जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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हमारे पुर्वजो में संघर्ष


हमारे पुर्वजो में संघर्ष


    मुगलों के सामराज्य के पतन के साथ ही दूसरी तरफ से अग्रेंजी इश्ट इंडिया कम्पनी ने अपने पैर बंगाल में जमा लिया था और उसने अपने पैर पसारता हुआ बक्सर से होते हुए वनारस इलहाबाद अवध आदि पर अपना कब्जा जमाते हुये गंगा के रास्ते चलते हुये उसने अपना एक अड्डा विन्ध्य क्षेत्र में भी वसा लिया और इसका नाम उसने मिर्जापुर रखा। जिसके अंतरगत ही विजयपुर राज्य आता था। जो एक प्रकार से मिर्जापुर का हृदय था। जिसकी खबर अंग्रेजों को भली भाति हो चुकी थी जिसके कारण ही वह इस हृदय रूपी विजयपुर नगर को समटने के लिये सड़यंत्र सुरु कर दिया। उसी बिच इस हरे भरे इलाके जो हर प्रकार से समपन्न था। इस पर अंग्रेजो कि निगाह पड़ गई जब वह गंगा में यात्रा करते हुए वानरस से इलहाबाद दिल्ली के लिये सफर पर होते, जिसको प्राप्त करने के लिये उन्होने एक बहुत खतरनाक सडयंत्र रचा जिसकी किसी को कानो कान पता नहीं चला, ना कैलाश को ही खबर हुई, ना ही विजयपुर के राजा हरिश्चन्द्र को ही हुआ। अंग्रेजो में एक बहुत चालाक और धुर्त किस्म का अफसर था जिसका नाम पिटर डिसुजा था। उसनें राजा के दामाद को अपना मित्र बना लिया, और उनको अपने साथ रख लिया उनके लिये अच्छि-अच्छि विदेशी औरतों की व्यवस्था कर दि। जिससे राजा का दामाद अपनी सारी राजा से सम्बंधित गुप्त जानकारीयाँ उन अंग्रेजों के सपुर्द कर दिया। जिसका अंग्रेजो ने काफी फायदा उठाया। अंग्रेजों ने सिधा-सिधा आमने सामने युद्ध नहीं किया क्योंकि वह जानते थे। कि वह इस तरह से गंगा के तराई में फंस जायेंगे और यहाँ कि जमिन इन जमिदारों और किसानो के साथ राजा के पक्ष में जित जायेंगी। क्योंकि छानबे क्षेत्र छनवर के इलाके से बाहर निकला आसान नहीं था। वहाँ पर वहाँ के लोकल लोग बहुत अधिक थे। अंग्रेजों सबसे पहले कैलाश को और राजा हरिश्चन्द्र को खत्म करने की योजना बनाई। क्योंकि वह जानते थे की इस राज्य के यह ही दो आधार भुत स्तम्भ है यदि इनको नष्ट कर दिया जाये तो विजयुर राज्य को नष्ट करने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। यह विजयपुर रेत के महल कि तरह से विखर जायेगा।

      जैसा कि राजा को मारने के लिये राजा कि सबसे कमजोर कड़ी उसके दामाद को अंग्रेजों नें अपना मुहरा बना लिया था। इसी तरह से कैलाश को मारने के लिये जो उसकी कमजोर कड़ी उसका मित्र उसके हि पड़ोष के मानस को भड़काया और उसे जमीन का लालच दिया। यद्यपि वह कैलाश और मानस दोनो मित्रा थे। लेकिन जमिन के मामले में दोनों जिमदारों में सबसे अधिक धाक और राजा के साथ निकटता कैलाश की अधिक थी। उसके पास जमिन भी काफी अधिक थी। मानस कि तुलना में इसको साथ कैलाश कि अपनी सेना के साथ हाथी घोड़ों से सुसज्जीत सेना भी थी। जैसा कि मानस के पास अपनी सेना नहीं थी। इसके दो बेटों के साथ में किसानों मजदूरों की बड़ी सख्या थी। राजा हरिश्चन्द्र को मारने के लिये अंग्रेजों ने राजा के दामाद को हि तैयार कर लिया गया। इसका लालच दे कर कि राजा के दामाद को ही राजा विजयपर का बना दिया जायेगा। राजा का दामाद एक चरित्र हिन और विलाशी था। जिससे लालच में आकर वह तैयार होगया। मानस बहुत सम्मान करता था। कैलाशका लेकिन अन्दर ही अन्दर वह कुढ़ता भी था। उसकी तरक्कि को देख कर उसे भी हजारों एकड़ जमिन के लालच ने पकड़ लिया।

    मानस ने अपने कुछ आदमियों को कैलाश को मारने के लिये तैयार कर लिया और अपने आदमियों कि गुप्त सभा बुलाया और अपने सभी आदमियों को अपने विश्वास में ले कर उसने कहा कि यही समय की मांग है। कि हमें अंग्रेजो से मित्रता कर लेनी चाहिये, क्योंकि अब हम अंग्रेजों से लड़ तो सकते नहीं है। क्योंकि इन्होंने मुगलों को परास्त करके सम्पूर्ण भारत पर अपना एक तरफा अधिकार कर लिया है। जैसा कि राजनिती का नियम है कि अवसर को देख कर जो उसका फायदा उठाता है वहीं अपनी गाथा इतिहास के पन्नों में लिखता है। जैसा कि पंच तन्त्र में एक कथा आती है-दक्षिण दिशा में सुवर्णवती नामक नगरी है, उसमे वर्धमान नामक एक बनिया रहता था। उसके पास बहुतसा धन भी था, परंतु अपने दूसरे भाई-बंधुओं को अधिक धनवान देखकर उसकी यह लालसा हुई कि और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिए. अपने से नीचे (हीन) अर्थात दरिद्रियों को देख कर किसकी महिमा नहीं बढ़ती है? अर्थात सबका अभिमान बढ़ जाता है और अपने से ऊपर अर्थात अधिक धनवानों को देखकर सब लोग अपने को दरिद्री समझते हैं।

  ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम्। शशिनस्तुल्यवंशोsपि निर्धनः परिभूयते॥
     जिसके पास बहुत-सा धन है, उस ब्रह्मघातक मनुष्य का भी सत्कार होता है और चंद्रमा के समान अतिनिर्मल वंश में उत्पन्न हुए भी निर्धन मनुष्य का अपमान किया जाता है। जैसे नवजवान स्री बूढ़े पति को नहीं चाहती है, वैसे ही लक्ष्मी भी निरुद्योगी, आलसी, "प्रारब्ध में जो लिखा है, सो होगा" ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वाले, तथा पुरुषार्थ हीन मनुष्य को नहीं चाहती है। आलस्यं स्री सेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम्। संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य॥

    और भी आलस्य, स्री की सेवा, रोगी रहना, जन्मभूति का स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नति के लिये बाधक है।

     संपदा सुस्थितंमन्यो भवति स्वल्पयापि यः। कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति तस्य ताम्॥ जो मनुष्य थोड़ी-सी संपत्ति से अपने को सुखी मानता है, विधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्य की उस संपत्ति को नहीं बढ़ाता है। निरुत्साही, आनंदरहित, पराक्रमहीन और शत्रु को प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्र को कोई स्री न जने अर्थात ऐसे पुत्र का जन्म न होना ही अच्छा है। नहीं पाये धन के पाने की इच्छा करना, पाये हुए धन की चोरी आदि नाश से रक्षा करना, रक्षा किये हुए धन को व्यापार आदि से बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धन को सत्पात्र में दान करना चाहिए. क्योंकि लाभ की इच्छा करने वाले को धन मिलता ही है एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजाने का भी अपने आप नाश हो जाता है और भी यह है कि बढ़ाया नहीं गया धन कुछ काल में थोड़ा व्यय हो कर काजल के समान नाश हो जाता है और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है।

     धनेन किं यो न ददाति नाश्रुते, बलेन कि यश्च रिपून्न बाधते। श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्, किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।

      उस धन से क्या है? जो न देता है और न खाता है, उस बल से क्या है? जो वैरियों को नहीं सताता है, उस शास्र से क्या है? जो धर्म का आचरण नहीं करता है और उस आत्मा से क्या है? जो जितेंद्रिय नहीं है। जैसे जल की एक बूँद के गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है, वही कारण सब कारण सब प्रकार की विद्याओं का, धन का और धर्म का भी है।

      दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै। स कर्मकारभस्रेव श्वसन्नपि न जीवति॥ दान और भोग के बिना जिसके दिन जाते हैं, वह लुहार की धोंकनी के समान सांस लेता हुआ भी मरे के समान है। यह सोच कर नंदक और संजीवक नामक दो बैलों को जुए में जोतकर और छकड़े को नाना प्रकार की वस्तुओं से लादकर व्यापार के लिए कश्मीर की ओर गया।

      अंजनस्य क्षयं दृष्ट्व वल्मीकस्य च संचयम्। अवन्धयं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु॥ काजल के क्रम से घटने को और वाल्मीक नामक चीटी के संचय को देखकर, दान, पढ़ना और कामधंधा में दिन को सफल करना चाहिए. बलवानों को अधिक बोझ क्या है? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है? और विद्यावानों को विदेश क्या है? और मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है? फिर उस जाते हुए का, सुदुर्ग नामक घने वन में, संजीवक घुटना टूटने से गिर पड़ा। यह देखकर वर्धमान चिंता करने लगा-नीति जानने वाला इधर-उधर भले ही व्यापार करे, परंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना विधाता के जी में है। सब कार्यों को रोकने वाले संशय को छोड़ देना चाहिये, एवं संदेह को छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये। यह विचार कर संजीवक को वहाँ छोड़ कर फिर वर्धमान आप धर्मपुर नामक नगर में जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैल को ला कर जुए में जोत कर चल दिया। फिर संजीवक भी बड़े कष्ट से तीन खुरों के सहारे उठ कर खड़ा हुआ। समुद्र में डूबे हुए की, पर्वत से गिरे हुए की और तक्षक नामक सपं से डसे हुए की भी आयु की प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है।

    अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं, सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति। जीवत्यनाथोsपि वने विसर्जितः। कृतप्रयत्नोsपि गृहे न जीवति॥

      दैव से रक्षा किया हुआ धन, बिना रक्षा के भी ठहरता है और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैव का मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे वन में छोड़ा हुआ सहायताहीन भी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करने से भी नहीं जीता है। फिर बहुत दिनों के बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वन में फिरता-फिरता हृष्ट-पुष्ट हो कर ऊँचे स्वर से डकराने लगा। उसी वन में पिंगलक नामक एक सिंह अपनी भुजाओं से पाये हुए राज्य के सुख का भोग करता हुआ रहता था। जैसा कहा गया है, मृगों ने सिंह का न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार किया, परंतु सिंह अपने आप ही पराक्रम से राज्य को पा कर मृगों का राजा होना दिखलाता है और वह एक दिन प्यास से व्याकुल होकर पानी पीने के लिए यमुना के किनारे गया और वहाँ उसे एक सिंह ने नवीन ॠतुकाल के मेघ की गर्जना के समान संजीवक का डकराना सुना। यह सुन कर पानी के बिना पिये वह घबराया-सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर विचारने लगा यह क्या है? यह सोचता हुआ चुपसा बैठ गया और उसके मंत्री के बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ों ने उसे वैसा बैठा देखा। उसको इस दशा में देख कर दमनक ने करटक से कहा-भाई करटक, यह क्या बात है कि प्यासा स्वामी पानी को बिना पीये डर से धीरे-धीरे आ बैठा है? करटक बोला-भाई दमनक, हमारी समझ से तो इसकी सेवा ही नहीं की जाती है। जो ऐसे बैठा भी है, तो हमें स्वामी की चेष्ठा का निर्णय करने से क्या प्रयोजन है? क्योंकि इस राजा से बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार किये गये हम दोनों ने बड़ा दुःख सहा है।

     सेवया धनमिच्छाद्भिः सेवकै: पश्य यत्कृतम। स्वायब्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम॥

     सेवा से धन को चाहने वाले सेवकों ने जो किया, ऐसा देख कर शरीर की स्वतंत्रता भी मूर्खो ने हार दी है और दूसरे पराधीन हो कर जाड़ा, हवा और धूप में दुःखों को सहते हैं और उस दुःख के छोटे से छोटे भाग से तप करके बुद्धिमान सुखी हो सकता है। स्वाधीनता का होना ही जन्म की सफलता है और जो पराधीन होने पर भी जीते है, तो मरे के समान से हैं? अर्थात वे ही मुर्दों के समान हैं, जो पराधीन हो कर रहते हैं। धनवान पुरुष, आशारुपी ग्रह से भरमाये गये हुए याचकों के साथ, इधर आ, चला आ, बैठ जा, खड़ा हो, बोल, चुप-सा रह इस तरह खेल किया करते हैं।     अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्रीभिरिव स्वयम्। आत्मा संस्कृत्य-संस्कृत्य परोपकरणीकृतः॥

     जैसे वेश्या दूसरों के लिए सिंगार करती है, वैसे ही मूर्खों ने भी धन के लाभ के लिए अपनी आत्मा को संस्कार करके हृष्ट पुष्ट बनवा कर पराये उपकार के लिए कर रखी हैं। जो दृष्टि स्वभाव से चपल है और मल, मूत्र आदि नीची वस्तुओं पर भी गिरती है, ऐसी स्वामी की दृष्टि का सेवक लोग बहुत गौरव करते हैं।

       मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा, क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः। धृष्ट: पार्श्वे वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः, सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥

      चुपचाप रहने से मूर्ख, बहुत बातें करने में चतुर होने से उन्मत्त अथवा बातूनी, क्षमाशील होने से डरपोक, न सहन सकने से नीतिरहित, सर्वदा पास रहने से ढीठ और दूर रहने से घमंडी कहलाता है। इसलिए सेवा का धर्म बड़ा रहस्यमय है, योगियो से भी पहचाना नहीं जा सका है। विशेष बात यह है कि जो उन्नति के लिए झुकता है, जीने के लिए प्राण का भी त्याग करता है और सुख के लिए दुःखी होता है, ऐसा सेवक को छोड़कर और कौन भला मूर्ख हो सकता है। दमनक बोला-मित्र, कभी यह बात मन से भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि खामियों की सेवा यत्न से क्यों नहीं करनी चाहिये, जो सेवा से प्रसन्न हो कर शीघ्र मनोरथ पूरे कर देते हैं। स्वामी की सेवा नहीं करने वालों को चमर के ढलाव से युक्त ऐश्वर्य और ऊँचे दंड वाले श्वेत छत्र और घोड़े हाथियों की सेना कहाँ धरी है? करटक बोला-तो भी हमको इस काम से क्या प्रयोजन है? क्योंकि अयोग्य कामों में व्यापार करना सर्वथा त्यागने के योग्य है। दमनक ने कहा-तो भी सेवक को स्वामी के कामों का विचार अवश्य करना चाहिये। करटक बोला-जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे। क्योंकि सेवक को पराये काम की चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये। पशुओं का ढुढ़ना हमारा काम है। अपने काम की चर्चा करो। परंतु आज उस चर्चा से कुछ प्रयोजन नहीं। क्योंकि अपने दोनों के भोजन से बचा हुआ आहार बहुत धरा है। दमनक क्रोध से बोला-क्या तुम केवल भोजन के ही अर्थी हो कर राजा की सेवा करते हो? यह तुमने अयोग्य कहा। मित्रो के उपकार के लिये और शत्रुओं के अपकार के लिए चतुर मनुष्य राजा का आश्रय करते हैं और केवल पेट कौन नहीं भर लेता है? अर्थात सभी भरते हैं।

     जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवा:। सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति

    जिसके जीने से ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं, उसी का जीवन सफल है और केवल अपने स्वार्थ के लिए कौन नहीं जीता है? जिसके जीने से बहुत से लोग जिये वह तो सचमुच जिया और यों तो काग भी क्या चोंच से अपना पेट नहीं भर लेता है? कोई मनुष्य पाँच पुराण में दासपने को करने लगता है, कोई लाख में करता है ओर कोई एक लाख में भी नहीं मिलता है।

