बुधवार, 25 सितंबर 2024

मानव की स्वाभाविक समस्या और समाधान क्या संभव है

जीवन का स्वभाव

महामूर्ख की समस्या

महामूर्ख की समस्या 
सबसे प्रथम महामूर्ख कौन है इसके लक्षण क्या है, महात्मा विदुर जी कहते हैं 
1. प्रथम लक्षण विदुर नीति के अनुसार जो मनुष्य बिना पढ़े ही स्वयं पर गर्व करता है,दरिद्र होते हुए भी बड़े-बड़े सपने देखता है,और बिना काम किये ही धन पाने की चेष्टा करता है वह मूर्ख कहलाता है। 
प्रथम लक्षण महामूर्ख का बिना पढ़े लिखे स्वय पर गर्व करता है, अर्थात् जो पढ़ना लिखना जानता हैं वह गर्व कर सकता है, दरिद्र होते हुये भी बड़े बड़े स्वप्न देखता है, अर्थात जो दरिद्रता में है उन्हे बड़े बड़े स्वप्न नहीं देखना चाहिए अर्थात दरिद्रता के स्वप्न देखने चाहिए, और बीना काम किये धन पाने कि कामना करना मानव की महामूर्खता को सिद्ध करता है अर्थात् जब बहुत कुछ करने पर भी धन ना मिले तो विद्वान समझा जाता है। 

2 . विदुर जी कहते हैं जो व्यक्ति अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करता है तथा मित्र के साथ गलत आचरण करता है वह मूर्ख कहलाता है।

अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करने वाला विद्वान नहीं समझा जाता, मित्र मन्त्र के साथ सही आचरण करने से विद्वान समझा जाता है। 

3.जो मनुष्य न चाहने वालों को चाहता है और चाहने वालों का त्याग कर देता है तथा जो अपने से बलवान के साथ बैर करता है ऐसा व्यक्ति महामूर्ख कहलाता है।

चाहने लायक वस्तु को चाहें, और जो आपको चाहते हैं उनका त्याग विद्वान नहीं करते हैं तीसरी बात अपने समान शत्रुओं से ही लड़ना चाहिए, पाण्डव कौरवो से लड़े वह मूर्ख थे क्योंकि कौरव तो पांडव से बहुत बड़े थे पाण्डव की तुलना में, रावण भी राम की सेना से शक्तिशाली था अर्थात राम ने रावण से युद्ध करके मूर्खता की थी|

4.विदुर की माने तो जो व्यक्ति शत्रु को मित्र बनाता है और मित्र से ईर्ष्या करते हुए उसे कष्ट पहुंचाता है तथा सदा बुरे कर्म में ही लिप्त रहता है ऐसा मनुष्य भी मूर्ख कहलाता है।

पहली बात शत्रुओं को कभी मित्र मत बनाओ, दूसरी बात मित्र को कभी कष्ट ना दें, उनसे सदा प्रेम करे, तथा हमें न श्रेष्ठ कर्म करे भले ही आप श्रेष्ठ कर्म करने योग्य ना हो, फिर आप विद्वान है|

5.जो मनुष्य अपने कर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है,सभी को संदेह की नजर से देखता है तथा शीघ्र संपन्न होनेवाले कार्यों को भी देर से संपन्न करता है  ऐसा मनुष्य भी मूर्ख माना जाता है।

विद्वानों के लक्षण वह अपने कर्मो को बढ़ा चढ़ा कर नहीं बताते हैं वह वहीं बताते हैं जो वास्तव में होता है, और वह सभी पर संदेह दृष्टि नही रखते हैं, जल्दी होने वाले कार्य जल्दी ही कर दे ते हैँ, इसलिए वह विद्वान हैँ |

6.जो मनुष्य पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन नहीं करता तथा जिसे सच्चा मित्र प्राप्त नहीं होता वह भीमूर्ख ही माना जाता है।

जो व्यक्ति पितरो का श्राद्ध और देवताओं की पुजा करता है, जिसको सच्चा मित्र प्राप्त होता है वह विद्वानों की श्रेणी मे आता है|

7.विदुरनीति के अनुसार मूर्ख व्यक्ति बिना बुलाए ही कहीं भी अंदर चला आता है,बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा विश्वासघाती मनुष्यों पर भी विश्वास कर लेता है।

विद्वान बिना बुलाए कही भी अंदर नहीं जाते हैं, बिना पुछे ज्यादा नहीं बोलते है, अर्थात कम बोलते हैं, पुछने पर ही ज्यादा बोलते हैँ, विश्वासघाती मनुष्यों पर भरोशा नहीं करते है|

8.जो व्यक्ति स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी दूसरे को दोषी बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थ का क्रोध करता है वह मनुष्य महामूर्ख है।

विद्वान व्यक्ति दोष मुक्त होता है, और वह निर्दोष पर कभी आक्षेप लगा कर उसे दोषी नहीं ठहराता, समर्थ होते हुए आवश्यक  कार्य पर क्रोध करता है।|

9.जो अपने बल को न समझकर बिना काम किए ही धर्म और अर्थ से विरुद्ध तथा न पाने योग्य वस्तु की इच्छा करता है वह व्यक्ति इस संसार में महामूर्ख कहलाता है।

्विद्वान व्यक्ति अपने बल को जानकर धर्म अर्थ के सहयोग से अपने पाने योग्य वस्तु की इच्छा करता है|

10.जो अधिकारी को उपदेश देता है और शून्य की उपासना करता है तथा जो कृपण का आश्रय लेता है उसे मूढ़ चित्तवाला यानि महामूर्ख कहते हैं।

विद्वान अधिकारी को उपदेश नहीं देता है, शुन्य की उपासना नही करता है, और वह कंजुस का आश्रय नहीं लेता धनियों के आश्रय में रहता है|

मंगलवार, 24 सितंबर 2024

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश

🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷

दिनांक  - २४ सितम्बर २०२४ ईस्वी

दिन  - - मंगलवार 

  🌗 तिथि -- सप्तमी ( १२:३८ तक तत्पश्चात अष्टमी )

🪐 नक्षत्र - - मृगशिर्ष ( २१:५४ तक तत्पश्चात  आर्द्रा )
 
पक्ष  - -  कृष्ण 
मास  - -  आश्विन 
ऋतु  - - शरद 
सूर्य  - -  दक्षिणायन 

🌞 सूर्योदय  - - प्रातः ६:११ पर  दिल्ली में 
🌞 सूर्यास्त  - - सायं १८:१५ पर 
 🌗चन्द्रोदय  -- २३:०२ पर 
  🌗 चन्द्रास्त  - - १२:५७ पर

 सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द  - - ५१२५
विक्रम संवत्  - -२०८१
शक संवत्  - - १९४६
दयानंदाब्द  - - २००

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 🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश
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१. चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिससे अनेक ईश्वर सिद्ध हों किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)

१. जो परमात्मा उन आदि सृष्टि के ऋषियों को वेद विद्या न पढ़ाता और वे अन्य को न पढ़ाते तो सब लोग अविद्वान् ही रह जाते। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)

३. वेद परमेश्वरोक्त है इन्हीं के अनुसार सब लोगों को चलना चाहिए और जो कोई किसी से पूछे कि तुम्हारा क्या मत है तो यही उत्तर देना कि हमारा मत वेद, अर्थात् जो कुछ वेदों में कहा है हम मानते हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)

४. जो परमात्मा वेदों का प्रकाश न करे तो कोई कुछ भी न बना सके इसलिए वेद परमेश्वरोक्त है इन्हीं के अनुसार सब लोगों को चलना चाहिए। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)

५. जो बाहर भीतर की पवित्रता करनी, सत्यभाषणादि आचरण करना है वह जहां कहीं करेगा आचरण और धर्म भ्रष्ट कभी न होगा और जो आर्यावर्त्त में रह कर दुष्टाचार करेगा वही धर्म और आचार भ्रष्ट कहलायेगा। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

६. कलियुग नाम काल है, काल निष्क्रिय होने से कुछ धर्माधर्म के काज में साधक बाधक नहीं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

१७. आपस की फूट से कौरव पाण्डव और यादव का सत्यानाश हो गया। परन्तु अब तक भी वही रोग पीछे लगा है। न जाने यह भयंकर राक्षस कभी छूटेगा या आर्यों को सब सुखों से छुड़ा कर दुःख सागर में डुबा मारेगा? (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

८. पारस मणि पत्थर सुना जाता है, वह बात झूठी है। परन्तु आर्यावर्त्त देश ही सच्चा पारस मणि है कि जिसको लोह रूपी दरिद्र विदेशी छूते के साथ ही सुवर्ण अर्थात् धनाढ्य हो जाते हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

९. जब लोग वर्तमान और भविष्यत में उन्नतशील नहीं होते तब लोग आर्यावर्त्त और अन्य देशस्य मनुष्यों की बुद्धि नहीं होती। जब बुद्धि के कारण वेदादि सत्य शास्त्रों का पठनपाठन, ब्रह्मचर्य्यादि आश्रमों के यथावत् अनुष्ठान, सत्योपदेश होते हैं तभी देशोन्नति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)

१०. जो ब्राह्मणादि उत्तम करते हैं वे ही ब्राह्मणादि और जो नीच भी उत्तम वर्ण के गुण कर्म स्वभाव वाला होवे तो उसको भी उत्तम वर्ण में और तो उत्तम वर्णस्थ होके नीच काम करे तो उसको नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिए। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ४)

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 🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

   🌷 ओ३म् देवो देवानामसि मित्रो अद्धतो वसुर्वसूनामासि चारूरध्वने।शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तेमेऽग्रे सख्ये मा रिषामा वयं तव।। ( ऋग्वेद १|९४|१३)

  💐 अर्थ:- हे ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर  ! तू देवों का भी देव है, तू अदभुत मित्र हैं, तू वसुओ का वसु है, अध्वर - यज्ञ मैं सुन्दर श्रेष्ठतम तू ही है।

 हे प्रकाशस्वरूप प्रभु  ! हम तेरी अतिविस्तृत सुखमयी शरण में सदा वर्तमान रहें।

  हे प्राणप्रिय प्रभो ! हम तेरी निश्छल, नि:स्वार्थ पावन मित्रता में कभी हिंसित न हो।

   हे अग्रणी परमेश्वर  ! तू देवों का देव है, विद्वानों का विद्वान हैं, ज्ञानियो का ज्ञानी, दानियों का दानी है।

   तू अदभुत मित्र हैं, आश्चर्यजनक सखा है, पापों से पृथक करनें वाला है।

  हे प्यारे और सबसे न्यारे प्रभुवर  ! हम तेरी अति विस्तृत, आनन्दमयी शरण में सदा वर्तमान रहें।हम तेरी निश्छल, नि: स्वार्थ पावन मित्रता को कभी अपनी आखों से ओझल न करें ।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे,  रवि- दक्षिणायने , शरद -ऋतौ, आश्विन - मासे, कृष्ण पक्षे , सप्तम्यां
 तिथौ, मृगशिर्ष 
 नक्षत्रे, मंगलवासरे
 , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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सोमवार, 23 सितंबर 2024

