जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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ज्ञानवर्धक कथाएं भाग -26 ज्ञानवर्धक कथाएं भाग -26

 

 

ज्ञानवर्धक कथाएं भाग -26

 

 

👉 Vardaan वरदान

 

एक बार पाँच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे, यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अन्धे ने कहा— यदि मेरी आँखें होतीं तो जहाँ कहीं अनुपयुक्त देखता वहीं उसे सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा— पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई के काम करता। निर्बल ने कहा— बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा— धनी होता तो दीन दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा— विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता।

 

वरुण देव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सच्चाई को परखने के लिए उसने आशीर्वाद दिया और इन पाँचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। अन्धे ने आँखें, लंगड़े ने पैर, निर्बल ने बल, निर्धन ने धन और मूर्ख ने विद्या पाई और वे फूले न समाये। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गये। अन्धा सुन्दर वस्तुएँ देखने में लगा रहता और अपनी इतने दिन की अतृप्ति बुझाता। लंगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाठ-बाठ जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुरता के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुण देव उधर से लौटे और उन असमर्थों की प्रतिज्ञा निभी या नहीं, यह देखने के लिए रुक गये। पता लगाया तो वे पाँचों अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे।

 

वरुण देव बहुत खिन्न हुए और अपने दिये हुए वरदान वापिस ले लिए। वे फिर जैसे के तैसे हो गये। अन्धे की आँखों का प्रकाश चला गया। लँगड़े के पैर जकड़ गये। धनी निर्धन हो गया। बलवान को निर्बलता ने जा घेरा। अब उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञायें याद आईं और पछताने लगे कि पाये हुए सुअवसर को उन्होंने इस प्रकार प्रमाद में क्यों खो दिया। समय निकल चुका था, अब पछताने से बनता भी क्या था?

 

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964

 

👉 विद्वता और मानवता

 

एक बहुत बड़ा मंदिर था। उसमें हजारों यात्री दर्शन करने आते थे। सहसा मंदिर का प्रबंधक प्रधान पुजारी मर गया। मंदिर के महंत को दूसरे पुजारी की आवश्यकता हुई और उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कल सवेरे पहले पहर आकर यहां पूजा संबंधी जांच में ठीक सिद्ध होगा, उसे पुजारी रखा जाएगा।

 

बहुत से विद्वान सवेरे पहुंचने के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर था। एक ही रास्ता था। उस पर भी कांटे और कंकड़-पत्थर थे। विद्वानों की भीड़ चली जा रही थी मंदिर की ओर। किसी प्रकार कांटे और कंकड़ों से बचते हुए लोग जा रहे थे।

 

सब विद्वान पहुंच गए। महंत ने सबको आदरपूर्वक बैठाया। सबको भगवान का प्रसाद मिला। सबसे अलग-अलग कुछ प्रश्र और मंत्र पूछे गए। अंत में परीक्षा पूरी हो गई। जब दोपहर हो गई और सब लोग उठने लगे तो एक नौजवान वहां आया। उसके कपड़े फटे थे। वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था।

 

महंत ने कहा- ‘‘तुम बहुत देर से आए।’’

 

वह बोला- ‘‘मैं जानता हूं। मैं केवल भगवान का दर्शन करके लौट जाऊंगा।’’

 

महंत उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे। बोले- ‘‘तुम जल्दी क्यों नहीं आए?’’

 

उसने उत्तर दिया- ‘‘घर से बहुत जल्दी चला था। मंदिर के मार्ग में बहुत कांटे थे और पत्थर भी थे। बेचारे यात्रियों को उनसे कष्ट होता। उन्हें हटाने में देर हो गई।’’

 

महंत ने पूछा- ‘‘अच्छा, तुम्हें पूजा करना आता है?’’

 

उसने कहा- ‘‘भगवान को स्नान कराके चंदन-फूल चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूं।’’

 

महंत ने पूछा- ‘‘और मंत्र?’’

 

वह उदास होकर बोला- ‘‘भगवान से नहाने-खाने को कहने के लिए मंत्र भी होते हैं, यह मैं नहीं जानता।’’

 

अन्य सब विद्वान हंसने लगे कि यह मूर्ख भी पुजारी बनने आया है। महंत ने एक क्षण सोचा और कहा- ‘‘पुजारी तो तुम बन गए। अब मंत्र सीख लेना, मैं सिखा दूंगा। मुझसे भगवान ने स्वप्न में कहा है कि मुझे मनुष्य चाहिए।’’

 

‘‘हम लोग मनुष्य नहीं हैं?’’ दूसरे आमंत्रितों ने पूछा।

 

वे लोग महंत पर नाराज हो रहे थे। इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महंत एक ऐसे आदमी को पुजारी बना दे जो मंत्र भी न जानता हो, यह विद्वानों को अपमान की बात जान पड़ती थी।

 

महंत ने विद्वानों की ओर देखा और कहा- ‘‘अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशु बहुत चतुर भी होते हैं लेकिन सचमुच मनुष्य तो वही है जो दूसरों को सुख पहुंचाने का ध्यान रखता है, जो दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ सकता है।’’

 

विद्वानों के सिर नीचे झुक गए। उन लोगों को बड़ी लज्जा आई। वे धीरे-धीरे उठे और मंदिर में भगवान को और महंत जी को नमस्कार करके उस पर्वत से नीचे उतरने लगे।

 

दोस्तों!! सोचने की बात है कि हममें से कौन मनुष्य है?

