मीमांसा दर्शन सूत्र 3.7 (18–34) हिन्दी-अंग्रेज़ी व्याख्या
मीमांसा दर्शन – अध्याय 3.7
सूत्र 3.7.18–34: हिन्दी और English Explanation
३.७.१८ — शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात् तस्मात् स्वयं प्रयोगे स्यात्
हिन्दी: शास्त्रफल (कर्म का परिणाम) अपने विशेष लक्षण के अनुसार प्रयोग में आता है, इसलिए स्वतः प्रयोग लागू होता है।
English: The scriptural result, due to its characteristic, is directly applicable; thus self-use is valid.
३.७.१९ — उत्सर्गे तु प्रधानत्वाच् छेषकारी प्रधानस्य तस्माद् अन्यः स्वयं वा स्यात्
हिन्दी: उत्सर्ग (त्याग) में प्रधान कर्म ही मुख्य होता है, शेष कर्म स्वतः या अन्यत्र लागू हो सकता है।
English: In offering, the principal act predominates, while the subordinate act may apply independently or elsewhere.
३.७.२० — अन्यो वा स्यात् परिक्रयाम्नानाद् विप्रतिषेधात् प्रत्यग् आत्मनि
हिन्दी: अन्य कर्म स्वतः हो सकता है, क्योंकि परिक्रया (क्रिया का संयोग) में विप्रतिषेध (विरोध) से स्वतंत्र है।
English: Another act may occur independently due to exemption from opposition in its context.
३.७.२१ — तत्रार्थात् कर्तृपरिमाणं स्याद् अनियमोऽविशेषात्
हिन्दी: वहाँ कर्मकर्ता की मात्रा असंयमित हो सकती है, क्योंकि कोई विशेष नियम नहीं है।
English: In such a context, the agent's measure may be unrestricted due to absence of specific regulation.
३.७.२२ — अपि वा श्रुति भेदात् प्रतिनामधेयं स्युः
हिन्दी: श्रुति भेद के कारण कर्म का निष्पादन नामानुसार किया जा सकता है।
English: Differences in scriptural statements allow acts to be executed according to their names.
३.७.२३ — एकस्य कर्मभेदाद् इति चेत्
हिन्दी: यदि एक कर्म में भेद हो, तो वही विचार किया जाता है।
English: If there is a distinction in one act, it is considered accordingly.
३.७.२४ — नोत्पत्तौ हि
हिन्दी: उत्पत्ति (अस्तित्व) में इसका कोई प्रभाव नहीं है।
English: It has no effect in terms of origination.
३.७.२५ — चमसाध्वर्यवश् च तैर् व्यपदेशात्
हिन्दी: चमस और अध्वर्य (रसोई कर्म) के कारण व्यपदेश (व्याख्या) से यह निर्धारित होता है।
English: Due to ladle and adhvaryu (culinary acts), the interpretation applies accordingly.
३.७.२६ — उत्पत्तौ तु बहुश्रुतेः
हिन्दी: उत्पत्ति में कई श्रुति (वचन) जुड़ी होती हैं।
English: In origination, multiple scriptural statements are connected.
३.७.२७ — दशत्वं लिङ्गदर्शनात्
हिन्दी: लिङ्ग (संकेत) देखने से दशत्व (पूर्णता) सिद्ध होती है।
English: Observing the sign ensures completeness.
३.७.२८ — शमिता च शब्दभेदात्
हिन्दी: शब्दभेद (विभिन्न शब्द) के कारण कार्य शमित होता है।
English: The act is controlled due to differences in words.
३.७.२९ — प्रकरणाद् वोत्पत्त्यसंयोगात्
हिन्दी: प्रकरण और उत्पत्ति के संबंध से कर्म का संयोग निर्धारित होता है।
English: The conjunction of act is determined from context and origination.
३.७.३० — उपगाश् च लिङ्गदर्शनात्
हिन्दी: उपगाश (अधिकार) लिङ्गदर्शन के अनुसार माना जाता है।
English: The privilege is considered based on the observed sign.
३.७.३१ — विक्रयी त्वन्यः कर्मणोऽचोदित्वात्
हिन्दी: विक्रय (हस्तांतरण) किसी अन्य कर्म के अनुपयुक्त होने से हो सकता है।
English: Sale occurs due to the inapplicability of another act.
३.७.३२ — कर्मकार्यात् सर्वेषाम् ऋत्विक्त्वम् अविशेषात्
हिन्दी: सभी कर्मों में ऋत्विक (पुरोहित) की आवश्यकता समान है।
English: All acts require a priest equally due to uniformity.
३.७.३३ — न वा परिसंख्यानात्
हिन्दी: यह संख्या-परिमाण (परिसंख्यान) से निर्धारित नहीं होता।
English: It is not determined by enumeration.
३.७.३४ — पक्षेणेति चेत्
हिन्दी: यदि पक्ष का विचार किया जाए, तो उसी अनुसार कर्म लागू होता है।
English: If a side or context is considered, the act applies accordingly.
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