      मनुष्यजातौ तुल्यायाँ भृत्यत्वमतिगर्हितम। प्रथमों यो न तत्रापि स किं जीवत्सु गण्यते॥ मनुष्यों को समान जाति के सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकों में भी जो प्रथम अर्थात सबका मानस नहीं है, क्या वह जीते हुओं में गिना जा सकता है? अर्थात उसका जीना और मरना समान है।
 
    अहितहितविचारशून्यबुध्दे:। श्रुतिसमयैर्वहुभिस्तिरस्कृतस्य। उदरभरणमात्रकेवलेच्छो:। पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः

      हित और अहित के विचार करने में जड़मति वाला और शास्र के ज्ञान से रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट भरने की ही रहती है, ऐसा पुरुष रुपी पशु और सचमुच पशु में कौन-सा अंतर समझा जा सकता है? अर्थात ज्ञानहीन एवं केवल भोजन की इच्छा रखने वाले से घास खाकर जीने वाला पशु अच्छा है। करकट बोला-हम दोनों मंत्री नहीं है, फिर हमें इस विचार से क्या? दमनक बोला-कुछ काल में मंत्री प्रधानता व अप्रधानता को पाते हैं। इस दुनिया में कोई किसी का स्वभाव से अर्थात जन्म से सुशील अर्थवा दुष्ट नहीं होता है, परंतु मनुष्य को अपने कर्म ही बड़पन को अथवा नीचपन को पहुँचाते हैं। मनुष्य अपने कर्मों से कुए के खोदने वाले के समान नीचे और राजभवन के बनाने वाले के समान ऊपर जाता है, अर्थात मनुष्य अपना उच्च कर्मों से उन्नति को और हीन कर्मों से अवनति को पाता है। इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपने ही यत्न के अधीन रहती है। करकट बोला-तुम अब क्या कहते हो? वह बोला-यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारण से घबरायासा लौट करके आ बैठा है। करटक ने कहा-क्या तुम इसका भेद जानते हो? दमनक बोला-इसमें नहीं जानने की बात क्या है? जताए हुए अभिप्राय को पशु भी समझ लेता है और हांके हुए घोड़े और हाथी भी बोझा ढोते हैं। पण्डित कहे बिना ही मन की बात तर्क से जान लेता है, क्योंकि पराये चित्त का भेद जान लेना ही बुद्धियों का फल है। आकार से, हृदय के भाव से, चाल से, काम से, बोलने से और नेत्र और मुंह के विकार से औरों के मन की बात जान ली जाती है। इस भय के सुझाव में बुद्धि के बल से मैं इस स्वामी को अपना कर लूँगा। जो प्रसंग के समान वचन को, स्नेह के सदृश मित्र को और अपनी सामर्थ्य के सदृस क्रोध को समझता है, वह बुद्धिमान है। करटक बोला-मित्र, तुम सेवा करना नहीं जानते हो। जो मनुष्य बिना बुलाये घुसे और बिना पूछे बहुत बोलता है और अपने को राजा का प्रिय मित्र समझता है, वह मूर्ख है। दमनक बोला-भाई, मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूँ? कोई वस्तु स्वभाव से अच्छी और बुरी होती है, जो जिसको रुचती है, वही उसको सुंदर लगती है।
 
     यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम। अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत॥ 

    बुद्धिमान को चाहिए कि जिस मनुष्य का जैसा मनोरथ होय उसी अभिप्राय को ध्यान में रख कर एवं उस पुरुष के पेट में घुस कर उसे अपने वश में कर ले। थोड़ा चाहने वाला, धैर्यवान, पण्डित तथा सदा छाया के समान पीछे चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर सोच-विचार न करे। अर्थात यथार्थरुप से आज्ञा का पालन करे ऐसा मनुष्य राजा के घर में रहना चाहिये।
 
    करटक बोला-जो कभी कुसमय पर घुस जाने से स्वामी तुम्हारा अनादर करे। वह बोला-ऐसा हो तो भी सेवक के पास अवश्य जाना चाहिये। दोष के डर से किसी काम का आरंभ न करना यह कायर पुरुष का चिंह है। हे भाई, अजीर्ण के डर से कौन भोजन को छोड़ते हैं?

     आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं, विद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा। प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च, यः पार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति॥ पास रहने वाला कैसा ही विद्याहीन, कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसी से हित करने लगता है, क्योंकि राजा, स्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है, उसी का आश्रय कर लेते हैं।

     करटक बोला-वहाँ जा कर क्या कहोगे? वह बोला-सुनो पहिले यह जानूँगा कि स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है या उदास है? करटक बोला-इस बात को जानने का क्या चिंह है? दमनक बोला-सुनो दूर से बड़ी अभिलाषा से देख लेना, मुसकाना, समाचार आदि पूछने में अधिक आदर करना, पीठ पीछे भी गुणों की बड़ाई करना, प्रिय वस्तुओं में स्मरण रखना।

    असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभाषणम्। अनुरक्तस्य चिह्मानि दोषेsपि गुणसंगंहः। जो सेवक न हो उसमें भी स्नेह दिखाना, सुंदर-सुंदर वचनों के साथ धन आदि का देना और दोष में भी गुणों का ग्रहण करना, ये स्नेहयुक्त स्वामी के लक्षण हैं। आज कल कह करके, कृपा आदि करने में समय टालना तथा आशाओं का बढ़ाना और जब फल का समय आवे तब उसका खंडन करना ये उदास स्वामी के लक्षण मनुष्य को जानना चाहिये। यह जान कर जैसे यह मेरे वश में हो जायेगा वैसे कर्रूँगा, क्योंकि पण्डित लोग नीतिशास्र में कही हुई बुराई के होने से उत्पन्न हुई विपत्ति को और उपाय से हुई सिद्धि को नेत्रों के सामने साक्षात झलकती हुई-सी देखते हैं। करटक बोला-तो भी बिना अवसर के नहीं कह सकते हो, बिना अवसर की बात को कहते हुए वृहस्पति जी भी बुद्धि की निंदा और अनादर को सर्वदा पा सकते हैं। दमनक बोला-मित्र, डरो मत, मैं बिना अवसर की बात नहीं कहूँगा, आपत्ति में, कुमार्ग पर चलने में और कार्य का समय टाले जाने में, हित चाहने वाले सेवक को बिना पूछे भी कहना चाहिए और जो अवसर पा कर भी मैं राय नहीं कहूँगा तो मुझे मंत्री बनना भी अयोग्य है। मनुष्य जिस गुण से आजीविका पाता है और जिस गुण के कारण इस दुनिया में सज्जन उसकी बड़ाई करते हैं, गुणी को ऐसे गुण की रक्षा करना और बड़े यत्न से बढ़ाना चाहिये। इसलिए हे शुभचिंतक, मुझे आज्ञा दीजिये। मैं जाता हूँ। करटक ने कहा-कल्याण हो और तुम्हारे मार्ग विघ्नरहित अर्थात शुभ हो। अपना मनोरथ पूरा करो। तब दमनक घबराया-सा पिंगलक के पास गया। तब दूर से ही बड़े आदर से राजा ने भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत करके बैठ गया। राजा बोला-बहुत दिन से दिखे। दमनक बोला-यद्यपि मुझ सेवक से श्री महाराज को कुछ प्रयोजन नहीं है, तो भी समय आने पर सेवक को अवश्य पास आना चाहिये, इसलिए आया हूँ। हे राजा, दांत के कुरेदने के लिए तथा कान खुजाने के लिए राजाओं को तीनके से भी काम पड़ता है। फिर देह, वाणी तथा हाथ वाले मनुष्य से क्यों नहीं? अर्थात अवश्य पड़ना ही है। यद्यपि बहुत काल से मुझ अनादर किये गये की बुद्धि के नाश की श्री महाराज शंका करते ही सो भी शंका न करनी चाहिये।

       कदर्थितस्यापि च धैर्यवृत्ते, र्बुध्देर्विनाशो न हि शंड्कनीयः। अधःकृतस्यापि तनूनपातो, नाधः शिखा याति कदाचिदेव॥ 

   अनादर भी किये गये धैर्यवान की बुद्धि के नाश की शंका नहीं करनी चाहिये, जैसे नीच की ओर की गई भी अग्नि की ज्वाला कभी भी नीचे नहीं जाती है, अर्थात हमेशा ऊँची ही रहती है। हे महाराज, इसलिए सदा स्वामी को विवेकी होना चाहिये। मणि चरणों में ठुकराता है और कांच सिर पर धारण किया जाता है, सो जैसा है वैसा भले ही रहे, काँच-काँच ही है और मणि-मणि ही है।

      दमनक ने अपने राजा पींगलक की मित्रता संजीवक से करा देता है और अपनी वुद्धि से और राजा की मुर्खता और संजीवक की बेबसी का फायदा उठाकर। दमनक पिंगलक को कहता है कि यह संजीवक बहुत शक्तिशाली है इससे आप मित्रता करले जिससे आपको फायदा ही होगा और ऐसा ही दमनक संजीवक को भी बोलता है। जिससे पिंगलक संजीवक को अपना मित्र बनाकर उसे निर्भयता का अभय़ दान देकर अपने दरबार का सदस्य बना लेता है। ऐसा ही कुछ दिन चलता है। इसके बाद एक दिन उस सिंह पिंगलक का भाई स्तब्धकर्ण नामक सिंह उसके पास आया। उसका आदर-सत्कार करके और अच्छी तरह बैठा कर पिंगलक उसके भोजन के लिये पशु मारने चला।

      इतने में संजीवक बोला कि-महाराज, आज मरे हुए मृगों का माँस कहाँ है? राजा बोला-दमनक करटक जाने, संजीवक ने कहा-तो जान लीजिये कि है या नहीं सिंह सोच कर कहा-अब वह नहीं है, संजीवक बोला-इतना सारा मांस उन दोनों ने कैसे खा लिया? राजा बोला-खाया, बाँटा और फेंक फांक दिया। नित्य यही हाल रहता है। तब संजीवक ने कहा महाराज के पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैं? राजा बोला-मेरे पीठ पीछे ऐसा ही किया करते हैं। फिर संजीवक ने कहा-यह बात उचित नहीं है। निश्चय करके वही मंत्री श्रेष्ठ है जो दमड़ी-दमड़ी करके कोष को बढ़ावे, क्योंकि कोषयुक्त राजा का कोष ही प्राण है, केवल जीवन ही प्राण नहीं है। यह सुन कर स्तब्धकर्ण बोला-सुनों भाई, ये दमनक करटक बहुत दिनों से अपने आश्रय में पड़े हैं और लड़ाई और मेल कराने के अधिकारी है। धन के अधिकार पर उनका कभी नहीं लगाने चाहिये। जब जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाहिये। सिंह बोला-यह तो है ही, पर ये सर्वथा मेरी बात को नहीं मानने वाले हैं। स्तब्धकर्ण बोला-यह सब प्रकार से अनुचित है। भाई, सब प्रकार से मेरा कहना करो और व्यवहार तो हमने कर ही लिया है। इस घास चरने वाले संजीवक को धन के अधिकार पर रख दो। पिंगलक ने अपने भाई कि सलाह मान कर संजीवक को अपने धन का रक्षक बना देता है। ऐसा करने पर उसी दिन से पिंगलक और संजीवक का सब बांधवों को छोड़कर बड़े स्नेह से समय बीतने लगा।

      फिर सेवकों के आहार देने में शिथिलता देख दमनक और करटक आपस में चिंता करने लगे। तब दमनक करटक से बोला-मित्र, अब क्या करना चाहिये। यह अपना ही किया हुआ दोष है, स्वयं ही दोष करने पर पछताना भी उचित नहीं है। जैसे मैंने इन दोनों की मित्रता कराई थी, वैसे ही मित्रो में फूट भी कराऊँगा। करटक बोला-ऐसा ही होय, परंतु इन दोनों का आपस में स्वभाव से बढ़ा हुआ बड़ा स्नेह कैसे छुड़ाया जा सकता है। दमनक बोला-उपाय करो, जैसा कहा है कि-जो उपाय से हो सकता है, वह पराक्रम नहीं हो सकता है। बाद में दमनक पिंगलक के पास जा कर प्रणाम करके बोला-महाराज, नाशकारी और बड़े भय के करने वाले किसी काम को जान कर आया हूँ। पिंगलक ने आदर से कहा-तू क्या कहना चाहता है? दमनक ने कहा-यह संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने वाला-सा दिखता है और मेरे सामने महाराज की तीनों शक्तियों की निंदा करके राज्य को ही छीनना चाहता है। यह सुनकर पिंगलक भय और आश्चर्य से मान कर चुप हो गया। दमनक फिर बोला-महाराज, सब मंत्रियों को छोड़ कर एक इसी को जो तुमने सर्वाधिकारी बना रखा है। वही दोष है। सिंह ने विचार कर कहा-हे शुभचिंतक, जो ऐसा भी है, तो भी संजीवक के साथ मेरा अत्यंत स्नेह है। बुराईयाँ करता हुआ भी जो प्यारा है, सो तो प्यारा ही है, जैसे बहुत से दोषों से दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है। दमनक फिर भी कहने लगा-हे महाराज, वही अधिक दोष है। पुत्र, मंत्री और साधारण मनुष्य इनमें से जिसके ऊपर राजा अधिक दृष्टि करता है, लक्ष्मी उसी पुरुष की सेवा करती है। हे महाराज सुनिये, अप्रिय भी, हितकारी वस्तु का परिणाम अच्छा होता है और जहाँ अच्छा उपदेशक और अच्छे उपदेश सुनने वाला हो, वहाँ सब संपत्तियाँ रमण करती है। सिंह बोला-बड़ा आश्चर्य है, मैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको बढ़ाया, सो मुझसे क्यों वैर करता है? दमनक बोला-महाराज, जैसे मली हुई और तैल आदि लगाने से सीधी करी हुई कुत्ते की पूँछ सीधी नहीं होती है, वैसे ही दुर्जन नित्य आदर करने से भी सीधा नहीं होता है और जो संजीवक के स्नेह में फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझ सेवक पर दोष नहीं है। पिंगलक (अपने मन में सोचने लगा) कि किसी के बहकाने से दूसरों को दंड न देना चाहिये, परंतु अपने आप जान कर उसे मारे या सम्मान करें। फिर बोला-तो संजीवक को क्या उपदेश करना चाहिये? दमनक ने घबरा कर कहा-महाराज, ऐसा नहीं, इससे गुप्त बात खुल जाती है। पहले यह तो सोच लो कि वह हमारा क्या कर सकता है? सिंह ने कहा-यह कैसे जाना जाए कि वह द्रोह करने लगा है? दमनक ने कहा-जब वह घमंड से सींगों की नोंक को मारने के लिए सामने करता हुआ निडर-सा आवे तब स्वामी आप ही जान जायेंगे। इस प्रकार कह कर संजीवक के पास गया और वहाँ जा कर धीरे-धीरे पास खिसकता हुआ अपने को मन मलीन-सा दिखाया। संजीवक ने आदत से कहा मित्र कुशल तो है? दमनक ने कहा-सेवकों को कुशल कहाँ? संजीवक ने कहा-मित्र, कहो तो यह क्या बात है दमनक ने कहा-मैं मंदभागी क्या कहूँ? एक तरफ राजा का विश्वास और दूसरी तरफ बांधव का विनाश होना क्या करू? इस दुःख सागर में पड़ा हूं। यह कह कर लंबी साँस भर कर बैठ गया। तब संजीवक ने कहा-मित्र, तो भी सब विस्तारपूर्वक मनकी बात कहो। दमनक ने बहुत छिपाते-छिपाते कहा-यद्यपि राजा का गुप्त विचार नहीं कहना चाहिये, तो भी तुम मेरे भरोसे से आये हो। अतः मुझे परलोक की अभिलाषा के डर से अवश्य तुम्हारे हित की बात करनी चाहिये। सुनो तुम्हारे ऊपर क्रोधित इस स्वामी ने एकांत में कहा है कि संजीवक को मार कर अपने परिवार को दूँगा। यह सुनते ही संजीवक को बड़ा विषाद हुआ। फिर दमनक बोला-विषाद मत करो, अवसर के अनुसार काम करो। संजीवक छिन भर चित्त में विचार कर कहने लगा-निश्चय यह ठीक कहता है, संजीवक छिन भर चित्त में विचार कर कहने लगा-निश्चय यह ठीक कहता है, अथवा दुर्जन का यह काम है या नहीं है, यह व्यवहार से निर्णय नहीं हो सकता है। संजीवक फिर सांस भरकर बोला-अरे, बड़े कष्ट की बात है, कैसे सिंह मुझ घास के चरने वाले को मारेगा? विजय होने से स्वामित्व और मरने पर स्वर्ग मिलता है, यह काया क्षणभंगुर है, फिर संग्राम में मरने की क्या चिंता है? यह सोच कर संजीवक बोला-हे मित्र, वह मुझे मारने वाला कैसे समझ पड़ेगा? तब दमनक बोला-जब यह पिंगलक पूँछ फटकार कर उँचे पंजे करके और मुख फाड़ कर देखे तब तुम भी अपना पराक्रम दिखलाना। परंतु यंह सब बात गुप्त रखने योग्य है। नहीं तो न तुम और न मैं। यह कहकर दमनक करटक के पास गया। तब करटक ने पूछा-क्या हुआ? दमनक ने कहा-दोनों के आपस में फूट फैल गई. करटक बोला-इसमें क्या संदेह है? तब दमनक ने पिंगलक के पास जा कर कहा-महाराज, वह पापी आ पहुँचा है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये, यह कह कर पहले जताए हुए आकार को करा दिया, संजीवक ने भी आ कर वैसे ही बदली हुई चेष्ठा वाले सिंह को देखकर अपने योग्य पराक्रम किया। फिर उन दोनों की लड़ाई में संजीवक को सिंह ने मार डाला। बाद में सिंह, संजीवक सेवक को मार कर थका हुआ और शोक-सा मारा बैठ गया। और बोला"-कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है? दमनक बोला-स्वामी, यह कौनसा न्याय है कि शत्रु को मार कर पछतावा करते हो? इस प्रकार जब दमनक ने संतोष दिलाया तब पिंगलक का जी में जी आया और सिंहासन पर बैठा। दमनक प्रसन्न चित्त होकर" जय हो महाराज की"," सब संसार का कल्याण हो, " यह कहकर आनंद से रहने लगा।

