मैं केवल भक्ति पद
रचता हूँ
आध्र प्रदेश के ताल्लपा गाँव में वर्ष 1424 में पैदा हुए अन्नमाचार्य भगवान् तिरुपति के अनन्य भक्त थे। वे
भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीराम, महादेव शिव, भगवती दुर्गा आदि सभी के प्रति भक्ति भाव रखते थे। वे मानते थे
कि सभी अवतार एक ही प्रभु के विभिन्न रूप हैं । उनका कंठ अत्यंत सुरीला था । पहले
वे अन्य साधु- संतों के रचे पद गाकर भक्ति का प्रचार किया करते थे, बाद में सरस्वती की उन पर ऐसी कृपा हुई कि रोज
एक भक्ति गीत रचकर उसे तिरुपतिजी को सुनाने लगे ।
कवि भक्त अन्नमाचार्य अपने प्रवचन में सदाचार पर बहुत जोर दिया करते थे। वे
कहा करते थे, मानव शरीर
बड़े भाग्य से प्राप्त होता है । उसे सत्कर्मों और भक्ति में लगाना चाहिए । किसी
की न निंदा करनी चाहिए और न बेवजह प्रशंसा । भगवान् की आराधना में वाणी का उपयोग
करना चाहिए । विजयनगर साम्राज्य के राजा सालुव नरसिंह राय ने एक बार उनका भक्ति
गीत सुना, तो
मंत्रमुग्ध हो उठे । वे उनके मित्र बन गए । मंत्री ने भक्त अन्नमाचार्य से एक बार
अनुरोध किया कि वे यदि राजा की प्रशंसा में कुछ पद रच दें, तो राजा उन्हें कई गाँव इनाम में देंगे ।
भक्त - कवि ने निर्भीकतापूर्वक उत्तर दिया, मैं केवल भगवान् की प्रशंसा के पद रचता हूँ और उन्हीं की भक्ति
के लिए गाता हूँ । अन्नमाचार्य ने अपने जीवन में 32 हजार पदों की रचना की । तिरुपति के वेंकटेश मंदिर के संकीर्तन
भंडार में ताम्रपात्र पर लिखित उनके असंख्य पद सुरक्षित हैं ।

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