🌞 ईशोपनिषद् मंत्र 16
(आत्मदर्शन और ब्रह्मैक्य का उद्घोष)
भूमिका
उपनिषद् भारतीय दर्शन की आत्मा हैं और ईशोपनिषद् उनमें अद्वैत वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। इसका 16वाँ मंत्र साधक को बाह्य जगत् से हटाकर सीधे आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह मंत्र केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि ज्ञान का उद्घोष है।
🕉️ मूल मंत्र
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य
व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं
तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥
— स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती
🔍 शब्दार्थ (सरल एवं शुद्ध)
- पूषन् – पालन करने वाला, उन्नति देने वाला
- एकर्षे – एकमात्र दृष्टा, वेदज्ञ
- यम – न्याय करने वाला
- सूर्य – प्रकाशस्वरूप अन्तर्यामी
- प्राजापत्य – समस्त सृष्टि का रक्षक
- व्यूह – दूर करो, हटा दो
- रश्मीन् समूहः – किरणों का आवरण
- तेजः – तेज, प्रकाश
- रूपम् – स्वरूप
- कल्याणतमम् – परम कल्याणकारी
- पश्यामि – मैं देखता हूँ
- पुरुषः – सर्वव्यापक चेतन परमात्मा
- सोऽहमस्मि – वही मैं हूँ
📖 सरल हिन्दी अर्थ
हे पूषण! हे एकमात्र सत्यद्रष्टा, न्यायकारी, सूर्यस्वरूप, सम्पूर्ण सृष्टि के रक्षक परमात्मन्!
आप अपनी तेजस्वी किरणों के आवरण को हटाइए, जिससे मैं आपके उस परम कल्याणकारी स्वरूप का साक्षात् दर्शन कर सकूँ।
जिस परम पुरुष को यह सम्पूर्ण जगत् जानता है, वही पुरुष मैं हूँ—यह सत्य मुझे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव हो।
🧠 भावार्थ (दार्शनिक विवेचन)
यह मंत्र ईशोपनिषद् का शिखर-वाक्य है।
यहाँ साधक ईश्वर से कोई भौतिक वरदान नहीं माँगता, बल्कि अज्ञान के आवरण को हटाने की प्रार्थना करता है।
सूर्य यहाँ केवल भौतिक सूर्य नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रतीक है।
किरणें = नाम-रूप, अहंकार, इन्द्रिय-बोध।
इनके हटते ही जो शुद्ध सत्य प्रकट होता है—वही ब्रह्म है।
और उस ब्रह्म का बोध होते ही उद्घोष होता है—
“सोऽहमस्मि” — वही मैं हूँ
यही अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
- परमात्मा बाहर नहीं, भीतर है
- अज्ञान हटते ही आत्मा-ब्रह्म की एकता प्रकट होती है
- मोक्ष किसी लोक में नहीं, ज्ञान में है
- साधना का लक्ष्य = आत्मसाक्षात्कार
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥
स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती
प. क्र० – (पूषन्) उन्नति करने वाला । (एकर्षे) वेदज्ञ (यम) न्यायकारी । (सूर्य) अन्तर्यामी प्रकाशक, (प्राजापत्य) संसार रक्षक । (व्यूह) हमसे दूर कर । (रश्मीन्) किरणें । (समूहः) कुल । (तेजः) तेज (यत्) जो । (ते) तेरा । (रूपं) रूप । (कल्याणतमम्) कल्याण देने वाला । (तत्) वह (ते) तेरा । (पश्यामि) देखता हूँ । (यः) जो (सः) वह । (असौ) यह । (पुरुषः) व्यापक चैतन्य परमात्मा (सः) वह । (अहम्) मैं । (अस्मि) हूँ । अर्थ- हे वेद के जानने वालो मैं सब से श्रेष्ठ परमात्मन् ! आप सबके अन्तर्यामी, प्रेरणा करने वाले, सूर्य के समान प्रकाश वाले, सब दुखों से मुझे पृथक करके सुख का रास्ता दिखाने वाले अपने, तेज को हम पर फैलाइये । आपका सबसे अधिक कल्याण करने वाला जो स्वरूप है जिससे प्राणियों को ऐसा आनन्द मिलता है कि जिससे बढ़कर या उसके तुल्य आनन्द कहीं नहीं मिलता, हम समाधि के द्वारा उस आनन्द को देख सकें । ऐसी विद्या हमे दान कीजिये, जिससे हमको प्रकट हो जाय कि हम पुरुष अर्थात् विकारों से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं ।
निष्कर्ष
यह मंत्र हमें सिखाता है कि
जब तक हम केवल तेज (बाह्य प्रकाश) देखते हैं, तब तक सत्य छिपा रहता है।
जब तेज का आवरण हटता है, तब सत्य स्वयं प्रकट होता है।
और तब ज्ञानी कह उठता है—
“योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।”
(पूषन्नेकर्षे यम सूर्य – सरल अर्थ व दार्शनिक विवेचन)
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