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बुधवार, 8 जनवरी 2025

सत्य को स्वीकार करो :--

 * ओ३म् *


प्रश्न :- गुरुजी हमने सुना था कि गंगशील ( भीष्म) की माता वह गंगा नदी थी जो आज भी पर्वतों से निकलकर मृत्यु लोक ( पृथ्वी) पर बह रही है और इसी गंगा नदी का महाराजा शान्तनु के साथ विवाह संस्कार हुआ । 

उत्तर :-

 सत्य को स्वीकार करो :--

=============== परमात्मा की कृपा से , पर्वतों से गंगा झरने के रूप में निकल कर अन्य नदी- नालों आदि से मिलकर वैश्यों तथा कृषकों की खेती को जीवन दान करती हुई , कीट पतंगों ,पशु पक्षियों एवं मानव आदि को अपने अमृत रूपी जल से संतुष्ट करती हुई , जीवन दान देती हुई बहती है । आस्तिक इस अनुपम रचना के द्वारा परमात्मा के चिंतन की ओर लग जाता है , परमात्मा में रमने लगता है।

        मानव का एक सिद्धांत होना चाहिए कि सत्य को सत्य मानने में या उसके उच्चारण करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । यह गंगा तो जल की बह रही है , यह तो सर्वथा जड़ है , चेतना शून्य है,  ज्ञान शून्य है । जल कहीं कन्या रूप में आता है क्या ? क्या यह हो सकता है ?  बेटा ! यह तो हो सकता है कि कोई कन्या गंगा नदी में किसी स्थान पर गिरकर बह गई हो , उसको किसी ने निकाल कर गंगा नाम रख दिया हो । बेटा ! परंतु जल वाली गंगा नदी देवकन्या बन गई हो,  हम तुम्हारे ऐसे वाक्यों को कभी भी मानने को तैयार नहीं । क्योंकि यह परमात्मा की बनाई हुई प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। यह भी हो सकता है की गंगा नामक देव कन्या कभी गंगा में गिर गई हो , उसकी राजा शांतनु ने रक्षा कर दी हो ।परंतु तुम्हारी कल्पना को हम कभी नहीं मानेंगे । क्योंकि यह प्राकृतिक नियम के विरुद्ध है ।

      बेटा ! तुमने जो यह कहा कि यह ब्रह्मा की पुत्री है। यह वाक्य तो सत्य है । एक ब्रह्मा ईश्वर का नाम है एक ब्रह्मा ऋषि हैं एक ब्रह्म पद हैं!क्योंकि जो जहां से उत्पन्न होती है वह उसी की पुत्री होती है।  परंतु आज के मानव ने इस वार्ता को अच्छी प्रकार से विचारा नहीं और न अच्छी प्रकार से समझा ही है  । मानव अपने अज्ञान के कारण कुछ का कुछ मान बैठा है।।

        ( ब्र० कृष्ण दत्त जी महाराज पूर्व श्रंगी ऋषि )

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