॥ अथ सुभाषितसंग्रहः 

परिवार-संबन्धी वैदिक एवं स्मृतिग्रन्थों के सुभाषितों का एक सुन्दर संग्रह प्रस्तुत किया है। इसका संक्षिप्त सार और केन्द्रीय भाव इस प्रकार है—


🌿 सुभाषितसंग्रहः — परिवार का आदर्श स्वरूप (सार)

1. सामंजस्य और प्रेम

अथर्ववेद के मन्त्रों में परिवार के सभी सदस्यों के लिए

  • समान हृदय,
  • प्रसन्न मन,
  • परस्पर विद्वेष-रहित प्रेम
    का आह्वान है।
    परिवारजनों को एक-दूसरे से वैसा ही स्नेह रखने को कहा गया है, जैसे गाय अपने नवजात बछड़े से रखती है

2. परिवार में कर्तव्य-बोध

  • पुत्र पिता के समान सदाचारी बने
  • माता के समान सौम्य और प्रसन्नचित्त हो
  • पत्नी पति के प्रति मधुर एवं शान्त वाणी बोले
  • भाई-बहिन परस्पर द्वेष न रखें

👉 स्पष्ट सन्देश है कि कर्तव्य, वाणी और व्यवहार से ही परिवार टिकता है।


3. एकता और सहमति

परिवार को—

  • समान अन्न,
  • समान साधन,
  • समान लक्ष्य
    के साथ एकमत होकर आगे बढ़ने की शिक्षा दी गई है।
    जैसे रथ की नाभि में अरे संगठित रहते हैं, वैसे ही परिवार के सदस्य केन्द्र (धर्म/ईश्वर) के चारों ओर जुड़े रहें।

4. ज्ञान, धर्म और संस्कार

  • वेदज्ञान,
  • यज्ञ,
  • संस्कार,
  • विद्वानों का मार्गदर्शन
    इनके अभाव से कुल पतन को प्राप्त होता है (मनुस्मृति 3.63)।

👉 कुविवाह, संस्कार-लोप और अधर्म से परिवार बिगड़ता है।


5. नारी-सम्मान का महत्व

मनुस्मृति स्पष्ट कहती है—

  • जहाँ स्त्रियाँ शोकग्रस्त रहती हैं, वह कुल नष्ट हो जाता है
  • जहाँ वे प्रसन्न रहती हैं, वहाँ कुल की निरन्तर वृद्धि होती है

यह अत्यन्त आधुनिक और सार्वकालिक सन्देश है।


6. दाम्पत्य-सुख = कुल-कल्याण

पति-पत्नी का परस्पर सन्तोष ही
परिवार के स्थायी कल्याण का आधार है
(मनुस्मृति 3.60)।


7. यथार्थबोध

रामायण का वचन बताता है कि— हर भाई भरत जैसा नहीं होता,
हर पुत्र राम जैसा नहीं होता।
अर्थात् आदर्श दुर्लभ हैं, इसलिए सहनशीलता आवश्यक है।


8. माङ्गलिक आचरण का फल

जप, हवन, संयम और माङ्गलिक जीवन जीने वाले
गृहस्थों का पतन नहीं होता (मनुस्मृति 4.146)।


✨ निष्कर्ष

यह सुभाषितसंग्रह सिखाता है कि—

प्रेम + धर्म + संयम + संस्कार + सम्मान = आदर्श परिवार

नीचे प्रस्तुत है पूरे सुभाषितसंग्रह का सरल, आधुनिक और सहज हिन्दी अनुवाद, जिसमें शास्त्रीय कठिनता हटाकर भाव स्पष्ट रखा गया है—


🌼 सुभाषितसंग्रहः

(परिवार और गृहस्थ जीवन पर सरल हिन्दी अनुवाद)


1. पारिवारिक प्रेम और एकता

(अथर्ववेद 3.30.1)
हे गृहस्थो! मैं तुम्हारे जीवन में

  • एक-दूसरे के प्रति अपनापन,
  • प्रसन्न मन,
  • और आपसी द्वेष का पूर्ण अभाव
    स्थापित करता हूँ।
    तुम सब आपस में वैसा ही प्रेम करो, जैसे गाय अपने नवजात बछड़े से करती है।

2. माता-पिता, पुत्र और पत्नी का आचरण

(अथर्ववेद 3.30.2)
पुत्र पिता के समान शुभ और धर्मपूर्ण कर्म करे।
माता के समान कोमल और प्रसन्न मन वाला बने।
पत्नी पति से मीठे, शान्त और सुख देने वाले शब्द बोले।