      मानस ने कहा जिस प्रकार से पिंगलक ने अपने मित्र संजीवक को मार कर अपनी स्वतन्त्रता धन के साथ राज्य का विस्तार किया ऐसा ही हमे भी करना होगा और एक दिन कैलाश राजा हरिश्चन्द्र से मिलकर शाम के समय अपने कुछ वफादार सैनिको और अपने एक पुत्र के साथ अपने हवेली को आ रहा था। सभी घोड़े से थे, इनको मारने के लिये छानबे क्षेत्र छनवर के लाखों एकड़ का सुनसान इलाका जो था उसमें मानस द्वारा कैलाश की मृत्यु का चक्रव्युह रचा गया। जो बस्ती से दूर एकांत जंगली घास फुंस सरपत आदि से आच्छादित था। वहीं पर मानस ने अपने सशस्त्र सैकड़ों आदमियों को छुपा रखा था। जिसने कैलाशके घुड़सवार सैनिकों को चारों तरफ से घेर कर तलवार भाला लाठी आदि से आक्रमड़ कर दिया। हंलाकि कैलाश स्वयं एक श्रेष्ठ योद्धा के अतिरिक्त बहुत विद्वान ज्ञानी पुरष थे, उसे पता था। कि उसकी जीत यहाँ संभव नहीं होगी। क्योंकि उसकी संख्या बहुत कम है, फिर भी उसने शेर कि तरह दहाड़ते हुये कहा। अपने पुत्र और अंगरक्ष सैनिको का हौशला बढ़ाते हुए सब को खत्म कर दो क्या देख रहो हो। इस तरह उस एकांत में चारों तरफ घमासान तलवात भालें कि आवाज गुजने लगी। कैलाश कि उम्र उस समय 75 साल थी फिर भी वह 20 साल और 25 साल के योद्धा के समान धमासान नर संहार कर रहा था। उसने अच्छे-अच्छे के छक्के छुड़ा दिया था। लम्बा तगंड़ा साढ़े सात फिट का ज्वान था। उसके समान ही उसके सारे पुत्र भी सब लम्बे तगड़े हट्टे कट्टे और काफी मजदूर थे। यहाँ पर कैलाश के साथ केवल उसका सबसे छोटा वेटा था भी उसके साथ था। जिसकी अभी कुछ एक साल पहले हि शादी हुई है। यदि कैलाश के सभी पुत्र यहाँ एक साथ होते तो इन पर विजय पाना कठिन था। इसलिये ही मानस ने यह चाल चली थी। इनको एकान्त में घेर कर मारा जाये। जिसमें उसका साथ देने के लिये अंग्रेजों के भी आदमी आगये थे। यह लड़ाई कई घंटों तक चली अंत में मानस जो झाड़ियों के पिछे छुप कर सब देख रहा था। वह अचानक मौका पाकर झाड़ियों से बाहर निकल कर अपने तिस किलो वजनी तलवार के एक खतरनाक वार से कैलाश का सर धड़ से अलग कर दिया। अब वह कैलाश नाम का योद्धा जो जमिन पर पड़ा था। अभी तक कैलाश अपने बहुत साथियों के साथ जो उसके सबसे चहेते अंगरक्षक थे सब ने मिलकर एक साथ कुल सैकड़ों लोग को मौत कि गर्त में हमेशां के लिये सुला चुके थे। जिनमे कुछ अपने थे और कुछ मानस के आदमी थे। बाकी सब जो अभी तक बचे थे, उनको मारने के लिये मानस के सभी आदमियों ने एक साथ अंग्रेजों के सिपाहियों को भी एक साथ लेकर गुट बंदी कर लिया और उसी तरह से कैलाश के पुत्र पर आक्रमण कर दिया, जिस तरह से कौरवों ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को मारने के लिये महाभारत के युद्ध में सभी महारथी एक हो गये थे। इस तरह से कैलाशके पुत्र की भी बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई। यह सुचना नगर गांव में ऐसे फैली जैसे कि सुखी घास में आग फैलती है। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गई इसके साथ अंग्रेजों कि सेनाओं ने गांव और नगर में डेरा डाल दिया। एक तरह से कर्फ्यु लागू कर दिया गया। किसी को भी घर के बाहर निकलने कि इजाजत नहीं थी।

     राजा को जब यह खबर मिली कि उसका वफादार और विर योद्धा कैलाश और उसके पुत्र के साथ मार दिया गया। तब वह अपने कुछ वफादर सैनिको अंगरक्षको के साथ अपनी हवेली से कैलाश कि हवेली के लिये उसको श्रद्धान्जली देने के लिये उसी रास्ते से निकला। जहाँ पर कैलाश और उसके पुत्र की हत्या हुई थी। उसे क्या पता था कि उसका काल भी उसका इन्तजार कर रहा है। जिसके इन्तजार में घात लगाकर अंग्रेज सैनिक के साथ मानस के आदमी और राजा का दामाद बैठ हुए थे। उन्होंने सब मिल कर राजा के साथियों समेत राजा कि अंधेरी रात्री में बड़ी निर्मम हत्या कर डाली। जिसके कारण भयंकर कोहराम मच गया। इसी बीच राजा हरिश्चन्द्र का एक लौता दामाद राजा बना दिया गया। औरं इस तरह से अंग्रेजों ने अपने मन माफिक राजा बना कर अपनी नितियों को लागू करना सुरु कर दिया विजयपुर के राज्य को कई टुकड़ों में विभाजित कर दिया जिसमें से शहरी इलाको को अपने वस कर लिया और ग्रामिण इलाको का मानस को सबसे बड़ा जिमदार बनाया गया और कैलाश के बचें पुत्रों को कुछ सौ एकड़ जमिन जिने खाने का देकर बाकी सारी जमिन छिन ली गई। उस जमिन में से कुछ जमिन को मानस को दिया गया। बाकि जमिन को अंग्रेज के उन सिपाहियो सैनिको को बांट दिया गया, जो कैलाश और उसको पुत्र के साथ राजा की हत्या करने में और अंग्रेजों की सत्ता को लागू करने में, अंग्रेज सरकार कि मदत कि थी और कैलाश के व्यक्तिगत सैनिको को नष्ट कर दिया गया। इसके साथ भयंकर लुट पाट व्यभिचार किया गया। अंग्रेज सिपाहियों के द्वारा जिसमें अक्सर भारतिय सैनिक ही थे। जो दूसरे प्रान्तो से बुलाये गये थे। उनको वहीं गांव और नगरों में हमेशा के लिये वसा दिया गया। शसस्त्र हथियारों जिनके पास आधुनिक राइफल और बंदुके थी। इस तरह से यह सारे अंग्रेज सैनिक के वंशज आज राजपुत गहरवार नाम से विजयपुर के इलाके में पाये जाते है।

     अंग्रेजों ने अपने मकसद को तो प्राप्त कर लिया मगर कैलाश और मानस दो खानदान में भयानक गृहयुद्ध छिड़ गया जिसे अंग्रेजो को शान्त करने में पसिने छुटने लगे। जो छः पुत्र अभी जीन्दा है वह किसी तरह से भी अपने पिता कि हत्या का बदला लेने के लिये उतावले है। जिनको शान्त करने के लिये। अंग्रेजों के आदमियों का मानस की हवेली पर हमेशा पहरा रहता था। साथ में कैलाश के परिवार और उनके पुत्रों को मानस परिवार के किसी भी सदस्य से मिलने की मनाही थी। यदि ऐसा पाया गया तो मृत्यु दण्ड दिया जायेगा। एक तरफ तो मानस कि हवेली में चहल पहल और हमेंशा खुशी का माहौल रहता है और हमेशा मेहमान हाथी घोड़ो से आते जाते रहते थे। दूसरी तरफ कैलाशके परिवार में मातम का माहौल छाया रहता था। जिनमें तीन युवा और विधवां औरते भी थी जिनके पुत्र और पुत्री अभी छोटे-छोटे थे। उनके उपर जैसे दुःखों का पहाड़ गिर गया था। वह सब अभी अपने दुःखों से उभर नहीं पाये थे। कि एक दिन अचानक कैलाश के दो मझले पुत्रों ने अपने कुछ विश्वस्थ आदमियों के साथ मानस के बड़े पुत्र मुरली को, वहीं छानबे छनवर के एकान्त में घेर लिया। जब वह मिर्जापुर शहर से कुछ सामान ले कर, अपने कुछ आदमियो के साथ, शाम को वापिस आरहे थे। जहाँ पर उनके पिता कैलाश को मारा गया था। वह इलाका इतना विरान और एकांत दिन में ही था। जहाँ पर शिवाय कुछ पक्षिययों के और निल गांयों के कोई दूसरा व्यक्ती दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता था। उस पर भी शाम का समय तब सभी सर्दि के समय में अपने-अपने घरों में ऱजाईयों में दुबके हुये थे। कुछ आग का अलाव जला कर अपने शरीर को गर्म करते हुए अपने-अपने झोपड़े में पड़े हुये है। बाहर गांव में शिवाय कुछ अंग्रेज सिपाहियों के कोई नही, जो वहीं के निवासी है उनको भी नहीं पता कि इस समय यहा गांव से आठ किलोमिटर दूर छनवर के मैदानों में क्या हो रहा है? जहाँ पर आज मानस का बेटा मुरली अपने आदमिययों के साथ अपनी जाने का भीख मांग रहा है। जिस पर कैलाश के दो ज्वान वेटे तलवार और गंड़ासे से उसके एक-एक अंगों को काट रहे है। अपने पिता और भाई की हत्या का बदला लेने के लिये। इस तरह से कैलाश के पुत्रों ने मुरली को मार कर जैसे आग में जलते हुए घि डालते है यही काम किया। पहले तो किसी को पता ही नहीं चला कि मुरली कि हत्या कैसे हुई उनकी लास का भी पता नहीं चला क्योकि उनकी लास के टुकड़े करके रात्री के समय में गंगा कि धारा में प्रवाहित कर दिया गया था। जहाँ पर एक मछुआरें ने कैलाश के पुत्रों को देख लिया था। जिसके कारण उनको उस माझी कि भी हत्या कर के उसको भी गंगा नदी में डाल दिया। अंग्रेज सैनिको ने बहुत इस हत्या का पता लगाने के लिये बहुत छान बिन की लेकिन कुछ पता नहीं चला। इस बात का पता बहुत समय के बाद मानस को हुआ।

    मानस को इस बात का बहुत दुःख हुआ वह अभी किसी प्रकार का संघर्ष नहीं करना चाहता था क्योंकि उस समय मुरली के चार पुत्र और एक पुत्री है। जो अभी छोटे-छोटे बच्चे थे। जिनका नाम क्रमशः मातरूप, हरिशंकर, रमाशंकर, दयाशंकर जिसकी पालने पोषने शिक्षा के जिम्मेदारी मानस पर आगई थी। इसके अतिरिक्त दूसरा पुत्र विद्याधर जो अभी कुछ दिन पहले ही अपनी दूसरी शादी कि है। वह अपनी नई पत्नी के साथ हनिमुन मनाने के लिये कश्मिर गये है। विद्याधर की पहली पत्नी का देहान्त हो चुका है जिसे एक पुत्र शुबेदार और एक शुगना नाम कि पुत्री है। आगे चल कर विद्या धर के दूसरी पत्नी को तिन पुत्र हुये जिसमें केशव, बुटी, हिरा है यह सब अभी एक साथ ही रहते है। जो विद्या धर की पत्नी को अच्छा नहीं लगता है। वह अपने लिये नई हवेली बनाना चाहते है। जिसके लिये मानस ने कहा ठीक है तुम्हारे लिये एक हवेलि का निर्माण कर दिया जायेंगा, लेकिन तुम्हे मुरलि के बच्चों का ध्यान देना होगा। जब तक कि वह स्वयं को सम्हालने के योग्य नहीं हो जाते है। इस बात पर विद्या धर तैयार हो जाते है और एक नई हवेली का निर्माण किया जाता हो जिसमें वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहने के लिये जाते है और एक हवेली का और निर्माण किया जाता है जिसमें मुरली कि विधवा पत्नी अपने चार पुत्र और पुत्री के साथ रहने लगी।

    इस तरह से मानस अपनी पत्नी के साथ अपनी हवेली में रहते थे। अचानक उनकी पत्नी बीमार हो जाती है। जिसको गंगा पार से चिकित्सों को बुला कर दिखाया जाता है। लेकिन उनकी तवियत में सुधार नहीं आता है और कुछ महिने के बिमारी के बादे उनकी मृत्यु हो जाती है। क्योंकि वह अपने पुत्र मुरली से बहुत अधिक जुड़ी थी मुरली की अचानक युवा अवस्था मृत्यु को वह बर्दास्त नहीं कर सकी। इस तरह से मानस अकेले पड़ गये। उनकी उम्र अभी केवल साठ साल कि थी। वह उस समय भी बहुत युवा और शानदार पुरुष था, उसके पास जमिन जायदाद हाथी घोड़े की कोई कमी नहीं थी, ना ही किसी नौकर चाकर कि ही। उसे यह महशुष हुआ कि उसकी संपत्ति की देखभाल करने वाले कम है। जिससे उन्होने अपनी दूसरी शादी कर ली और उससे चार पुत्र पैदा किया। जो क्रमशः जीतनारायण पैदा हुआ। जो बहुत ताकतवर और सात फिटा का ज्वान थे एक बहुत कुशल तलावार बाज जो आगे चलकर उस क्षेत्र का सबसे ताकतवर के रूप में प्रसिद्ध हुए। जिसने अपने तेज से सारा इलाका अपने कब्जे में कर लिया। जो अंग्रेजों कि आखं का तिनका बन गया था। दूसरा फौजदार जो अंग्रेजों का पक्का वफादार खुफिया गुप्तचर बना आगे चल कर, तीसरा पुत्र अमर नाथ जो खुखांर आतंकी की तरह से उभरा, जिसके नाम से ही पुरा क्षेत्र कापंता था। वह किसी कि औरत को अपने पास रात विताने के लिये बुला लेता था। जो उसके आदेश का उलंघन करता था उसका सर कलम कर दिया जाता था। क्योंकि इनके साथ अंग्रेज भी थे। चौथा पुत्र माताचरन जो अंग्रेज का सिपाही बन गया।

