Mimansa Darshan Chapter 3.4.3

मीमांसा दर्शन – अध्याय 3.4.31–40

हिन्दी एवं English Explanation

३.४.३१ — लिङ्गाद् आर्त्विजे स्यात्

हिन्दी: कर्म का निर्धारण लिङ्ग या विधि के अनुसार आर्त्विज (यज्ञकर्ता) पर लागू होता है।
English: The action applies to the performer (Artvij) according to the identifying mark or procedure.

३.४.३२ — पानव्यापच् च तद्वत्

हिन्दी: शराब या पेय में व्याप्त नियम उसी प्रकार लागू होते हैं।
English: The same rules apply to beverages as they do to offerings.

३.४.३३ — दोषात् तु वैदिके स्याद् अर्थाद् धि लौकिके न दोषः स्यात्

हिन्दी: वैदिक कर्म में दोष माना जा सकता है, किन्तु लौकिक दृष्टि से अर्थ के अनुसार दोष नहीं होता।
English: In Vedic acts, defects may exist, but from a worldly perspective, no defect occurs according to meaning.

३.४.३४ — तत्सर्वत्राविशेषात्

हिन्दी: यह नियम सभी स्थानों पर समान रूप से लागू होता है।
English: This applies universally without distinction.

३.४.३५ — स्वामिनो वा तदर्थत्वात्

हिन्दी: कर्म का प्रभाव उसके स्वामी (कर्ता) पर निर्भर करता है।
English: The effect of the act depends on its owner (performer).

३.४.३६ — लिङ्गदर्शनाच् च

हिन्दी: लिङ्ग के दर्शन से कर्म का निर्धारण किया जाता है।
English: The identification of the action is based on the mark (Lingadarshan).

३.४.३७ — सर्वप्रदानं हविषस् तदर्थत्वात्

हिन्दी: सभी प्रकार के हविष् (दान) के नियम उसी उद्देश्य से लागू होते हैं।
English: All types of offerings (Havis) follow the rule according to their purpose.

३.४.३८ — निरवदानात् तु शेषः स्यात्

हिन्दी: उपहार या दान न होने पर भी शेष नियम लागू होता है।
English: Even in the absence of offerings, remaining rules are applicable.

३.४.३९ — उपायो वा तदर्थत्वात्

हिन्दी: सभी उपाय उसी उद्देश्य के अनुसार लागू होते हैं।
English: All means or methods apply according to the purpose.

३.४.४० — कृतत्वात् तु कर्मणः सकृत् स्याद् द्रव्यस्य गुणभूतत्वात्

हिन्दी: कर्म का पालन केवल इसलिए किया जाता है क्योंकि यह वस्तु के गुण के अनुसार निश्चित है।
English: The act is performed only because it is determined by the inherent quality of the substance.

मीमांसा दर्शन – अध्याय 3.4.41–51

हिन्दी एवं English Explanation

३.४.४१ — शेषदर्शनाच् च

हिन्दी: कर्म का शेष या शेषतत्त्व को देखकर उसके नियमों का निर्धारण किया जाता है।
English: The remaining aspect (Sheshatattva) determines the rules of the act.

३.४.४२ — अप्रयोजकत्वाद् एकस्मात् क्रियेरञ् शेषस्य गुणभूतत्वात्

हिन्दी: यदि कोई क्रिया अप्रयोज्य है, तो केवल शेष के गुण के अनुसार ही वह निर्धारित होती है।
English: An unessential action is determined solely by the inherent quality of the remaining entity.

३.४.४३ — संस्कृतत्वाच् च

हिन्दी: कर्म का संस्कृत या व्यवस्थित होना इसे निर्धारित करता है।
English: The act being well-structured or ordained defines its application.

३.४.४४ — सर्वेभ्यो वा कारणाविशेषात् संस्कारस्य तदर्थत्वात्

हिन्दी: संस्कार का तदर्थत्व सभी कारणों के विशेष न होने के कारण स्थापित होता है।
English: The significance of a Samskara applies because no particular cause is distinct among all.

३.४.४५ — लिङ्गदर्शनाच् च

हिन्दी: कर्म की पहचान लिङ्ग या विशेष चिन्ह द्वारा की जाती है।
English: The action is identified through its sign (Lingadarshan).

३.४.४६ — एकस्माच् चेद् यथाकाम्यम् अविशेषात्

हिन्दी: यदि एक क्रिया पर लागू किया जाए, तो उसका प्रभाव अविशेष रूप में सभी पर समान होता है।
English: If applied to one act, its effect universally remains undifferentiated.

३.४.४७ — मुख्याद् वा पूर्वकालत्वात्

हिन्दी: किसी क्रिया का महत्व उसके पूर्वकाल या मुख्यत्व से भी निर्धारित होता है।
English: The importance of an act is determined also by its precedence or primary status.

३.४.४८ — भक्षाश्रवणाद् दानशब्दः परिक्रये

हिन्दी: दान शब्द का प्रयोग भक्ष्य (भोजन) और श्रवण से संबंधित कार्यों में होता है।
English: The term ‘Daan’ applies to actions involving food (Bhaksha) and listening (Shravana).

३.४.४९ — तत्संस्तवाच् च

हिन्दी: संबंधित संस्तव या स्तुति के अनुसार कर्म निर्धारित होता है।
English: The action is determined according to the related praise or eulogy.

३.४.५० — भक्षार्थो वा द्रव्ये समत्वात्

हिन्दी: भोजन के उद्देश्य के लिए द्रव्य में समानता के कारण नियम लागू होते हैं।
English: Rules apply for food because of uniformity in the substance for consumption.

३.४.५१ — व्यादेशाद् दानसंस्तुतिः

हिन्दी: आदेश या उपदेश से दान और उसकी स्तुति सुनिश्चित होती है।
English: By injunction or teaching, donation and its praise are established.
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