🔶 दरभंगा में एक शंकर मिश्र नामक विद्वान हो
गये हैं। वे छोटे थे तब उनकी माँ को दूध नहीं उतरता था तो गाय रखनी पड़ी। दाई ने
माता के समान प्रेम से बालक को अपना दूध पिलाया। शंकर मिश्र की माता दाई से कहा
करती थी कि बच्चा जो पहली कमाई लायेगा सो तेरी होगी।
🔷 बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत
का उद्भट विद्वान हो गया। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर दरबार में बुलाया और उसकी
काव्य रचना पर प्रसन्न होकर अत्यन्त मूल्यवान हार उपहार में दिया।
🔶 शंकर मिश्र हार लेकर माता के पास पहुँचे। माता
ने उसे तुरन्त ही दाई को दे दिया। दाई ने उसका मूल्य जंचवाया तो वह लाखों रुपए का था।
इतनी कीमती चीज लेकर वह क्या करती? लौटाने आई। पर शंकर मिश्र
और उसकी माता अपने वचन से लौटने का तैयार न हुए। पहली कमाई के लिए जब दाई को वचन
दिया जा चुका था तो फिर उसे पलटने में उनका गौरव जाता था।
🔷 बहुत दिन देने लौटाने का झंझट पड़ा रहा। अन्त
में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो दरभंगा में “दाई का तालाब” नाम से
अब भी मौजूद हैं।
वचन का पालन करने वाले शंकर मिश्र
और बिना परिश्रम के धन को न छूने वाली दाई दोनों ही प्रशंसनीय हैं।
👉 सच्चा यज्ञ
🔶 महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ समाप्त होने
पर एक अद्भुत नेवला जिसका आधा शरीर सुनहरा था यज्ञ भूमि में लोट लगाने लगा। कुछ ही
समय बाद वह रुदन करके कहने लगा कि "यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। " पाण्डवों सहित
सभी उपस्थित लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ, पूछने पर नेवले ने
बताया" कुछ समय पूर्व अमुक देश में भयंकर अकाल पड़ा।
🔷 मनुष्य भूख के मारे तड़प-तड़प कर मरने लगे। एक
ब्राह्मण परिवार कई दिनों से भूखा था। एक दिन कहीं से कुछ अन्न उन्हें मिला। ब्राह्मणी
ने उसकी चार रोटी बनाई। उस ब्राह्मण का यह नियम था कि भोजन से पूर्व कोई भूखा होता
तो उसे भोजन कराकर तब स्वयं खाता। उस दिन भी उसने आवाज दी कि जो हमसे अधिक-भूखा-हो
उसका अधिकार इस भोजन पर है, आये, वह अपना भाग
ग्रहण करें। तो एक चाण्डाल भूख से तड़प रहा था, आ गया।
🔶 ब्राह्मण ने अपने हिस्से की एक रोटी सौंप दी, उससे
भी तृप्त न होने पर क्रमशः पत्नी और बालक-बालिका ने भी अपने-अपने हिस्से की रोटी
उसे दे दी। जब वह चाण्डाल भोजन कर चुका और उसने पानी पीकर हाथ धोये तो उससे धरती
पर कुछ पानी पड़ गया।
🔷 मैं उधर होकर निकला तो उस गीली जमीन पर लेट
गया। मेरा आधा शरीर ही सम्पर्क में आया जिससे उतना ही स्वर्णमय बन गया। मैंने सोचा
था शेष आधा शरीर युधिष्ठिर के यज्ञ से स्वर्णमय बन जायेगा, लेकिन
यहाँ ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह यज्ञ मेरे ख्याल से पूर्ण नहीं हुआ। "
🔶 यज्ञ की श्रेष्ठता उसके वाह्य स्वरूप की विशालता
में नहीं अन्तर की उत्कृष्ट त्याग वृत्ति में है। यज्ञ के साथ त्याग-बलिदान की
अभूतपूर्व परम्परा जुड़ी हुई है। यही संस्कृति को धन्य बनाती है।
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