       इधर मुरली के बड़ा लड़का बहुत बड़ा जुआरी बना मातारूप जो अपना जीवन विलाश और ऐय्यास पुर्वक विताने में ही व्यतित करता थ। लोगों कि पंचायत करना उसका प्रमुख कार्य था। जवकी मुरली का दूसरा वेटा हरीशंकर जिमदार बना और जमिन की देखभाल करने के साथ उसका सारा हिसाब किताब रखता है। हजारों एकड़ में जमिन फैली है जिसमें हजारों किसानो के परिवार कार्य करते है कितने मजदूर का जीवन उस पर आश्रित है। तीसरा वेटा मुरली का रमाशंकर भी अपने घोड़े पर सवार हो कर हरीशंकर के साथ किसानी के काम को देखता है। चौथा वेटा मुरली का बहुत पढ़ने लिखनें में तेज था। इसलिये वह सरकारी इंजिनियर बन कर शहर से बाहर चला गया और अपनी सारी जींदगी बाहर ही व्यतित करता है। विद्याधर के पुत्र पुत्री सभी बड़े हो जाते है सब का शादी विवाह हो जाता है।

        अभी भी कैलाश के पुत्रों नें अपने हृदय में उस दुःख समेटे हुए है किस तरह से मानस ने उनको पिता कैलाश की निर्मम हत्या का सड़यन्त्र रच कर उनको मारा था। इसी फिराक से वह सब थे कि किसी तरह से मानस छनवर के एकान्त में घेर कर इसका काम तमाम कर दिया जा। जिसका वह सब इन्तजार कर रहें थे एक दिन उनको मौका मिल गया। जब मानस अपनी हवेली से दूर अपने घोड़े से छनवर में घुमने के लिये अकेले ही चला गया वह से भुल ही चुका था। कि कुछ लोग उसकी हत्या के लिये उसके लिये जाल फैला कर रखा है। उसका काल उसे अकेला ले जा रहा है। जिसमें वह फंस गया जिसका फायदा कैलाश के पुत्रों ने उठाया। मानस को घेर कर सभी कैलाश के पुत्रों ने एक साथ मानस पर आक्रमण कर दिया उस समय मानस 80 साल का था। फिर भी काफी ताकतवर था उसने काफी समय तक अपनी रक्षा कि और लड़ता रहा लेकिन कैलाश के पुत्रों के सामने वह अधिक समय तक नहीं ठहर सका। कैलाश के पुत्रों ने उसके एक-एक अंगों को बारी-बारी काटा और उसको बहुत तड़पाया मरने से पहले और जब प्राण पखेरु मानस के निकल गये। तब कैलाश के पुत्रों ने मानस कि शरीर को झाड़ फुस एकत्रीत करके उसमें रखा दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। इस तरह से उन्होंने अपने पिता और भाई का बदला ले लिया, मानस और उसके पुत्र मुरली कि हत्या कर दिया, लेकिन उनको पता नहीं था कि इसका परिणाम उनके पूरे खानदान के नास का कारण बन जायेगा। जैसा कि क्रोध में आदमी अपना आपा खो देता है।

       कैलाश की अंतिम विधवा बहु जानती है कि यह ग़लत है इस लिये वह एक दिन अपने परिवार के सदस्यों बुला कर कहती है। कि हम सब जीव है हमारे कल्याण के लिये ही इस उपासक जीव को प्रभु प्रेरणा देना प्रारम्भ करते हुए कहते है कि हे जीव तुम सतत गतिशील कर्मशिल बनो अकर्मण्यता तुम्हे कभी भी दूरदूर तक स्पर्श ना कर सके, आत्मा शब्द का अर्थ ही होता है निरंतर गतिशील बने रहने वाला तत्व क्योंकि अकर्मण्यता वस्तुओं को जीर्ण शीर्ण कर देती है। जो जड़ता का प्रथम गुण है। इस तरह से कर्मशीलता निरंतर क्रियाशील बने रहना ही विकास और-और प्रादुर्भाव का कारण बनती है। अर्थात क्रियाशलता ही जीवन का मुल उद्देश्य स्वयं जीवन रूप निरंतर बहने वाली उर्जा है। बस तुम कुछ ऐसा उद्योग पुरुषार्थ करो की विद्वान महापुरुष तुम्हें आगे बढ़नें में तुम्हारी सहयता करें, जिससे तुम दिन प्रतिदिन निरंतर बढ़ते रहो और तुम्हारा झुकाव श्रेष्ठतम कर्मों की तरफ ही हो। जो तुम्हारे उत्थान के लिये ही हो, तुम्हारा पुरुषार्थ निरंतर सही दिशा में सार्थक अपने जीवन श्रेष्ठ उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हो। तुम हिंशा रहित अहिसंक कर्मो को करने वाले मनुष्यों में अग्रणी मनुष्य बनो, तुम्हारे जीवन के प्रत्येक कार्य से यह प्रतिबीम्बित हो कि तुम्हार कार्य मानव कल्याण के साथ मानव निर्माण सर्व जनहिताय और सर्वजन सुखाय हो। तुम्हारे किसी भी कार्य से किसी भी प्राणी का अन्याय से बिनाश ना हो, ना ही तुम्हारा कार्य किसी प्रकार से बिद्धन्सक हो। तुम परम ऐश्वर्यशाली मेरे समान मेरे ही सभी गुणों को धारण करने वाले और तुम्हारे जीवन में मेरे ही श्रेष्ठ गुणों की अधिकता है ना कि मेरे बिपरीत प्रकृत के गुणों की अधिकता अर्थात जणता और नस्वरता की मात्रा अधिकता हो। इस तरह से तुम मेरे साथ मेरे सान्निध्य से अपने सभी कार्य को सरलता से सिद्ध करने में सबल होगे। अर्थात तुम केवल प्रेय के पिछे न चल कर मरने वाले मरणधर्मा ना बन कर श्रेय के साथ चलो जिससे तुम अमरता की उपलब्धी अपने जीवन में कर सको। अपने जीवन को तुम ऐसा बना कर निश्चित रूप से उत्तम-उत्तम संतानो वालो बनों तुम्हारे जीवन की यह एक महत्त्वपूर्ण असफलता होगी यदी तुम्हारी संतान या प्रजा निकृष्ट स्वभाव कि होगी जो तुम्हारी ही शत्रु बनेगी जिससे तुम्हारा जीवन साक्षात नरक बन कर रह जायेगा। इस जीवन यात्रा में ऐसी समझदारी युक्त यात्रा करना कि तुम्हारी शरीर रोग से आक्रान्त ना हो। यह शरीर रूप तुम्हारा रथ मध्य में ही ना तुम्हारा साथ छोड़ दे यदि ऐसा हुआ तो तुम्हारी जीवन यात्रा कैसे पुरी होगी? इसके प्रती हमेशा सचेत रहना जैसे सूर्य पृथ्वी का के प्रती सचेत रहता है। जब तुम हमारा ध्यान करोगे तो हमेशा स्वस्थ रहोगे, दुःखी और बीमार रोग ग्रस्त वही होते है। जो अत्यधिक शारीरिक प्राकृतिक विषय भोग में ही आसक्त तल्लीन रहते है। तुम्हे यक्ष्मा रोग ना घेरे इस राज रोग के घेरे में मत आओ यदि तुम प्रकृती का सही सद् उपयोग करोगे तो इसके शिकार तुम कैसे फंस सकते हो? चोर लुटेरे तुम्हारे संपत्ती के स्वामी कभी ना बनने पाये इसके लिए तुम हमेशा सतर्क रहों और अपनी धन की रक्षा के लिये उचित प्रबन्ध करो। बिना श्रम या पुरुषार्थ के धन संपत्ती को प्राप्त करना भी एक प्रकार की चोरी या स्तेन ही है। इससे तुम हमेशा स्वयं को मुक्त रखो। यह चोरी बिभिन्न प्रकार के सट्टे लाटरी जुआ आदि इसी में आते है। यह मनुष्य कामचोर निकम्मा आरामपसंद विलाशी बनाते है। जिससे मानव भयंकर तम विपत्तीयों गन्दे व्यसनो और बिमारीयों के चपेट में आ जाता है। जिसमे से निकलना बड़ी मशक्कत के बाद भी मुस्किल होता है कभीकभी असंभव हो जाता है। पाप को अच्छी तरह से व्यक्ति या चित्रीत करने वाला पापी पुरुष तुम्हारें विचारों तुम्हारें मस्तिस्क पर कभी हाबी या तुम कभी उसके परबस ना हो, या वह पाप आत्मा तुम्हारें विचारों पर कभी भी शासन ना करें। तुम हमेंशा निश्चल एक शान्त चित्त रहो और अपनी इन्द्रियों को हमेंशा अपने वश में रखों और उनको अपने पर नियंत्रण रखो। गो पतौ अर्थात इन्द्रियों के स्वामी परमेश्वर के सान्निध्य में रहने से इन्द्रिया अपना मार्ग कभी नहीं भटकती है और जब ऐसा नहीं होता है तो यह इन्द्रिया मानव किसी काम को नहीं छोड़ती है हर प्रकार से पथ भ्रष्ट कर देती है। गो पतौ का मतलब वेद वाणी को जानने वाला परमपिता भी होता है इस प्रभु में तुम हमेशा केन्द्रित रहना अपना ध्रु परमेश्वर को बना कर रखना, जो परमेश्वर के समिप केन्द्रित रहा वहीं यहाँ बचा है। जिसने ऐसा नहीं किया वह यहाँ संसार रूपी चक्की के दो पाटों के बिच में फंस कर पिसता रहा उसका बचना असंभव हो गया। प्रभु ही इस विश्वचक्र के धुरी की मुख्य किल है। इसी में तुम हमेंशा स्थिरता से निवास करना। बहुत होना संसार में स्वार्थरत आत्म केन्द्रित बन कर मत रहना अधिक से अधिक प्राणियों और जीवों से अपना सम्बन्ध स्थापित करने का निरंतर प्रयाश करते रहना दूसरों के भी दुःख दर्द को समझना और एक से मैं बहुत हो जाउ इसका भाव या ख्याल रख कर जीवन को जीना और परमेश्वर सबसे अन्त में मंत्र से उपदेश कर रहा है, कि यज्ञमानस्य इस श्रृष्टी यज्ञ को चलाने वाला मुझ प्रभु के काम क्रोधादि पशुओं को बहुत ही सुरक्षित रखना। क्योंकि पानी को ज़्यादा सुरक्षित रखना आवश्यक नहीं लेकिन आग को बहुत सावधानी से रखने की ज़रूरत है अन्यथा इससे बहुत भयंकर कष्ट और दुःख उत्पन्न होता है। इसका मुख्य कारण है इनको असुरक्षित रखना और इनका लापरवाही के तरिके से उपयोग करना। जिस प्रकार से चिड़िया घर में मृगादि को बहुत अधिक बंधन में रखना आवश्यक नहीं होता है। लेकिन उसी चिड़िया घर में शेरादि प्राणीयों को बहुत शख्त पिजड़े में रखना कितना परम आवश्यक होता है? इसी प्रकार से इन पशु रूप काम क्रोधादि को भी बहुत नियन्त्रण में रखना आवश्यक होता है। क्योंकि यह कामादि के द्वारा ही संसार में प्रजनन आदि का कार्य निरंतर होता है। यह काम उर्जा ही संसार का मूल है मन की भी उत्पत्ती इस काम से हुइ है। मन से शरीर बना और शरीर से संसार बना है। प्रजानात्मक कार्य पवित्र होना चाहिये, लेकिन जब यह अनियन्त्रित हो जाता है, तो यह काम विकास के अस्थान पर विनास क्षयकारक बन जाता है। क्रोध भी आवेश शक्ति है लेकिन जब यह अनियन्त्रित हो जाता है तो विनाशकारी सिद्ध होता है और सब विद्धनों विपत्तीयों और अनर्थों का मुख्य है।

     जैसा की योगेश्वर कृष्ण गीता में कहते हैः-काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्धव:। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्। 37. काम: विषयवासना; एष: यह; क्रोध: क्रोध; एष: यह; रजो-गुण रजोगुणसे; समुद्भव: उत्पन्न; महा-अशन: सर्वभक्षी; महा-पाप्मा महान पापी; विद्धिजानो; एनम्इसे; इहइस संसार में; वैरिणम्महान शत्रु। हे अर्जुन इसका कारण रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। जब जीवात्मा भौतिक सृष्टि के सम्पर्क में आता है तो उसका शाश्वत प्रभु प्रेम रजोगुण की संगति से काम में परिणत हो जाता है अथवा दूसरे शब्दों में, ईश्वर-प्रेम का भाव काम में उसी तरह बदल जाता है जिस तरह इमली के संसर्ग से दूध दही में बदल जाता है और जब काम की संतुष्टि नहीं होती तो यह क्रोध में परिणत हो जाता है, क्रोध मोह में और मोह इस संसार में निरंतर बना रहता है। अत: जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु अनियन्त्रित काम है और यह काम ही है जो विशुद्ध जीवात्मा को इस संसार में फंसा रहने के लिए प्रेरित करता है। क्रोध तमोगुण का प्राकट्य है। ये गुण अपने आपको क्रोध तथा अन्य रूपों में प्रकट करते हैं। अत: यदि रहने तथा कार्य करने की विधियों द्वारा रजोगुण को तमोगुण में न गिरने देकर सतोगुण तक ऊपर उठाया जाए तो मनुष्य को क्रोध में पतित होने से आत्म आसक्ति के द्वारा बचाया जा सकता है। अपने नित्य वर्धमान चिदानंद के लिए भगवान ने अपने आपको अनेक रूपों में विस्तार कर लिया और जीवात्माएँ उनके इस चिदानंद के ही अंश हैं। उनको भी आंशिक स्वतंत्रता प्राप्त है, किन्तु अपनी इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके जब वे सेवा को इंद्रिय सुख में बदल देती हैं तो वे काम की चपेट में आ जाती है।

     भगवान ने इश सृष्टि की रचना जीवात्माओं के लिए इन कामपूर्ण रुचियों की पूर्ति हेतु सुविधा प्रदान करने के निमित्त की और जब जीवात्माएँ दीर्घकाल तक काम-कर्मों में फंसी रहने के कारण पूर्णतया ऊब जाती हैं तो वे अपना वास्तविक स्वरूप जानने के लिए जिज्ञासा करने लगती हैं। कैलाश की आखिरी बहु का उपदेस उसके घर के किसी सदस्य के गले नहीं उतरा उसी प्रकार से जिस प्रकार से किसी ज्वर ग्रस्त मनुष्य को मिठा रस मिठा नहीं लगता है। बदलें में घर के और सदस्य उसे भिरु और मुर्ख कहने लगे और कहा कि यह जाहिलों का कार्य है जिसे तुम परमेस्वर का उपदेस कहती हो। अपनी बात को लोगों ने ठीक कहा कि यह हत्या और बदले का कार्य सर्वथा उचित है। जिससे नाराज हो कर कैलाश कि आखिरी बहु जो बनारस जिले के एक जमिदार कि पुत्री थी वह अपने पिता के घर वहाँ जा कर रहने लगी क्योंकि उसे इस हत्या का परिणाम पहले से जैसे ज्ञात हो गया था कि आगे क्या होने वाला है?