3. भाई-बहिन में सौहार्द

(अथर्ववेद 3.30.3)
भाई भाई से और बहिन बहिन से द्वेष न करे।
परिवार के सभी सदस्य

  • समान विचार वाले,
  • सद्गुणों से युक्त,
  • और मंगलमय वाणी बोलने वाले हों।

4. झगड़े से दूर रहने वाला परिवार

(अथर्ववेद 3.30.4)
हे परिवारजनो!
जिस प्रकार श्रेष्ठ लोग

  • शुद्ध अन्न खाने से,
  • धर्मपूर्वक धन कमाने से,
  • और उत्तम ज्ञान प्राप्त करने से
    आपस में झगड़ा नहीं करते,
    उसी प्रकार का अन्न, धन और ज्ञान
    हम तुम्हारे परिवार में स्थापित करते हैं।

5. बुज़ुर्गों का सम्मान और आपसी सहयोग

(अथर्ववेद 3.30.5)
हे परिवारजनो!
तुम ज्ञानवान बनो,
बुज़ुर्गों का सम्मान करो,
परिवार की जिम्मेदारी उठाओ,
और कभी मन से एक-दूसरे से अलग मत हो।
एक-दूसरे से मधुर, सत्य और प्रिय वचन बोलो।
मैं तुम्हें आपस में सहायक और एकमत बनाता हूँ।


6. समान साधन, समान लक्ष्य

(अथर्ववेद 3.30.6)
तुम सबका

  • जल पीने का स्थान,
  • भोजन,
  • और जीवन के साधन
    समान हों।
    तुम सब मिलकर धर्मकर्म ऐसे करो,
    जैसे रथ की नाभि में अरे चारों ओर से जुड़े रहते हैं।

7. एक ईश्वर-भाव और प्रसन्न मन

(अथर्ववेद 3.30.7)
हे गृहस्थो!
मैं तुम्हें

  • एक समान पूजा करने वाला,
  • प्रसन्न मन वाला,
  • और एक ईश्वर को मानने वाला
    बनाता हूँ।
    तुम विद्वानों की तरह
    मोक्ष के मार्ग की रक्षा करने वाले बनो।
    सुबह-शाम तुम्हारे मन में सदा शुभ भावना बनी रहे।

मनुस्मृति से सुभाषित

8. पति-पत्नी का संतोष

(मनुस्मृति 3.60)
जिस परिवार में
पति पत्नी से संतुष्ट रहता है
और पत्नी पति से संतुष्ट रहती है,
उस परिवार में निश्चित ही कल्याण होता है।


9. कुविवाह और अधर्म का परिणाम

(मनुस्मृति 3.63)
अनुचित विवाह,
धार्मिक संस्कारों का त्याग,
वेदों का अध्ययन न करना
और विद्वानों की बात न मानना—
इन कारणों से परिवार पतन को प्राप्त हो जाता है।


10. स्त्रियों का सम्मान

(मनुस्मृति 3.57)
जिस परिवार में
पत्नी, बहू और बहिन दुखी रहती हैं,
वह परिवार शीघ्र नष्ट हो जाता है।
और जहाँ ये स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं,
वह परिवार सदा उन्नति करता है।


रामायण से यथार्थ वचन

11. सभी आदर्श समान नहीं होते

(वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 18.15)
हे सुग्रीव!
हर भाई भरत जैसा नहीं होता,
हर पुत्र राम जैसा नहीं होता,
और हर मित्र तुम्हारे जैसा नहीं होता।


12. माङ्गलिक आचरण का फल

(मनुस्मृति 4.146)
जो लोग
मंगलमय आचरण करते हैं,
संयम से रहते हैं,
जप और हवन करते हैं,
उनका जीवन पतन की ओर नहीं जाता।


🌸 समग्र संदेश

यह सुभाषितसंग्रह सिखाता है कि—

प्रेम, मधुर वाणी, धर्म, नारी-सम्मान, संस्कार और एकता—
इन्हीं से परिवार सुखी, सुरक्षित और समृद्ध बनता है।

सुभाषितसंग्रहः माता–पिता 



ओ३म् सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः ।
अन्यो अन्यमभि हर्यत, वत्सं जातमिवाघ्न्या ।।

हे गृहस्थो ! मैं तुम्हारे जीवन में समान हृदयता, प्रसन्न-मनस्कता और विद्वेष का अभाव (अत्यन्त प्रीति) स्थापित करता हूँ। तुम परस्पर एक-दूसरे को वैसे ही चाहो जैसे गौ नवजात बछड़े को चाहती है ।

अनुव्रतः पितुः पुत्रो, मात्रा भवतु सम्मनाः ।
जाया पत्ये मधुमतीं, वाचं वदतु शन्तिवाम् ।।

    पुत्र पिता के समान शुभ कर्मों को करने वाला और माता के समान प्रसन्न मन वाला बने । पत्नी पति के प्रति मीठे और शान्तिदायक वचन बोले ।

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्, मा स्वसारमुत स्वसा ।
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा, वाचं वदत भद्रया ।।

