राजनीतिज्ञ हनुमान
अपने बड़े भाई बालि के अत्याचारों से सुग्रीव पीडित थे । बाली ने मद में चूर
होकर सुग्रीव की पत्नी को उससे छीन लिया था । सुग्रीव को बालि के भय से राज्य
छोड़कर वन में छिपने को मजबूर होना पड़ा । इसी समय भगवान् श्रीराम सीताजी की खोज
करते हुए सुग्रीव के राज्य में पहुँचे। श्रीराम की शक्ति और उनकी न्यायप्रियता से
सुग्रीव सुपरिचित थे। उन्होंने अपने सचिव हनुमान को श्रीराम के पास भेजकर बालि के
उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाने का निर्णय किया ।
हनुमान भगवान् श्रीराम के पास पहुँचे। अपना परिचय देने के बाद उन्होंने
श्रीराम के समक्ष सुग्रीव की समस्या प्रस्तुत की । साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि
सुग्रीव सीता माता का पता लगाने में पूर्ण सहयोग देंगे । श्रीराम हनुमान की
तर्कपूर्ण बातें सुनकर हतप्रभ हो उठे । उन्हें लगा, जैसे कोई अत्यंत नीतिज्ञ विद्वान् उनसे बात कर रहा है । श्रीराम
ने अपने अनुज से कहा, लक्ष्मण, अपने राजा
का पक्ष प्रस्तुत करते समय इन्होंने नीति और राजनीति की अनूठी निपुणता का परिचय
दिया है । निश्चय ही हनुमान असाधारण ज्ञान और भक्ति - भाव से संपन्न महापुरुष हैं
।
भगवान् श्रीराम के शब्द सुनकर हनुमान बोले, प्रभु, मेरे अंदर कोई योग्यता नहीं है । यह तो आपकी असीम अनुकंपा है कि मुझ जैसे
अकिंचन को इतना महत्त्व दे रहे हैं । कहते - कहते हनुमान उनके चरणों में लोट गए ।

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