जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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बुद्ध की सहनशीलता

 बुद्ध की सहनशीलता

    गौतम बुद्ध सत्य, अहिंसा और सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति थे। इन्हीं सद्गुणों का उपदेश वे घूम-घूमकर देते और लोगों से इन्हें अपनाने का आग्रह करते। एक दिन वे किसी गाँव में पहुँचे। वहाँ कुछ ऐसे अज्ञानी लोग थे, जो बुद्ध के विरोधी थे। वे बुद्ध को अपशब्द कहने लगे। यह देखकर बुद्ध के शिष्यों को बहुत बुरा लगा। उन्होंने बुद्ध से इसका विरोध करने का आग्रह किया तो बुद्ध ने उन्हें समझाया कि ये लोग तो अपशब्द ही कह रहे हैं। यदि ये पत्थर भी मार रहे होते तो भी मैं कहता कि मारने दो। मैं जानता हूँ कि ये कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन क्रोध के कारण कह नहीं पा रहे। दस साल पूर्व यदि ये ही लोग मुझे गाली देते तो मैं भी इन्हें गाली देता। किंतु अब तो लेनदेन से मुक्ति मिल गई है। क्रोध से अपशब्द निकलते हैं। यहाँ तो क्रोध-भवन कब का ढह चुका है। बुद्ध के विचार सुनकर अपशब्द कहने वाले हैरान रह गए। बुद्ध ने आगे अपने शिष्यों से कहा, "इन लोगों को बताओ कि पिछले गाँव में क्या हुआ था? शिष्यों ने बताया, "वहाँ के लोग फल व मिठाइयाँ लेकर आए थे और आप ने यह कहकर वे चीजें लौटा दी कि अब लेने वाला विदा हो चुका है। दस साल पहले आते तो मैं ये सभी उपहार ले लेता।" बुद्ध बोले, "उन लोगों ने मिठाइयाँ गाँव में बाँट दी, लेकिन आप ये अपशब्द गाँव में न बाँटे। आप मुझे क्रोध नहीं दिला सकते। ठीक उस खुंटी की तरह, जो किसी को नहीं टाँगती, लोग उस पर वस्त्र अवश्य टाँग देते हैं।"

    कथा का सार यह है कि साक्षी भाव सच्चे संत की पहचान है। जो अच्छे-बुरे, लाभ-हानि, अपना-पराया के संकीर्ण भाव से मुक्त हो जाता है, उसे ही संतत्व की प्राप्ति होती है।


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