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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (दयानन्दसरस्वतीविरचिता)/३२. स्वरव्यवस्थाविषयः

 


अथ संक्षेपतः स्वरव्यवस्थाविषयः

अथ वेदार्थोपयोगितया संक्षेपतः स्वराणां व्यवस्था लिख्यते। ते स्वरा द्विधा , उदात्तषड्जादि भेदात् सप्त सप्तैव सन्ति। तत्रोदात्तादीनां लक्षणानि व्याकरणमहाभाष्यकारपतञ्जलिप्रदर्शितानि लिख्यन्ते -


" स्वयं राजन्त इति स्वराः। आयामो दारुण्यमणुता खस्येत्युच्चैःकराणि शब्दस्य। आयामो गात्राणां निग्रहः , दारुण्यं स्वरस्य दारुणता रूक्षता , अणुता कण्ठस्य , कण्ठस्य संवृतता , उच्चैःकराणि (टिप्पणी- उदात्तविधायकानीति यावत्।) शब्दस्य। अन्ववसर्गो मार्दवमुरुता खस्येति नीचैःकराणि (टिप्पणी- अनुदात्तविधायकानीति यावत्।) शब्दस्य। अन्ववसर्गो गात्राणां शिथिलता , मार्दवं स्वरस्य मृदुता स्निग्धता , उरुता खस्य महत्ता कण्ठस्येति नीचैःकराणि शब्दस्य। त्रैस्वर्य्येणाधीमहे , त्रिप्रकारैरज्भिरधीमहे , कैश्चिदुदात्तगुणैः , कैश्चिदनुदात्त- गुणैः , कैश्चिदुभयगुणैः। तद्यथा - शुक्लगुणः शुक्लः , कृष्णगुणः कृष्णः। य इदानीमुभयगुणः स तृतीयामाख्यां लभते - कल्माष इति वा , सारग् इति वा। एवमिहापि उदात्त उदात्तगुणः , अनुदात्तोऽनुदात्तगुणः , य इदानीमुभयगुणः स तृतीयामाख्यां लभते स्वरित इति। त एते तन्त्रेतरनिर्देशे (टिप्पणी- अतिशयार्थद्योतके तरप्प्रत्ययस्य निर्देशे।) सप्त स्वरा भवन्ति। उदात्तः , उदात्ततरः , अनुदात्तः , अनुदात्ततरः , स्वरितः , स्वरिते यः उदात्तः सोऽन्येन विशिष्टः , एकश्रुतिः सप्तमः॥ "


' उच्चैरुदात्त ' इत्याद्युपरि॥


- अ॰ 1। पा॰ 2॥


तथा षड्जादयः सप्त - षड्जऋषभगान्धारमध्यम-पञ्चमधैवतनिषादाः॥


- पिङ्गलसूत्रे अ॰ 3। सू॰ 64॥


एषां लक्षणव्यवस्था गान्धर्ववेदप्रसिद्धा ग्राह्या अत्र तु ग्रन्थभूयस्त्वभिया लेखितुमशक्या।


भाषार्थ - अब वेदार्थ के उपयोगहेतु से कुछ स्वरों की व्यवस्था कहते हैं-जो कि उदात्त और षड्ज आदि भेद से चौदह 14 प्रकार के हैं। अर्थात् सात उदात्तादि और सात षड्जादि। उन में से उदात्तादिकों के लक्षण जो कि महाभाष्यकार पतञ्जलि महामुनि जी ने दिखलाये हैं, उनको कहते हैं- (स्वयं राजन्त॰) आप ही अर्थात् जो विना सहाय दूसरे के प्रकाशमान हैं, वे स्वर कहाते हैं। (आयामः) अङ्गों का रोकना, (दारुण्यं) वाणी को रूखा करना, अर्थात् ऊंचे स्वर से बोलना, और (अणुता) कण्ठ को भी कुछ रोक देना, ये सब यत्न शब्द के उदात्त विधान करने वाले होते हैं। अर्थात् उदात्त स्वर इन्हीं नियमों के अनुकूल बोला जाता है। तथा (अन्वव॰) गात्रों का ढीलापन, (मार्दव॰) स्वर की कोमलता, (उरुता) कण्ठ को फैला देना, ये सब यत्न शब्द के अनुदात्त करनेवाले हैं। (त्रैस्वर्य्येणा॰) हम सब लोग तीन प्रकार के स्वरों से बोलते हैं। अर्थात् कहीं उदात्त, कहीं अनुदात्त और कहीं उदात्तानुदात्त, अर्थात् स्वरित गुणवाले स्वरों से यथायोग्य नियमानुसार अक्षरों का उच्चारण करते हैं। जैसे श्वेत और काला रंग अलग अलग हैं, परन्तु इन दोनों को मिलाकर जो रंग उत्पन्न हो उसका नाम तीसरा होता है, अर्थात् खाखी वा आसमानी, इसी प्रकार यहां भी उदात्त और अनुदात्त गुण अलग अलग हैं, परन्तु इन दोनों के मिलाने से जो उत्पन्न हो उसको स्वरित कहते हैं। विशेष अर्थ के दिखानेवाले 'तरप्' प्रत्यय के संयोग से वे उदात्त आदि सात स्वर होते हैं। अर्थात् उदात्त, उदात्ततर, अनुदात्त, अनुदात्ततर, स्वरित, स्वरितोदात्त और एकश्रुति॥


उक्त रीति से इन सातों स्वरों को ठीक ठीक समझ लेना चाहिए।


अब षड्जादि स्वरों को लिखते हैं, जो कि गानविद्या के भेद हैं-(स्वराः षड्जऋषभ॰) अर्थात् षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। इन के लक्षण व्यवस्थासहित जो कि गान्धर्व वेद अर्थात् गानविद्या के ग्रन्थों में प्रसिद्ध हैं, उन को देख लेना चाहिए। यहां ग्रन्थ न बढ़ जाने के कारण नहीं लिखते।


॥इति स्वरव्यवस्थाविषयः संक्षेपतः॥32॥

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