जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

About Us

About Us
Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

यह ब्लॉग खोजें

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

Contribute

Contribute
We are working for give knowledge, science, spiritulity, to everyone.

Ad Code

तीन भिक्षु -लियोटालस्टाय

 


तीन भिक्षु

      यह लेव तॉल्स्तॉय की बहुत प्रसिद्द कहानी है। रूस के ऑर्थोडॉक्स चर्च के आर्चबिशप को यह पता चला कि उसके नियमित प्रवचन में भाग लेने वाले बहुत से लोग एक झील के पास जाने लगे हैं। उस झील के बीच में छोटा-सा एक टापू था जहाँ एक पेड़ के नीचे तीन बूढ़े रहते थे। गाँव वालों का यह कहना था कि वे तीनों संत हैं। आर्चबिशप को यह बात बहुत नागवार गुज़री क्योंकि ईसाई धर्म में संत केवल उन्हें ही माना जाता है जिन्हें वेटिकन द्वारा विधिवत संत घोषित किया गया हो। आर्चबिशप क्रोधित हो गया–"वे तीनों संत कैसे हो सकते हैं? मैंने सालों से किसी को भी संतत्व की पदवी के लिए अनुशंसित नहीं किया है! वे कौन हैं और कहाँ से आये हैं?"। लेकिन आम लोग उन तीनों के दर्शनों के लिए जाते रहे और चर्च में आनेवालों की तादाद कम होती गयी। अंततः आर्चबिशप ने यह तय किया कि वह उन तीनों को देखने के लिए जाएगा। वह नाव में बैठकर टापू की ओर गया। वे तीनों वहाँ मिल गए. वे बेहद साधारण अनपढ़ और निष्कपट देहातियों जैसे थे। दूसरी ओर, आर्चबिशप बहुत शक्तिशाली व्यक्ति था। रूस के ज़ार के बाद उस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण आदमी था वह। उन तीनों को देखकर वह खीझ उठा–"तुमें संत किसने बनाया?"–उसने पूछा। वे तीनों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। उनमें से एक ने कहा–"किसी ने नहीं। हम लोग खुद को संत नहीं मानते। हम तो केवल साधारण मनुष्य हैं"।

 

         "तो फिर तुम लोगों को देखने के लिए इतने सारे लोग क्यों आ रहे हैं?" वे बोले–"यह तो आप उन्हीं से पूछिए." "क्या तुम लोगों को चर्च की आधिकारिक प्रार्थना आती है?"–आर्चबिशप ने पूछा। "नहीं। हम तो अनपढ़ हैं और वह प्रार्थना बहुत लंबी है। हम उसे याद नहीं कर सके." "तो फिर तुम लोग कौन-सी प्रार्थना पढ़ते हो?" उन तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। "तुम बता दो"एक ने कहा। "तुम ही बता दो ना"वे आपस में कहते रहे। आर्चबिशप यह सब देखसुनकर अपना आप खो बैठा। "इन लोगों को प्रार्थना करना भी नहीं आता! कैसे संत हैं ये?"–उसने मन में सोचा। वह बोला–"तुम लोगों में से कोई भी बता सकता है। जल्दी बताओ!" वे बोले–"दरअसल हम आपके सामने बहुत ही साधारण व्यक्ति हैं। हम लोगों ने खुद ही एक प्रार्थना बनाई है पर हमें यह पता नहीं था कि इस प्रार्थना को चर्च की मंजूरी मिलना ज़रूरी है। हमारी प्रार्थना बहुत साधारण है। हमें माफ़ कर दीजिये कि हम आपकी मंजूरी नहीं ले पाए. हम इतने संकोची हैं कि हम आ ही न सके." "हमारी प्रार्थना हैईश्वर तीन है और हम भी तीन हैं, इसलिए हम प्रार्थना करते हैं–'तुम तीन हो और हम तीन हैं, हम पर दया करो'–यही हमारी प्रार्थना है।" आर्चबिशप बहुत क्रोधित हो गया–"ये प्रार्थना नहीं है! मैंने ऐसी प्रार्थना कभी नहीं सुनी!"वह ज़ोरों से हंसने लगा। वे बोले–"आप हमें सच्ची प्रार्थना करना सिखा दें। हम तो अब तक यही समझते थे कि हमारी प्रार्थना में कोई कमी नहीं है। 'ईश्वर तीन है और हम तीन हैं' और भला क्या चाहिए? बस ईश्वर की कृपा ही तो चाहिए? उनके अनुरोध पर आर्चबिशप ने उन्हें चर्च की आधिकारिक प्रार्थना बताई और उसे पढ़ने का तरीका भी बताया। प्रार्थना काफी लंबी थी और उसके ख़तम होते-होते उनमें से एक ने कहा–" हम शुरू का भाग भूल गए हैं"। फिर आर्चबिशप ने उन्हें दोबारा बताया। फिर वे आख़िरी का भाग भूल गए... आर्चबिशप बहुत झुंझला गया और बोला–" तुम लोग किस तरह के आदमी हो? तुम एक छोटी-सी प्रार्थना भी याद नहीं कर सकते? "वे बोले–" माफ़ करें लेकिन हम लोग अनपढ़ हैं और हमारे लिए इसे याद करना थोडा मुश्किल है, इसमें बहुत बड़े-बड़े शब्द हैं... कृपया थोड़ा धीरज रखें। यदि आप इसे दो-तीन बार सुना देंगे तो शायद हम इसे याद कर लेंगे"। आर्चबिशप ने उन्हें तीन बार प्रार्थना सुना दी। वे बोले–" ठीक है, अबसे हम यही प्रार्थना करेंगे, हांलाकि हो सकता है कि हम इसका कुछ हिस्सा कहना भूल जाएँ पर हम पूरी कोशिश करेंगे"। आर्चबिशप संतुष्ट था कि अब वह लोगों को जाकर बताएगा कि उसका पाला कैसे बेवकूफों से पड़ा था। उसने मन में सोचा–'अब लोगों को जाकर बताऊँगा कि वे जिन्हें संत कहते हैं उन्हें तो धर्म का क-ख-ग भी नहीं पता और वे ऐसे जाहिलों के दर्शन करने जाते हैं!'। यही सोचते हुए वह नाव में जाकर बैठ गया। नाव चलने लगी और वह अभी झील में आधे रास्ते पर ही था कि उसे पीछे से उन तीनों की पुकार सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा, वे तीनों पानी पर भागते हुए नाव की तरफ आ रहे थे! उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वे लोग पानी पर भागते हुए आये और नाव के पास पानी में खड़े हुए बोले–" माफ़ कीजिये, हमने आपको कष्ट दिया, कृपया चर्च की प्रार्थना एक बार और दोहरा दें, हम कुछ भूल गए हैं"। आर्चबिशप ने कहा–" तुम लोग अपनी प्रार्थना ही पढो। मैंने तुम्हें जो कुछ भी बताया उसपर ध्यान मत दो। मुझे माफ़ कर दो, मैं बहुत दंभी हूँ। मैं तुम्हारी सरलता और पवित्रता को छू भी नहीं सकता। जाओ, लौट जाओ. "लेकिन वे अड़े रहे–" नहीं, ऐसा मत कहिये, आप इतनी दूर से हमारे लिए आये... बस एक बार और दोहरा दें, हम लोग भूलने लगे हैं पर इस बार कोशिश करेंगे कि इसे अच्छे से याद कर लें। "लेकिन आर्चबिशप ने कहा–" नहीं भाइयों, मैं खुद सारी ज़िंदगी अपनी प्रार्थना को पढ़ता रहा पर ईश्वर ने उसे कभी नहीं सुना। हम तो बाइबिल में ही यह पढ़ते थे कि ईसा मसीह पानी पर चल सकते थे पर हम भी उसपर शंका करते रहे। आज तुम्हें पानी पर चलते देखकर मुझे अब ईसा मसीह पर विश्वास हो चला है। तुम लोग लौट जाओ. तुम्हारी प्रार्थना संपूर्ण है। तुम्हें कुछ भी सीखने की ज़रुरत नहीं है"।