      मानस के वेटों को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता कि निर्मम हत्या कर दिया गया है। कैलाश के पुत्रों के द्वारा तब उन सबने एक साथ कैलाश की हवेली पर रात्री के समय हमला बोल दिया और उसम समय जो उस घर में उपस्थित थे सबको अपनी तलवार और गड़ासे भाले से मौत के घाट उतार दिया जिसमें बच्चे औरते थी। इसके बाद पुरी हवेली में आग लगा दिया गया। जिस सामुहिक नर संहार मानस के कुछ एक सदस्य को छोड़ कर सभी लोग मारे गये थे। यह दृश्य देख कर कितनो के दृदय ने चलना बन्द कर दिया। मानस पुत्रों के हाथों से केवल कैलाश दो पुत्र और उसके परिवार बाल बच्चों के साथ और एक अंतिम विधवा बहु ही बची थी। जो उस समय कैलाश की हवेली में नहीं थी वह अपने मायके चली गई थी। वह उसी पुत्र की पत्नी थी जिसकी हत्या कैलाश के साथ कि गई थी। वह बहुत दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति की नेक महिला थी और बहुत धनी थी। वह प्रायः अपने मायके ही रहती थी। इस तरह से मानस के पुत्र उन सब को तलास ने लगे और जो उनके हाथ में नहीं आये थे। कुछ समय के बाद पता चला कि कैलाश के बचे पुत्रों अपना नया निवास कुसेहरा के जंगल में बसाया है, जो विन्ध्य पर्वत पर है।

      कैलाश के परिवार को यह मानस के सभी लोग मिल कर एक-एक कर के बारी-बारी कर सभी पुत्रों और पौत्रों को धोखें से चाल चल कर अंग्रेजों कि सहायता से एक-एक कर इस तरह से मारने लगे बारी-बारी करके जिससे किसी को सक भी ना हो और सब मारे भी जाये। अर्थात खाने में जहर दे दिया या फिर दुर्घटना करा दिया। सराकारी अंग्रेज़ी हुकुमत ने उन पर तरह-तरह के आरोप को लगा दिया था।

     क्योकि अंग्रेजों को एक बहुत बड़े भुभाग पर अपना रेल्वेस्टेशन बनाना था। जिसका कैलाश का परिवार विरोध कर रहा था। क्योंकि वह जमिन बाज़ार से सटी हुई किमती थी। जो कैलाश के परिवार के नाम थी। इस तरह से अंग्रेजों ने मानस की मृत्यु के बाद उनके तीनों वेटों को जीत नारायन, अमर नाथ, फौजदार को अपने हाथ का मोहरा बना कर कैलाश के सारे वंश का हि सफाया कर दिया। शिवाय कैलाश की अन्तिम बहु को छोड़ कर, उसके लिये कुछ सौ एकड़ जमिन को छोड़ कर और उसकी सारी जमिन को मानस के परिवार को दे दिया गया।

       जिस जमिन पर बाद में मुरली के पुत्रों का कब्जा बन गया। जब मुरली के पुत्र रमासंकर और उनके पुत्र संतोष कि शादी कैलाश की आखिरी बहु के भाई अयोध्या की पुत्री राजकुमारी के साथ हो गया। क्योंकि यह जमिन की देखभाल करते थे। जीतनारायण ने अपनी एक नौटंकी की कंपनी खोल रखी थी। जो हमेंशा यात्रा पर ही रहता था। जब वह आता जो इधर गुंडे किस्म के लोग उभरते उसका सफाया कर देता था। अंग्रेज सभी का उपयोग मतलब से करते थे। जीतनारायण जो अंग्रेजो के कहने पर रेत कि खान को भी देखता था। जीतनारायण के ना रहने पर रेत कि खान को अमरनाथ और फौजदार दोनो भाई देखते थे। यह दोनो की चरित्र हिनता से साधरण जनता ने इनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस तरह से इनकी दुश्मनी ऐसे लोगों से होगई। जो इनके आतंक और अत्याचार से अत्यधिक दुःखी और परेशान थे। जिसके लिये उन्होंने एक गुट बना लिया। जिसका नाम तीवारी गुट था, जिससे इन दोनो गुटों की लड़ाईयाँ अक्सर होती रहती थी। दूसरी तरफ मुरली का बड़ा लड़का मातारूप भी इनके समान ही था। वह लड़ाईयाँ नहीं करता। लेकिन जुआरी और विलाशिता के लिये बहुत समाज में प्रसिद्ध हो चुका थ। दुसरों की औरतों को देखना उसकी बुरी आदत थी। जिसके खिलाफ उस क्षेत्र के यादव लोगों ने विद्रोह कर दिया। जिसके लिये बराबर लड़ाई इन गुटों में होती कभी इस गुट के एक दो आदमी मारे जाते, कभी कभी। इन गुटों के पास अपनी बंदुक और दूसरे हथियार भी थे। जिसका यह सब ग़लत उपयोग करते थे। जिसकी वजह से आगे चल कर अंग्रेजो ने इन गुटों में समझौता कराने के लिये जमिनो का और बटवारां कराया। जिसके जिम्मे जितनी जमिन थी। वह जमिन उन सब को दे दिया गया। इस तरह से जमिन कम होने लगी और सारे भाई एक में रह नहीं पाये। उन्होने अलग होने का फैसला किया और सबने अपने-अपने लिये अलग-अलग घर बनावाया। सब का परिवार बढ़ रहा था। सबके कई-कई पुत्र और पुत्रीयाँ थी।

       इस तरह से मानस के वंश में इस समय उसकी पहली पत्नी से दो पुत्र में मुरली और विद्याधर, जिसमें से मुरली के चार पुत्र और विद्या धर के पहली पत्नी से एक पुत्र और दूसरी पत्नी से तीन पुत्र कुल मिला कर चार पुत्र विद्याधर के भी है और स्वंय मानस के दूसरी पत्नी के चार पुत्र यह सब मिला कर कुल मानस के वंश में छः पुत्र और आठ पौत्र है। जो लग भग हम उम्र ही है। उन सबने अपनी सारी समंप्ती का बटवारां कर लिया जिसमें जमिन के अतिरिक्त हाथी घोड़े सोने चादी भी उसके साथ नौकर चाकर भी बट गये।

      इस पर भी अंग्रेज शान्त नहीं हुए उनको और जमिन की ज़रूरत पड़ गई। रेल्वेस्टेसन के अतिरीक्त दूसरा बड़ा यार्ड बनाने के लिये। जो पचास एकड़ का जमिन का टुकड़ा शहर के पास का था। जो जमिन मानस के दूसरी पत्नी के पुत्रों कि जमिन थी। जिस जमीन से काफी आमदनी होती थी। क्योंकि वह आम अमरुद का बगिचा था जिसको नष्ट करके अंग्रेज वहाँ रेल्वे का यार्ड बनाने का प्रयाश कर रहे थे। जब इसकी बात एक अंग्रेज अधिकारी ने जीतनारायण मानस के बड़े वेटे से कि तो वह भड़क गया और उस अंग्रेज अधिकारी को अपनी दलान से मार कर भगा दिया। यह कहते हुए कि अब यहाँ कभी मत दिखाई देना, नहीं तो मैं तुम्हे जान से मार दुंगा। इस बात का पता जब और बड़े अंग्रेज अधिकारियों को चला तो उन सबने एक नई कुरुप योजना बनाई। जीतनारायण जो इस समय सबसे अधिक तपा था। उसको मारने की, जिसके लिये उन्होंने तिवारी गुट को अपने साथ ले लिया और उनको रेत कि खान देने का वादा किया। जिससे बहुत बड़ी आमदनी जीतनारायण बंधुओं को होती थी। जिसको छिन कर मानस के पुत्र और उनके मुरली विद्याधर के पुत्रों की कमर को तोड़ना चाहते थे।

     जीतनारायण को जब यह पता चल कि उसको मारने के लिये अंग्रेज उसके शत्रुओं से मिल कर उसके लिये जाल विछा रहे है। तो उसने भी अपने को मजबुत करने के लिये जनता को अपने साथ करने के लिये। एक योजना बनाई, जैसा कि हम सब जानते है मानस खानदान और कैलाश खानदान कई पुस्तों से दुस्मनी चल रही है। जिसका अंत लगभग हो चुका है। आज के तारिख में केवल मानस कि अंतिम बहु के कोई नहीं जिन्दा बचा है। जीतनारायण एक योद्धा के साथ काफी बुद्धिमान और कलाकार प्रकृति का आदमी है। जो जनता के भावों को समझता है। उसने मानस की बहु को अपने साथ मिलाने कि योजना बनाई। इस तरह से जो मानस के पक्ष में जो साधरण जनता नहीं। जो कैलाश के वफादार लोग है, जो अपने नेता के तौर पर कैलाश की बहु को ही आज भी देखते है। जीतनारायण यह विचार करता था कि इस तरह से यदि हम अपने लोकल लोगों को अपने साथ करलेगें तो हम अंग्रेजो का सामना कर सकते है। जैसा कि हम जानते है कि कैलाश की आखिरी बहु जो अपने मायके में रहती है। जिसके पिता बहुत बड़े वनारस के जमिदार और धनी है। वहाँ पर एक बार जाकर जीतनारायण ने कैलाश की आखिरी बहु से मिलने का निर्णय किया। जाने से पहले उसने अपने आने का संदेश भेज दिया। कैलाश की बहु भी यह लड़ाई झगड़ा नहीं चाहती थी और वह किसी तरह से इस लड़ाई को खत्म अपने जीवित रहते ही करना चाहती थी। इसलिये वह जीतनारायण का संदेश स्विकार कर लेती है और उससे मिलती है। कैलाश कि वहु उस समय तक वृद्धा हो चुकी थी उसकी उम्र 90 साल के करीब थी। जबकि जीतनारायण 60 साल का हो चुका था। यह राजनीतिक मुलाकात थी। दोनों कि मुलाकात एक हवेली में बहुत सारे वफादार आदमीयों मध्य निश्चित किया गया। जहाँ पर जीतनारायण पहुंच कर अपनी मनसा को कैलाश की बहु के सामने रखा और उसने कहा कि यह अंग्रेज हमारी दुस्मनी का ग़लत इस्तेमाल कर रहे है। हम ऐसे ही लड़ते रहे तो हमारे और आपके आदमी में कोई भी जिन्दा नहीं बचेगा। इस तरह से हम सब को ही मार दिया जायेगा। जैसा कि कहा गया है कि बाहरी शत्रु से लड़ने के लिये अपने आंतरिक शत्रुता से मिल जाना चाहिये। इस समय हमारे साथ अंग्रेज धोखे पर उतर आयें है। जो हमारे पिताजी (मानस) के साथ मित्रता की थी और बहुत सारे वादा किया था। उसको वह सब भुल चुके है। उनका केवल एक मतलब है हम सब का नर संहार। कैलाश कि बहु ने कहा हम युद्ध के पछ में कभी नहीं थे। यह तो हमारें बड़े भाईयों के सर पर खुन सवार हो चुका था। जिसका बदला लेने के लिये उन्होनें अपना सब कुछ गवां दिया। यदि तुम्हे हमारी बची हुई जमिन चाहिए तो तुम उसको भी ले सकते हो। उसके लिये तुम्हे हमारे परिवार के एक सदस्य को अपने परिवार में सामिल करना होगा। इस तरह से हमारी दुस्मनी मित्रता में बदल सकती है। मैंने सुना है कि तुम्हारें भाई मुरली के चार पुत्रों में रमासंकर का दूसरा पुत्र शादी के योग्य हो चुका है। उससे मैं अपने भाई कि पुत्री की शादी करा देगे। जिससे हमारी शत्रुता के अस्थान पर मित्रता के विजारोपड़ होगा। जिसके लिये जीतनारायण तैयार होगये। क्योंकि वह किसी भी किमत पर कैलाश के आदमियों को अपने पक्ष में करना चाहता थे। इस तरह से फैसला हो गया और इस खुस खबरी के साथ जीत नारायन अपने घर पर आगये और यह बात मुरली के पुत्रों को बताया। साथ में नगर में भी फैला दी गयी कि अब मानस और कैलाश खानदान अपनी शत्रुता को भुल कर आपस में मित्रता कर रहे है और मानस खानदान के लड़के कि शादी कैलाश खानदान के लड़की से तय हो चुकी पूरे नगर में इसका ढिढोरा पिट दिया गया।

     इसके साथ विवाह कि तारिक तय कर दिया गया और विवाह कि चारों तरफ तैयारी होने लगी। दूर-दूर तक सभी को निमंत्रण विवाह में सामिल होने के लिये भेजा गया। निश्चित तारिख पर रमासंकर के दूसरें वेटे संतोष और अयोद्धा प्रसाद जो कैलाश की अंतिम बहु के छोटे भाई है उनकी पुत्री राजकुमारी का विवाह वैदिक मंत्रोच्चारण के मध्य संपन्न हुआ। बारात में सैकड़ो हाथी घोड़ा हजारों बारती सब अयोद्धया प्रसाद के घर पर ही दो तीन रहे और उनके स्वागत खाने पिने की रहने की किसी प्रकार कि कमी नहीं कि गई थी। जब वहाँ से बारत वापिस चली तो कई पंड़ावों के बाद अपने गांव पहुंची। वाहाँ पर भी पूरे गांव और नगर के नर नारी सबी लोगों ने उन सब का भव्य स्वागत किया और नये विवाह के बंधन में बधें दामपत्य जोड़ी को आशीर्वाद के साथ, बहुत सारा भेट सभी लोगों के द्वारा दिया गया। जिसके साथ पूरे नगर और गांव में जैसे दिवाली का माहौल हो गया। हर तरफ घी के दिये जलाये गये और कमना कि गई यह कैलाश और मानस खानदान की प्रसन्नता हमेशा ऐसी ही बनी रहे। लेकिन यह बात अंग्रेजो को अच्छी नहीं लगी।

     एस दिन रात्री में जीतनारायण को पकड़ने के लिये भारी मात्रा में अंग्रेज़ी सिपाही गांव ब्रह्मपुरा में आ टपके और फायर करना सुरु कर दिया जब गांव वालों ने विरोध किया। तो उन पर गोलीयाँ बरसाई जाने लगी। उस समय अंग्रेजों का एक आफिसर और उसके साथ पुरी एक सैनिक टुकड़ी भी जो सब हथियार बंद थे। जिसमें कुछ एक को छोड़ कर सभी भारतिय सैनिक ही थे। जब गांव वालों ने देखा कि अंग्रेज सिफाई गोलियों कि बारिस कर रहें है। तो सभी गांव के आदमी बाहर आगये जिसमे हजारों कि संख्या में युवा और तलवार बाज थे। उन्होंने अंग्रेज सिपाहियों पर हमला बोल दिया, कुछ ऐसे भी गांव बड़े किसान थे। जो जीतनारायण के लिये अपनी जान कि बाजी लगाने में भी पिछे नहीं हट रहे थे। गांव के बड़े किसाने ने अपने सरदार कि रक्षा करने के लिये अपनी-अपनी बंदुके निकाल लिया और अंधाधुन फायरिगं दोनो तरफ से होने लगी। कितनी क्रास फयरिंग हुई जिससे दोनो तरफ लासों पर लासें गिरने लगी। गांव के लोग भारी पड़ने लगे। कुछ ही घंटें में जीतनारायण और उसके भाईयों ने किसानों मजदुरों और गांव वालों कि मददत से अंग्रेज सिपाहियों को अपने कब्जे में कर लिया सब जो बचे थे। सब का सर कलम करके गंगा की धारा में बहा दिया। जैसे गंगा के पानी में खुल घोल दिया गया हो। जो रात्री के चन्द्रमा के प्रकाश में ऐसे चमक रहा था जैसे नदि ही खुन कि बह रही हो। पूरे क्षेत्र में हाहा कार कोह राम जैसा मच गया। सब अपने-अपने घरों से बाहर आ गये। रात्री के समय दुसरी सेना बी नहीं आ सकि ना हि उनके पास इसकी सुचना ही जिल मुख्यालय पहुंच पाई कि अंग्रेज के सभी सैनिक और अधिकारी मारे गये।

      जब यह सुचना अंग्रेजों के कानों में पहुंची तो उन्होंने सुबह हि ब्रह्मपुरा में हजारों कि सेना में पुलिस फोर्स को जिला मुख्यालय मिर्जापुर से भेज दिया और पूरे क्षेत्र को एक छावनी में बदल दिया गया और ब्रह्मपुरा नगर के हर गांव के हर घर की तलासी कि जाने लगी। जहाँ पर केवल बच्चे बृद्ध औरते ही मिली वहाँ पर कोई भी युवा या जिसकी तलास अंग्रेज सेना और पुलस को थी, उसमें कोई नहीं मिला। क्योकि जीतनारायण जानता था। कि यह अंग्रेज सुबह ही जायेगे और उससे पहले ही वह अपने मुख्य आदमीयों के साथ ब्रह्मपुरा कि सिमा को छोड़ कर विन्ध्य पर्वत की पहाड़ियों और गुफाओं में अपनी मंडली के साथ जा कर रहने लगा। इधर अंग्रेज सैनिक और अधिकारी निर्दोष जनता और जीतनारायण के दूसरें आदमियों और दुर के रिस्तेदारों पर अपने आतंक का कहर ढाने लगे। कितने निर्दोष लोगों के महिलाओं बच्चों और बृद्धों को जान से मार दिया और कितने सारे लोगों को धरों में जिन्दा जला दिया गया।