पृथ्वी और अन्य ग्रहण का सूर्य परिक्रमा दिन रात साल का सही गणना

हमारी पृथ्वी की परिधि लगभग 25 हजार मील या 40 हजार 233.6 किलोमीटर है, इसका व्यास 8 हजार मील या 12874.752 किलोमीटर है, और इसका क्षेत्रफल 19 करोड़ 70 लाख वर्ग मील या 510228030 करोड़ वर्ग किलोमीटर है,अतः यह अपनी धुरी पर 23 घंटे,56 मिनट और 4 सेकंड में एक चक्र लगाती है, जबकि सूर्य के गिर्द यह 29.76 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चक्र लगा रही है,जो यह 365.2564 दिनों में पूरा करती है,यह सारा खेल सूर्य की आकर्षण शक्ति का है,अन्यथा 29.76 किलोमीटर प्रति सेकंड से गति करने में कोई अर्थ नहीं है,
चंद्रमा किसी स्थिर ग्रह के गिर्द 27 दिन 7 घंटे और 43 मिनट में चक्र लगाता है,परंतु पृथ्वी क्योंकि खुद गति कर रही है, अतः यह चंद्रमा के चक्र लगाने के दौरान 30 डिगरी आगे बढ़ जाती है,इस कारण उसे पृथ्वी का चक्र लगाने में 29 दिन 12 घंटे और 44 मिनट लग जाते हैं,.
बुध को अपनी धुरी पर एक चक्र लगाने में 59 दिन लगते हैं, जबकि उसे सूर्य के गिर्द चक्र लगाने में 88 दिन लगते हैं,
शुक्र को सूर्य के गिर्द चक्र लगाने में तो 225 दिन लगते हैं,पर अपनी धुरी पर चक्र लगाने में 243 दिन लग जाते हैं,यह अपनी धुरी पर पूर्व से पश्चिम की ओर चक्र लगाता है,जबकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर चक्र लगाती है,मंगल 687 दिनों में सूर्य के गिर्द चक्र लगाता है; बृहस्पति 11 वर्षों में; शनि 29 वर्षों में,यूरेनस 84 वर्षों में और नेपच्यून 164 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है;जबकि अपनी धुरी पर मंगल 24 घंटे 37 मिनट में, बृहस्पति 9 घंटे 50 मिनट में, शनि 10 घंटे 47 मिनट में, यूरेनस 10 घंटे 42 मिनट में और नेपच्यून 15 घंटे 48 मिनट में चक्र लगाता है.
यह सब क्या है? पृथिवी पर दिनरात 24 घंटे का है और साल 365 दिनों का है,जबकि बुध का दिन रात हमारे 59 दिनों के बराबर है,पर उस के साल में सिर्फ 88 दिन हैं; मंगल का दिन रात 24 1/2 (साढ़े चौबीस घंटों का है,पर साल 687 दिनों का है; शनि का दिन रात 10 घंटे 47 मिनट का है,पर साल हमारे ग्यारह वर्षों के बराबर है; यूरेनस का दिनरात 10 घंटे 42 मिनट का है,पर साल हमारे 84 वर्षों के बराबर है; नेपच्यून का दिनरात 15 घंटे 48 मिनट का है पर साल हमारे 164 वर्षों के बराबर है.
यह सब इस बात पर निर्भर है कि कौन सा ग्रह कहां है,उस का आकार कितना है,उस की दैनिक और वार्षिक गति की रफ्तार कितनी है,इस में सूर्य की
आकर्षण शक्ति का मुख्य हाथ है. यह किसी बुद्धिमान की बुद्धिमत्ता का नहीं
बल्कि अराजकता का प्रमाण है, जो ग्रह कक्षा में जहां फिट हो गया और जितने कम या ज्यादा जोर से घूम रहा है; अपनी धुरी और सूर्य के गिर्द उतने जोर से ही
सूर्य की आकर्षण शक्ति के वशीभूत हुआ घूम रहा है,पृथ्वी एक हजार (1037.
5646) मील अथवा 1660 किलोमीटर प्रति घंटे के हिसाब से ज्यादा तेजी से अपनी धुरी पर घूम ही नहीं सकती तो दिनरात 24 घंटों में ही बनेंगे,इस में किस की कौन सी महिमा है.?.जब तक वह गुरुत्वाकर्षण से बंधी है, घूमती ही जाएगी,इसे कोई रोक नहीं सकता,इसमें किसी की कौन सी किसकी बुद्धिमत्ता है.?.पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है,पर शुक्र पूर्व से पश्चिम की ओर घूम रहा है,इसमें किसी की क्या बुद्धिमत्ता है.?.
( नोट- इस किताब का नाम भले ही चार्वाक दर्शन हो पर इसमें जानकारी अत्याधुनिक वैज्ञानिक है,इतनी पेचीदा जानकारियों को आम आदमी के लिए यहाँ कोई मतलब नहीं था पर भक्तों ने मजबूर किया तो जानकारी उड़ेल दी,आप भी अवलोकन कीजिए).
        
           

शनिवार, 21 सितंबर 2024

मृतक श्राद्ध एक पाखण्ड!!!

🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷

दिनांक  - २१ सितम्बर २०२४ ईस्वी

दिन  - - शनिवार 

  🌖 तिथि -- चतुर्थी ( १८:१३ तक तत्पश्चात पंचमी )

🪐 नक्षत्र -  भरणी ( २४:३६ तक तत्पश्चात कृत्तिका )
 
पक्ष  - -  कृष्ण 
मास  - -  आश्विन 
ऋतु  - - शरद 
सूर्य  - -  दक्षिणायन 

🌞 सूर्योदय  - - प्रातः ६:९ पर  दिल्ली में 
🌞 सूर्यास्त  - - सायं १८:१९ पर 
 🌖चन्द्रोदय  -- १८:२९ पर 
  🌖 चन्द्रास्त  - - ९:३४ पर

 सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द  - - ५१२५
विक्रम संवत्  - -२०८१
शक संवत्  - - १९४६
दयानंदाब्द  - - २००

🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀

 🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥मृतक श्राद्ध एक पाखण्ड!!!
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   श्राद्ध और तृपण के सत्य वैदिक स्वरूप को जाने... और अन्ध विश्वास को त्यागे...!!!

प्रिय बन्धुओं ! 
                  अपने समाज में अनेक भ्रान्त प्रथायें प्रचलित हैं । उनमें मृतकों का श्राद्ध भी एक बहुत ही विचित्र तथा भ्रान्ति पूर्ण प्रथा है । वास्तव में बहुत से लोगों ने पितर, श्राद्ध और तृपण शब्दों के अर्थ का अनर्थ कर इन्हे अपनी जीविका का साधन बना रखा है ।

   "पितर, श्राद्ध और तृपण" के वैदिक स्वरूप को जाने जिससे आप "मृतक श्राद्ध "रूपी पाखण्ड से बच सके और अपना व समाज का उपकार कर सके ।

  महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार...

  "श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा, श्रध्दया यत्क्रियते तच्छ्राध्दम्"

अर्थात् 
         जिससे सत्य को ग्रहण किया जाये उसको 'श्रद्धा' और जो-जो श्रद्धा से सेवारूप कर्म किये जाए उनका नाम श्राद्ध है ।।

  "तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितृन् तत्तर्पणम्"

अर्थात् 
         जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान मातादि पितर प्रसन्न किये जायें, उसका नाम तर्पण है ।।

  उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि श्रध्दा से सेवाकर पितरो को तृप्त करना ही श्राद्ध और तृपण कहलाता है |

  अब प्रश्न उठता है कि पितर किसे कहते है जिसकी सेवा द्वारा श्राध्द और तर्पण किया जा सके...

  महर्षि मनु के अनुसार पितर पाँच है या अग्रलिखित पाँच को कहते हैं...

  "जनकश्चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति । अन्नदाता भयत्राता पञ्चेते पितरः स्मृतः ।।

अर्थात् 
         पितर पाँच है...
(१) जन्म देने वाले 'माता-पिता' ।
(२) उपनयन की दीक्षा देने वाला             'आचार्य' ।
(३) विद्या पढ़ाने वाला 'गुरू' ।
(४) अन्न देने वाला ।
(५) रक्षा करने वाला ।

  यदि थोड़ी सी बुद्धि लगाए तो ये पाँचों ही 'जीवित पितर' है न कि मृतक ।

  अतः श्रद्धा से उपर्युक्त आये पाँचो यथा माता पिता, आचार्य आदि जीवित जनों की प्रति दिन सेवा करना ही श्राद्ध कहलाता है ।

  तथा वो सेवा ऐसी हो जिससे ये जीवित पितर तृप्त अर्थात् संतुष्ट हो जाये इसी का नाम तृपण है ।

  परन्तु मित्रों आज कल उलटा ही देखा जा रहा है जब तक माता पिता जीवित रहते है तब तक तो सन्तान प्रायः उनकी उपेक्षा करता है । सेवा आदि की बात तो दूर उनको जल और भोजन भी समय पर नहीं दिया जाता । गुरूओं के साथ भी विद्यार्थी प्रायः अभद्र व्यवहार करते है ।

   और मृतक श्राद्ध को करना अपने कर्त्तव्य की मूर्ति मान रहे है । यही कारण है कि वर्तमान में प्रत्येक गृहस्थी दुःखी है ।

  अतः मृतक श्राद्ध रूपी पाखण्ड का त्याग करो और जीवित माता पिता आचार्य आदि की सेवा करो यही सच्चा और श्राद्ध का वैदिक स्वरूप है ।

  धर्म की जय हो ! पाखण्ड का नाश हो !!

