तच्छेलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत् ।
चक्रच्छिन्नं खमुत्पत्य ननादातिभयंकरम् ।।७।।
चक्रसे कटा हुआ दानवका महान् मस्तक पर्वतके शिखर-सा जान पड़ता था। वह आकाशमें उछल-उछलकर अत्यन्त भयंकर गर्जना करने लगा ।। ७ ॥
तत् कबन्धं पपातास्य विस्फुरद् धरणीतले ।
सपर्वतवनद्वीपां दैत्यस्याकम्पयन् महीम् ।।८।।
किंतु उस दैत्यका वह धड़ धरतीपर गिर पड़ा और पर्वत, वन तथा द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको कपाता हुआ तड़फड़ाने लगा ।।८।।
ततो वेरविनिर्बन्धः कृतो राहुमुखेन वै।
शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां ग्रसत्यद्यापि चैव तो ॥९॥
तभीसे राहुके मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ भारी एवं स्थायी वैर बाँध लिया; इसीलिये वह आज भी दोनोंपर ग्रहण लगाता है ।।९।।
विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः ।
नानाप्रहरणे(मानवान् समकम्पयत् ।। १०॥
(देवताओंको अमृत पिलानेके बाद) भगवान् श्रीहरिने भी अपना अनुपम मोहिनीरूप त्यागकर नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोद्वारा दानवोंको अत्यन्त कम्पित कर दिया ॥१०॥
ततः प्रवृत्तः संग्रामः समीपे लवणाम्भसः ।
सुराणामसुराणां च सर्वघोरतरो महान् ॥ ११ ॥
फिर तो क्षारसागरके समीप देवताओं और असुरोंका सबसे भयंकर महासंग्राम छिड़ गया ॥ ११ ॥
प्रासाश्च विपुलास्तीक्ष्णा न्यपतन्त सहस्रशः ।
तोमराश्च सुतीक्ष्णाग्राः शस्त्राणि विविधानि च ।। १२ ।।
दोनों दलोंपर सहस्रों तीखी धारवाले बड़े-बड़े भालोंकी मार पड़ने लगी। तेज नोकवाले तोमर तथा भाँति-भांतिके शस्त्र बरसने लगे ।। १२ ।।
ततोऽसुराश्चक्रभिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु ।
असिशक्तिगदारुग्णा निपेतुर्धरणीतले ॥ १३ ॥
छिन्नानि पट्टिशेश्चैव शिरांसि युधि दारुणः ।
तप्तकाञ्चनमालीनि निपेतुरनिशं तदा ।। १४ ।।
भगवानके चक्रसे छिन्न-भिन्न तथा देवताओंके खड्ग, शक्ति और गदासे घायल हुए असुर मुखसे अधिकाधिक रक्त वमन करते हुए पृथ्वीपर लोटने लगे। उस समय तपाये हुए सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित दानवोंके सिर भयंकर पट्टिशोंसे कटकर निरन्तर युद्धभूमिमें गिर रहे थे ।। १३-१४ ।।
रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।
अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते ।।१५।।
वहाँ खूनसे लथपथ अंगवाले मरे हुए महान् असुर, जो समरभूमिमें सो रहे थे, गेरू आदि धातुओंसे रंगे हुए पर्वत-शिखरोंके समान जान पड़ते थे ।। १५ ।।
हाहाकारः समभवत् तत्र तत्र सहस्रशः।
अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति ।।१६।।
संध्याके समय जब सूर्यमण्डल लाल हो रहा था, एक-दूसरेके शस्त्रोंसे कटनेवाले सहस्रों योद्धाओंका हाहाकार इधर-उधर सब ओर गूंज उठा ।।१६।।
परिघैरायसैस्तीक्ष्णैः संनिकर्षे च मुष्टिभीः।
निघ्नतांसमरेअन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत्।।17।।
उस समरांगणमें दूरवर्ती देवता और दानव लोहेके तीखे परिधोंसे एक-दूसरेपर चोट करते थे और निकट आ जानेपर आपसमें मुक्का -मुक्की करने लगते थे। इस प्रकार उनके पारस्परिक आघात-प्रत्याघातका शब्द मानो सारे आकाशमें गूंज उठा ।।17।।
छिन्धि भिन्धि प्रधाव त्वं पातयाभिसरेति च ।
व्यश्रूयन्त महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः ।। १८ ॥
उस रणभूमिमें चारों ओर ये ही अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी पड़ते थे कि 'टुकड़ेटुकड़े कर दो, चीर डालो, दौड़ो, गिरा दो और पीछा करो' ॥ १८॥
एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ।
नरनारायणी देवो समाजग्मतुराहवम् ॥ १९ ॥
इस प्रकार अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध हो ही रहा था कि भगवान् विष्णुके दो रूप नर और नारायणदेव भी युद्धभूमिमें आ गये ।। १९ ॥
तत्र दिव्यं धनुर्दष्टवा नरस्य भगवानपि ।
चिन्तयामास तच्चक्रं विष्णुनवसूदनम् ।। २०॥
भगवान् नारायणने वहाँ नरके हाथमें दिव्य धनुष देखकर स्वयं भी दानवसंहारक दिव्य चक्रका चिन्तन किया ।।२०।।
ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् । विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलंसुदर्शनं संयति भीमदर्शनम् ।। २१ ।।
चिन्तन करते ही शत्रुओंको संताप देनेवाला अत्यन्त तेजस्वी चक्र आकाशमार्गसे उनके हाथमें आ गया। वह सूर्य एवं अग्निके समान जाज्वल्यमान हो रहा था। उस मण्डलाकार चक्रकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती थी। उसका नाम तो सुदर्शन था, किंतु वह युद्धमें शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था ।। २१ ।।
तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभंभयंकरं करिकरबाहुरच्युतः ।
मुमोच वै प्रबलवदुगवेगवान् __ महाप्रभं परनगरावदारणम् ।। २२ ।।
वहाँ आया हुआ वह भयंकर चक्र प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसमें शत्रुओंके बड़े-बड़े नगरोंको विध्वंस कर डालनेकी शक्ति थी। हाथीकी सूंडके समान विशाल भुजदण्डवाले उग्रवेगशाली भगवान् नारायणने उस महातेजस्वी एवं महाबलशाली चक्रको दानवोंके दलपर चलाया ।। २२ ।।
तदन्तकज्वलनसमानवर्चसंपुनः पुनर्व्यपतत वेगवत्तदा ।
विदारयद् दितिदनुजान् सहस्रशः ___ करेरितं पुरुषवरेण संयुगे ।। २३ ।।
उस महासमरमें पुरुषोत्तम श्रीहरिके हाथोंसे संचालित हो वह चक्र प्रलयकालीन अग्निके समान जाज्वल्यमान हो उठा और सहस्रों दैत्यों तथा दानवोंको विदीर्ण करता हुआ बड़े वेगसे बारम्बार उनकी सेनापर पड़ने लगा ।। २३ ।।
दहत् क्वचिज्ज्वलन इवावलेलिहत्प्रसह्य तानसुरगणान् न्यकृन्तत ।
प्रवेरितं वियति मुहुः क्षिती तथापपोरणे रुधिरमथो पिशाचवत् ।। २४ ।।
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