दानी बनो!
सभी मतों, पन्थों और ग्रन्थों में दान देने की महिमा भरी हुई है । वेद तो यहाँ तक कहते हैं---
न तदको अस्ति (ऋ० १० । ११७ ॥ ४) अदाता का घर घर ही नहीं है। अथर्ववेद ३।२४ । ५ में तो यहाँ तक कह दिया है
शतहस्त समाहर सहत्हरस्त सं किर। हे मानव ! तू सैकड़ों हाथों से कमा और हजारों हाथों से दान कर।
युवको ! आप भी दान देकर दानी बनो और दानी भी कैसे? कविवर रहीम जैसे
रहीम एक नवाब थे। वे प्रतिदिन दान दिया करते थे। दान देने का नियम यह था कि रुपये-पैसों की ढेरी लगा लेते थे और आंखें नीची करके उस ढेर में से मुट्ठी भर-भरकर याचकों को देते जाते थे। एक दिन गंग कवि भी वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि एक याचक दो-तीन बार ले चुका है परन्तु रहीम फिर भी उसे दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर गंग कवि ने पूछा
सीखे कहाँ नवाबजू देनी ऐसी देन ?
ज्यों ज्यों कर ऊँचे चढ़े त्यों त्यों नीचे नैन । तब रहीम ने बड़ी नम्रता से उत्तर दिया--
देने हारा और है जो देता दिन रैन।
लोग भरम हम पे करें या विधि नीचे नैन।।
दान दो और नम्रतापूर्वक दो। कुढ़कर, जलकर, खीजकर और दुःखी होकर मत दो। गीता में क्या सुन्दर कहा है
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
प्रसदित्युच्यते पार्य न च तत्प्रेत्य नो इह ॥
(गीता० १७ । २८)
हे अर्जुन ! अश्रद्धा से किया हुया यज्ञ, दान, तप और जो कुछ कर्म किया जाता है वह सब व्यर्थ है। श्रद्धारहित कर्म का न इस लोक में फल मिलता है और न परलोक में।
इसी भाव को एक व्यक्ति ने इस प्रकार व्यक्त किया है Give with faith, if you lack faith give nothing. श्रद्धापूर्वक दो। यदि श्रद्धा नहीं है तो कुछ भी मत दो।
"हस्तस्य भूषणं दानम् ।" हाथ का भूषण करण नहीं है अपितु दान है । अत: दान दो, दानी बनो।
दान की महिमा का वर्णन करते हुए महात्मा विदुर जी कहते हैं
द्वावम्भसि निवेष्टव्यो गले बध्या दृढां शिलाम् ।
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥
(विदुर प्रजागर ३३ । ६०)
इन दोनों व्यक्तियों के गले में दृढ़ पत्थर बांधकर जल में डुबा देना चाहिए-दान न देनेवाले धनिक को और तप - परिश्रम न करनेवाले दरिद्र को।
यह धन सदा किसी के पास रहता नहीं। भतृहरि जी कहते हैं
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ।।
(नीतिशतक० ४२)

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