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 🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

🌷ओ३म् अहानि शं भवन्तु न: शं रात्रि: प्रतिधीयताम्।शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभि: शं न इन्द्रावरूणा रातहव्या। शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो: (यजुर्वेद ३६|११ )

💐अर्थ  :- हे ईश्वर  ! दिन हमें सुखकारी हो, रातें शान्ति देने वाली हो , विद्युत् वा अग्नि रक्षक सामग्री सहित सुखकारक हो, विद्युत् व जल के ग्रहण करने योग्य सुख हमें शान्ति दायक हो, विद्युत् और पृथ्वी हमारे लिए अन्नो के सेवनार्थ सुखदायी हों तथा विद्युत्और उत्तम औषधियां रोगनाशक एवं भय निवर्तक हो,ऐसी कृपा करों।

🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀

 🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे,  रवि- दक्षिणायने , शरद -ऋतौ, आश्विन - मासे, कृष्ण पक्षे , चतुर्थयां
 तिथौ, भरणी
 नक्षत्रे, शनिवासरे
 , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तं वृणे

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गुरुवार, 19 सितंबर 2024

पुनर्जन्म सिद्धान्त समीक्षा

पुनर्जन्म सिद्धान्त समीक्षा 
🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹
प्रश्न :- पुनर्जन्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आत्मा और इन्द्रियों का शरीर के साथ बार बार सम्बन्ध टूटने और बनने को पुनर्जन्म या प्रेत्याभाव कहते हैं । 
प्रश्न :- प्रेत किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जब आत्मा और इन्द्रियों का शरीर से सम्बन्ध टूट जाता है तो जो बचा हुआ शरीर है उसे शव या प्रेत कहा जाता है । 
प्रश्न :- भूत किसे कहते हैं ? 
उत्तर :- जो व्यक्ति मृत हो जाता है वह क्योंकि अब वर्तमान काल में नहीं है और भूतकाल में चला गया है इसी कारण वह भूत कहलाता है । 
प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?
उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिये आपको पहले जन्म और मृत्यु के बारे मे समझना पड़ेगा । और जन्म मृत्यु को समझने से पहले आपको शरीर को समझना पड़ेगा । 
प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ । 
उत्तर :- शरीर दो प्रकार का होता है :- 
(१) सूक्ष्म शरीर ( मन, बुद्धि, अहंकार, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ) 
(२) स्थूल शरीर ( ५ कर्मेन्द्रियाँ = नासिका, त्वचा, कर्ण आदि बाहरी शरीर ) और इस शरीर के द्वारा आत्मा कर्मों को करता है । 
प्रश्न :- जन्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आत्मा का सूक्ष्म शरीर को लेकर स्थूल शरीर के साथ सम्बन्ध हो जाने का नाम जन्म है । और ये सम्बन्ध प्राणों के साथ दोनो शरीरों में स्थापित होता है । जन्म को जाति भी कहा जाता है ( उदाहरण :- पशु जाति, मनुष्य जाति, पक्षी जाति, वृक्ष जाति आदि ) 
प्रश्न :- मृत्यु किसे कहते हैं ?
उत्तर :- सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच में प्राणों का सम्बन्ध है । उस सम्बन्ध के टूट जाने का नाम मृत्यु है । 
प्रश्न :- मृत्यु और निद्रा में क्या अंतर है ?
उत्तर :- मृत्यु में दोनों शरीरों के सम्बन्ध टूट जाते हैं और निद्रा में दोनों शरीरों के सम्बन्ध स्थापित रहते हैं । 
प्रश्न :- मृत्यु कैसे होती है ? 
उत्तर :- आत्मा अपने सूक्ष्म शरीर को पूरे स्थूल शरीर से समेटता हुआ किसी एक द्वार से बाहर निकलता है । और जिन जिन इन्द्रियों को समेटता जाता है वे सब निष्क्रिय होती जाती हैं । तभी हम देखते हैं कि मृत्यु के समय बोलना, दिखना, सुनना सब बंद होता चला जाता है । 
प्रश्न :- जब मृत्यु होती है तो हमें कैसा लगता है ?
उत्तर :- ठीक वैसा ही जैसा कि हमें बिस्तर पर लेटे लेटे नींद में जाते हुए लगता है । हम ज्ञान शून्य होने लगते हैं । यदि मान लो हमारी मृत्यु स्वाभाविक नहीं है और कोई तलवार से धीरे धीरे गला काट रहा है तो पहले तो निकलते हुए रक्त और तीव्र पीड़ा से हमें तुरंत मूर्छा आने लगेगी और हम ज्ञान शून्य हो जायेंगे और ऐसे ही हमारे प्राण निकल जायेंगे । 
प्रश्न :- मृत्यु और मुक्ति में क्या अंतर है ?
उत्तर :- जीवात्मा को बार बार कर्मो के अनुसार शरीर प्राप्त करे के लिये सूक्ष्म शरीर मिला हुआ होता है । जब सामान्य मृत्यु होती है तो आत्मा सूक्ष्म शरीर को लेकर उस स्थूल शरीर ( मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ) से निकल जाता है परन्तु जब मुक्ति होती है तो आत्मा स्थूल शरीर ( मनुष्य ) को तो छोड़ता ही है लेकिन ये सूक्ष्म शरीर भी छोड़ देता है और सूक्ष्म शरीर प्रकृत्ति में लीन हो जाता है । ( मुक्ति केवल मनुष्य शरीर में योग समाधि आदि साधनों से ही होती है ) 
प्रश्न :- मुक्ति की अवधि कितनी है ? 
उत्तर :- मुक्ति की अवधि 36000 सृष्टियाँ हैं। 
1 सृष्टि = 8640000000 वर्ष । 
यानी कि इतनी अवधि तक आत्मा मुक्त रहता है और ब्रह्माण्ड में ईश्वर के आनंद में मग्न रहता है । और ये अवधि पूरी करते ही किसी शरीर में कर्मानुसार फिर से आता है । 
प्रश्न :- मृत्यु की अवधि कितनी है ?
उत्तर :- एक क्षण के कई भाग कर दीजिए उससे भी कम समय में आत्मा एक शरीर छोड़ तुरंत दूसरे शरीर को धारण कर लेता है । 
प्रश्न :- जन्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- ईश्वर के द्वारा जीवात्मा अपने सूक्ष्म शरीर के साथ कर्म के अनुसार किसी माता के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है और वहाँ बन रहे रज वीर्य के संयोग से शरीर को प्राप्त कर लेता है । इसी को जन्म कहते हैं । 
प्रश्न :- जाति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जन्म को जाति कहते है । कर्मों के अनुसार जीवात्मा जिस शरीर को प्राप्त होता है वह उसकी जाति कहलाती है । जैसे :- मनुष्य जाति, पशु जाति, वृक्ष जाति, पक्षी जाति आदि । 
प्रश्न :- ये कैसे निश्चय होता है कि आत्मा किस जाति को प्राप्त होगा ? 
उत्तर :- ये कर्मों के अनुसार निश्चय होता है । ऐसे समझिए ! आत्मा में अनंत जन्मों के अनंत कर्मों के  संस्कार अंकित रहते हैं । ये कर्म अपनी एक कतार में खड़े रहते हैं जो कर्म आगे आता रहता है उसके अनुसार आत्मा कर्मफल भोगता है । मान लो आत्मा ने कभी किसी शरीर में ऐसे कर्म किये हों जिसके कारण उसे सूअर का शरीर मिलना हो । और ये सूअर का शरीर दिलवाने वाले कर्म कतार में सबसे आगे खड़े हैं तो आत्मा उस प्रचलित शरीर को छोड़ तुरंत किसी सूअरिया के गर्भ में प्रविष्ट होगी और सूअर का जन्म मिलेगा । अब आगे चलिये सूअर के शरीर को भोग जब आत्मा के वे कर्म निवृत होंगे तो कतार में उससे पीछे मान लो भैंस का शरीर दिलाने वाले कर्म खड़े हो गए तो सूअर के शरीर में मरकर आत्मा भैंस के शरीर को भोगेगा । बस ऐसे ही समझते जाइए कि कर्मों की कतार में एक के बाद एक एक से दूसरे शरीर में पुनर्जन्म होता रहेगा । यदि ऐसे ही आगे किसी मनुष्य शरीर में आकर वो अपने जीवन की उपयोगिता समझकर योगी हो जायेगा तो कर्मो की कतार को 36000 सृष्टियों तक के लिये छोड़ देगा । उसके बाद फिर से ये क्रम सब चालू रहेगा । 
प्रश्न :- लेकिन हम देखते हैं एक ही जाति में पैदा हुई आत्माएँ अलग अलग रूप में सुखी और दुखी हैं ऐसा क्यों ?
उत्तर :- ये भी कर्मों पर आधारित है । जैसे किसी ने पाप पुण्य रूप में मिश्रित कर्म किये और उसे पुण्य के आधार पर मनुष्य शरीर तो मिला परंतु वह पाप कर्मों के आधार पर किसी ऐसे कुल मे पैदा हुआ जिसमें उसे दुख और कष्ट अधिक झेलने पड़े । आगे ऐसे समझिए जैसे किसी आत्मा ने किसी शरीर में बहुत से पाप कर्म और कुछ पुण्य कर्म किए जिस पाप के आधार पर उसे गाँय का शरीर मिला और पुण्यों के आधार उस गाँय को ऐसा घर मिला जहाँ उसे उत्तम सुख जैसे कि भोजन, चिकित्सा आदि प्राप्त हुए । ठीक ऐसे ही कर्मों के मिश्रित रूप में शरीरों का मिलना तय होता है । 
प्रश्न :- जो आत्मा है उसकी स्थिति शरीर में कैसे होती है ? क्या वो पूरे शरीर में फैलकर रहती है या शरीर के किसी स्थान विशेष में ? 
उत्तर :- आत्मा एक सुई की नोक के करोड़वें हिस्से से भी अत्यन्त सूक्ष्म होती है और वह शरीर में हृदय देश में रहती है वहीं से वो अपने सूक्ष्म शरीर के द्वारा स्थूल शरीर का संचालन करती है । आत्मा पूरे शरीर में फैली नही होती या कहें कि व्याप्त नहीं होती । क्योंकि मान लें कोई आत्मा किसी हाथी के शरीर को धारण किये हुए है और उसे त्यागकर मान लो उसे कर्मानुसार चींटी का शरीर मिलता है तो सोचो वह आत्मा उस चींटी के शरीर में कैसे घुसेगी ? इसके लिये तो उस आत्मा की पर्याप्त काट छांट करनी होगी जो कि शास्त्र विरुद्ध सिद्धांत है, कोई भी आत्मा काटा नहीं जा सकता । ये बात वेद, उपनिषद्, गीता आदि भी कहते हैं । 
प्रश्न :- लोग मृत्यु से इतना डरते क्यों हैं ?
उत्तर :- अज्ञानता के कारण । क्योंकि यदि लोग वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि का स्वाध्याय करके शरीर और आत्मा आदि के ज्ञान विज्ञान को पढ़ेंगे तो उन्हें सारी स्थिति समझ में आ जायेगी और लेकिन इससे भी ये मात्र शाब्दिक ज्ञान होगा यदि लोग ये सब पढ़कर अध्यात्म में रूचि लेते हुए योगाभ्यास आदि करेंगे तो ये ज्ञान उनको भीतर से होता जायेगा और वे निर्भयी होते जायेंगे । आपने महापुरुषों के बारे में सुना होगा कि जिन्होंने हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए । ये सब इसलिये कर पाए क्योंकि वे लोग तत्वज्ञानी थे जिसके कारण मृत्यु भय जाता रहा । सोचिए महाभारत के युद्ध में अर्जुण भय के कारण शिथिल हो गया था तो योगेश्वर कृष्ण जी ने ही उनको सांख्य योग के द्वारा ये शरीर, आत्मा आदि का ज्ञान विज्ञान ही तो समझाया था और उसे निर्भयी बनाया था । सामान्य मनुष्य को तो अज्ञान मे ये भय रहता ही है । 
प्रश्न :- क्या वास्तव में भूत प्रेत नहीं होते ? और जो हम ये किसी महिला के शरीर मे चुड़ैल या दुष्टात्मा आ जाती है वो सब क्या झूठ है ?
उत्तर :- झूठ है । लीजिए इसको क्रम से समझिए । पहली बात तो ये है कि किसी एक शरीर कां संचालन दो आत्माएँ कभी नहीं कर सकतीं । ये सिद्धांत विरुद्ध और ईश्वरीय नियम के विरुद्ध है । तो किसी एक शरीर में दूसरी आत्मा का आकर उसे अपने वश में कर लेना संभव ही नही है । और जो आपने बोला कि कई महिलाओं में जो डायन या चुड़ैल आ जाती है जिसके कारण उनकी आवाज़ तक बदल जाति है तो वो किसी दुष्टात्मा के कारण नहीं बल्कि मन के पलटने की स्थिति के कारण होता है । विज्ञान की भाषा में इसे  कहते हैं जिसमें एक व्यक्ति परिवर्तित होकर अगले ही क्षण दूसरे में बदल जाता है । ये एक मान्सिक रोग है । 
प्रश्न :- पुनर्जन्म का साक्ष्य क्या है ? ये सिद्धांतवादी बातें अपने स्थान पर हैं पर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण क्या हैं ? 
उत्तर :- आपने ढेरों ऐसे समाचार सुने होंगे कि किसी घर में कोई बालक पैदा हुआ और वह थोड़ा बड़ा होते ही अपने पुराने गाँव, घर, परिवार और उन सदस्यों के बारे में पूरी जानकारी बताता है जिनसे उसका प्रचलित जीवन में दूर दूर तक कोई संबन्ध नहीं रहा है  । और ये सब पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । सुनिए ! होता ये है कि जैसा आपको ऊपर बताया गया है कि आत्मा के सूक्ष्म शरीर में कर्मो के संस्कार अंकित होते रहते हैं और किसी जन्म में कोई अवसर पाकर वे  उभर आते हैं इसी कारण वह मनुष्य अपने पुराने जन्म की बातें बताने लगता है । लेकिन ये स्थिति सबके साथ नहीं होती । क्योंकि करोड़ों में कोई एक होगा जिसके साथ ये होता होगा कि अवसर पाकर उसके कोई दबे हुए संस्कार उग्र हो गए और वह अपने बारे में बताने लगा । 
प्रश्न :- क्या हम जान सकते हैं कि हमारा पूर्व जन्म कैसा था ?
उत्तर :- महर्षि दयानंद सरस्वति जी कहते हैं कि सामान्य रूप में तो नहीं परन्तु यदि आप योगाभ्यास को सिद्ध करेंगे तो आपके करोंड़ों वर्षों का इतिहास आपके सामने आकर खड़ा हो जायेगा और यही तो मुक्ति के लक्षण है।

