स्वर्ग का राज्य

 

स्वर्ग का राज्य

इसा मसीह कहा करते थे कि स्वर्ग का राज्य पाने के लिए प्रेम में पूरी तरह डूब जाना बहुत जरूरी है । एक बार एक श्रद्धालु उनके पास पहुँचा । उसने पूछा, आप स्वर्ग के राज्य की बात कहते हैं । इस कठिन मंजिल तक कैसे पहुँचा जा सकता है ? ईसा ने कहा, हर कोई स्वर्ग का राज्य प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह हर प्राणी के भीतर विद्यमान है । जब आदमी यह समझ लेगा कि स्वर्ग उसके हृदय में मौजूद है, तो वह राग - द्वेष और घृणा को अपने पास फटकने नहीं देगा । प्राणी मात्र से प्रेम करनेवाला, अहंकार त्यागकर अपने को अन्यों से तुच्छ समझने वाला, दूसरों की सहायता को तत्पर रहनेवाला स्वर्ग के राज्य में ही तो रहता है ।

    किसी ने ईसा से पूछा, अनेक श्रद्धालु आपके उपदेशों का पालन करते हैं । फिर भी वे दुःखी क्यों दिखाई देते हैं ? ईसा ने कहा , खेत में बीज बोए जाते हैं । सबके सब एक से ही नहीं उगते । कुछ बीज पथरीली जमीन पर गिरते हैं, उनके अंकुर जल्दी सूख जाते हैं । जो अच्छी जमीन पर गिरते हैं, वे फलते-फूलते हैं । उनके आस-पास इतनी मिट्टी होती है कि वे उसमें अपनी जड़ों को जमा लें । इसी प्रकार मेरा उपदेश सुनने वाले कई बार लोभ- लालच और कुसंग में आकर गलत काम कर बैठते हैं । वे भटककर स्वर्ग का रास्ता भूल जाते हैं । उन्होंने आगे कहा, पग - पग पर संभलकर चलने की जरूरत है । अहिंसा व प्रेम के मार्ग में बहुत भटकाव आते हैं । जो लोग उनकी उपेक्षा कर सीधे चलते रहते हैं, वे एक दिन मंजिल अवश्य प्राप्त कर लेते हैं। 

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