सच्चा साधु कौन है ?
तीर्थंकर
भगवान् महावीर सत्संग के लिए आने वालों से कहा करते थे, सांसारिक ( गृहस्थी) मनुष्य को अपनी पत्नी और
बच्चों के मोह में पड़कर गलत तरीके से धन अर्जित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए ।
मोह में अंधा होकर आदमी बुरे - से - बुरे पाप करने से भी नहीं हिचकता, पर जब उसका परिणाम भोगने का समय आता है, तब वह अकेला ही दुःख भोगता है । अतः मोह, ममता और लोभ का त्याग कर किसी भी क्षण
दुष्कर्म न होने पाए इसका प्रयास करना चाहिए ।
साधकों को संबोधित करते हुए भगवान् महावीर ने कहा, साधक को सदाचार का पूर्ण पालन करना चाहिए । जो
निष्कपट तथा सरल होता है, उसी की आत्मा शुद्ध होती है और जिसकी आत्मा शुद्ध होती है, उसी के पास धर्म ठहर सकता है । सदाचारी, सात्त्विक और निष्कपट व्यक्ति ही साधना की
अंतिम स्थिति पूर्णनिर्वाण को प्राप्त होता है ।
एक व्यक्ति ने तीर्थंकर से पूछा, दुःख क्यों सताते हैं ?
भगवान् ने उत्तर दिया, प्राणी अपने - अपने दुष्ट कर्मों के कारण ही दुःखी होता है । अच्छा या बुरा
जैसा भी कर्म हो, उसका फल
भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता । भिक्षु के लक्षण पूछे जाने पर उन्होंने कहा, जो कटु वचन नहीं कहता, क्रोध नहीं करता, जिसकी इंद्रियाँ अचंचल हैं, जो संयम का पालन करता है और संकट आने पर
व्याकुल नहीं होता — वही भिक्षु
है । भिक्षु वेश से नहीं, सद्गुणों से होता है । जो सब प्रकार का त्याग करता है, वही सच्चा संन्यासी कहलाता है ।
