प्राचीन भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली केवल पढ़ाई की पद्धति नहीं थी, बल्कि पूर्ण मानव निर्माण की प्रक्रिया थी। यह शिक्षा शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—चारों का समन्वित विकास करती थी। आज जब आधुनिक शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित हो गई है, तब गुरुकुल शिक्षा की पुनर्स्थापना राष्ट्र के नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए अनिवार्य हो गई है।
उत्तर:
घर में न रहकर गुरु के अधीन रहकर, ब्रह्मचर्यपूर्वक, त्याग, तपस्या, संयम और अनुशासन के साथ विद्या अर्जन करना ही गुरुकुल शिक्षा प्रणाली कहलाती है।
उत्तर:
जो आचार्य कुल में रहकर शरीर की शुद्धता, चित्त की रक्षा तथा विद्या प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्न करता है, वही ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी कहलाता है।
उत्तर:
सामान्यतः 6 वर्ष की आयु में प्रवेश होता था, किंतु अपवाद स्वरूप अधिक आयु में भी प्रवेश की व्यवस्था थी।
उत्तर:
नहीं। गुरुकुल में राजा-रंक, अमीर-गरीब, आदिवासी-अछूत—सभी को समान अधिकार से प्रवेश मिलता था। यह पूर्णतः समतावादी व्यवस्था थी।
उत्तर:
भोजन शुद्ध, सात्त्विक और सीमित होता था। वस्त्र सरल, सभ्य और शालीन होते थे, जिससे अहंकार का नाश हो।
उत्तर:
गुरुकुल शिक्षा बहुआयामी थी, जिसमें शामिल थे—
👉 अर्थात् भौतिक + आध्यात्मिक दोनों उन्नति।
उत्तर:
👉 भोजन केवल दिन में दो बार।
उत्तर:
गुरुकुल शिक्षा पूर्णतः निशुल्क थी।
उत्तर:
उत्तर:
ग्रामों से दूर, अरण्य (वन) में—जहाँ प्रकृति स्वयं गुरु बनती थी।
उत्तर:
हाँ। बालकों और बालिकाओं के अलग-अलग गुरुकुल होते थे, जिनके बीच न्यूनतम 12 कोस की दूरी रखी जाती थी।
उत्तर:
गुरुकुलों का माध्यम संस्कृत था—और वही रहेगा।
उत्तर:
गुरुकुल प्रणाली आदिकालीन है—मानव सभ्यता के आरम्भ से।
उत्तर:
औसतन हर गाँव में 2 गुरुकुल मानें तो लगभग
👉 36 लाख गुरुकुल सम्पूर्ण आर्यावर्त में विद्यमान थे।
उत्तर:
नालंदा, तक्षशिला, पाटलिपुत्र, वल्लभीपुर आदि।
उत्तर:
1902 ई., कांगड़ी (हरिद्वार) —
स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी द्वारा।
उत्तर:
👉 गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की पुनर्स्थापना से।
उत्तर:
राम, कृष्ण, कपिल, कणाद, पतंजलि, धन्वंतरि, गार्गी, मैत्रेयी, अर्जुन, द्रोण, परशुराम, द्रौपदी आदि।
“विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् याति पात्रताम्।”
अर्थ: विद्या से विनय आता है, और विनय से पात्रता।
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