धर्म ही सच्चा साथी है

 

धर्म ही सच्चा साथी है

आचार्य बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। वे देवताओं को उपदेश देते हुए कहा करते थे, दुर्जनों की संगति तथा अहंकार से अनेक जन्मों के संचित पुण्य भी क्षीण हो जाते हैं । दुर्व्यसनी का साथ कभी नहीं करना चाहिए । साधुजनों और सत्य पर अटल रहने वालों का सत्संग कर ही लोक - परलोक सुधारा जा सकता है ।

एक बार युधिष्ठिर बृहस्पतिजी के सत्संग के लिए पहुंचे। उन्होंने आचार्य से प्रश्न किया, देवगुरु, मनुष्य का सच्चा सहायक कौन है ? आचार्य बृहस्पति ने बताया, राजन्, प्राणी अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही दुःख से पार होता है और अकेला ही दुर्गति भोगता है । कुटुंबजन तो उसके मृत होते ही दो घड़ी रोते हैं, श्मशान में उसे अग्नि के हवाले कर वहाँ से मुँह फेरकर चल देते हैं । एकमात्र धर्म- सत्कर्म ही उस जीवात्मा का अनुसरण करता है । धर्म ही हमेशा सच्चा सहायक बना रहता है । अतः किसी भी कुटुंबजन के मोह में फँसकर कोई भी धर्मविरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए ।

धर्मनीति के तत्त्व रहस्य को बताते हुए आचार्य बृहस्पति ने कहा, जो बात खुद को अच्छी न लगे, वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिए । जिस प्रकार हमें कटु वचन और निंदा से दुःख होता है, उसी प्रकार किसी की न तो निंदा करें, न कटु वचन बोलें और न ही किसी का अहित करें । यही धर्म तत्त्व है । सदा सबका हित करनेवाला और सबसे प्रेम करने में प्रवृत्त रहनेवाला सभी का प्रिय बना रहता है ।

युधिष्ठिर को अपनी जिज्ञासाओं का समाधान मिल गया ।


एक टिप्पणी भेजें

If you have any Misunderstanding Please let me know

और नया पुराने