता है:
👉 परिणाम नहीं, प्रक्रिया पवित्र होनी चाहिए
यह मंत्र कहता है:
👉 अग्नि = Universal Operating System
इस मंत्र का जप उपयोगी है जब:
👉 यह मंत्र Alignment सिखाता है।
अग्नि ही देवों का मुख है,
मनुष्यों का माध्यम है,
और प्रकृति का गर्भ है।
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