🚩‼️ओ3म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी
दिनांक - - 3 मई 2025 ईस्वी
दिन - - मंगलवार
🌖तिथि--प्रतिपदा (24:35 तक ईसा पूर्व)
🪐 नक्षत्र - - विशाखा ( 09:09 तक अनुराधा )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - ज्येष्ठ
ऋतु - -ग्रीष्म
सूर्य - - उत्तरायण
🌞सूर्योदय - - प्रातः 5:31 पर दिल्ली में
🌞सूरुष - - सायं 19:04 पर
🌖चन्द्रोदय--19:54 पर
🌖 चन्द्रास्त - - चन्द्रास्त नहीं होगा
सृष्टि संवत् - - 1,96,08,53,126
कलयुगाब्द - - 5126
सं विक्रमावत - -2082
शक संवत - - 1947
दयानन्दबद - - 201
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🚩‼️ ओ3म् ‼️ 🚩
🔥 वेदवाणी - ईश्वरीय वाणी
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वेदवाणी "ईश्वर ने संसार के सुख के लिए निधि के समान सूपी है। मनुष्य उस वेद के द्वारा परमाणु से लेकर ईश्वर पर्यंत खोज करके ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
वेदवाणी न्यायकारी भगवान की प्राप्ति के लिए वह ज्ञान का प्रकाश करता है जो सर्वत्र पूज्य है।
जो वेदवाणी प्रयास के साथ तप (ब्रह्मचर्य आदि अनुष्ठान) के साथ उत्पन्न हुआ है, जो सत्य ज्ञान से एवं यथार्थ नियम से स्वीकृत है, वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) जिस वेद वाणी के प्राप्त स्थान है, ब्रह्माण्ड को दर्शन देने वाले ईश्वर स्वामी हैं, जो वेदवाणी धारण अपनी शक्ति से सभी ओर धारण की गई है, श्रद्धा एवं ईश्वर विश्वास से अति प्राचीन काल की है, दीक्षा (नियम, व्रत, संस्कार) आदि से रक्षा की जाती है, यज्ञ (आध्यात्मिक संस्कार, शिल्प विद्या, अग्नि होत्र और शुभ गुणों के दान) में प्रतिष्ठा की जाती है
उस वेदवाणी की प्राप्त से और उनके सहारा लेके चर्च के पुरुष आनंद मंदिर और दुनिया में प्रतिष्ठित भी होते हैं। जो वेदपाठी व्रत से, ब्रह्मचर्य से वेदवाणी के गुण और उपदेशों को कहते हैं, वह वेदपाठी को जो लोग सताते हैं, उनकी वेदवाणी को जपते हैं, ऐसे गीतों की सुकीर्ति चली जाती है, उनकी वीरता और मंगलमयी श्री लक्ष्मी भी चली जाती हैं। विद्या के रोकटोक से अविद्या के कारण विपत्तियां फलती है।
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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷ओ3म् अग्निं दूतं वृणिम्हेहातरं विश्ववेदसम्।अस्य यज्ञस्य सुकृतम्। (साम वेद)
💐अर्थ:- पापियों को दंड देने वाले दाता, सर्वज्ञ और संसार रूपी यज्ञ के उत्तम निर्माता भगवान की हम श्रद्धा से स्तुति करते हैं।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पंचांग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्टयादिसंवत-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि-नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ3म् तत्सत् श्री ब्राह्मणो दये द्वितीये प्रहर्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टविंशतितम कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-शन्नवतिकोति-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाष्टसहस्र- षड्विंशत्य्युत्तरशतमे ( 1,6,08,53,126 ) सृष्ट्यबडे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विशहस्त्रतमे (2082) वैक्रमब्दे 】 【 मदद्विशतीतमे ( 201) दयानन्दबदे, काल -संवत्सरे, रवि - उत्तरायणे, ग्रीष्म -ऋतौ, ज्येष्ठ - मासे, कृष्ण - पक्षे, प्रतिपदायां तिथौ, विशाखा - नक्षत्रे, मंगलवासरे, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भारतखंडे...प्रदेशे.... प्रदेशे...नगरे...गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .(पितामह)... (पिता)।
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