      जब जीतनारायण को यह सब ज्ञात हुआ तो उसने अपनी एक डकैतो कि सेना खड़ी कर ली। रात को ब्रह्मपुरा में आते और सुबह से पहले ही सब विन्ध्य की पहाड़ीयों में खो जाते थे। जहाँ पर अंग्रेंजों कि दाल नहीं गलती थी और रात्री के समय सभी अंग्रजों और अंग्रेज अधिकारी जो भी मिल जाते थे। वह सब मारें जाते जीतनारायण और उसके आदमियों के द्वारा। ब्रह्मपुरा के नगर वासियों के लिये जीत नारायन कि गैंग भगवान के समान थी भले ही वह मर जाये। लेकिन साधरण ब्रह्मपुरा का एक भी नागरिक जीतनारायण के खिलाफ एक भी शब्द बोलने के लिये तैयार नहीं थे। अंग्रेजों के नाको में लोहे का चना चबवा दिया। मिर्जापुर नगर के सबी बड़े व्यापारी जीतनारायण के सेना के लिये हर प्रकार के धन साधन को पहुंचाते थे। उनके पास जीतनारायण का पत्र पहुंचता और वह व्यापारी सामान भेज देता था। जो नहीं भेजता था और अंग्रेजो के साथ देते थे। उनके जितनारयन गैंग के लोग चुन-चुन कर मौत के घाट उतार दिया करते थे। इस तरह से जीत नारायन पूरे मिर्जापुर में एक ऐसा नाम होगया। जिसके नाम से ही लोगों की पैंट गिली हो जाती थी। जितनी भी अंग्रेज़ी सेना रात्री के समय ब्रह्मपुरा नगर में प्रवेश किया। उन सब को उसी छानबे छनवर में खदेड़ सभी ग्रामवासियों और साथ नगर वासी एक साथ किचड़ में फंसा कर उन सबका काम तमाम कर देते। वहाँ का राजा जीतनारायण ही बना रहा और उनको अस्त्रों को छिन कर उनके उपर ही हमला किया जात था। अंग्रेज भी उससे हार मानने वले नहीं थे। फिर भी सभी अंग्रेज सतर्कता बरतने लगे और रात्री के समय ब्रह्मपुरा के गांवों और नगर में प्रवेश करने से बचने लगे। क्योंकि अंग्रेज दस लोगों को मारते तो जीतनारायण कि सेना 20 अंग्रेज सिपाही और अफसरो को मारती थी। अंग्रेज डाल-डाल चलते जो जीतनारायण पात-पात चलता था और कई सालों तक अंग्रोजों को चकमा दे कर उनको और उनके आदमियों को मारते रहा।

      जीतनारायण कि सेना के लिये हथिययार गोला बारुद और खाद्य सामग्री आदि को जब ज़रूरत पड़ती। वह सब इलहाबाद से कलकत्ता कि तरफ जाने वाली ट्रेनों को छनवर के एकान्त में रोक लेते थे। रात्री के समय में जिससे वह अपने ज़रूरत कि सभी बस्तुओं को लुट लेते थे। इसके अतिरीक्त अंग्रेज यात्रियों से उनका धन भी छिन लेत थे। ऐसा भी होता था। कभी कलकत्ता से-से दिल्ली के लिये ट्रेन भी लुट लि जाती थी। ट्रेन के चालक उस मिर्जापुर के इलाके से इतने भयभित हो चुके थे। जहां जीतनारायण की गैंग का आदमी भी आकर यह लुट पाट को अंजाम देता था। अंग्रेजों को अपना सभी सामान दिल्ली से कलकत्ता और कलकत्ता से दिल्ली का यह रेलगाणियों का मुख्य रुट था। जो चारों तरफ जंगल और पहाड़ियों से घिरे होने के कारण अंग्रेजों के लिये इस गैंग को बस में करना एक समय मुस्किल लगने लगा और वह जीतनारायण गैंग नैक्सल घोषित कर दिया गया। और उससे भिड़ने से बचने लगे थे। साथ में लाखों रुपये का इनाम भी घोसित कर दिया था। इस सभी कार्य को अक्सर जीतनारायण का भाई अमरनाथ काफी तेज और दबंग किस्म का व्यक्ती के साथ अपनी सेना का नेतृत्व बहुत करता था, उसकी आवाज में ही एक अजिबों किस्म का आकर्षण और तेज था, और सारी खुफिया जानकारी अंग्रेजों कि जीतनारायण का तीसरा भाई फौजदार एकत्रित करके जीतनारायण तक पहुंचाता था। इस तरह से जीतनारायण के दोनों भाई उसके दो हाथ के समान हो चुके थे। और आंतरिक किले कि सारी व्यवस्था को मुरली के पुत्र के साथ विद्या धर देखता था। इन सब भाईयों ने अपनी योग्यता पर उस समय इतना अधिक धन सम्पदादि लुट कर जमा कर लिया था। जिसको रखने के लिये कि और अपने पूरे आदमी और परिवार के साथ रहनें के लिये। जमिन के अन्दर-अन्दर ही एक विशाल किला बनवाने का कार्य शुरु कर दिया, जिसको कुछ एक सालों में ही बड़ी सफाई से पुरा भी कर लिया और उसमें अपने सभी अदमियों के साथ जीतनारान राजा कि तरह वहाँ पर रहने लगा। वह किला जमिन के अन्दर इतना बड़ा था कि उसमें लाखों लोग आराम से कई सालो तक रह सकते थे। वहाँ किसी अंग्रेज आदमी और उसको गुप्तचर का पहुचना मुस्किल ही नहीं असंभव था। अंग्रेजों के अधिकारियों के नाक के निचे इतना बड़ा विशाल कार्य हो गया। जिसकी उनको कानो कान खबर नहीं हुई. उस किले में पहुंचने का रास्ता सुरंग के रास्ते से पहाड़ियों से हो कर जाता था, कई रास्ते थे। एक रास्ता नदि किनारे भी निकलाता। जिस रास्ते से कभी-कभी जीतनारायम गंगा दर्शन के लिये भी आता। जहाँ पर रेत की खान थी, एक दिन किसी मुखविर ने जो तिवारी गुट का था जिनका दबदबा नदी के पार उसी प्रकार से था। जिस प्रकार से नदि के इस पार विंध्य क्षेत्र में जीतनाराययन और उसके भाईयों का था। एक अंग्रेज अधिकारी को यह सुचना दि की जीतनारायण हर मांह की आमावश्या के दिन रात्री के तिसरे पहर में गंगा स्नान के लिये आता है।

     अंग्रेज अधिकारियों ने गुप्त रूप से अपने सशस्त्र सैनिकों को रेत की खानों में छुपा दिया। साथ में तीवारी गुट के कई खतरनाक गुर्गों को भी सामिल किया गया था और जब जीतनारायण अपने कुछ बिशेष आदमियों के साथ सुरंग के रास्ते से गंगा किनारे नहाने के लिये आया, अंग्रेज सैनिको नें उसकों पकड़ने के लिये उसको चारों तरफ से घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिगं शुरु कर दिया। जिससे पहले तो जीतनारायण और-और उसके आदमी सकते में आगये। इसके साथ ही सबने अपना मोर्चा सम्हाल लिया और दोनों तरफ से नदि किनारें रेत कि खदान में बंदुखें गरजने लगी। जिसमें से एक जीतनारायण का अंग रक्षक वापिस जीतनारायण को किले के दरवाजे के पास ले गया और भाग जाने के लिये कहा। लेकिन जीतनारायण ने कहा कि हमने कभी पिठ दिखा कर भागना नहीं सिखा है। काफी समय तक यह संघर्ष चलता रहा अंत में जीतनारायण और उसके आदमियों कि गोलिया खत्म हो गई और उसके आदमि भी अंग्रेजो के गोलियों के शिकार हुए।

     जिसके बाद जीतनारायण ने आत्म समर्पण करना ही उचित समझा और अपनी सफेद पगड़ी को अपने सर से खोल कर अपनी बंदुक कि नाल पर रख कर हवा में लहराने लगा। उस समय सूर्य अपनि लालिमा के साथ आकाश में प्रकट हो रहा था। जीतनारायण को जब अंग्रेज आफिसर नें देख कर अपने सेना को गोलीबारी रोकने का हुक्म देता है और कहता है गिरप्तार कर लो, हमें यह आदमी जिंदा चाहिये। अंग्रेज सिपाही जीतनारायण को पकड़ कर उसके हाथों में हथकड़ी डाल देते है। लेकिन किसी भी अंग्रेज सैनिक कि या अंग्रेज अधिकारी की जीतनारायण पर हाथ उठाने या मारने कि हिम्मत नहीं हुई। जीतनारायण को पकड़ कर अंग्रेज सिपाही गंगा नदी के द्वारा ही नाव से ही मिर्जापुर के चुनार के किले में ले गये और वहाँ पर उसकों कैद कर दिया। इसके बाद उसे यातना दे कर उससे पुछ ताक्ष करने का प्रयास करने लगे, लेकिन उससे कुछ काम कि जानकारी नहीं देने पर, बाद में जीतनारायण पर राजनीतिक कैदि बनाया गया, और उनके उपर लोगों को और साधारण जनता को भड़का कर आंदोलन का रूप दिया जिसमें हजारों लोगों कि जान गई। इसका आरोप लगाया गया।

    इधर जब ब्रह्मपुरा नगर और यहाँ के नागरिकों पता चला कि जीतनारायण को अंग्रेजों ने पकड़ लिया है। तो जीतनारायण के किले का साशक उसका छोटा भाई अमरनाथ बन गया। और उसने हर एक प्रयास किया की जीतनारायण को अंग्रेजो के कैद से मुक्त कराया जाये। उसके लिये उसने एक बार चुनार के किले पर भी हमला किया लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। क्योंकि यह बात अंग्रेज अफसर जानते थे। कि यह आदमी बहुत खतरनाक है इसको यहाँ रखने का मतलब बहुत बड़ा बिद्रोह होगा। इसलिये रात्री के समय ही जीतनारायण और उसके कुछ और आदमियों को ट्रेन सें अपनी राजधानी कलकत्ता भेज दिया। कड़ी सुरक्षा के विच और वहाँ पर भी नहीं रखा, वहाँ से भी एक पानी की जहाज से काले पानी की जेल में भेज दिया गया। जहाँ पर जीतनारायण और उसके आदमियों के साथ बहुत जुल्म और अमानविय व्यवहार किया जाता तरह-तरह की यातना दि जाती थी।

     अमरनाथ ने जब ब्रह्मपुरा के किले पर अपना कब्जा किया तो वह पुरी तरह से जमिन के अन्दर ही रहता था। उसने एक जोरदार हमला करके तिवारी गुट का सारा नामों निसान मिटा दिया और बहुत लुट पाट करने के बाद उनके गांव को पुरी तरह से आग के हवाले कर दिया गया। क्योंकि उसको यह ज्ञात हो चुका था। कि जीतनारायण के बारे में गुप्त सुचना देने वाला यह तिवारी गुट ही था। उसनें उस रास्ते को जो नदि कि तरफ खुलता था। उसको हमेशा के लिये बन्द करा दिया जो नदी के किनारे के लिये जाता था। वह केवल उन रास्तो का ही प्रयोग करता था जो पहाड़ीयों और जगंलों में निकलती थी। धन कि कोई कमी नहीं थी। क्योंकि काफी धन संपदा जीतनारायण ने एकत्रित कर रखी थी। जो उसके भाईयों और भान्जों के लिये बहुत थी। उसके अतिरीक्त जमिन जो मानस और कैलाश की थी उसमें भी बहुत कुछ हर साल पैदा होता था। जो गुप्त रूप से किला में पहुंच जाता था। क्योंकि अब भी लोग वफादार थे। क्योकि जमिन का सारा व्यापार और कारोबार मुरली के दो वेटे ही देखते थे। हरिशंकर और रमासंकर इनका व्यवहार साधरण जनता के साथ बहुत अच्छा और मजबुत था। ऐसे ही समय गुजरने लगा।

     एक दिन अंग्रेज अधिकारीयों को वह गुप्त मार्ग एक जंगली गड़ेरियें ने दिखा दिया जो ब्रह्मपुरा किले के अन्दर जाता था। जहाँ पर अचानक अंग्रेज अधिकारी अपनी हजारों की सेना को लेकर पहुंच गये और अमरनाथ के साथ उसके भाई फौजदार को भी गिरप्तार कर लिया और उनको मिर्जापुर के कारगार में डाल दिया। ब्रह्मपुरा का किला अब मुरली के पुत्रों के अन्तर्गत में आ गया। इनका स्वाभाव ठीक था इस लिये अंग्रेजों नें उनको भी कुछ समय के लिये जेल में डाला मगर कोई गवाह उनके खिलाफ ना मिलने के कारण मुरली के लड़के मातासंकर, हरीसंकर, रमासंकर को छोड़ना पड़ा। जबकि विद्या धर के पुत्र इसमें नहीं रहते थे। वह अलग ही रहे अपने गावं की हवेली में जिससे उनको किसी प्रकार की ज़्यादा दिक्कत का समान नहीं करना पड़ा। उस समय विद्याघर बहुत विमार चल रहा था। जिसकी थोड़े समय के बाद मृत्यु होगई।

     रमासंकर के पुत्र संतोष और उनकी पत्नी राज कुमारी को विवाह के दस साल पूरे कर लिये थे और उनके दो पुत्र और एक पुत्री भी हो चुके थे। संतोष काफी पढ़ा लिखा और समझदार था इसलियें वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सहर में रहने लगा। जहाँ पर अपने पुत्रों और पुत्री को शिक्षा ग्रहण करने के लिये एक अच्छे विद्यालय में प्रवेस कर दिया और स्वयं वह एक चिकित्सक का कार्य करता था जिससे उसको अच्छा पैसा मिल जाता था। जिससे उसकी जीवन की गाड़ी अच्छी तरह चल रही थी। इसके साथ संतोष गुप्त भेड़िया के समान धुर्त था जिसके कारण वह राजकुमारी और अपने बच्चे काफी नफरत करता था क्योंकि वह एक रुढ़ी वादी विचारदारा वाला व्यक्ति है। जो यह अब भी मानता है कि यह राजकुमारी और इसके बच्चे उसके शत्रु खानदान कैलाश से सम्बंध रखते है। यद्यपी उसने कभी खुल कर ऐसा नहीं कहा लेकिन यह बात काफी समय के बाद सामने आती है। इस तरह से धिरे-धिरे यह मानस खानदान का पुरा परिवार विखरने लगा और लोग ब्रह्मपुरा नगर को छोड़ कर शहर कि तरफ रुख करने लगे। एक समय ऐसा आगया कि लोग धिरे-धिरे किला को छोड कर अंग्रेजो के आतंक से बचने के लिये। वहाँ से दूरे वनारस और इलहाबाद में बसने लगे। क्योंकि अंग्रेज हर किसी को जीतनारायण का ही साथी समझते थे। जो भी ब्रह्मपुरा के किले में रहता था और उनको तरह-तरह की यातना दे कर उस किला को छोड़ने के लिये विवश करते थे। जिससे उस किले पर उनका कब्जा हो सके, एस समय ऐसा भी आता है जब अंग्रेज उस किला पर अपना अधिकार कर लिया और अपने सैनिको के साथ कुछ अंग्रेज अधिकारी उसमें रहने लगे। जो उनका साथ देता वह उसमें रहता और जो उनके खिलफ जाता उसकों और उसको परिवार को दंड का सामना करना पड़ता अंत में वह परिवार या तो मारा जाता या फिर किला से बाहर अपना ठीकान बना लेते थे। इस में मुरली और विद्या धर के लड़के भी थे। जो वहाँ से बाहर रहने के लिये आगये और अपने एक-एक पुत्रों को अंग्रेज़ी सेना में भरती कर दिया। जिसके कारण अंग्रजो का रुख इनके प्रती थोड़ा नरम होगया। अब अंग्रेज फिर अपने मन का अत्याचार और कर वसुली करने लगे इनका विरोध करने वाला कोई नहीं था। लोगों को अपनी रोजी रोटी भी कमाने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। कुछ एक बड़े जमिदार को छोड़ कर जैसे विद्याधर और मुरली धर के पुत्रों के और सभी किसान कर्ज में डुबने लगे। क्योंकि अंग्रेज जितना पैदा खेत में होता उससे अधिक कर में ही लेते थे। जिसमें बहुत से किसानो को अपनी जमिन भी बेचनी पड़ रही थी। जो आगे चल कर मातासंकर जब अपने परिवार से अलग हो कर अपने एक पुत्र के साथ अलग रहने लगा तो उसका खर्च खेती की आमदनी से नहीं चलता था। जिसके लिये अपनी बहुत सारी जमिन उन अंग्रेज सैनिको को बेचना पड़ा जो अंग्रेजों के द्वारा जमिदारों के झगड़ों को सुलझाने के लिये ब्राह्मपुरा में बसाये गये थे। राजपुत और गहरवार आदी। इस तरह से मानस के परिवार के द्वार कैलाश के खानदान का अंत और बाद में समझौता किया जाना और कुछ समय के लिये एक तरफा अधिकार मानस के परिवार का होना। जिसके बाद उस जमिन में राजपुत और गहरवारों ने भी अपना हिस्सा बना लिया। धिरे-धिरे इस तरह से उस क्षेत्र में गहरवार और राजपुत हावी होने लगे और पुराने मानस और कैलाश के परिवार का पतन सुरु होगया।

