🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷
दिनांक - -०६ नवम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - बुधवार
🌓 तिथि -- पञ्चमी ( २४:४१ तक तत्पश्चात षष्ठी )
🪐 नक्षत्र - - मूल ( ११:०० तक तत्पश्चात पूर्वाषाढ )
पक्ष - - शुक्ल
मास - - कार्तिक
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ६:३७ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:३२ पर
🌓चन्द्रोदय -- ११:०० पर
🌓 चन्द्रास्त - - १९:०७ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥आर्यों का चक्रवर्ती राज्य!
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परमात्मा ने जब सृष्टि की रचना की और नर - नारियों की युवावस्था में उत्पत्ति हुई तब से लेकर महाभारत काल तक आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य रहा ।महाभारत की लडाई व आपसी फूट से सब छिन भिन हुआ ।नौ सौ वर्षों तक मुगलों का शासन और दौ सौ वर्षों तक अंग्रजों के शासन से जो बची संस्कृति, शिक्षा रही उस का भी रूप बदल गया और धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंग गया ।
आर्यों का ग़लत इतिहास बताया जाने लगा जिसका श्रेय लार्ड मैकाले को जाता है । जिसने १८५७ से लेकर १८८८ ई० तक लंदन में विचार विमर्श के पश्चात यह भ्रम फैलाया कि आर्य यहाँ के मूल निवासी नही बल्कि ईरान से आये हैं,जो आज तक प्रचलित है ।वस्तुतः किसी भी देश का पतन करना हो तो उसकी न्याय, शिक्षा संस्कृति को नष्ट कर दो वह देश हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा ।यही कार्य अंग्रजों ने किया जिससे आज तक पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला है ।
जब रघुगण राजा थे तब रावण भी यहाँ के अधीन था। श्री राम के समय में विरूद्ध हो गया तो उसको श्री राम ने मृत्यु दण्ड देकर उसके राज्य को उसके भाई विभिषण को दिया । स्वायंभुव राजा से लेकर पांडव पर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य था जो बाद में आपसी फूट से लड़कर छिन्न-भिन्न हुआ ।आदि सृष्टि से लेकर पांच हजार वर्ष से पूर्व समय आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य इस भूमंडल पर था,सृष्टि के आदि में मनुस्मृति इसका प्रमाण है ।पांच हजार वर्षों के पूर्व वेदमत से भिन्न दुसरा कोई मत नही था ।महाभारत युद्ध के पश्चात् विद्धान, राजा,ऋषि आदि मारे गए और नाना पन्थों का प्रचलन शुरू हुआ जो आज चरम सीमा पर है ।
महाभारत युद्ध के पूर्व श्रीकृष्ण तथा अर्जुन अग्नियान नौका पर बैठकर पाताल ( अमेरिका) गये वहाँ से उद्दालक ऋषि को राजा युधिष्ठिर के यज्ञ में उपस्थिति हेतु लाये थे ।धृतराष्ट्र का विवाह गांधार जिसको आज कंधार कहते हैं वहाँ की राजकुमारी गांधारी से हुआ था ।पाण्डु की धर्मपत्नी माद्री ईरान के राजा की पुत्री थी ।अर्जुन का विवाह पाताल ( अमेरिका) वहाँ के राजा की पुत्री उलोपी से हुआ था ।चीन का राजा भगदत्त, अमेरिका का बभ्रुवाहन, योरोप देश का विडालाक्ष, यवन जिसको यूनान कहते हैं । ईरान का शाल्य आदि सब राजा राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्ध में आये थे।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र🕉️🚩
🌷 ओ३म् एतावानस्य महिमातो ज्वायाँश्च पूरूष:। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।। ( यजुर्वेद ३१|३ )
💐 अर्थ:- यह सब सूर्य चन्द्र आदि लोक लोकान्तररूप चराचर जितना भी जगत् है, वह चित्र विचित्र रचना के अनुमान से ईश्वर के महत्व को सिद्ध करके -- उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय से तीन काल में ह्रास और वृद्धि आदि से भी परमात्मा के चतुर्थ अंश में स्थित है, इसके चतुर्थ अंश की अवधि को भी प्राप्त नही होता ।इस सामर्थ्य के तीन अंश अपने अविनाशी मोक्षस्वरूप में सदा वर्तमान रहते हैं ।इस कथन से ईश्वर की अनन्तता का नाश नहीं होता, किन्तु जगत् की अपेक्षा उसका महत्व और जगत् की न्यूनता बतायी गयी है ।
परमात्मा इस जगत् में परिपूर्ण है और इस जगत् से महान् है।सब पृथ्वी आदि भूत ईश्वर के एक पाद है अर्थात एक अंश में स्थित है ।अर्थात यह जगत् परमात्मा के चतुर्थ अंश की अवधि को भी प्राप्त नही है ।जगत् की रचना करने वाले परमेश्वर के तीन पाद अर्थात तीन अंश अपने मोक्ष स्वरूप में ही सदा वर्तमान रहता है ।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, कार्तिक - मासे, शुक्ल पक्षे , पञ्चम्यां
तिथौ, मूल
नक्षत्रे, बुधवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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