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

वेदों में विश्वकर्मा परमात्मा एवं ऐतिहासिक शिल्पी विश्वकर्मा

*वेदों में विश्वकर्मा परमात्मा एवं ऐतिहासिक शिल्पी विश्वकर्मा*
(विश्वकर्मा पूजा दिवस के शुभ अवसर पर प्रकाशित)
परमपिता परमात्मा की कल्याणी वाणी वेद के "विश्वकर्म्मा" शब्द से ईश्वर,सूर्य, वायु, अग्नि का ग्रहण होता है। प्रचलित ऐतिहासिक महापुरुष शिल्पशास्त्र के ज्ञाता विश्वकर्मा एवं वेदों के विश्वकर्मा भिन्न हैं। इस लेख के माध्यम से दोनों में अंतर को स्पष्ट किया जायेगा।
निरूक्तकार महर्षि यास्क विश्वकर्मा शब्द का यौगिक अर्थ लिखते हैं।
विश्वकर्मा सर्वस्य कर्ता तस्यैषा भवति’’ निरुक्त शास्त्रे १०/२५ 
तथा प्राचीन वैदिक विद्वान् कहते हैं
‘‘विश्वानि कर्माणि येन यस्य वा स विश्वकर्मा अथवा विश्वेषु कर्म यस्य वा स विश्वकर्मा"
अर्थात् जगत के सम्पूर्ण कर्म जिसके द्वारा सम्पन्न होते हैं अथवा सम्पूर्ण जगत में जिसका कर्म है वह सब जगत् का कर्ता परमपिता परमेश्वर विश्वकर्मा है।
विश्वकर्मा शब्द के इस यथार्थ अर्थ के आधार पर विविध कला कौशल के आविष्कार यद्यपि अनेक विश्व कर्मा सिद्ध हो सकते हैं। तथापि सर्वाधार सर्वकर्ता परमपिता परमात्मा ही सर्व प्रथम विश्वकर्मा है। ऐतरेय ब्राह्मणग्रन्थ के मतानुसार ‘प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा विश्वकर्माऽभवत्’
"प्रजापति (परमेश्वर) प्रजा को उत्पन्न करने से सर्वप्रथम विश्वकर्मा है।"
वेद में परमेश्वर के विश्वकर्त्व अद्भुत व मनोरम चित्रण विश्वकर्मा नाम लेकर अनेक स्थानों पर किया गया है। सृष्टि का मुख्य निर्माण कारण परमात्मा ही है। वही सब सृष्टि को प्रकृति के उपादान कारण से बनाता है, जीवात्मा नहीं। इस कारण सर्वप्रथम विश्वकर्मा परमेश्वर है। परमेश्वर ने जगत् को बनाने की सामग्री प्रकृति से सृष्टि की रचना की है । इस लिए वही उपासनीय है ।
तथा जो शिल्पविद्या के विद्वान् विश्वकर्मा हुए हैं
उन में ऋषि प्रभास के पुत्र को आदि विश्वकर्मा माना जाता है, तथा इस के अतिरिक्त ऋषि भुवन के पुत्र विश्वकर्मा, ऋषि त्वष्टा के पुत्र विश्वकर्मा आदि अनेक विश्वकर्मा हुए हैं । वर्तमान में विश्वकर्मा समाज शिल्प विद्या से सम्बंधित समाज माना जाता हैं।
वेद शिल्प विद्या अर्थात श्रम विद्या का अत्यंत गौरव करते हुए हर एक मनुष्य के लिए निरंतर पुरुषार्थ की आज्ञा देते हैं| वेदों में निठल्लापन पाप है| वेदों में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की आज्ञा है (यजुर्वेद ४०.२)| मनुष्य जीवन के प्रत्येक पड़ाव को ही ‘आश्रम’ कहा गया है – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,वानप्रस्थ और सन्यास, इन के साथ ही मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करने का उपदेश है | वैदिक वर्ण व्यवस्था भी कर्म और श्रम पर ही आधारित व्यवस्था है (देखें- वेदों में जाति व्यवस्था नहीं)| आजकल जिन श्रम आधारित व्यवसायों को छोटा समझा जाता है, आइए देखें कि वेद उनके बारे में क्या कह रहे हैं –
कृषि :
ऋग्वेद १.११७.२१ – राजा और मंत्री दोनों मिल कर, बीज बोयें और समय- समय पर खेती कर प्रशंसा पाते हुए, आर्यों का आदर्श बनें|
ऋग्वेद ८.२२.६ भी राजा और मंत्री से यही कह रहा है|
ऋग्वेद ४.५७.४ – राजा हल पकड़ कर, मौसम आते ही खेती की शुरुआत करे और दूध देने वाली स्वस्थ गायों के लिए भी प्रबंध करे|
वेद, कृषि को कितना उच्च स्थान और महत्त्व देते हैं कि स्वयं राजा को इस की शुरुआत करने के लिए कहते हैं| इस की एक प्रसिद्ध मिसाल रामायण (१.६६.४) में राजा जनक द्वारा हल चलाते हुए सीता की प्राप्ति है | इस से पता चलता है कि राजा- महाराजा भी वेदों की आज्ञा का पालन करते हुए स्वयं खेती किया करते थे|
ऋग्वेद १०.१०४.४ और १०.१०१.३ में परमात्मा विद्वानों से भी हल चलाने के लिए कहते हैं|
महाभारत आदिपर्व में ऋषि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को खेत का पानी बंधने के लिए भेजते हैं अर्थात् ऋषि लोग भी खेती के कार्यों में संलग्न हुआ करते थे| 
ऋग्वेद का सम्पूर्ण ४.५७ सूक्त ही सभी के लिए कृषि की महिमा लिए हुए है|
जुलाहे और दर्जी :
सभी के हित के लिए ऋषि यज्ञ करते हैं,परिवहन की विद्या जानते हैं, भेड़ों के पालन से ऊन प्राप्त कर वस्त्र बुनते हैं और उन्हें साफ़ भी करते हैं ( ऋग्वेद १०.२६)|
यजुर्वेद १९.८० विद्वानों द्वारा विविध प्रकार के वस्त्र बुनने का वर्णन करता है|
ऋग्वेद १०.५३.६ बुनाई का महत्व बता रहा है|
ऋग्वेद ६.९.२ और ६.९.३ – इन मंत्रों में बुनाई सिखाने के लिए अलग से शाला खोलने के लिए कहा गया है – जहां सभी को बुनाई सीखने का उपदेश है|
शिल्पकार और कारीगर :
शिल्पकार,कारीगर,मिस्त्री, बढई,लुहार, स्वर्णकार इत्यादि को वेद ‘तक्क्षा’ कह कर पुकारते हैं|
ऋग्वेद ४.३६.१ रथ और विमान बनाने वालों की कीर्ति गा रहा है|
ऋग्वेद ४.३६.२ रथ और विमान बनाने वाले बढई और शिल्पियों को यज्ञ इत्यादि शुभ कर्मों में निमंत्रित कर उनका सत्कार करने के लिए कहता है|
इसी सूक्त का मंत्र ६ ‘तक्क्षा ‘ का स्तुति गान कर रहा है और मंत्र ७ उन्हें विद्वान, धैर्यशाली और सृजन करने वाला कहता है|
वाहन, कपडे, बर्तन, किले, अस्त्र, खिलौने, घड़ा, कुआँ, इमारतें और नगर इत्यादि बनाने वालों का महत्त्व दर्शाते कुछ मंत्रों के संदर्भ : 
ऋग्वेद १०.३९.१४, १०.५३.१०, १०.५३.८, 
अथर्ववेद १४.१.५३, 
ऋग्वेद १.२०.२, 
अथर्ववेद १४.२.२२, १४.२.२३, १४.२.६७, १५.२.६५ 
ऋग्वेद २.४१.५, ७.३.७, ७.१५.१४ |
ऋग्वेद के मंत्र १.११६.३-५ और ७.८८.३ जहाज बनाने वालों की प्रशंसा के गीत गाते हुए आर्यों को समुद्र यात्रा से विश्व भ्रमण का सन्देश दे रहे हैं|
अन्य कई व्यवसायों के कुछ मंत्र संदर्भ :
वाणिज्य – ऋग्वेद ५.४५.६, १.११२.११,
मल्लाह – ऋग्वेद १०.५३.८, यजुर्वेद २१.३, यजुर्वेद २१.७, अथर्ववेद ५.४.४, ३.६.७,
नाई – अथर्ववेद ८.२.१९ ,
स्वर्णकार और माली – ऋग्वेद ८.४७.१५,
लोहा गलाने वाले और लुहार – ऋग्वेद ५.९.५ ,
धातु व्यवसाय – यजुर्वेद २८.१३|
वेदों के प्रमाण पंडित धर्मदेव विद्यामार्तण्ड जी की पुस्तक "वेदों का यथार्थ स्वरुप" से लिए गए है।

