जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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कथासरित्सागर भाग 1.5



कथासरित्सागर भाग 1.5

गतांक से आगे.......

 ___ इस प्रकार गुणाढ्य के कहने से काणभूति ने वह कथा अपनी भाषा में कही और गुणाढ्य ने भी उसी पिशाची भाषा में उसी कथा को सात लाख श्लोकों में सात वर्षों में पूर्ण किया। इस कथा को विद्याधरों के ले जाने के डर से, वन में स्याही न मिलने के कारण गुणाढ्य ने अपने रुधिर से वह कथा लिखी। उस दिव्य कथा के सुनने के लिये आये हुए सिद्ध और विद्याधरों की ऐसी भीड़ इकट्ठी हो गई, मानों आकाश में शामयाना ही हो गया है गुणाढ्य की बनाई हुई, उस कथा को देख कर काणभूति अपने शाप से छूट कर अपनी सद्गति को प्राप्त हो गया। और जो २ पिशाच वहाँ उस दिव्य कथा को सुन रहे थे वह भी स्वर्ग को प्राप्त हुए। इसके उपरान्त भगवती ने मुझ से यह बात भी कही थी, कि इस कथा को जब तुम पृथ्वी में प्रकाशित करोगे। तब तुम्हारे शाप का अन्त होगा, सो मैं इस कथा को किस के पास भेजूं, यह शोच कर गुणाढ्य ने अपने साथ आये हुए गणदेव और नन्दिदेव नाम शिष्यों से कहा कि इस काव्य को देने के योग्य राजा केवल सातवाहन है, वह बड़ा राजसिक है, जैसे वायु पुष्पों की सुगन्धि को इधर-उधर ले जाती है उसी प्रकार वह राजा भी इस काव्य को पृथ्वी में प्रकाशित करेगा। ऐसा विचार करके गुणाढ्य तो वहाँ से लाकर देवी जी के बगीचे में ठहरे, और अपने शिष्यों को पुस्तक लेकर राजा के पास भेजा। वह शिष्य इस कथा को लेकर राजा के यहां गया। और बोला कि हे राजा यह गुणाढ्य का बनाया हुआ काव्य है। इसको आप लीजिये राजा उस पिशाची भाषा को सुन कर और उन शिष्यों की प्राकृति पिशाचों जैसी देख कर विद्या के अभिमान से तिरस्कार पूर्वक बोला कि सात लाख श्लोकों की यह पिशाची भाषा का नीरस ग्रन्थ है। और रुधिर से अक्षर लिखे हुए हैं। इस पिशाचों की कथा को धिक्कार है। तब वह दोनों शिष्य उस पुस्तक को लेकर, गुणाढ्य के पास चले गये। और राजा का सब वृत्तान्त वर्णन कर दिया, यह सुनकर गुणाढ्य को भी बढ़ा खेद हुआ। क्योंकि समझदार के अनादर से किसको खेद नहीं होता है। इसके उपरान्त गुणाढ्य ने अपने शिष्यो को लेकर वहाँ से कुछ दूर जाकर, किसी पहाड़ी के बड़े उत्तम स्थान पर एक अग्नि का कुंड बनवाया। और उस कुंड में अग्नि जला कर गुणाढ्य ने पशु और पक्षियों को सुना २ कर उस पुस्तक का एक पन्ना अग्नि में हवन करने लगा। संपूर्ण ग्रन्थ को हवन कर दिया। परन्तु अपने शिष्यों के लिये एक लाख श्लोकों का अन्य नरवाहनदत्त का चरित बचा रक्खा। क्योकि वह शिष्यों को बहुत प्यारा था। जिस समय गुणाढ्य उस कथा को पढ़ २ कर हवन करते थे। उस समय अपने २ चारा घास आदि को छोड़ २ कर भैसा शूकर तथा सारंग आदिक पशु पक्षी उनके निकट आकर उनको घेरकर निश्चल बैठते थे। और उस कथा को सुन २ कर आंसू बहाते थे। इसी बीच में राजा सातवाहन कुछ बीमार हुया वैद्यों ने देखकर कहा कि राजा को सूखे मांस खाने से यह रोग विषाद हुआ है। तब रसोईदार बुलाया गया। तब वह आकर बोला कि महाराज हमको बहेलिये ऐसा ही मांस रोज देते हैं। इसके उपरान्त जब पहेलियों से पूछा गया, तो उन्होने कहा कि यहां से थोड़ी दूर एक पर्वत पर कोई ब्राह्मण पढ़ कर एक २ पुस्तक का पत्राणग्नि में हवन करता है, उसके सुनने के लिये सब जंगल के पशु पक्षी अपने २ चारों को भी छोड़ कर वहाँ जाते हैं। और वहाँ से हटते नहीं है, इसी से भूख के मारे उनके मांस सूख रहे हैं। बहेलिये के ऐसा वचन सुन कर उन्हीं के साथ राजा बड़े आश्चर्य में भरा हुआ गुणाढ्य के पास पहुंचा। और उनका जंगल में वास करने से बड़ी २ जटा वाले गुणाढ्य के दर्शन किये। वह जटायें नही थी मानों बुझने से कुछ बची हुई उसके शाप रूपी अग्नि का वह धुआं सब ओर फैला था। इसके उपरान्त रोते हुए पशुपक्षियों के मध्य में बैठे हुए गुणाढ्य को पहचान कर उनको राजा ने प्रणाम किया। और सब वृत्तान्त पूछा। वहां तब गुणाव्य ने अपने और पुष्पदन्त के शाप की संपूर्ण कथा जो कि इस कथा के उत्पन्न होने की कारण थी वर्णन की। फिर गुणाढ्य को महा देव जी के गण का अवतार समझ कर राजा पैरों पर गिर पड़ा। और महादेव जी के मुखसे निकली हुई इस दिव्य कथा को मांगने लगा। उस समय गुणाढ्य बोले कि हे राजा छः लाख श्लोकों की कथा तो हमने हवन कर दी। अब एक लाख श्लोक की एक कथा बाकी है। इसे लेलो और यह दोनों हमारे शिष्य' इस कथा को तुम्हें समझायेंगे। इस प्रकार राजा से सब वृत्तान्त कह कर, और योग से अपने शरीर को त्याग कर वह शाप से छटे हुए गुणाढ्य अपनी पदवी पर पहुंचे। इसके उपरान्त गुणाढ्य की दी हुई-बृहत्कथा नाम नरवाहनदत्त की एक लाख श्लोकों की कथा को लेकर राजा अपने नगर को चला आया और गुणदेव तथा नन्दिदेव नाम गुणाढ्य के शिष्यों को पृथ्वी सुवर्ण वाहन बस्त्र आदि अनेक पदार्थ देता हुआ, फिर उन्हीं दोनों शिष्यों के साथ राजा सातवाहन उस कथा को प्रकाशित करने के लिये, इस कथा का कथापीठ भी पिशाची भाषा में बना हुया, देवताओं की भी कथाओं को भुलाने वाली विचित्र रसों से भरी हुई यह दिव्य कथा संपूर्ण सुप्रतिष्ठित नाम नगर में प्रसिद्ध होकर तीनों लोकों में फैल गई॥

इतिश्रीकथासरित्सागरभाषायांकथापीठलंबके अष्टमस्तरंगः ८॥ यहकथापीउनामप्रथमलवकसमाप्तहुआ।

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