 

श्वेतकेतु और उद्दालक, उपनिषद की कहानी, छान्द्योग्यापनिषद, GVB THE UNIVERSITY OF VEDA

यजुर्वेद मंत्रा हिन्दी व्याख्या सहित, प्रथम अध्याय 1-10, GVB THE UIVERSITY OF VEDA

उषस्ति की कठिनाई, उपनिषद की कहानी, आपदकालेमर्यादानास्ति, _4 -GVB the uiversity of veda

वैराग्यशतकम्, योगी भर्तृहरिकृत, संस्कृत काव्य, हिन्दी व्याख्या, भाग-1, gvb the university of Veda

G.V.B. THE UNIVERSITY OF VEDA ON YOU TUBE

इसे भी पढ़े- इन्द्र औ वृत्त युद्ध- भिष्म का युधिष्ठिर को उपदेश

इसे भी पढ़े - भाग- ब्रह्मचर्य वैभव

Read Also Next Article- A Harmony of Faiths and Religions

इसे भी पढ़े- भाग -2, ब्रह्मचर्य की प्राचीनता

जीवन बदलने की अद्भुत कहानियां

भारत का प्राचीन स्वरुप

वैदिक इतिहास संक्षीप्त रामायण की कहानीः-

वैदिक ऋषियों का सामान्य परिचय-1

वैदिक इतिहास महाभारत की सुक्ष्म कथाः-

वैदिक ऋषियों का सामान्य परिचय-2 –वैदिक ऋषि अंगिरस

वैदिक विद्वान वैज्ञानिक विश्वामित्र के द्वारा अन्तरिक्ष में स्वर्ग की स्थापना

राजकुमार और उसके पुत्र के बलिदान की कहानीः-

कहानी ब्रह्मचर्य महिमा

पंचतन्त्र की कहानी पिग्लक

पुरुषार्थ और विद्या- ब्रह्मज्ञान

संस्कृत के अद्भुत सार गर्भित विद्या श्लोक हिन्दी अर्थ सहित

पंचतन्त्र कि कहानी मित्र लाभ

श्रेष्ट मनुष्य समझ बूझकर चलता है"

पंचतंत्र- कहानि क्षुद्रवुद्धि गिदण की

दयालु हृदय रुरु कथा

कनफ्यूशियस के शिष्‍य चीनी विद्वान के शब्‍द। लियोटालस्टा

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