सोमवार, 16 सितंबर 2024

वैदिक तैंतीस कोटि देव*

*ओ३म्*🔥🌹
#क्या_सनातन_धर्म_में_तैतीस_करोड़_देवी_देवताओं_का_वर्णन_है_❓
        
🌹🌹 *वैदिक तैंतीस कोटि देव*🌹🌹
भारतवर्ष में देवों का वर्णन बहुत रोचक है | देवों की संख्या तैंतीस करोड़ बतायी जाती है और इसमें नदी , पेड़ , पर्वत , पशु और पक्षी भी सम्मिलित कर लिये गये है | ऐसी स्तिथि में यह बहुत आवश्यक है कि शास्त्रों के वचन समझे जाएँ और वेदों की वास्तविक शिक्षाएँ ही जीवन में धारण की जाएँ | वर्तमान में समाज के विनाश और पतन का मूल कारण अज्ञान है क्युकी हम अपनी संस्कृति को भूल गये अपने कर्म पथ से विचलित हो गये।
निराकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर का स्थान मुर्ति पूजा ने ले लिया यज्ञ का स्थान बली ने ले लिया पुरुषार्थ का स्थान भाग्यवाद ने ले लिया वेदिक कर्मकाण्ड के स्थान पर पाखंड और कुरीतिया भर दी गयी और इस महान आर्यावर्त का पतन हुआ ऐसे में पाखंड से बचने हेतु वास्तविक देवों को समझना अत्यंत आवश्यक है। देवों का सदुपयोग उनकी सेवा एवं रक्षा कर ही हम मानव जीवन के पूर्ण ऐश्वर्य और परमपिता परमेश्वर की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
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             🌹🌹देव कौन ?🌹🌹
'देव' शब्द के अनेक अर्थ हैं -
" देवो दानाद् वा , दीपनाद् वा , द्योतनाद् वा , द्युस्थानो भवतीति वा | " ( निरुक्त - ७ / १५ )
तदनुसार 'देव' का लक्षण है 'दान' अर्थात देना | जो सबके हितार्थ अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु और प्राण भी दे दे , वह देव है |
देव का गुण है 'दीपन' अर्थात प्रकाश करना | सूर्य , चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं |
देव का कर्म है 'द्योतन' अर्थात सत्योपदेश करना | जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है |
देव की विशेषता है 'द्युस्थान' अर्थात ऊपर स्थित होना | ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को , समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को , और राष्ट्र में ऊपर स्थित होने से राजा को भी देव कहते हैं |
इस प्रकार 'देव' शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है | हाँ , भाव और प्रयोजन के अनुसार अर्थ भिन्न - भिन्न होते हैं |
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
             🌹🌹 *तैंतीस प्रकार*🌹🌹
'कोटि' शब्द के दो अर्थ हैं - 'प्रकार' और 'करोड़' | विश्व में तैंतीस कोटि के देव अर्थात तैंतीस प्रकार के देव हैं , तैंतीस करोड़ नहीं |
अथर्ववेद -१०/७/२७ में कहा गया है --
" यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे | तान् वै त्रयास्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः || "
अर्थात वेदज्ञ लोग जानते हैं कि तैंतीस प्रकार के देवता संसार का धारण और प्राणियों का पालन कर रहे हैं | इस प्रकार तैंतीस करोड़ देव कहना मिथ्या और भ्रामक है |
वैदिक संस्कृति में तैंतीस कोटि के अर्थात तैंतीस प्रकार के अर्थात तैंतीस देव हैं | इनकी गणना निम्न प्रकार है --
(१) यज्ञ एक देव है , क्योंकि इससे वर्षा होकर प्राणियों को सुख मिलता है |
गीता -३/१४ में कहा गया है --
" अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः | यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद् भवः || "
अर्थात प्राणी अन्न से , अन्न बादल से और बादल यज्ञ से उत्पन्न होते हैं | इस प्रकार यज्ञ प्राणियों के जीवन और सुख का आधार है |
(२) विद्युत् एक देव है , क्योंकि यह ऐश्वर्य का साधन है | इससे गति , शक्ति , प्रकाश , समृद्धि और सुख के साधन प्राप्त होते हैं |
बृहदारण्यक उपनिषद - ३/१/६ के अनुसार --
"कतम इन्द्रः ? अशनिरिति | " इन्द्रदेव अर्थात ऐश्वर्य का साधन कौन है ? विद्युत् ही इन्द्रदेव अर्थात ऐश्वर्य का साधन है |
(३) पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , चन्द्रमा , सूर्य और नक्षत्र , ये आठ सबका निवास स्थान होने से वसु कहलाते हैं | ये आठ वसु समस्त प्राणियों को आश्रय देने से देव हैं |
(४) वर्ष के बारह मास हैं - चैत्र , वैशाख , ज्येष्ठ , आषाढ़ , श्रावण , भाद्रपद , आश्विन , कार्त्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ और फाल्गुन | इन्हें आदित्य भी कहते हैं | ये बारह आदित्य प्राणियों को आयु देने से देव कहलाते हैं |
यदि इन मासों के नाम जनवरी , फरवरी , मार्च , अप्रैल , मई , जून , जुलाई , अगस्त , सितम्बर , अक्टूबर , नवम्बर और दिसम्बर बताये जाएँ तो भी इनका देवपन यथावत रहता हैं क्योंकि इस स्थिति में भी इनका आयु देना सार्थक है और इन नामों से भी ये बारह आदित्य कहलायेंगे |
(५) जीवात्मा , पाँच प्राण और पाँच उप प्राण , ये ग्यारह जब शरीर को छोड़ते हैं तो लोग रो पड़ते है | इस कारण ये रूद्र कहलाते हैं | ये ग्यारह शरीर का आधार होने से देव हैं |
         🌹🌹 *प्राण और उपप्राण*🌹🌹 
पाँच प्राण हैं -- प्राण , उदान , समान , व्यान और अपान ।
पाँच उपप्राण हैं -- नाग , कूर्म , कृकल , देवदत्त और धनञ्जय ।
           🌹🌹उपयोग के देव🌹🌹
इन तैंतीस कोटि देवों में केवल जीवात्मा चेतन है । यह अन्यों का उपयोग करता है और स्वयं भी अन्य जीवात्माओं के उपयोग में आता है ।
जैसे - गाय दूध देकर , भेड़ ऊन देकर , कुत्ता रखवाली करके और बैल हल खींचकर उपयोग में आते हैं ।
मनुष्य सेवक , पाचक , सैनिक , वैद्य आदि बनकर उपयोग में आता है और कृषक , व्यापारी , उपभोक्ता , स्वामी , राजा आदि बनकर अन्यों से उपयोग लेता है ।
जीवात्मा के अतिरिक्त शेष बत्तीस देव 'जड़' हैं और 'उपयोग के देव' कहलाते है । ये सदैव चेतन के उपयोग में आते हैं और जड़ होने के कारण स्वयं किसी का उपयोग नहीं कर सकते ।
          🌹🌹व्यवहार के देव🌹🌹
माता , पिता , आचार्य , अतिथि और पति-पत्नी से संसार के व्यवहार सिद्ध होते हैं । इसलिए ये पाँचों 'व्यवहार के देव' कहलाते हैं ।
तैत्तिरीय उपनिषद ( 1-11- 2 ) के अनुसार --
" मातृदेवो भव , पितृदेवो भव , आचार्यदेवो भव , अतिथिदेवो भव "
अर्थात माता , पिता , आचार्य और कुछ व्यक्ति अतिथि बन जाते हैं । इस प्रकार तो सभी मनुष्य देव हो गये ! नहीं , देव-कोटि इतनी सामान्य नहीं अपितु बहुत विशेष है । सम्बन्ध मात्र से देव-कोटि प्राप्त नहीं होती ।
एक पिता जब जेब काटता है तब जेब काटते समय वह देव नहीं होता । एक स्त्री जब अपने पुत्र से पक्षपात करते हुए किसी अन्य से विवाद करती है तब माता होते हुए भी वह देव-कोटि में नहीं आती । वास्तव में इनमे जितना-जितना गुण , अच्छापन , भलापन , बड़प्पन , देने का शुद्ध भाव और उच्चता है , उतना ही देवपन है । देवपन के समय ही ये पूजनीय हैं ।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
          🌹🌹सबका इष्टदेव🌹🌹
ऊपर वर्णित तैंतीस देवों में आंशिक या सीमित देवपन है । इनसे सुख मिलता है किन्तु दुःख भी मिल सकता है ।
अग्नि देव है किन्तु भड़क जाए , अतिथि देव है किन्तु शत्रु बन जाय , राजा देव है किन्तु कुपित हो जाय तो दुखदायी हो जाता है ।
इस कारण ये सदुपयोग और सत्कार की मर्यादाओं से बँधे हैं । सूर्य-चन्द्र और नदी-पर्वतों का सदुपयोग करना मर्यादा है ।
माता , पिता , आचार्य और अतिथियों की सेवा करना धर्म है ।
पूर्वज महापुरुषों का अनुसरण , संविधान का पालन और देश की रक्षा करना सब मनुष्यों का कर्तव्य है ।
किन्तु इनमे से कोई उपासना का देव नहीं है ।
उपासना का देव तो केवल परमात्मा है ।
महर्षि दयानन्द ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका , वेदविषय विचारः ) के अनुसार --
" परमेश्वर एवेष्टदेवोsस्ति "
अर्थात परमेश्वर ही सब मनुष्यों का इष्टदेव है ।
जो लोग भिन्न-भिन्न देवताओं को पूजते हैं वे कल्याण का वृथा यत्न करते हैं ।
ईश्वर के अतिरिक्त कभी कोई किसी का उपास्य देव नहीं हो सकता । उसकी उपासना में ही सबका कल्याण है ।
          🌹🌹 *एकदेव महादेव*🌹🌹
तैंतीस या बहुत से देव बताना तो 'देव' शब्द की व्याख्या एवं इसका विस्तृत अर्थ समझाने के लिए है ।
किसी विषय को ठीक से समझने-समझाने के लिए उसकी गहराई , विस्तार , सीमा , शंका एवं समाधान की आवश्यकता होती है ।
इसी पुनीत उद्देश्य से वेद एवं उपनिषद में यह विषय दर्शनीय है ।
इस ज्ञान का फल यह है कि उपासक का ईश्वर में विश्वास दृढ़ होता है ।
इस सृष्टि का सब कालों एवं परिस्थितियों में पूर्णतम देव तो एक ही है और वह है परमात्मा । वही पूर्णमहान होने से महादेव है ।
उसी की उपासना करना मनुष्य का धर्म है ।
उसी सर्वशक्तिमान सर्वेश्वर सर्वव्यापक महान ईश्वर के कल्याणकारी महादेव को मेरा कोटि कोटि नमन है।
ॐ नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च ।।

