🙏सत्य का निर्णय कैसे होगा?🙏
यहां इस भौतिक जगत में कुछ भी निशुल्क नहीं मिलता है। हर वस्तु के पीछे
हमारा स्वार्थ अवश्य होता है। वह स्वार्थ भौतिक, दैविक अथवा
आध्यात्मिक हो सकता है यह निश्चित है, कि स्वार्थ मूल है,
जैसा कि स्वामी तुलसी दास जी कहते है कि
स्वार्थ लाई करई सब प्रिती सुर नर मुनि की यही है ऋति। अर्थात स्वार्थ के
वसी भूत होकर ही यहां प्रत्येक मानव सुर अर्थात देवता मुनि भी इसी के वश में होकर
ही प्रत्येक कार्य का संपादन करते है.
हम सब के सभी कार्य में स्वार्थ मिला है वह कुछ भी हो सकता है। मानव और परमात्मा
में यही मूल अन्तर है परमात्मा का स्वभाव है, सारा ज्ञान, विज्ञान, योग, भोग की सामग्री
और सम्पूर्ण ऐश्वर्य निशुल्क देता है, बिना किसी स्वार्थ के वशीभूत हुए निस्वार्थ
और निष्पक्ष भाव वह हम सब के साथ न्याय और अपनी दया को प्रकट कर रहा है। उसे भी हम
सब नहीं देख सकते है उसमें भी कारण है। हमारा अज्ञान और अहंकार रोड़ा अटका कर खड़ा
हो जाता है। फिर भी वह शाश्वत बिना किसी भेद भाव के है, या यूं
कहे सब मुफ्त में ही दे रहा है उस पर सभी का किसी ना किसी तरह से श्रद्धा विश्वास अडिग
है, और इसमें जो मानव मन का अहम है। वही मूल कारण है उसका
अज्ञान ही है जो दूसरों को दुःखी और तरह-तरह से परेशान करके स्वयं को उससे ज्यादा आनंदित
करने की तीव्र आकांक्षा दूसरों को कुचलने की प्रेरणा देता है और मानव मन उसी अहम
के कारण ही स्वयं दुःखी रहता है और दूसरों को भी दुःखी रखता है। यह सब क्यों हो
रहा है इसके पीछे अपना ही अज्ञान है या यूं कहे कि उसके अन्दर का जो परमात्मा है
वह उसके द्वारा दबा दिया गया है, या उसने अपनी आत्मा जिसके पीछे
से परमात्मा की आवाज आ रही है उसे उसने सुनना बन्द कर दिया है। जैसा की मंदिर के
पुजारी करते है सिर्फ मन्दिरों के पुजारी ही ऐसा नहीं कर रहे है उसी तरह से हम सब
भी कर रहें है क्योंकि यह मानव शरीर परमात्मा का मंदिर है और हम सब अपने हृदय का
दरवाजा जाने कितने सदियों से बन्द करने में ही अपनी सम्पूर्ण प्राण ऊर्जा शक्ति को
व्यय खर्च कर रहें है। यह एक प्रकार का सबसे बड़ा व्यापार, ऐसा,
व्यवसाय है जिसे सिर्फ मंदिर के पुजारी ही नहीं कर रहे है यद्यपि हम
सब भी यहीं कर रहें है आज के समय में पश्चिम जगत अपने चरम पर है यह एक अति है
जिसकी वजह से उन सब का अन्तर जगत सम्पूर्ण नष्ट हो चुका है पूर्व भी उसके चपेट
प्रभाव में आ चुका है इसका परिणाम मैडनेस पागलपन कि मात्रा अत्यधिक तेजी से बढ़
रही है, और यह सब मिल कर सामूहिक आत्मघात, आत्महत्या की तैयारी में पूरी ताकत से जुटे है। इस सम्पूर्ण पृथ्वी को
भौतिक स्वर्ग बना रहे है और यह सब जिस पदार्थ से बन रहा है वह सब बारूद का ढेर है
जिससे यह सम्पूर्ण पृथ्वी राख में तबदील हो जायेगी, जैसे कोयला जलने या भस्म होने
के बाद होता है।
एक बार कई धर्म के शास्त्रि पंडितों का एक बहुत बड़े शास्त्रार्थ का आयोजन