      इसके साथ ही अंग्रेजो कि भी भारत देश पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ने लगी। जिससे उन्होंने भारत को दो भागों में बाट दिया भारत और पाकिस्तान फिर भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। तो उन्होंने भारत को छद्म भेष में रहकर अपने अधिकार का प्रारंभ किया जिसमें सभी जन्म से भारतिय रंग से भारितय थे। मगर संस्कृत सभ्यता से वह सब काले अंग्रेज और उनकी दोगली नस्ल ने अधिकार करना सुरु कर दिया। जब संसार में मसिनी क्रान्ति का युग सुरु हो रहा था। वैल के अस्थान पर ट्रैक्टर ने लिया। हाथी घोड़ों के स्थान पर कार और मोटर सायकिल ने ले लिया। जो इस दौड़ में आगे बढ़ गया वह आगे ही बढ़ता गया और जो अपने पुराने रिती रिवाज के साथ ही जुड़े रहे वह पिछण गये। इसे अंधी दौण में। जैसा कि मुरली का एक लड़का जो इन्जिनियर बन चुका था उसके लड़के अमेरिका इंगलैड और दूसरे वाहर देशों में जा कर वहाँ के नागरिक बन गये।

       जीतनारायण एक दिन काले पानी कि जेल से रात्री के समय वहाँ की गुप्त सुरंग के रास्ते से भाग निकला और समुन्दर में छलांग लगा दिया और तैर कर ही समुद्र को पार करने का प्रयास करने लगा। क्योकि वह गंगा नदी के किनारे का रहने वाला है। अच्छी तरह से तैरना जानता है। काफी तैरने के बाद उसको समन्दर में एक बड़ी ह्वेल मछली मरी हुई तैरती मिलती है पहले तो वह उसे समुद्र में कोई छोटा द्विप समझता है। लेकिन वह पास आया। तो देखा कि वह एक मछली की लास थी। जो तैर रही उस लास के उपर चढ़ कर जीतनारायण उसको एक नाव कि तरह से उपयोग किया और उसी के सहारे समुद्र को पार करने का प्रयास करता रहा। जब भुख लगती तो मछलियों को खाता और जब प्यास लगती तो धुप से समुद्र के पानी को भाप बना करता मछलियों के खाल का पात्र बना कर उनकी सहायता से, इस तरह से रात दिन समुद्र से संघर्ष करता हुआ और इसी तरह से कई एक साल तक वह यात्रा कर के वह पांच एक साल में भारत के दक्षिण समुद्र किनारे पहुंच गया। और वहाँ से चलकर कई एक महिने में भिक्षु बन कर अपने नगर ब्रह्मपुरा पहुंचा जहाँ पर उसने सब कुछ बदला हुआ पाया। उस समय उसकी उम्र 80 साल हो चुकी थी जब उसे पता चला कि उसके भाई जेल में बन्द है। तो उसने स्वयं सांयास ले कर उसी किले के दरवाजे पर एक छोटी झोपड़ी बना कर रहने लगा। यद्यपी अब उस किले का केवल दरवाजा ही बचा है क्योकि अंग्रेज को जब यह ज्ञात हो गया कि उनको भारत छोड़ना है तो वह नहीं चाहते थे कि यह किला दुबारा किसी क्रान्ति कारी गिरोह के कब्जे में आये। क्योंकि वह बहुत गुप्त और जमिन के अन्दर था, जिसके कारण बहुत अधिक लोगों को उसके बारे में ज्ञान भी नहीं था। अंग्रेजो ने उसको एक पहाड़ी गुफा के रूप में प्रचारित किया जो डकैतो का ठिकाना थी। जिसके कारण लोगों का उस किले पर से ध्यान हट गया। जिसका उन्होंने खुब फायदा उठा कर उस किले को अन्दर से ही तबाह कर दिया। अर्थात किले के अन्दर भयानक बम विस्फोट किया जिससे वह किला जमिन के अन्दर धरासाई हो गया। जब जीतनारायण को यह सब ज्ञात हुआ तो उसने अपना सब कुछ भुल कर। एक नये जीवन को जीने का निर्णय किया कि वह किसी को भी अपने बारें में नहीं बतायेगा और वही जंगल में रह कर लोगों को ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते रहे। जिससे उनके बहुत भक्त बन गये और लोग दूर-दूर से उससे मिलने के लिये आते थे। बाद में उनको लोग बाबा बदेवरानाथ के नाम से जानते थे। जिनके नाम का एक बहुत बड़ा आश्रम आज भी विन्ध्याचल के पहाड़ियों के उपर है। जहाँ पर एक बार मुझे भी जाने का अवसर मिला। जिससे मुझे कुछ उनके बारे में गुप्त जानकारी मिली।

       यह सत्य है कि इस भारत को आज आजाद देश माना जाता है। लेकिन यह आजाद नहीं हुआ है, आज भी मानस और कैलाश कि खानदान को समाप्त करने के लिये प्रयाश कर रही है। हलांकि अब मानस और कैलाश नहीं रहे लेकिन जो उनके वंशज है, जिनमें से ही एक मैं भी हूं। आज का समय बदल गया है। आज आदमियों को सताने का और किसी की सम्पत्ती को हड़पने का तरिका बदल गया गया। लेकिन सड़यन्त्र आज भी चल रहा है। सरकार आज कहने को भारतिय है लेकिन इसका सारा कार्य बाहरि शक्तियाँ निश्चित करती है। मैं तो यह मनता हूँ हमारा देश आज भी किसी प्रकार से आजाद नहीं हुआ है। आज भी पहले से भी खतरनाक जाहिल और दूष्ट प्रकृति के व्यक्तियों का ही अधिकार इस देश पर है। जब से मेरा जन्म हुआ तभी से मेरे साथ किसी कैदि के समान व्यवहार किया जाता रहा है। कहने को मैं आजाद हूँ मैं किसी जेल में नहीं रहता हूँ लेकिन यह भी सत्य है कि यह दुनिया ही मेरे लिये यातना गृह बन गई है। और जब से मैं जानने लायक हुआ तब से ही मुझे ज्ञात हुआ है कि मेरे साथ को गृह युद्ध हो रहा है। जिसको हम शित युद्ध कह सकते है। प्रारम्भ में यह युद्ध मेरे साथ केवल मेरा परिवार करता था धिरे-धिरे जैसा मैं बड़ा होता गया मेरा युद्ध क्षेत्र भी बढ़ता गया, और उसके योद्धा जो मेरे खिलाफ लड़ने के लिये बदलते रहे। मुझे इसका ज्ञान तब हुआ जब मैने उस छनवर की जमिन पर एक ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान नामक वैदिक विश्वविद्यालय बनाने की योजना पर काम करना शुरु किया। जो लाखों एकड़ में फैली है, जिसमें आज भी मेरी कुछ जमिन उस मैदान के बिच में उपस्थित है। क्योंकि वह क्षेत्र काफी बड़ा और खाली है वहाँ केवल एक खेती होती है। या केवल एक फसल उपजाई जाती है। जब गंगा में बाढ़ आने से सारा लाखों एकड़ का इलाका पानी से डुब जाता है। वहाँ पर विसों फिट उंचा पानी गंगा के बाढ़ने पर जमा हो जाता है। इस लिये मैने वहाँ पर जमिन के अन्दर किला बना कर विस्वविद्यालय चलाने का निर्णय किया। क्योंकि मुझे ज्ञात हुआ कि यहाँ हमारे समाज में दुःख का कारण अज्ञान है। ज्ञान का प्रसार करने के लिये एक बृहद विश्वविद्यालय बनाया जाये। क्योकि मिर्जापुर में आज भी कोई विश्वविद्यालय नहीं है। कहने के लिये वह राजावों का शहर है। आज मिर्जापुर को नक्सल प्रभावित क्षेत्र की श्रेणी में रखा गया है। वह ऐसा क्षेत्र है भी इसका भी मुझे आभास हो चुका है। क्योंकि उस क्षेत्र की कुछ ऐसी विशेषता है जहाँ पर आज कि सरकार के लिये खतरा महसुष होता है। भारत सरकार को डर है जिसको पिछे से अंग्रेज चला रहे है। कि यहाँ यदि किला बनाया गया तो वह भारती अंग्रेजों जो देश को चला रहे है उनके सामने वही चुनौति खड़ी हो सकती है जो कभी जीतनारायण और उसे भाईयों कि गैंग ने किया था। अंग्रेजों के जाने बाद भी आज तक पूरे भारत में कोई वैदिक विश्वविद्यालय नहीं है। कहने के लिये बैदिक ज्ञान सर्वोपरि है। जितने भी विश्वविद्यालय भारत में चलते है वह सब अंग्रेज़ी कि शिक्षा पद्दती से-से चलते है। जिसको कार्ल मार्क्स, लार्ड मैकाले और मैक्समुलर नें मिलकर तैयार किया था। या कुछ ऐसे भी है जो संस्कृत के भी है जैसे संपूर्णनन्द जो वाराणसि में है। वहाँ पर भी केवल पौराणिक ज्ञान के प्रचार किया जाता है। यह मेरे द्वारा एक बहुत बड़ा कदम उठाया गया। जिससे ऐसा प्रतित होता है। कि जैसे कोई जिन्न कई सौ वर्षो से किसी कब्र में कैद था वह मेरे इस कृत्य से जागृत होगया। जिसे यह सारी दुनिया एक साथ मुझको मारने के लिये मेरे पिछे पड़ गई है। क्या अपने क्या पराये? जहाँ भी गया मैं हर जगह जैसे मुझ पर निगाह रखी जाती है और हर प्रकार से मुझे नष्ट किया जाने का प्रयाश किया जाने लगा है। जैसे मैंने इस दुनिया के किसी दुःखती रग पर अपनी पैनी तलवार को चुभा दिया है। जिससे यह हमारी खुन कि प्यासी बन गई। यद्यपि मैं शुरु से ही साधु किस्म का आदमी रहा हूँ जिसके कारण ही मैं यहाँ पर अब तक जिन्दा हूँ यद्यपि मैं किसी भी क्षेत्र में आज तक सफल नहीं हो पाय हूं। हर क्षेत्र में मुझे परास्थ करने के लिये मेरे शत्रु पहले से खड़े मुझे मिलते रहे है। फिर भी मैने हार नहीं माना है आज भी संघर्ष रत हूं। मैं जानता हूँ कि मैं इस दुनिया से नहीं जित सकता हूँ लेकिन मैं लड़ते-लड़ते मरना चाहता हूं। जैसा की गिता में कृष्ण अर्जुन को कहते है कि जब जित जावोंगे तो तुम्हे यहाँ याद किया जायेगा और हार जावोंगे तो भी एक योद्धा के रूप में याद किये जाओंगे। हर हालत में संघर्ष करना ही श्रेयस्कर है। आज से हज़ारो साल पहले महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन अपने ही भाईयों के विरुद्ध लड़ने के विचार से कांपने लगते हैं, तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि यह संसार एक बहुत बड़ी युद्ध भूमि है, असली कुरुक्षेत्र तो तुम्हारे अंदर है। अज्ञानता या अविद्या धृतराष्ट्र है और हर एक आत्मा अर्जुन है और तुम्हारे अन्तरात्मा में श्री कृष्ण का निवास है, जो इस रथ रुपी शरीर के सारथी है। ईंद्रियाँ इस रथ के घोड़ें हैं। अंहकार, लोभ, द्वेष ही मनुष्य के शत्रु हैं। गीता हमे जीवन के शत्रुओ से लड़ना सीखाती है और ईश्वर से एक गहरा नाता जोड़ने में भी मदद करती है। गीता त्याग, प्रेम और कर्तव्य का संदेश देती है। गीता में कर्म को बहुत महत्त्व दिया गया है। मोक्ष उसी मनुष्य को प्राप्त होता है। जो अपने सारे सांसारिक कामों को करता हुआ ईश्वर की आराधना करता है। अहंकार, ईर्ष्या, लोभ आदि को त्याग कर मानवता को अपनाना ही गीता के उपदेशो का पालन करना है।

     गीता सिर्फ़ एक पुस्तक नहीं है, यह तो जीवन मृत्यु के दुर्लभ सत्य को अपने में समेटे हुए है। कृष्ण ने एक सच्चे मित्र और गुरु की तरह अर्जुन का न सिर्फ़ मार्गदर्शन किया बल्कि गीता का महान उपदेश भी दिया। उन्होने अर्जुन को बताया कि इस संसार में हर मनुष्य के जन्म का कोई न कोई उद्देशय होता है। मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है, यह तो एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता। जो जन्म लेगा उसकी मृत्यु भी निश्चित है। जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रो को त्याग कर नए वस्त्रो को धारण करते है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर के नष्ट होने पर नए शरीर को धारण करती है। जिस मनुष्य ने गीता के सार को अपने जीवन में अपना लिया उसे ईश्वर की कृपा पाने के लिए इधर उधर नहीं भटकना पड़ेगा।

   श्री कृष्ण का मानव जीवन जीने का उपदेश, श्रीमद भगवद एकादश स्कंध अध्याय ७ श्लोक ६-१२

     तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बांधवों का स्नेह सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्य प्रेम से मुझमें अपना मन लगाकर सम दृष्टी से पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करो। इस जगत में जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है, स्वप्न की तरह मन का विलास है। इसीलिए माया-मात्र है, मिथ्या है-ऐसा जान लो। जिस पुरुष का मन अशांत है, असयंत है उसी को पागलों की तरह अनेक वस्तुयें मालूम पड़ती हैं; वास्तव में यह चित्त का भ्रम ही है। नानात्व का भ्रम हो जाने पर ही "यह गुण है" और "यह दोष है" इस प्रकार की कल्पना करी जाती है। जिसकी बुद्धि में गुण और दोष का भेद बैठ गया हो, दृणमूल हो गया है, उसी के लिए कर्म, अकर्म और विकर्म रूप का प्रतिपादन हुआ है। जो पुरुष गुण और दोष बुद्धि से अतीत हो जाता है, वह बालक के समान निषिद्ध कर्मों से निवृत्त होता है; परन्तु दोष बुद्धि से नहीं। वह विहित कर्मों का अनुष्ठान भी करता है, परन्तु गुण बुद्धि से नहीं। जिसने श्रुतियों के तात्पर्य का यथार्थ ज्ञान ही प्राप्त नहीं कर लिया, बल्कि उनका साक्षात्कार भी कर लिया है और इस प्रकार जो अटल निश्चय से संपन्न हो गया है, वह समस्त प्राणियों का हितैषी सुहृद होता है और उसकी सारी वृत्तियाँ सर्वथा शांत रहती हैं। वह समस्त प्राणिमात्र विश्व को मेरा ही स्वरुपआत्मस्वरूप देखता है; इसलिए उसे फिर कभी जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता।