शनिवार, 14 सितंबर 2024

आश्चर्य की बात मानव अस्तित्व का कोई शुभचिंतक नहीं है।

यह संसार घोर अंधकार युक्त है, यहा किसी के हृदय में ज्ञान का प्रकाश नही है, यहाँ जीवन का सर्वस्व लगाकर एक दूसरे के सर्वनाश का भयंकर तम संग्राम चल रहा है। यहा हर कोई एक दूसरे को रौंदकर आगे बढ़कर सारी सफलता सारी कायनात पर एकाधिकार करने के लिए पागल होरहा है। 
यहा समस्या स्वयं के जीवन पर खतरनाक आक्रमणकारी रोज नये नये चक्रव्यूह रच रहे हैं जो ध्यान देने वाली बात हे स्वयं की रक्षा करनी है जिसके लिए प्रथम स्थान पन धन का स्थान है इसके नीचे सबकुछ है क्योंकि आपका जीवन 100 % धन के आश्रित है और शत्रु घर के अंदर जिसने पूर्णत:कब्जा कर रखा है वह आपकी कमजोरी जानता है कि आपके पास धन का श्रोत नहीं है, और धन का संचय भी अधिक नहीं उससे कही अधिक खर्च है वह अच्छी तरह से जानते हैं की आपके जीवन पर भयंकर संकट और खतरा है, इन्ही के साथ बाहरी शत्रु भी एक होगया है, अंदर बाहर दोनो तरफ से हमले हो रहे हैं। 
आपको स्वयं को इनसे बचाना है यह आपकी जिम्मेदारी है क्योंकि यह जिंदगी आपकी है कोई भी ईस पृथ्वी पर सिवाय ईश्वर के दूसरा कोई नहीं है। और ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करता है आपको अपनी सहायता करनी चाहिए यही आपका धर्म है और सुरु से यही कर भी रहे हैं आपकी लापरवाही की वजह से ही आपको झटका भी लग रहा है जिससे आपको अपने जीवन का खतरा समझ मे आ रहा यह सत्य भी है|
इसी सत्य के साथ आपको आगे बढ़ना है। इतने जीवन के लंबे सालो में इतने भयंकर अत्यंत कठोर संकटओ को सहते सहते आपका दम उखड़ने लगा है बार बार आपके जहन से एक ही प्रश्न उठता है ऐसा हमारे ही साथ क्यों हो रहा समस्या का समाधान होने के स्थान पर समस्या और अधिक गहराती जा रही है यह नासुर की तरह आपके जीवन को खोखला और अंदर से दीमक की तरह चालती जा रही है, वास्तव मे जो गलत हैं वह और शक्तिशाली हो रहा है और आप कमजोर होते जारहे हैं। 
क्या सच में ईश्वर है और वह यह सब देख रहा हैँ, ईश्वर तो है लेकिन ईश्वर बेबस है वह न्याय नहीं करता है उसने इस संसार के प्रपंच का सारा जिम्मा मनुष्यो पर डाल रखा है। लड़ो मरो अपने कर्मो का फल भोगो यह संसार ऐसा ही है। समाधान है उसके लिए लड़ना होगा चुनौति संकट खतरा का सामना करना होगा जोखीम को उठाना होगा अपनी जीत निश्चित करने के लिए आपको जीने के लिये मरना होगा डरने की कोई बात नहीं है हिम्मत हौसला और उत्साह डटकर कठीनाईयों पर आपको विजय प्राप्त करना होगा आपके अंदर अदम्य साहस धैर्य और अद्भुत शक्ति है आप कभी भी किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या के सामने परास्त नहीं होते आपने आज तक सभी कठीनाईयों परेशानियों और दिक्कतों का सामना किया है आगे भी आप अपने जीवन में आने वाली समस्या का समाधान अवश्य ही कर लेगे हमे आप पर पूर्ण भरोशा और आपकेअस्तित्व पर अगाव श्रद्धा और विश्वास है|

देवद्दादेश्यो द्रविणदानं याज्ञ:||

हमारी संस्था ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान मुफ्त में अपने सभी कार्यक्रम समाज के और मानव जाती के कल्याणा के लिए करती है, कृपया वेदों के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए और हमारे विद्यालय की मुलभुत गरीब असहाय बच्चों की शिक्षा के लिए उनके खाने कपड़े दवाईयों के लिए आवास के लिए सहयोग राशी का अवश्य दान करें, हमारे उत्साह को बढ़ाने के लिए क्योंकि यह कार्य बहुत परिश्रम का है, इसमें हम आपके सहयोग की जरूरत है। हमारी संस्था ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान में जो महानुभाव अपनी पवित्र कमाई का दान करेगे उनको ५०% की छूट मीलेगी|

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  Founder of GVB the University of Veda - President - Manoj Pandey,    Gyan Vigyan Brahmagyan

हमारी संस्था 80G and 12A free

आचार्य मनोज पाण्डेय अध्यक्ष 
ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान वैदिक विश्वविद्यालय 
9305008616

गुरुवार, 12 सितंबर 2024

संगठन (ग्रुप

कृपया पूरा पड़े ,,,,,,,एक आदमी था, जो हमेशा अपने *संगठन (ग्रुप)* में सक्रिय रहता था,  उसको सभी जानते थे ,बड़ा मान सम्मान मिलता था; अचानक किसी कारण वश वह निष्क्रिय रहने लगा , मिलना-जुलना बंद कर दिया और संगठन से दूर हो गया।

       कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया । मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक सिगड़ी / बोरसी (अलाव) में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था। उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।

        दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे। कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले, उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे *उठाकर किनारे पर रख दिया।*  और फिर से शांत बैठ गया।

      मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से *अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है। लेकिन उसने देखा कि अलग की हुई लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है।* कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा। उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।

          कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में *उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन* थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।

          इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया, कम से कम शब्द बोले। जाने  से पहले मुखिया ने *अलग की हुई  बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया। वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी और चारों ओर रोशनी तथा ताप बिखेरने लगी।*

       जब आदमी, मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से *कहा मेरे घर आकर मुलाकात* करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

*आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता, संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी +बिखेरता है ; संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।*
*
-        *मित्रों संगठन या एक दुसरे के साथ से ही हमारी पहचान बनती है, इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए ।*

 *संगठन के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण किसी व्यक्ति के लिए नहीं, उससे जुड़े विचार के प्रति होनी चाहिए।*

         *संगठन किसी भी प्रकार का हो सकता है ,आध्यात्मिक पारिवारिक , सामाजिक, *व्यापारिक (शैक्षणिक संस्थान, औद्योगिक संस्थान )  सांस्कृतिक इकाई , सेवा संस्थान आदि।*

 *_संगठनों के बिना मानव जीवन अधूरा है , अतः हर क्षेत्र में जहाँ भी रहें संगठित रहें सुरक्षित रहें  !_*
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
सचिन आर्य 
अध्यक्ष , आर्य सरंक्षणी सभा , बरेली 

एक छोटा सा विचार विशेष ध्यान दें🙏🙏🙏🙏😔😔😔😔🇮🇳🇮🇳

मेरा अगला जन्म मनुष्य के रूप में ही होना चाहिए आचार्य श्री, इसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा ? आज मुझे इसी पाप–पुण्य बारे कुछ प्रश्न पूछने हैं गुरुदेव ।

