👉 जो चाहोगे सो पाओगे !
🔶 एक साधु था, वह रोज घाट के
किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”,
जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी
बात पर ध्यान नहीं देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।
🔷 एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु
की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे
सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि
‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वह दे सकते हो जो मैं जो चाहता हूँ?”
🔶 साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम
जो कुछ भी चाहता है मैं उसे जरूर दूंगा, बस तुम्हें मेरी बात माननी
होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?” युवक
बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “
🔷 साधु बोला,” कोई बात नहीं मैं
तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी
हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की
हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र, मैं
तुम्हें दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे
‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे
कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।
🔶 युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी
हथेली,
पकड़ते हुए बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के
बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद
रखना जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर
सकता है।
🔷 युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता
है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्बाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य
से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू
करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा
व्यापारी बनता है।
🔶 मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती
हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम
अपने कीमती समय को बर्बाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम
लें।
👉 महात्मा बुद्ध और अनुयायी -
🔷 भगवान बुद्ध के एक अनुयायी ने कहा, प्रभु
! मुझे आपसे एक निवेदन करना है। बुद्ध ने कहा बताओ क्या कहना है?
🔶 अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं।
अब ये पहनने के लायक नहीं रहे। कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें!
🔷 बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे, वे
सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह - जगह से घिस चुके थे… इसलिए उन्होंने एक
अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए। कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के
घर पहुंचे।
🔶 बुद्ध: क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम
से हो?
तुम्हें और कुछ तो नहीं चाहिए?
🔷 अनुयायी: धन्यवाद प्रभु मैं इन वस्त्रों
में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
🔶 बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं
तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया?
🔷 अनुयायी: मैं अब उसे ओढ़ने के लिए प्रयोग कर
रहा हूँ?
🔶 बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या
किया?
🔷 अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की
जगह लगा दिया है।
🔶 बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने परदे फेंक दिए?
🔷 अनुयायी: जी नहीं, मैंने
उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए
कर रहा हूँ।
🔶 बुद्ध: तो फिर रसोई के पुराने कपड़ों का क्या
किया?
🔷 अनुयायी: अब मैं उन्हें पोंछा लगाने के लिए
प्रयोग करूँगा।
🔶 बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोंछा क्या हुआ?
🔷 अनुयायी: प्रभु वह अब इतना तार -तार हो चुका
था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक -एक
धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं…। उन्हीं में से एक कल रात आपके कक्ष में
प्रकाशित था।
🔶 बुद्ध अनुयायी से संतुष्ट हो गए वह
प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्बाद नहीं करता और उसमें समझ है कि उनका
उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।
🔷 दोस्तों, आज जब प्राकृतिक
संसाधन दिन – प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं ऐसे में हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि
चीजों को बर्बाद ना करें और अपने छोटे - छोटे प्रयत्नों से इस धरा को सुरक्षित बना
कर रखें।
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