     श्रीकृष्ण ने जहाँ तक हो सका मित्रता, सहयोग सामंजस्य आदि के बल पर ही परिस्थितियों को सुधारने का प्रयास किया, लेकिन जहाँ ज़रूरत पड़ी वहाँ सुदर्शन चक्र उठाने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया। वहीं अपने निर्धन सखा सुदामा का अंत तक साथ निभाया और उनके चरण तक पखारें। गीता को हिन्दू धर्म में बहुत खास स्थान दिया गया है। गीता अपने अंदर भगवान कृष्ण के उपदेशो को समेटे हुए है। गीता को आम संस्कृत भाषा में लिखा गया है, संस्कृत की आम जानकारी रखना वाला भी गीता को आसानी से पढ़ सकता है। गीता में चार योगों के बारे विस्तार से बताया हुआ है, कर्म योग, भक्ति योग, राजा योग और ज्ञान योग। गीता को वेदों और उपनिषदों का सार माना जाता, जो लोग वेदों को पूरा नहीं पढ़ सकते, सिर्फ़ गीता के पढ़ने से भी आप को ज्ञान प्राप्ति हो सकती है। गीता न सिर्फ़ जीवन का सही अर्थ समझाती है बल्कि परमात्मा के अनंत रूप से हमे रुबरु कराती है। इस सांसारिक दुनिया में दुख, क्रोध, अंहकार ईर्ष्या आदि से पिड़ित आत्माओं को, गीता सत्य और आध्यात्म का मार्ग दिखाकर मोक्ष की प्राप्ति करवाती है। गीता में लिखे उपदेश किसी एक मनुष्य विशेष या किसी खास धर्म के लिए नहीं है, इसके उपदेश तो पूरे जग के लिए है। जिसमे आध्यात्म और ईश्वर के बीच जो गहरा सम्बंध है उसके बारे में विस्तार से लिखा गया है। गीता में धीरज, संतोष, शांति, मोक्ष और सिद्धि को प्राप्त करने के बारे में उपदेश दिया गया है। आज से हज़ारो साल पहले महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन अपने ही भाईयों के विरुद्ध लड़ने के विचार से कांपने लगते हैं, तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। जो इस रथ रुपी शरीर के सारथी है। ईंद्रियाँ इस रथ के घोड़ें हैं। अंहकार, लोभ, द्वेष ही मनुष्य के शत्रु हैं। गीता हमे जीवन के शत्रुओ से लड़ना सीखाती है और ईश्वर से एक गहरा नाता जोड़ने में भी मदद करती है। गीता त्याग, प्रेम और कर्तव्य का संदेश देती है। गीता में कर्म को बहुत महत्त्व दिया गया है। मोक्ष उसी मनुष्य को प्राप्त होता है जो अपने सारे सांसारिक कामों को करता हुआ ईश्वर की आराधना करता है। अहंकार, ईर्ष्या, लोभ आदि को त्याग कर मानवता को अपनाना ही गीता के उपदेशो का पालन करना है।

      कृष्ण ने एक सच्चे मित्र और गुरु की तरह अर्जुन का न सिर्फ़ मार्गदर्शन किया बल्कि गीता का महान उपदेश भी दिया। उन्होने अर्जुन को बताया कि इस संसार में हर मनुष्य के जन्म का कोई न कोई उद्देशय होता है। मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है, यह तो एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता। जो जन्म लेगा उसकी मृत्यु भी निश्चित है। जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रो को त्याग कर नए वस्त्रो को धारण करते है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर के नष्ट होने पर नए शरीर को धारण करती है। जिस मनुष्य ने गीता के सार को अपने जीवन में अपना लिया उसे ईश्वर की कृपा पाने के लिए इधर उधर नहीं भटकना पड़ेगा।

     ज्ञानी भक्त के चरित्र पर यह श्लोक और अधिक प्रकाश डालता है। इन छ गुणों को बताकर भक्त के चित्र को और अधिक स्पष्ट किया जा रहा है। जो अनपेक्ष (अपेक्षारहित) है सामान्य पुरुष अपने सुख और शान्ति के लिए बाह्य देश? काल? वस्तु? व्यक्ति और परिस्थितियों पर आश्रित होता है। इनमें से प्रिय की प्राप्ति होने पर वह क्षण भर रोमांचित कर देने वाले हर्षोल्लास का अनुभव करता है। परन्तु एक सच्चा भक्त अपने सुख के लिए बाह्य जगत् की अपेक्षा नहीं रखता? क्योंकि उसकी प्रेरणा? समता और प्रसन्नता का स्रोत हृदयस्थ आत्मा ही होता है। जो शुचि अर्थात् शुद्ध है एक सच्चा भक्त शारीरिक शुद्धि तथा उसी प्रकार आन्तरिक शुद्धि से भी सम्पन्न होता है। जो भक्त साधक की स्थिति में भी शरीर मन और जगत् के साथ अपने सम्बन्धों में शुद्धि रखने के प्रति जागरूक रहता है वही फिर सिद्ध भक्त शुचि को प्राप्त होता है। यह एक सुविदित तथ्य है कि कोई पुरुष जिस वातावरण में रहता है? उसे देखकर तथा उसकी वस्तुओं? वस्त्रों आदि की दशा देखकर उस पुरुष के स्वभाव? अनुशासन तथा संस्कृति का अनुमान किया जा सकता है। शारीरिक शुचिता तथा व्यवहार में भी पवित्रता रखने पर भारत में अत्यधिक बल दिया गया है। बाह्य शुद्धि के बिना आन्तरिक शुद्धि मात्र दिवास्वप्न? या व्यर्थ की आशा ही सिद्ध होगी। दक्ष (कुशल) सदा सजगता तो सुगठित पुरुष का स्वभाव ही बन जाता है। किसी भी कार्य़ की सफलता की कुंजी उत्साह है। कुशल और समर्थ व्यक्ति वह नहीं है जो अपने व्यवहार और कार्य में त्रुटियाँ करता रहता है। दक्ष भक्त मन से सजग और बुद्धि से समर्थ होता है। उसमें मन की शक्ति का अपव्यय नहीं होता अत एक बार किसी कार्य का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लेने के पश्चात् वह उस कार्य का सिद्धि के लिए सदा तत्पर रहता है। जैसा कि हम देख रहे हैं? यदि धार्मिक कहे जाने वाले लोग अपने कार्य में आलसी? असावधान और अशिष्ट हो गये हैं? तो हम समझ सकते हैं कि हिन्दू धर्म अपने प्राचीन वैभव से कितना दूर भटक गया है। उदासीन समाज में ऐसे अनेक भक्त कहे जाने वाले लोगों का मिलना कठिन नहीं हैं? जिन्होंने अपने आप को एक अनभिव्यक्त दुखपूर्ण स्थिति में समर्पित कर दिया है और उसका कारण केवल यह है कि किसी ने उसके साथ विश्वासघात अथवा दुर्व्यवहार किया था। ऐसे मूढ़ भक्त सोचते हैं कि समाज के इन अपराधों के प्रति वे उदासीन रहेंगे। बाद में उनकी भक्ति ही उन्हें एक दुर्भाग्यपूर्ण दायित्व प्रतीत होने लगती है? न कि एक वास्तविक लाभ दर्शनशास्त्र को विपरीत समझने पर उसकी समाप्ति समाज के आत्मघात में ही होती है। उदासीन भाव का प्रयोजन केवल अपने मन की शक्तियों का अपव्यय रोकने के लिए ही है। मनुष्य के जीवन में? छोटी-छोटी कठिनाइयाँ? सामान्य बीमारियाँ सुख सुविधा का अभाव आदि का होना तो स्वाभाविक और सामान्य बात है। उनको ही अत्यधिक महत्त्व देना और उनकी निवृत्ति के लिए दिन रात प्रयत्न करते रहने का अर्थ जीवन भर परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के संघर्ष में ही डूबे रहना है। यहाँ साधक को यह उपदेश दिया गया है कि जीवन की इन साधारण परिस्थितियों में वह अपनी मानसिक शक्ति को व्यर्थ ही नहीं खोने दे? बल्कि इन घटनाओं में उदासीन भाव से रहकर शक्ति का संचय करे। छोटे मोटे दुःख और कष्ट अनित्य होने के कारण स्वतः ही निवृत्त हो जाते हैं? अत उनके लिए चिन्ता और संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं है। व्यथारहित (भयरहित) जब मनुष्य किसी वस्तु विशेष की कामना से अभिभूत हो जाता है? तब उसे मन में यह भय लगा रहता है कि कहीं उसकी इच्छा अतृप्त ही न रह जाये। परन्तु ज्ञानी भक्त सब कामनाओं से मुक्त होने के कारण निर्भय होता है। सर्वारम्भ परित्यागी संस्कृत में आरम्भ शब्द का अर्थ कर्म भी होता है। अत सर्वारम्भ परित्यागी शब्द का अर्थ कोई यह नहीं समझे कि भक्त वह है? जो सब कर्मों का त्याग कर देता है इस प्रकार के शाब्दिक अर्थ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू लोग कर्म करने में अकुशल और आलसी हो गये हैं। इन लोगों को देखकर ही अन्य लोग हमारी आलोचना करते हुए कहते हैं कि हिन्दू धर्म में आलस्य को ही दैवी आदर्श के रूप में गौरवान्वित किया गया है। परन्तु यह अनुचित है? क्योंकि इस शब्द के आशय की सर्वथा उपेक्षा की गयी है। यदि कोई व्यक्ति किसी कर्म में निश्चित प्रारम्भ देखता है? तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह स्वयं को उस कर्म का आरम्भकर्ता मानता है। उसके मन में यह भाव दृढ़ होना चाहिए कि उसने ही यह कर्म विशेष किसी विशेष फल को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ किया है? जिसे प्राप्त कर वह कोई निश्चित लाभ या सुख प्राप्त करेगा। जो पुरुष भगवान् का भक्त है? और सांस्कृतिक पूर्णत्व को प्राप्त करना चाहता है? उसको इस प्रकार के मान और कर्तृत्व के अभिमान को सर्वथा त्याग कर निरहंकार भाव से जगत् में कर्म करने चाहिए. वास्तविकता यह है कि हमारे जीवन में कोई भी कर्म नया नहीं है? जिसका अपना स्वतन्त्र प्रारम्भ और समाप्ति हो। सम्पूर्ण जगत् के सनातन कर्म व्यापार में ही सभी कर्मों का समावेश हो जाता है। यदि भलीभांति विचार किया जाये तो ज्ञात होगा कि हमारे सभी कर्म जगत् में उपलब्ध वस्तुओं और स्थितियों से नियन्त्रित? नियमित? शासित और प्रेरित होते हैं। ईश्वर के भक्त को विश्व की इस एकता का सदैव भान बना रहता है? और इसलिए? वह जगत् में सदा ईश्वर के हाथों में एक करण या निमित्त के रूप में कर्म करता है? न कि किसी कर्म के स्वतन्त्र कर्ता के रूप में। उपर्युक्त सद्गुणों से सम्पन्न भक्त मुझे प्रिय है। भक्त के कुछ और लक्षण बताते हुए भगवान् कहते हैं।

      वह पुरुष परम भक्त कहलाता है जिसने मन और बुद्धि की अनात्म उपाधियों तथा जगत् से अपने तादात्म्य को त्याग कर आनन्दस्वरूप आत्मा में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर ली है। अत यह स्वाभाविक ही है कि अनात्म जगत् से होने वाले सुखदुखादिक अनुभव उसे किसी भी प्रकार से न आकर्षित कर सकते हैं और न विचलित। इसे ही इस श्लोक में बताया गया है। सामान्य मनुष्य जगत् की सभी वस्तुओं को वे जैसी हैं? वैसी ही नहीं देखता। उसे कोई वस्तु प्रिय होती है? तो कोई अप्रिय। तत्पश्चात् वह प्रिय वस्तु की आकांक्षा या इच्छा करता है और अप्रिय से द्वेष। इसके पश्चात्? तीसरा द्वन्द्व उत्पन्न होता हैं प्रवृत्ति और निवृत्ति का? अर्थात् इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के लिए और द्वेष्य वस्तु को त्यागने के लिए वह प्रयत्न करता है। इसके परिणामस्वरूप इष्ट की प्राप्ति होने पर वह हर्षित होता है? अन्यथा शोक करता है। ज्ञानी भक्त में इन समस्त विकारों और प्रतिक्रियाओं का यहाँ अभाव बताया गया है। इसका कारण यह है कि वह अपने परम आनन्दस्वरूप में स्थित होने के कारण बाह्य मिथ्या वस्तुओं में सुख और दुःख की कल्पना करके उनसे राग या द्वेष नहीं करता। राग और द्वेष के द्वन्द्व के अभाव में हर्ष और शोक का स्वत अभाव हो जाता है। वह भक्त जगत् को अपनी कल्पना की दृष्टि से न देखकर यथार्थ रूप में देखता है। शुभाशुभ परित्यागी जब मनुष्य अपने आनन्दस्वरूप को नहीं जानता है वह बाह्य जगत् में सुख और शान्ति की खोज करता रहता है। उस स्थिति में? अपने राग और द्वेष के कारण वस्तुओं की प्राप्ति के लिए शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) दोनों ही प्रकार के कर्म करता है। परन्तु? भक्त के मन में राग और द्वेष नहीं होने के कारण वह शुभ और अशुभ दोनों ही से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपर्युक्त श्लोक में प्रयुक्त सभी शब्दों का एक विशेष गूढ़ अभिप्राय है? अन्यथा केवल वाच्यार्थ को ही स्वीकार करने पर ऐसा प्रतीत होगा कि ज्ञानी भक्त कोई शव अथवा पाषाण मात्र है? क्योंकि वह न इच्छा करता है और न द्वेष न हर्षित होता है और न दुखी अर्थात् वह मृत पड़ा रहता है। यह श्लोक इस बात का अत्यन्त प्रभावी उदाहरण है। कि धर्मशास्त्रों के शब्दों का वाच्यार्थ उसके मर्म या प्रयोजन को स्पष्ट नहीं करता है। अत उनके लक्ष्यार्थ पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। इस श्लोक में वर्णित गुणें से युक्त भक्त भगवान् को प्रिय होता है। यह श्लोक प्रस्तुत प्रकरण का चतुर्थ भाग है? जिसमें ज्ञानी भक्त के और छः लक्षण बताये गये हैं। इस प्रकार अब तक छब्बीस गुणों को बताया गया है? जो भक्त के स्वाभाविक लक्षण होते हैं।

    जैसा कि हमने बताया कि कैलाश के खानदान में केवल उनके अंतिम पुत्र कि पत्नी जो बनारस की रहने वाली थी और वह अपने खानदानी छोटे भाई जीमदार अयोध्या प्रसाद के यहां, अपने मायके में रहती थी। अपने पति के मृत्यु के बाद। उनका पति कैलाश जीमदार का आखिरी संतान था। जो दो भयंकर शत्रु खानदानों के बीच में अपनी दुस्मनी कि आग में जल रहे थे। जिसमे बहुत सारे लोग दोनो तरफ के अपनी जान को गवा चुके थे। उसमें एक कैलाश का आखिरी पुत्र भी था। जिसकी पत्नी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की थी। वह और खानदानों के बिच में खुन खराबा नहीं चाहती थी। वह इन दोनो कट्टर खुन के प्यासे खानदानों को फिर से प्रेम के मधुर सुत्र में बाधंना चाहता थी। जिसमें उसका साथ मानस का दूसरी पत्नी का पुत्र जीतनारयण ने दिया और उसने अपने भाई मुरली को पुत्र रमासंकर के पुत्र संतोष और कैलाश कि बहु के भाई अयोध्या प्रसाद की पुत्री राज कुमारी का विवाह करा दिया था। जिससे यह दो जलती हुई अग्नि ज्वाला आपस में मिलकर एक हो सके, और इन दोनों के मध्य जो झगड़े का कारण जमिन है, उसको एक कर दिया जाये। लेकिन यह पुरी तरह से संभव नहीं हो पाया उपर से तो प्रेम सम्बंध नाम दिया गया। लेकिन वास्तव में वह एक परिवार का गृहयुद्ध बन गया। जिसमें कुछ निर्दोष लोगों को प्रताणित किया जाने लगा। उस राजकुमारी का सबसे बड़ा पुत्र मैं हुआ। जिसके जन्म के साथ ही मृत्यु के साथ संघर्ष सुरु हो गया।

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