मैं बेसहारा नहीं
हूँ
राजा चंद्रचूड़ एक धर्मपरायण तथा न्यायप्रिय शासक थे। वे अकसर रात में वेश बदलकर
जनता का हाल जानने के लिए महल से निकला करते थे और यदि किसी निराश्रित को देखते, तो उसकी सहायता करने को तत्पर हो उठते । राजा
ने घोषणा कर रखी थी कि उनके राज्य में किसी भी महिला का उत्पीड़न सहन नहीं किया
जाएगा ।
एक दिन राजा चंद्रचूड़ को पता लगा कि एक व्यक्ति कुसंगति के कारण दुर्व्यसनी
बन गया है । उसने अपनी विवाहिता पत्नी का त्याग कर किसी दूसरी महिला से विवाह कर
लिया है । राजा चंद्रचूड़ ने उसे पकड़कर लाने का आदेश दिया । इस बात की सूचना
मिलते ही वह व्यक्ति दूसरी पत्नी के साथ राज्य छोड़कर भाग गया ।
एक दिन राजा उस पीडित और असहाय महिला का पता लगाकर मंत्री के साथ उसके घर
पहुँचे। महिला की स्थिति देखकर वे यह सोचकर द्रवित हो उठे कि पति द्वारा ठुकराई गई
यह स्त्री न जाने कैसे गुजारा करती होगी । राजा ने उससे अत्यंत विनम्रता से प्रश्न
किया, क्या तुम बिलकुल
बेसहारा हो ?
महिला ने राजा के शब्द सुने, तो बोली, नहीं महाराज, ऐसा बिलकुल
नहीं है । मेरे तो तीन- तीन सहारे हैं । राजा ने पूछा, तुम्हारे वे तीन सहारे क्या हैं?
महिला ने कहा , महाराज, मेरे हाथ, मेरा धर्म और मेरे भगवान् मेरा सहारा हैं ।
फिर भला मैं खुद को बेसहारा क्यों मानें?
राजा उस स्वाभिमानी महिला के चरणों में झुक गए और उन्होंने उसे अपनी वाटिका
को हरा -भरा रखने का दायित्व सौंप दिया ।
