वेदों में मद्यपान निषेध
१. हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् उथर्न नग्ना जरन्ते।।- ऋग्वेद (८/२/१२)
जैसे शराब दिल खोलकर पीनेवाले आपस में लड़ते है और जैसे वे नग्न होकर रातभर बड़बड़ाते हैं वे दुष्टबृद्धि लोग होते हैं।
२. अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्। तनु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समाह्यन पीतये समस्मै।।
-ऋग्वेद (६ /४०/२)
हे राजन् ! जिसके खाने-पीने से बुद्धि और बल बढ़े, उसे तू खा और पी एवं खिला और पिला। उस वस्तु का पान मत करना और न कराना जिससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाए।
३. अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुषतीमजीगः।
अयं षडुर्वीरमिमीत थीरो न याभ्यो भवनं कच्चनारे।।
-ऋ्वेद (६ /४७/३)
हे मनुष्यों ! जिसके पीने से वाणी, बुद्धि और शरीर बढ़े तथा जिससे शास्त्रों का सम्यक् ग्रहण हो सके, उसी का सेवन करना चाहिए और बुद्धी आदि के नाशक पदार्थ का नहीं।

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