मेरा अगला जन्म मनुष्य के रूप में ही होना चाहिए आचार्य श्री, इसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा ? आज मुझे इसी पाप–पुण्य  बारे कुछ प्रश्न पूछने हैं गुरुदेव ।
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आपने सोते हुए निर्दोष कुत्ते को बिना किसी कारण के जोर का डंडा मारा, यह ’कृत–पापकर्म’ है । यह आपने 100 डिग्री का पाप कर दिया । अगले दिन उसी सोते हुए कुत्ते को आपने खुद डंडा नहीं मारा बल्कि किसी और को बोल दिया कि इस सोते हुए कुत्ते को जोर का डंडा मारो, यह ’कारित–पापकर्म’ है, क्योंकि आपने यह पाप स्वयं नहीं किया मगर किसी अन्य के माध्यम से करवाया, इसलिए आपने यह 75 डिग्री का पाप कर दिया ।  तीसरे दिन उसी सोते हुए निर्दोष कुत्ते को आपने स्वयं डंडा नहीं मारा, ना ही किसी दूसरे से डंडा मरवाया, बल्कि वहां तो पहले से ही कोई उसे डंडा मार रहा था, आपने तो बस उस डंडा मारने वाले को शाबाशी दे दी, उसका समर्थन कर दिया ,  यह आपने ’अनुमोदित–पापकर्म’ कर दिया । अनुमोदित का अर्थ है समर्थन करना । आपने ना तो खुद मारा, ना किसी से मरवाया, बस केवल पापी का समर्थन किया तो यह आपने 50 डिग्री का पाप कर दिया । 
यह डिग्री–विग्री कुछ नहीं होता, यह तो बस समझाने के लिए है कि सबसे बड़ा, मध्यम, और छोटा पाप कैसे होता है । शास्त्रों में इसे मुख्य रूप से तीन भागों में समझने के लिए बांट दिया गया । बस ये तीन याद रखो– 
1. कृत पापकर्म –खुद करना 
2. कारित पापकर्म– किसी दूसरे से करवाना
3. अनुमोदित पापकर्म– पाप करने वाले का समर्थन करना 
पुण्य कर्मों को भी ऐसे ही समझिए–
एकदम ऐसा ही आप पुण्य कर्म का समझ लीजिए ।  किसी प्यासे बुजुर्ग को स्वयं  पानी पिलाना  ’कृत–पुण्य कर्म’,  अगले दिन उसी बुजुर्ग को किसी अन्य से पानी पिलवाना  ’कारित पुण्यकर्म’, तथा उसी बुजुर्ग को तीसरे दिन ना तो स्वयं और ना किसी अन्य के माध्यम से पानी पिलाना मगर पहले से ही पानी पिला रहे किसी अन्य व्यक्ति का समर्थन करना कि शाबाश तुम तो पुण्य का कार्य कर रहे हो, इसे  ’अनुमोदित–पुण्यकर्म’ कहते हैं । 
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{{  ((  कर्मफल   व्यवस्था  ))  }}
°°°°°°
शिष्य :  प्रणाम गुरुदेव ।
आचार्य : आयुष्मान भव: ।
शिष्य : आपने अंत में जो अनुमोदित कर्म बताया , इसमें यदि कोई मौन रहता है तो क्या व्यवस्था है ।
आचार्य : कई बार मौन भी समर्थन जैसा ही होता है । आपके मौन से यदि दूसरों का अहित होता है तो समझें कि आप अनुमोदित–पापकर्म कर बैठे । आपने शुभकार्य का समर्थन नहीं किया और मौन रह गए तो आपको ’अनुमोदित–पुण्यकर्म का फल नहीं मिलेगा । ऐसी व्यवस्था जानें । 
शिष्य : यदि मैंने कुछ पापकर्म कर लिए और कुछ पुण्यकर्म कर लिए तो अब क्या होगा पुज्यवर आचार्य ?
आचार्य : तो  जो–जो आपने पापकर्म किए हैं उन–उनका आपको दुःख (कष्ट, दंड) भोगना पड़ेगा और जो–जो आपने पुण्यकर्म किए हैं उन–उन का आपको सुख (सुफल,आनंद) मिलेगा । 
शिष्य :  तो क्या यह सारे सुख–दुःख हमारे पाप व पुण्य कर्मों का ही परिणाम है ?
आचार्य : बिलकुल, और सुनो, इसमें रत्तीभर भी गड़बड़ की गुंजाइश नहीं है । एक कतरा सुख और दुःख, कम या ज्यादा होने की कोई भी संभावना नहीं है । जो आपने पाप किया, उसका दंड आपको मिलेगा, चाहे इस जन्म में मिले या अगले जन्म में मिले । इसी तरह जो पुण्य , चाहे वह छोटा सा भी पुण्यकर्म है वह आपने किया तो आपको उसका सुख, उसका उत्तम फल मिलेगा ही मिलेगा ।  वह ईश्वर यदि ऐसा ना करे तो वह न्यायकारी नहीं बल्कि अन्यायकारी सिद्ध होता है । उसकी व्यवस्था वाला न्याय एकदम निष्पक्ष है ।
 शिष्य : कितने पुण्य कर्म करने से अगला जन्म मनुष्य के रूप में मिल सकता है ?
आचार्य : जब पुण्य कर्मों और पाप कर्मों की मात्रा बराबर होती है तो मनुष्य को अगला जन्म भी मनुष्य के रूप में ही मिलता है । यदि पापकर्म पुण्यकर्मों से ज्यादा हुए तो मनुष्य को विभिन्न जीव–जंतुओं के रूप में जन्म लेना पड़ता है । जैसे ही फिर से वह अपने पाप कर्मों का इतना  फल भोग चुका होता है कि उसके पापकर्म पुण्यकर्मों के बराबर रह जाएं तो उसे फिर से मानव जन्म मिलता है ।
शिष्य : इस पृथ्वी पर हजारों खरब जीव–जंतु हैं , यदि उनमें से आधों के भी पापकर्म और पुण्यकर्म बराबर हो जाएं तो इस पृथ्वी पर मनुष्यों की जनसंख्या तो हजारों गुणा बढ़ जाएगी ?
आचार्य :  इस समस्त सृष्टि में ऐसी–ऐसी अरबों–खरबों पृथ्वियां हैं जहां मनुष्य रहते हैं और हमारी पृथ्वी की तरह या इससे कुछ भिन्न जीवन हैं । वहां पर भी अगला जन्म हो सकता है । यह सब व्यवस्था सर्वशक्तिमान ईश्वर के अधीन है ।
 शिष्य : यदि मुझे कोई दुःख होता है तो क्या वह मेरे कर्मों का फल है ?
आचार्य :  बिलकुल , इस व्यवस्था में रत्तीभर भी गड़बड़ की गुंजाइश नहीं है । आपने जो पाप किया, वह छोटा हो या बड़ा, आपको उसकी सजा अवश्य मिलेगी । इसी तरह आपने जो चाहे छोटा सा भी पुण्य किया तो उसका फल, उसका सुख आपको अवश्य मिलेगा ।  यह सारी व्यवस्था सर्वव्यापक ईश्वर देखता है और सबको न्यायपूर्ण फल देता है ।
शिष्य : कोई शराबी कार चालक मुझे टक्कर मारकर भाग जाए तो यह पाप तो उसने किया और सजा मुझे मिल गई ? मैं घायल हो जाऊंगा, कुछ महीने कष्ट भोगूंगा, मर भी सकता हूं ।  वह शराबी कार चालक तो भाग गया । यह कैसा न्याय हुआ आचार्यवर ?
आचार्य :   वह कार चालक फलदाता नहीं है, फलदाता तो ईश्वर है इसलिए उस कार चालक ने कृत पापकर्म किया, उसके कोष (खाते में) वह पाप जुड़ गया । यदि वह पकड़ा गया और न्यायालय ने उसे दंडित किया तो उसका कोष (खाता) से वह पाप कम हो जाएगा । यदि न्यायालय ने कम दंड दिया तो उसी हिसाब से आपके कोश में से  पाप भी कम होगा । रही बात आपकी – आपने कोई पाप नहीं किया मगर सजा बड़ी मिल गई ?  इससे आपका जो पाप कर्मों का कोष (खाता) था उसमें से उतने ही दुःख जो आपको मिलने थे वो कम हो जाएंगे क्योंकि आप तो पहले ही दुःख भोग चुके हो ।  ऐसे ही सब व्यवस्था न्यायकारी प्रभु के अधीन है । जो बिल्कुल शुद्ध, स्पष्ट और न्यायसंगत है ।
 शिष्य : आचार्य श्री ! शुभ कर्म और अशुभ कर्म कौन से होते हैं ?
आचार्य : जिन–जिन कर्मों से मनुष्य समेत सभी जीवधारियों को सुख पहुंचता हो वे सब शुभकर्म हैं, पुण्य कर्म हैं , इसके विपरित सब अशुभ और पाप कर्म हैं ।
शिष्य :  क्या सभी कर्मों का फल हमें तुरंत मिल जाता है ?
उत्तर :  नहीं , कुछ कर्मों का फल अभी और कुछ का अगले जन्मों में भोगना पड़ता है ।  कुछ जो कर्म हमने लाखों जन्मों पूर्व किसी एक मनुष्य जन्म में कोई कर्म किया हो तो करोड़ों वर्ष बाद भी उसका फल मिल सकता है, और मिलता भी है । तभी तो सामान्य बोलचाल में लोग कह देते हैं कि जाने किस जन्म का किया पाप सामने आ गया और आज यह दुःख मुझे देखना पड़ा । 
शिष्य :  आपकी इन सब बातों का प्रमाण क्या है आचार्य श्रेष्ठ ?
आचार्य :  ऋषियों के वचन, वेदों के सिद्धांत, उपनिषदों के कथन और इन सबके तथ्यगत उद्धरण इसके प्रमाण हैं जिनकी एक–एक मंत्र को संख्या और पृष्ठ संख्या सहित मैं आपके सामने प्रस्तुत कर सकता हूं। 
शिष्य : किस कर्म का क्या और कितना फल मिलेगा , क्या यह भी वर्णित हैं ?
आचार्य : नहीं ,   यह व्यवस्था ईश्वराधीन है ।  किस कर्म का क्या फल देना और कब देना है यह सब ईश्वर जानता है ।
शिष्य : यह कैसी व्यवस्था है आचार्य जी, एक बालक को तो अच्छा परिवार, धन, अच्छे शिक्षक और पूरा वातावरण जन्म से ही मिल जाता है और दूसरा बालक जन्म से ही झोपड़ी में पैदा होता है जिसे रोटी के भी लाले पड़े रहते हैं । इस झोपड़ी वाले से क्या उम्मीद करें कि  यह  इस ’कर्मफल’ व्यवस्था को जान पाएगा । 
आचार्य :  मनुष्य का आत्मा शुभ और अशुभ का स्वाभाविक ज्ञान रखना है । शुभ कार्य करते हुए आनंद और उत्साह उत्पन्न होता है, जबकि अशुभ कार्य करते हुए हृदय में भय और चिंता का भाव उत्पन्न होता है । रही बात निर्धन परिवार में जन्म लेने और सद्ज्ञान से दूर होने की तो कर्मफल व्यवस्था अटल है, जो पाप कर्म किए है उनके दंड से छुटकारा किसी भी उपाय से संभव नहीं है । इसी तरह शुभ कर्मों का फल भी अवश्य ही मिलता है । ज्ञान से दूरी कर देना भी दंड का एक रूप है । 
शिष्य : जैसे मैंने गिलास लेकर पानी पिया, तो क्या ऐसे साधारण कर्मों का भी लेखा–जोखा प्रभु रखते हैं ?
आचार्य : नहीं , क्योंकि इसका कोई प्रयोजन नहीं , इसलिए केवल शुभ व अशुभ कर्मों का ही लेखा–जोखा प्रभु रखते हैं ।
शिष्य :  क्या प्रभु ये सब बातें कहीं लिखकर रखते हैं ?
आचार्य : नहीं, इसकी जरूरत नहीं । सर्वशक्तिमान प्रभु सबकुछ अपनी व्यवस्था से संभालते हैं । उनको कहीं लिखने की जरूरत नहीं होती । इसके बावजूद भी कहीं किसी गड़बड़ की जरा सी भी संभावना कभी नहीं होती । 
शिष्य : जब कोई मनुष्य पाप कर्म करता है तो प्रभु उसे रोकते क्यों नहीं है । 
आचार्य :  मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है और प्रभु का काम कर्मों के फल देना है । दोनों अपने–अपने कार्यों को कुशलता से करते हैं ।  जैसा कर्म वैसा फल । 
शिष्य : आज तो आपने इस सद्ज्ञान से अपने शिष्य की आत्मा को प्रकाशित कर दिया गुरुवर । आनन्द की वर्षा कर दी । प्रणाम गुरुदेव ।
आचार्य : आयुष्मान भव: । ऐसा नहीं है । आपके शुभकर्मों के परिणाम स्वरूप प्रभु ने आपका मुझसे मिलन करवाया । प्रेरणा दी, यह सद्ज्ञान भी उन्हीं पुण्यकर्मों से मिलता है ।  माध्यम चाहे कोई भी हो । प्रभु पिता ही हमें उत्तम कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं, और सबको प्रेरित करते हैं । मैंने आपको जो ""कृत कर्म"",  ""कारित कर्म""   और  ""अनुमोदित कर्म"" के रूप वाला विश्लेषण समझाया है, शास्त्रों में इससे भी सूक्ष्म वर्गीकरण है ।  इस शास्त्रोक्त ""कर्मफल"" व्यवस्था को यदि देश के विद्यालयों में पढ़ाया जाए तो समाज अपराध मुक्त हो जाए और चहुओर सुख ही सुख हो जाए ।  वैदिक ज्ञान के बिना संसार सुख–शांति की कल्पना भी नहीं कर सकता ।
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बुधवार, 11 सितंबर 2024

चौदह प्रकार के लोग जो मृततुल्य हैं।

🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🔥चौदह प्रकार के लोग जो मृततुल्य हैं।
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   🌷राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?

  रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

  अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!