 

👉 कहीं पहुँचना है, तो चलना होगा: -

 

एक व्यक्ति प्रतिदिन आकर महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना करता था। उसका यह क्रम एक माह तक बराबर चला पर इस सबका उसके जीवन पर कोई प्रभाव नही पडा। महात्मा बुद्ध उसको बारबार समझाते थे कि लोभ, द्वेष और मोह पाप के मूल हैं, इन्हें त्यागो। परंतु इन बुराइयों से बचना तो दूर वह इनमे और अधिक फँसता गया।

 

महात्मा बुद्ध कहते थे कि क्रोध करने वाले पर जो क्रोध करता है, उसका अधिक अहित होता है। लेकिन जो क्रोध का उत्तर क्रोध से नही देता, वह एक भारी युद्ध जीत लेता है। बुद्ध के ऐसे प्रवचन सुनने के बाद भी उस व्यक्ति का स्वभाव उग्र से उग्रतर होता जा रहा था।

 

एक दिन वह परेशान होकर बुद्ध के पास गया, और उन्हें प्रणाम निवेदन करके अपनी समस्या सुनाई।

 

बुद्ध ने कहा- “कहाँ के रहने वाले हो।।?”

 

वो बोला- “श्रावस्ती का।।।“

 

बुद्ध ने फिर पूछा- “ राजगृह से श्रावस्ती कितनी दूर है।।।?“

 

उसने बता दिया।

 

बुद्ध ने पूछा- “कैसे जाते हो वहाँ।।।?”

 

वो बोला- “सवारी से।।।।“

 

बुद्ध ने फिर पूछा- “कितना वक्त लगता है।।?“

 

उसने हिसाब लगाकर ये भी बताया।

 

बुद्ध बोले- “अब ये बताओ, यहाँ बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुँच सकते हो।।।“

 

वो बोला- “ये कैसे हो सकता है।।? वहाँ पहुँचने के लिये तो चलना होगा।।।।“

 

बुद्ध बडे प्यार से बोले- "तुमने सही कहा। चलने पर ही मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। इसी तरह अच्छी बातों का असर तभी पडता है जब उन पर अमल किया जाए। ज्ञान के अनुसार कर्म ना होने पर वह व्यर्थ जाता है।“

 

इसी तरह हर जानी गई अच्छी बात असर तभी लाती है जब उसको कर्म में ढाला जाए या उसका व्यवहार किया जाए। बिना अमल किया ज्ञान सिर्फ व्यर्थ ही नहीं चला जाता बल्कि वह समय के साथ भूल भी जाता है। फिर कुछ लोग यह कहते पाए जाते हैं कि वह यह अच्छी बात इसलिए नही अपना पाते हैं कि परिस्थिति अनुकूल नहीं है, तो जरा विचार कीजिए अनुकूल परिस्थिति इसीलिए तो नहीं है कि कोई भी अच्छाई पर अमल ही नही कर रहा है। बिना अच्छाई पर अमल किए अच्छी परिस्थिति कैसे आएगी। आखिर कहीं से तो शुरुआत करनी होगी॥

 

👉 "आंतरिक सामर्थ्य ही साथ देगी"

 

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे - कैसे सामर्थ्यवान लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

 

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

 

"तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी।

 

भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।"

 

अखण्ड ज्योति मई, 1969

 

👉 मांस का मूल्य

 

मगध सम्राट् बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा :- देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है।।।? मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आद तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता।। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।।।।।उसने मुस्कुराते हुऐ कहा :- राजन्।।। सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।

 

सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा : आप चुप क्यों हो? आपका इस बारे में क्या मत है? चाणक्य ने कहा : यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है।।।।, एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा। रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।

 

चाणक्य ने द्वार खटखटाया। सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा :-संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है उनकी हालत नाजूक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है।।।।आप महाराज के विश्वास पात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ।।।।।। यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फिका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की?

 

उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

 

मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करोडों स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गऐ और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी।।।।!

 

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है।।।।? यह मुद्राऐं किसलिऐ है? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले: दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?

 

जीवन अमूल्य है।

हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है।।! इस धरती पर हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार है।।। 🦆 🦐

 

👉 मन की तृप्ति

 

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई मे लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की माताजी कुछ पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं ।। उनकी कमर झुकी हुई थी,। चेहरे की झुर्रियों मे भूख तैर रही थी ।। आंखें भीतर को धंसी हुई किन्तु सजल थीं ।। उनको देखकर मन मे ना जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया ।।

 

"दादी लस्सी पिहौ का ? "

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक ।। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 2-4-5 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है ।। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उन दादी के मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी!

 

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए ।। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा ।।

"ये काहे के लिए ?"

" इनका मिलाई के पियाइ देओ पूत ! "

 

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था ।। रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी !

एकाएक आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा ।। उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं ।।।

 

अब मुझे वास्तविकता मे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने ही दोस्तों और अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए ना कह सका !

 

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे ।। कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर मे बैठ जाने पर आपत्ति ना हो ।। लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी ।।

 

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम लोगों के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पड़ोस मे ही जमीन पर बैठ गया।

 

क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था ।। इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती ।। हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा।। लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा ।।

"ऊपर बैठ जाइए साहब! "

 

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर मुस्कुराहट थी

बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं ।। होंठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएं थीं

 

ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कभी कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

 

दोस्तों।। जब कभी अवसर मिले अच्छे काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ ना दे।। !!

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