तवमग्न रभुराके नमस्यस्त्वं वाजस्य कषुमतो राय ईशिषे |
तवं वि भास्यनु दक्षि दावने तवं विशिक्षुरसियज्ञमातनिः ||
यह मंत्र अग्नि के रचनात्मक, बुद्धिमान और विस्तारक स्वरूप को उद्घाटित करता है। यहाँ अग्नि केवल रक्षक या संबंध नहीं, बल्कि सृष्टि का इंजीनियर, यज्ञ का विस्तारकर्ता और ज्ञान–धन का नियंत्रक है।
तवम् अग्ने रभुराके नमस्यः
त्वं वाजस्य क्षुमतो राय ईशिषे ।
तवं वि भास्यनु दक्षि दावने
तवं विशिक्षुरसि यज्ञमातनिः ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
रभुः – कुशल कारीगर, सृजनशील
आके – दूर–दूर तक
नमस्यः – नमनीय, वंदनीय
त्वं वाजस्य – बल, अन्न, सामर्थ्य का
क्षुमतः – बुद्धिमान, तेजस्वी
रायः – धन, समृद्धि
ईशिषे – स्वामी हो
तवं वि भासि – तुम प्रकाशित करते हो
अनु दक्षि दावने – योग्यता और दक्षता के अनुसार देने में
तवं विशिक्षुः असि – तुम विस्तार करने वाले हो
यज्ञम् आतनिः – यज्ञ को फैलाने वाले, व्यापक करने वाले
हे अग्नि!
तुम दूर–दूर तक फैले
सृजनशील कारीगर हो,
इसलिए वंदनीय हो।
तुम बल, बुद्धि और धन के
स्वामी हो।
तुम योग्य व्यक्ति को
उसकी क्षमता के अनुसार
प्रकाश और दान देते हो।
तुम यज्ञ को
समाज, जीवन और जगत में
फैलाने वाले हो।
रभु वैदिक परंपरा में
Innovation, Engineering, Craftsmanship का प्रतीक है।
👉 यह मंत्र कहता है:
अनु दक्षि दावने
धन यहाँ:
👉 अग्नि योग्यता के बिना वितरण नहीं करती
यही वैदिक Merit System है।
यज्ञमातनिः
यज्ञ का अर्थ:
👉 जो जीवन को उपयोगी बनाये, वही यज्ञ है।
यह मंत्र कहता है:
👉 अग्नि = Universal Growth Engine
यह मंत्र विशेष उपयोगी है जब:
यह मंत्र निर्माण और विस्तार की शक्ति देता है।
अब तक अग्नि बनी:
👉 अगला चरण होगा: अग्नि = नियंता और समापनकर्ता
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