एक सम्राट ने किया, उसको सुनने के लिए दूर-दूर से बहुत सारे लोग
एकत्रित हुए जैसा की प्रायः हुआ करता है, वहां पर यह निर्णय
होने वाला था कि परमात्मा कैसा है, और परमात्मा का स्वरूप
कैसा है? जैसा की प्रायः होता है एक धर्म पंडित दूसरे धर्म
के विचारों से कभी सहमत नहीं होते है। ऐसा ही उन सब में भी होने लगा, इसलिए ही यहां पृथ्वी पर सबसे ज्यादा लड़ाईयां और युद्ध धर्म को लेकर हुए
है, और अभी भी गुरील्ला युद्ध हो रहे है। एक धर्म दूसरे धर्म
को समाप्त करने के लिए अपनी पूरी ताकत को झोंक रहे है। इस्लाम का प्रचार और
धर्मान्तरण, ईसाइयों का धर्मान्तरण बरा-बर बहुत तेजी से हो
रहा है। जिसके पास ज्यादा धन है उसी का धर्म ज्यादा फल फूल रहा है। आज ईसाई का
राज्य करने के लिये ही इसके पीछे बहुत बड़ी मात्रा में धन और जीवन को व्यर्थ में
खर्च किया जा रहा है।
धर्म का जो शास्त्रार्थ हो रहा था
उसमें किसी का निर्णय न होने की स्थिति में लोग बहुत अधिक निराश हुए, और
उनमें जो कुछ बुद्धिमान लोग थे उन्होंने धर्म और परमात्मा के विषय में अपनी
जिज्ञासा को शान्त करने के लिए महात्मा बुद्ध के पास गए, क्योंकि
महात्मा बुद्ध उस समय अपने चरम पर थे अर्थात उनकी प्रसिद्धि बहुत थी।
महात्मा बुद्ध ने उन बुद्धिजीवियों को पहले शान्त हो कर सुना और फिर अपने
शिष्यों से कहा की एक अच्छा हाथी और चार अंधे आदमी को लेकर आवो। फिर वह एक मस्त तनदुरुस्त
हाथी और चार अंधे आदमीयों को लेकर आए, तब महात्मा बुद्ध ने उन अंधे
व्यक्तियों से कहा कि जावो हाथी को देखो और यहां मेरे पास आकर बताओ की हाथी कैसा
होता है? पहले अंधे आदमी ने हाथी के पैरो को छूआ और उसने आकर
कहा हाथी तो खम्भे की तरह होता है, और दूसरे अंधे ने हाथी के
पेट को छूआ और उसने कहा कि हाथी तो दीवाल की तरह होता है। तीसरे अंधे ने हाथी के
कान को छूआ और उसने आकर सूचना दी की हाथी तो कपड़े की तरह से होते है। अन्त चौथे
अंधे ने आकर बताया की हाथी तो रस्सी की तरह होता है क्योंकि उसने ने हाथी के पूंछ
को छूआ और कहा की हाथी तो रस्सी की तरह होती है, और वह आपस
में सारें बहस करने लगे। क्योंकि सब ने हाथी को अलग-अलग बताया जो एक दूसरे से मेल
नहीं हो रहा था। उन सब ने उस हाथी को छू कर देखा और सब एक दूसरे को बताने लगे, कि
हाथी कैसा होता है? जिसने पुछ को पकड़ा वह समझ गया कि हाथी
तो रस्सी कि तरह होता है, और जिसने हाथी कि पैर को छूआ उसने
कहा कि हाथी खम्भे कि तरह होता है अन्त में महात्मा बुद्ध ने कहा कि प्रत्येक अंधे
ने हाथी को छूआ और सब ने हाथी कि व्याख्या कि या उसके बारे में बताया इसमें सही
कौन रहा है? इसका मतलब है। सारे धर्म और उसके सारे अंध
श्रद्धालु उसी प्रकार से है, और उनका परमात्मा या धर्म के
विषय में उसी प्रकार से जानते समझते जिस प्रकार से अंधों ने हाथी को समझा है।
जिसके पास आंखें है वह किसी से नहीं पूछता है कि हाथी रूपी धर्म या परमात्मा क्या
और कैसा है?
