जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ और नक्षत्रों की स्थिति। - भागवत पुराण

 कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ और नक्षत्रों की स्थिति। - भागवत पुराण

कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ - भागवत पुराण


    कलियुग पारम्परिक भारत का चौथा युग है। आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध 3136 ई.पू. में हुआ। कलियुग का आरम्भ कृष्ण के इस युद्ध के ३५ वर्ष पश्चात निधन पर हुआ। भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के इस पृथ्वी से प्रस्थान के तुंरत बाद 3102 ई.पू. (5102 वर्ष) पूर्व से कलि युग आरम्भ हो गया।

    भागवत पुराण अनुसार कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ, उस वक्त नक्षत्रों की स्थिति क्या थी और कलियुग का कितने समय का होता है? इन प्रश्नों का उत्तर शुकदेव जी ने परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण द्वादश स्कन्ध द्वितीयोऽध्याय में दिया है। वे इस प्रकार है -

सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते उदितौ दिवि ।

तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि ॥ २७ ॥

तेनैव ऋषयो युक्ताः तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् ।

ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ॥ २८ ॥

- भागवत पुराण १२.२.२७-२८

    भावार्थः - जिस समय आकाश में सप्तर्षियों का उदय होता है, उस समय पहले उनमें से दो ही दिखायी पड़ते हैं। उनके बीच में दक्षिणोत्तर रेखा पर समभाग में अश्विनी आदि नक्षत्रों में से एक नक्षत्र दिखायी पड़ता है। उस नक्षत्र के साथ सप्तर्षिगण मनुष्यों की गणना से सौ वर्ष तक रहते हैं। वे तुम्हारे (परीक्षित के) जन्म के समय और इस समय भी मघा नक्षत्र पर स्थित हैं।

कलियुग का प्रारम्भ और कुल समय

यदा देवर्षयः सप्त मघासु विचरन्ति हि ।

तदा प्रवृत्तस्तु कलिः द्वादशाब्द शतात्मकः ॥ ३१ ॥

- भागवत पुराण १२.२.३१-३२

    भावार्थः - परीक्षित! जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर विचरण करते रहते हैं, उसी समय कलियुग का प्रारम्भ होता है। कलियुग की आयु देवताओं की वर्ष गणना से बारह सौ वर्षों की अर्थात् मनुष्यों की गणना के अनुसार चार लाख बत्तीस हजार वर्ष की है।

कलियुग के प्रारम्भ में नक्षत्रों की स्थिति

यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूर्वाषाढां महर्षयः ।

तदा नन्दात् प्रभृत्येष कलिर्वृद्धिं गमिष्यति ॥ ३२ ॥

- भागवत पुराण १२.२.३२

    भावार्थः - जिस समय सप्तर्षि मघा से चलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में जा चुके होंगे, उस समय राजा नन्द का राज्य रहेगा। तभी से कलियुग की वृद्धि शुरू होगी।

    अस्तु, तो कलियुग के अंत में भगवान अवतार लेंगे और कलियुग का अंत होगा और फिर से सतयुग की शुरुआत होगी। अवस्य पढ़े कलियुग के अंत में भगवान कल्कि अवतार - भागवत पुराण


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