जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

 

जानें काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास


काशी


    काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजार वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है। यहीं पर सन्त एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पूरा किया और काशीनरेश तथा विद्वतजनों द्वारा उस ग्रन्थ की हाथी पर धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गयी। महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दृढ़ संकल्प से काशी कारीडोर के अन्तर्गत काशी विश्वनाथ जी के मंदिर का विस्तार किया गया जो अद्भुत अकल्पनीय साथ ही आश्चर्य जनित भी है प्रत्येक काशी वासियों ने ऐसी परिकल्पना भी नहीं की होगी |माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने 8 मार्च 2019 को काशी विश्वनाथ कारीडोर का शिलान्यास किया गया लगभग 32 महिनों के अनवरत निर्माण कार्य के बाद 13 दिसम्बर 2021 मोदी जी द्वारा लोकार्पण किया गया | ललिता घाट के रास्ते प्रथम भारत माता के दर्शन होते हैं फिर अहिल्या बाई की मूर्ति है आगे चलकर ज्ञानवापी में नंदी जी के दर्शन एवं स्पर्श करने की सुविधा है जो आज के पूर्व संभव नहीं था वही दूसरी ओर काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा विभिन्न प्रकार की सुविधाएं प्राप्त करने हेतु सुगम दर्शन से लेकर रुद्राभिषेक विभिन्न आरती इत्यादि के लिए शुल्कों का प्रावधान कर जिस तरह से जन साधारण विशेष कर नित्य पूजार्चन करने वालों के लिए यह कष्टप्रद है किसी भी ज्योतिर्पिठ का व्यवसायी करण उचित नहीं है|बाबा विश्वनाथ जी के गर्भ गृह में प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से 60 कि. ग्रा.भार के सोने से गर्भ गृह में पत्तर चढ़ाने का कार्य किया गया है


    काशी विश्वनाथ मंदिर काशी जिसे अब वाराणसी कहा जाता है में स्थित सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है.

Kashi Vishwanath Temple is one of the most sacred Hindu temples located in Kashi which is now called Varanasi.

    काशी बनारस शहर का पुराना नाम है, जिसे अब वाराणसी कहा जाता है.

काशी में गंगा, वरुणा और असी यानी अस्सी नाम की पवित्र नदियां बहती हैं। यहां पर वरुणा और अस्सी नदी के बहने के कारण ही इस नगर को वाराणसी भी कहा जाता है।

  यह भारत का सर्वाधिक प्राचीनतम शहर है।

मान्यताओं के अनुसार यह शहर भगवन शिव के त्रिशूल पर बना है। तथा यह शहर शैव परम्परा का महत्वपूर्ण स्थल है।

बौद्ध काल में काशी कोसल जनपद में आता था।

काशी नगरी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है।

    वाराणसी मंदिरों के लिए जाना जाता है और वहां का सबसे प्रसिद्ध मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर है. यह शहर के विश्वनाथ गली में स्थित है

   काशी विश्वनाथ मंदिर


यह भगवान शिव को समर्पित है. यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो इसे शिव के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक बनाता है.

मंदिर के प्रमुख देवता श्री विश्वनाथ हैं जिसका अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान 

ज्योतिर्लिंग


हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ शिव पुराण में ज्योतिलिंगों का उल्लेख है. ये भगवान शिव की संरचनात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं और इनकी काफी मान्यता है.


पूरे विश्व में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं.


गुजरात में सोमनाथ,

आंध्रप्रदेश के श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन,

मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर,

मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर,

उत्तराखंड में केदारनाथ,

महाराष्ट्र में भीमाशंकर,

उत्तर प्रदेश में वाराणसी में विश्वनाथ,

महाराष्ट्र में त्र्यंबकेश्वर,

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, देवघर झारखंड,

गुजरात में द्वारका में नागेश्वर,

तमिलनाडु रामेश्वरम में रामेश्वर और

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ग्रिशनेश्वर.

विश्वनाथ मंदिर का इतिहास


इस मंदिर का उल्लेख महाभारत और उपनिषदों में भी मिलता है।

धार्मिक मान्यता कि यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का यह आदि स्थान है।


   काशी विश्वनाथ का जीर्णोद्धार 11 वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने करवाया था।

वर्ष 1194 में इस्लामिक आक्रांता मुहम्मद गौरी ने ही इसे तोड़ दिया।

सुल्तान महमूद शाह ने इसे फिर तुड़वा दिया।

     इतिहासकारों के मुताबिक दुबारा काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार राजा टोडरमल ने कराया था। उन्होंने साल 1585 में नारायण भट्ट की मदद से इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

     इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।

     18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है।

     औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई।

2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।

औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई।

2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।

सन 1752 से लेकर 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होल्कर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किये।

7 अगस्त 1770 में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया।

   1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।

इस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 1853 में 1000 कि. ग्रा शुद्ध सोने का छत्र बनवाया।

   ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।

काशी विश्वनाथ का यह मंदिर 15.5 मीटर ऊंचा है।

वर्तमान में इसका प्रबंधन 1983 से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जा रहा है.

यह मंदिर नागर शैली का उदाहरण है।


मंदिर निर्माण शैली – नागर शैली


नागर शैली – नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पहाड़ों के बीच की धरती में पाया जाता है.

सर्वप्रथम इस प्रकार के मंदिरों का निर्माण नगरों में होने के कारण इसका नाम नागर शैली पड़ा।

   वास्तु शास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों की पहचान चतुष्कोण आधार, गर्भ गृह, गर्भ गृह के समक्ष अंतराल के बाद मंडप तथा अर्ध मंडप से होती है

    द्रविड़ शैली – द्रविड़ शैली कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच की भूमि में अपनाई गई.

वेसर शैली – वेसर शैली विन्ध्य पहाड़ों और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश से सम्बन्ध रखती है.



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