मैं जीवन को बिना किसी तैयारी के ही जीता हूं जैसा हमको यह जीवन मिला है, उसको
उसकी परिपूर्णता में पूरा स्वीकारता हूं इसके बारे में मैं पहले से कुछ भी तैयारी
नहीं करता हूं क्योंकि मैं यह जानता हूं कि यह जीवन परमात्मा का एक अद्वितीय उपहार
है। मैं आने वाले कल को बिल्कुल कल के लिए खुला रखता हूं उसके लिए मेरे पास कोई
योजना या पहले से कुछ भी तय नहीं करता हूं। अगर मुझे लगता है कुछ बोलना चाहिए तो
ही मैं कुछ बोलता हूं अगर नहीं लगता है कि मुझे बोलने की कोई खास जरूरी नहीं तो
मैं मौन ही रहता हूं। इसके सिवाय कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचता है मैं वहीं करता
हूं जो मुझसे मेरा अस्तित्व कराता है। मैं स्वयं से कभी यह प्रश्न नहीं पूछता हूं
ऐसा क्यों है? क्योंकि इस क्यों कोई उत्तर ही नहीं है। यह
सहज है, बहता हूं जिस प्रकार से नदी, समन्दर
और बादलों पर सवार हवा बह रही है। सारे उत्तर स्वयं के बनाये गए है और सब स्वयं को
झुठा, असत्य, पाखण्डी बनाने के लिए और
स्वयं की तृप्ति के लिए हैं। उसमें जीवन का सार्थक सत्य और उसकी वास्तविकता नहीं
है। सत्य कहा नहीं जा सकता, सत्य बहुत विशाल, विस्तृत व्यापक व्योम, अज्ञेय अन्तरिक्ष की तरह है
उसको जितना जान लो वह कम ही है। जिसका कोई अन्त नहीं है वह अनन्त है। जिसके लिए ही
नेति- नेति अनन्त वेदान्त कहा गया है अर्थात जहां वेदों का अन्त होता है वहां से
वह प्रारम्भ होता है और सारे शब्द चम्मच की तरह है जिससे हम सब समन्दर को खाली
करने के लिए भागीरथी प्रयास करते है। यह कभी भी आज तक संभव नहीं हुआ है नाहीं आगे
ही होगा, शब्द मात्र विशाल परम ज्ञान सत्य की कुछ हल्की सी
झलक से ज्यादा कुछ नहीं है। जिस प्रकार झील के शान्त पानी में अपना चेहरा देखते है
या कांच में अपनी तस्वीर देखते। उसी प्रकार से मुर्दे शब्दों में सत्य की झलक होती
है। शब्द का अर्थ यह है सत्य के सन्दर्भ में नहीं से अच्छा कुछ है शब्द तो है।
इसलिए मैं नदी की धारा के साथ बहता हूं बिना किसी प्रश्न के कि कहां जा रहा हूं
क्योंकि नदी स्वयं कि लहरों से कभी नहीं पूछती है कि तुम कहां जा रहे हो? क्योंकि नदी के लिए यह प्रश्न ही व्यर्थ है। मेरा प्रयास है केवल चलते रहो
यह चलना ही जीवन है जो अज्ञेय है जिसे वेद यज्ञामहे कहते है। यह जीवन यज्ञ की तरह
से है जो परमात्मा का दिया मानव को दिव्य आशीर्वाद उसके कल्याण के लिए है। लेकिन
जब हमारी इच्छा अवरोध रुकावट बन कर खड़ी हो जाती है, तो उसमें
जीवन नहीं बचता है। जीवन स्वयं में परिपूर्ण है उसका कोई लक्ष्य नहीं है और उसे बखूबी
ज्ञान है कि उसे कहां जाना है उसकी मंजिल क्या है? दुःख उधार
है और परमानंद परमात्मा स्वयं का आन्तरीक जीवन का स्वभाव है।
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