  तब अंगद ने मृत्यु के १४ प्रकार बताए-

  कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

  १. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

   २. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो, सत्य वैज्ञानिक नियमों, परंपराओं, धर्म एवं लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

   ३. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान एवं यज्ञ करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

   ४. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र मानकर उनकी मदद करनी चाहिए। उनके प्रति करुणा का भाव रखना चाहिए।

    ५. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

   ६. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

   ७. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

   ८. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

   ९. सतत क्रोधी: २४ घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

   १०. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

   ११. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

  १२. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

   १३. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

   १४. श्रुति संत विरोधी: जो वेदादि सत्य सत्य आर्ष शास्त्रों एवं संत पुरुषों विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

  अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहने से बचाना चाहिए। 

साभार:- श्री महावीर आर्य

मंगलवार, 10 सितंबर 2024

जगत् के प्रभु हैं कल्याणकारी जो भी काम किया तेरा नाम लिया ज़िदगी तेरे ही बल पे सारी ।।

1214  English version is at the end
             हे वज्रवाले ❗
                   वैदिक भजन १२१४ वां
                         राग भैरवी
     गायन समय चारों प्रहर विशेषत: प्रातः
                         ताल अध्धा
                   👇 वैदिक मन्त्र👇
न घेमन्यत् आपपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ। 
तवेदु स्तम्भ चिकेत।।ऋ•८.२.१७अथ॰१०.१८.२सा१.२.३
                    👇 वैदिक भजन 👇       
जगत् के प्रभु हैं कल्याणकारी 
जो भी काम किया तेरा नाम लिया 
ज़िदगी तेरे ही बल पे सारी ।।
जगत्.......... 
हर एक कार्य का मंगलाचरण करूं 
झुक- झुक कर तेरी वन्दना करूं 
हे वज्रवाले !तू देखे-भाले 
पापों को वज्र से मारता तू ही ।।
जग......... 
विघ्न अनिष्टों का करता तू वर्जन 
हे वज्रधारी! करूं मैं समर्पण 
करता हूं वन्दना छोड़ प्रवंचना 
देता है तू प्रेरणायें सही ।।
जगत् ............. 
सत्य विजय तेरा वज्र प्रताप है 
जहां है सफलता आश्रय विराट है 
करता है जो भी शुभ कार्य हरदम 
देता है धन- माल प्रभावशाली ।।
जगत्......... 
                           भाग २ 
जगत के प्रभु हैं कल्याणकारी 
जो भी काम किया तेरा नाम लिया 
ज़िन्दगी तेरे ही बल पे सारी ।।
जगत्........
दीन - धनी सब तू ही बनाये 
छोटे-बड़े सब तुझको ही ध्यायें 
आश्रय तेरा हो जीविका चलती    
अन्यों  का आश्रय ना मैं लूं कभी।।
जगत्......
धन, जन, मान पे करूं ना खुशामद 
एहसान दूजों का देगा ना आनन्द 
दामन तेरा ही थामना चाहूं 
निष्कामी तू है मंगलकारी 
जगत्.........
           16.7.2024।    820 p.m.
                      शब्दार्थ:-
मंगलाचरण= शुभ कार्य करने से पहले मंगल कामना करते हुए श्लोक पढ़ना
अनिष्ट= अहित' अमंगल
वज्रवाले= रुद्र परमेश्वर
वर्जन= छोड़ना, त्यागना
प्रवंचना= धोखेबाजी, ठगी
खुशामद= चापलूसी
                        👇 उपदेश👇
हे जगत् के ईश्वर ! परम मंगलकारी ! मैं जो भी कोई नया कार्य शुरू करता हूं, नया यज्ञकर्म--नया शुभ कर्म प्रारम्भ करता हूं तो वह सब तेरा ही नाम लेकर ,तेरे ही भरोसे, तेरे ही बल पर शुरू करता हूं। अपने हर एक कार्य का मंगलाचरण में तेरे ही आगे झुक कर तेरी ही मानसिक वन्दना करके करता हूं। हे वज्रवाले ! मैं तेरे सिवाय किसी भी अन्य के आगे झुक कर मंगल नहीं मना सकता, क्योंकि पाप से निवृत करने वाला वज़्र तो तेरे ही हाथ में है-- अनिष्टों, अमंगलों और विघ्नों का वास्तव में वर्जन करने वाला वज्र तेरे ही हाथ में है। तो हे वज्रधारिन्! मैं किसी अन्य की स्तुति करके क्या कर पाऊंगा। जो कार्य सचमुच एकमात्र तुम्हारे ही आश्रय से किए जाते हैं और जो मनुष्य सचमुच अपना कर्म सर्वथा तुझे अर्पण करते हैं तो वहां पराजय, असफलता या असिद्धि नाम की कोई वस्तु रह ही नहीं जाती। पर बात कईयों को ज़रा विचित्र- सी लगेगी, किन्तु है सर्वथा सत्य। सचमुच तब सब मंगल- ही- मंगल हो जाता है। यह सब तेरे वज्र का प्रताप है। जो लोग केवल तेरा ही आश्रय लेकर कार्य शुरू करते हैं, सर्वथा त्वदर्पित होते हैं,उनके पास निरन्तर जागता हुआ तेरा वज्र उनकी रक्षा करता है, अतः है मंगलकारी वज्रिन! इस संसार में तू ही एकमात्र स्तुति करने योग्य है। मैं तो तेरी ही स्तुति करना जानता हूं। यदि मैं किसी धनाढ्य पुरुष की स्तुति करूं तो शायद वह मुझे मेरे कार्य के लिए धन दे देगा; किसी प्रभावशाली पुरुष की विनती करूं तो शायद मेरे लिए उसका प्रभाव बाद सहायक हो जाएगा, परन्तु हे जगत के ईश्वर ! मैं जानता हूं कि यह सब तभी होगा जबकि तेरी ऐसा इच्छा होगी। संसार के सब प्राणी, सब अमीर गरीब, छोटे- बड़े सब तेरे ही बनाए हुए पुतले हैं। संसार के बड़े- से- बड़े पुरुष भी तेरे ही आश्रय पर तेरी ही इच्छा पर जीवित हैं; तो मैं उन पुरुषों का आश्रय लेकर क्या करूंगा? जब तुझे अभीष्ट होता है कि किसी कार्य में धन-जन बुद्धि आदि की सहायता मिले तो वह कहीं-न-कहीं कहीं से मिलती ही है। बल्कि हम देखते हैं कि धन-जन मान आदि पाने के लिए जिन पुरुषों का हम भरोसा करते हैं निरर्थक खुशामद करते हैं,वहां से हमें कुछ भी नहीं मिलता किन्तु किसी दूसरी आनाशातीत जगह से वैसी सब सहायता मिल जाती है, अतः मैं तो अपने कार्यों के प्रारम्भ में किसी भी अन्य का भरोसा नहीं करता मैं तो केवल तेरा ही पल्ला पकड़ना जानता हूं,मैं तो तेरी ही स्तुति करना जानता हूं।
🕉👏द्वितीय श्रृंखला का २०८ वां वैदिक भजन 
और अब तक का १२१४ वां वैदिक भजन 🙏🌹
🙏सभी श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएं🙏🌹
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1214 
0 thunderbolt ❗
                   vaidik bhajan 1214 th
                         raag bhairavee
     Singing time :-
all the time (specially morning) 
                         taal adhdha
                   👇 vaidik mantra👇
na ghemanyat aapapan vajrinnapaso navishtau. 
tavedu stomam chiket..
Rig•8.2.17Ath.10.18.2
Saam1.2.3
    👇 vaidik bhajan 👇       
jagat ke prabhu hain kalyaanakaaree 
jo bhee kaam kiyaa teraa naam liyaa 
zindagee tere hee bal pe saaree ..
jagat.......... 
har ek karya kaa mangalaacharan karoon 
jhuk- jhuk kar teree vandanaa karoon 
he vajravaale ! too dekhe-bhaale 
paapon ko vajra se maarataa too hee ..
jag......... 
vighna anishton kaa karataa too varjan 
he vajradhaarin! karoon main samarpan 
karataa hoon vandanaa chhod pravanchanaa 
detaa hai too preranaayen sahee ..
jagat ............. 
satya vijay teraa vajra- prataap hai 
jahaan hai saphalatas aashray viraat hai 
karataa hai jo bhee shubhkaarya haradam 
detaa hai dhan- maal prabhaavashaalee ..
jagat......... 
                           bhaag 2 
jagat ke prabhu hain kalyaanakaaree 
jo bhee kaam kiyaa teraa naam liyaa 
zindagee tere hee bal pe saaree ..
jagat........
deen - dhanee sab too hee banaaye 
chhote-bade sab tujhako hee dhyaayen 
aashray teraa ho jeevikaa chalatee    
anyon  kaa aashray naa main loon kabhee..
jagat......
dhan, jan, maan pe karoon na khushaamad 
ehasaan doojon ka degaa na aanand 
daaman tera hee thaamanaa chaahoon 
nishkaamee too hai mangalakaaree 
jagat.........

16.7.2024. 820 p.m.

👇Meaning of words:-👇

Mangalacharan = reciting a shloka while wishing good luck before doing any auspicious work

Anisht = Harmful, inauspicious

Vajravale = Lord Rudra

Varjan = Leave, forsake

Pravchan = Cheating, fraud

Chhushamd = Flattery

👇 meaning of Vedic Bhajans 👇       
 The Lord of the world is the welfare
 Whatever I did, I took your name 
 Zidgi tere hi bal pe sari.
 The world. 
 Let me praise every single action 
 I bow down and worship you 
 O thunderbolt!You see-spear 
 You kill sins with thunderbolt.
 The world. 
 You avoid obstacles and evils 
 O Vajradhar!  I do surrender 
 I do worship leave deception 
 Gives you the right inspirations.
 The world 
 True victory is your thunderbolt glory 
 Where is success shelter is huge 
 does whatever good work always 
 gives wealth- goods impressive.
 The world. 
                            Part 2 
 The Lord of the world is the welfare 
 Whatever I did, I took your name 
 Zindagi tere hi bal pe sari.
 The world.
 You make all the poor and rich 
 Let all, small and great, meditate on you 
 Shelter yours be the livelihood moving    
 I will never take refuge in others.
 The world.
 I do not flatter myself with wealth, people, and honor 
 The kindness of others will not give joy 
 I want to hold your feet 
 Selfless you are auspicious 
 The world.
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  O Vajra-holder ❗

👇 Sermon👇
O God of the world! Most auspicious! Whatever new work I start, new Yagya-karma, new auspicious work, I start it by taking your name, trusting in you, on your strength. I bow before you in the auspicious beginning of every work and mentally worship you. O Vajra-holder! I cannot bow before anyone else except you and celebrate auspiciousness, because the Vajra that removes sins is in your hand only-- the Vajra that actually prevents evils, misfortunes and obstacles is in your hand only. So O Vajra-holder! What can I achieve by praising anyone else. The works that are really done with your support only and the people who really dedicate their work completely to you, then there is no such thing as defeat, failure or failure.  But this may seem a little strange to many, but it is absolutely true. In fact, everything becomes auspicious then. All this is the power of your thunderbolt. Those who start work by taking shelter of you only, are completely proud of their nature, your thunderbolt always remains awake near them and protects them, so, O auspicious Vajrini! You are the only one in this world who deserves to be praised. I know how to praise you only. If I praise a rich man, then perhaps he will give me money for my work; if I request an influential man, then perhaps his influence will be helpful to me, but O God of the world! I know that all this will happen only when you wish so. All the creatures of the world, all the rich and poor, small and big, all are puppets made by you. Even the greatest men of the world are alive on your shelter and your wish; then what will I do by taking shelter of those men?  Whenever you desire assistance in the form of money, people, intelligence etc. in some work, you get it from somewhere or the other.
Rather we see that the people whom we trust to get wealth, respect etc., we flatter them uselessly, we do not get anything from them but we get all such help from some other unknown place, hence I do not trust anyone else at the beginning of my work, I only know how to hold your hand, I only know how to praise you.
🕉👏208th Vedic Bhajan of the second series
And 1214th Vedic Bhajan till now🙏🌹
🙏Hearty wishes to all the listeners🙏🌹