    भाई भाई से द्वेष न करे और बहिन तहिन से द्वेष न करे। हे भाई बहिन आदि सदस्यो ! तुम सभी उत्तम प्रगति करने वाले तथा सत्कार करने वाले और समान गुणकर्म स्वभाव वाले होकर, माङ्गलिक रीति से शुभ वचन बोला करो ।

येन देवा न वियन्ति, नो च विद्विषते मिथः ।
तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे, संज्ञानं पुरुषेभ्यः ।।

    हे पारिवारिक जनो ! जिस अन्न के सेवन से, जिस धन के उपार्जन से और जिस वेदज्ञान की प्राप्ति से दिव्य विद्वान् लोग एक दूसरे से मनमुटाव नहीं करते और आपस में द्वेष नहीं करते हैं; उसी प्रकार के अन्न, धन और उत्तम ज्ञान को हम लोग तुम्हारे परिवार में प्रतिष्ठित करते हैं ।

ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट, सं राधयन्तः सधुराश्चरन्तः ।
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत, सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ।।

    हे परिवारजनो ! आप लोग बुजुर्गों वाले तथा ज्ञान-सम्पन्न होकर उत्तम प्रयोजनों को सिद्ध करते हुए, परिवार की धुरा वहन करते हुए और प्रगति करते हुए आपस में एक दूसरे से कभी पृथक् मत होओ-मानसिक अलगाव मत रखो । एक दूसरे के प्रति सुन्दर (सत्य तथा मधुर) वाणी बोलते हुए एक दूसरे के पास आओ। मैं तुम्हें परस्पर का सहायक और ऐकमत्यवाला-सहमति वाला बनाता हूँ।

समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः, समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः

    तुम्हारा जलपान आदि का स्थान समान हो, तुम्हारा भोजन आदि समान हो । मैं तुम्हें यान वाहन आदि के समान उपकरणों में (उनकी प्राप्ति में) प्रेरित करता हूँ। तुम लोग सम्यक् प्राप्ति वाले संगठित होकर हवनादि के द्वारा अग्नि का वैसे ही सेवन करो जैसे रथचक्र की नाभि में चारों ओर से अरे संगठित रहते हैं ।

सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोम्येक श्नुष्टीन्त्संवननेन सर्वान् ।
देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायं प्रातः सौमनसो वो अस्तु ।। (अथर्ववेदसंहिता - ३.३०.१-७)

    हे गृहस्थो ! मैं तुम्हारे शुभ-कर्म-सेवन रूपी माध्यम से तुम सबको एकसी पूजा वाला, उत्तम प्रसन्न मन वाला और एक ही ईश्वर को तत्परता से प्राप्त करने वाला बनाता हूँ। दिव्य विद्वानों के समान तुम मोक्षवृत्ति के रक्षक बनो । तुम लोगों में परस्पर सायं प्रातः सदा मानसिक श्रेष्ठ भाव बना रहे ।

सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता, भर्ना भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं, कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।। (मनुस्मृतिः - ३.६०)

    जिस परिवार में पत्नी से पति सन्तुष्ट रहता है और वैसे ही पति से पत्नी सन्तुष्ट रहती है, उस परिवार में निश्चय ही कल्याण का वास होता है ।

कुविवाह: क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति, ब्राह्मणातिक्रमेण च ।। (मनुस्मृतिः - ३.६३)

    अनमेल विवाहों से, यज्ञ तथा षोडश संस्कार रूपी उत्तम क्रियाओं के लोप हो जाने से, वेदों के स्वाध्याय न करने से और विद्वानों के उपदेशों के विपरीत चलने से परिवार दुष्ट परिवार बन जाते हैं - बिगड़ जाते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र, विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। (मनुस्मृतिः - ३.५७)
    जहाँ पत्नी, पुत्रवधू तथा बहिन आदि महिलाएँ शोकमग्न रहती हैं, वह परिवार शीघ्र विनष्ट हो जाता है । और जहाँ ये महिलाएँ शोक नहीं करतीं, वह परिवार सदा वृद्धि को प्राप्त होता है ।

न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः ।
मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ।। (वाल्मीकिरामायणम् (युद्धकाण्डम्) -१८.१५)
    हे प्रिय सुग्रीव ! सभी भाई भरत जैसे नहीं होते तथा पिता के सभी पुत्र मुझ (राम) जैसे नहीं होते और सभी मित्र आप जैसे नहीं होते ।

मङ्गलाचारयुक्तानां, नित्यं च प्रयतात्मनाम् ।
जपतां जुह्वतां चैव, विनिपातो न विद्यते ।। (मनुस्मृतिः - ४.१४६)
    माङ्गलिक आचरण वाले, सदा अपने आपको वश में रखने वाले, जप करने वाले और नित्य हवन करने वाले गृहस्थ आदि मनुष्यों का पतन नहीं होता । अनिष्ट नहीं होता ।