तवमग्ने दम आ विश्पतिं विशस्त्वां राजानं सुविदत्रं रञ्जते| तवं विश्वानि सवनीक पत्यसे तवं सहस्राणि शता दश परति ||
यह मंत्र अग्नि को गृह, समाज, राज्य और यज्ञ–संपूर्ण व्यवस्था का सार्वभौम शासक घोषित करता है। यहाँ अग्नि केवल देवता नहीं, बल्कि सिस्टम–आर्किटेक्ट है।
तवम् अग्ने दम आ विश्पतिं विशः
त्वां राजानं सुविदत्रं रञ्जते ।
तवम् विश्वानि सवनीक पत्यसे
तवम् सहस्राणि शत दश प्रति ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
दम – घर, परिवार, आंतरिक व्यवस्था
आ – पूर्णतः
विश्पतिम् – समाज/जनसमूह के स्वामी
विशः – प्रजाएँ, लोग
त्वाम् राजानम् – तुम्हें राजा के रूप में
सुविदत्रम् – श्रेष्ठ दाता, उत्तम व्यवस्था देने वाला
रञ्जते – स्वीकार करते हैं, आनंदित होते हैं
विश्वानि – सभी
सवनीक – यज्ञ, कर्म, प्रयास
पत्यसे – तुम ही उनके स्वामी हो
सहस्राणि शत दश प्रति –
हजारों, सैकड़ों, दशों (असंख्य रूपों में)
हे अग्नि!
तुम ही घर और समाज के
सच्चे स्वामी हो।
सभी लोग तुम्हें
श्रेष्ठ दाता और राजा मानकर
स्वीकार करते हैं।
सभी कर्मों, यज्ञों और प्रयासों के
तुम ही अधिपति हो।
तुम असंख्य रूपों में,
हजारों–सैकड़ों तरीकों से
फल प्रदान करते हो।
दम → विश → राजानम्
ऋग्वेद कहता है:
👉 और तीनों का केंद्र = अग्नि (अनुशासन + ऊर्जा)
राजानं सुविदत्रम्
सच्चा राजा:
👉 अग्नि = Ideal Governance Model
विश्वानि सवनीक पत्यसे
कोई भी कर्म:
👉 अग्नि = Execution + Accountability
सहस्राणि शत दश प्रति
फल:
👉 लेकिन अग्नि कभी खाली नहीं लौटाती।
👉Agni Sukta mantra 5 Innovation
यह मंत्र कहता है:
👉 Agni is the Operating System of Civilization
यह मंत्र विशेष है जब:
यह गृहस्थ, प्रशासक और साधक—तीनों के लिए है।
पिछले मंत्र में अग्नि:
इस मंत्र में अग्नि:
👉 धन उत्पन्न हुआ,
अब उसका प्रबंधन अग्नि करती है।
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