दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
काला का भी विनाश कर देनेवाली देवी काली कहलाती है । काली की अनेक रूपों में आराधना की जाती है । काली तंत्र में दक्षिण काली (काली के ही अन्य रूप) का वर्णन करते हुए इसे करालवदना, मुक्तकेशी, दिगम्बरा, मुंडमाला विभूषिता, चतुर्हस्ता कहा गया है । काली के चार हाथों मे क्रमशः निचले बाएं हाथ में तत्काल भेदित शीश, ऊपरी बाएं हाथ में खड्ग, निचले दाएं हाथ में अभय, खप्पर व ऊपरी दाएं हाथ में आयुध विशेष सुशोभित रहता है ।
वाल्मीकि रचित गुप्त रामायण (अदभुत रामायण) में वर्णन मिलता है कि जब श्रीराम ह्जार मुख वाले रावण से युद्ध करते हुए मूर्च्छित हो गए, तब सीता ने उन्हें दिवंगत समझकर इतना अधिक कोप किया कि उनका मुखमंडल काला हो गया । इसी स्वरूप में उन्होंने हजार मुखी रावण का वध कर डाला । सीता का यह स्वरूप भी काली का स्वरूप ही कहलाता है ।
काली का वर्ण महामेघवत् है । यह शवरूप महादेव पर स्थित अर्द्धचंद्रतुल्य भालवती, त्रिनयना है । काली को ओज, पराक्रम, विजय, वैभव की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है । काली का संबंध प्रलयकालीन रात्रि के मध्यकाल से है । इस काल में काली भीषण रूप वाली होती है । लेकिन तांत्रिकों के लिए यही रूप अभयकारी होता है । सृष्टि के विनाश के पश्चात काली दिगंबरा रहती है तथा जब सारा विश्व श्मशान बन जाता है तब इस महाशक्ति का उत्थान होता है ।
ब्रह्मस्वरूपा काली ही आद्याशक्ति है । प्रारंभ में दक्षिण भैरव ने ही काली की पूजा की थी । अतः इसे दक्षिण काली अथवा दक्षिणा काली भी कहा जाता है । रावण पुत्र मेघनाद ने भी लक्ष्मण से युद्ध करने से पूर्व गुप्त काली की साधना की थी ।
मार्कंडेय पुराण में काली को नित्य कहा गया है । यही काली समय-समय पर अनेक रूपों में अवतरित होती है तथा देवताओं, दैत्यों, मनुष्यों का कल्याण करती है ।
काली और काल में घनिष्ठता है । सृष्टिगत जितने भी पदार्थ हैं, उनका क्षय काल ही करता है । काली भी सृष्टि का संहार करनेवाली महाशक्ति है । सांख्यशास्त्र के अनुसार काल की उत्पत्ति आकाश तत्त्व से हूई है । नैयायिक मतानुसार काल सदैव विद्यमान रहता है तथा जागतिक पदार्थों की उत्पत्ति भी काल के द्वारा ही होती है । इसीलिए कहा गया है:
कालः पचति भूतानि, कालः संहरति प्रजा: । भर्तृहरि रचित ग्रंथ वाक्य प्रदीप में काल के संदर्भ में कहा गया हैः
अव्याहताः कला यस्य काल शक्तिमुपाश्रिताः जन्मादयो विकाराः षड्भाव भेदस्य योनयः ॥
यहां काल का तात्पर्य सदाशिव, रुद्र, भैरव से है । यह आश्चर्य ही कि यह काल भी काली के चरणों में लेटा रहता है । इसी से काली की महत्ताव स्पष्ट है ।
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