जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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जीवन संग्राम -1, मिर्जापुर का परिचय

 


जीवन संग्राम -1, मिर्जापुर का परिचय

 

      राम-अगस्त्य मिलन के प्रसंग में रामायण का सारा विवरण बहुत ही सजीव है। उस विराट वन में जगह-जगह तपस्वियों के आश्रम हैं। जिन्हें राक्षसों का भय भी है, पर इसके बावजूद जो लगातार अपनी दैनिक तपश्चर्या में लगे रहते हैं। अगस्त्य से मिलने से पहले राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ सुतीक्ष्ण से मिलने गए थे। और वहीं से उनको अगस्त्य के प्रसिद्ध आश्रम जाने का मार्ग मालूम पड़ा था। तो इस आधार पर तय यह माना जाता है कि अगस्त्य ऋषि राम के समकालीन थे। और वैदिक मंत्ररचना के दूसरे सहस्त्राब्द के अन्तिम चरण में हुए थे। पर दक्षिण के इस महामुनि का सारे भारत पर अपनी बौद्धिकता और कर्मठता का दबदबा कुछ ऐसा था। कि उत्तर के गाथाकारों ने कितनी ही ऐसी कथाएं बना डालीं कि जिससे साबित यह होता है कि वे कोई विशेष लोकहित का काम करने दक्षिण दिशा की ओर गए थे। और फिर वहीं के होकर रह गए। महान् लोकहित का वह काम क्या था, इसका कोई संकेत कहीं नहीं मिलता। वे किसी खास सभ्यता का प्रसार करने वहां गए थे, इसकी उन्हें कोई जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि शेष भारत की तरह दक्षिण भारत में सभ्यता का प्रसार सैंकड़ों सालों से था और हम देख ही आए हैं। कि कैसे मनु महाराज की एक सन्तान तुर्वसु की शाखा-प्रशाखाएं दक्षिण में राज करने लगी थीं। अगर किसी यज्ञसंस्कृति का प्रसार करना दक्षिण गमन का उद्देश्य मान लिया जाए तो खुद रामायण का विवरण साक्षी है। कि वह संस्कृति वहां सहज रूप से ही व्यापक पैमाने पर फैली पड़ी थी। राक्षसों का विनाश भी इसलिए उद्देश्य नहीं माना जा सकता क्योंकि राक्षस जाति के साथ मनुष्यों का संघर्ष दक्षिण ही नहीं उत्तर में भी चल रहा था। और अगस्त्य के समकालीन राम ने अगर दक्षिण में जाकर खर, दूषण और त्रिशिरा का वध किया था तो उत्तर में वे विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए ताड़का, मारीच और सुबाहु का वध कर ही चुके थे। तो क्यों उन्हें उत्तर का बताकर दक्षिण की ओर गए ऐसा बताया गया? जवाब तक पहुंचने के लिए बेहतर होगा कि वे गाथाएं दोहरा दी जाएं जो कई तरह से अगस्त्य ऋषि के साथ जोड़ दी गई हैं। एक गाथा यह है कि जब इन्द्र ने वृत्रासुर का दधीचि की अस्थियों से बने अपने वज्र से संहार कर दिया तो असुर एकदम नेताविहीन होकर घबरा गए। घबराहट में असुरों के एक दल ने अर्थात् कालेयों ने एक रणनीति यह बनाई कि वे समुद्र में जाकर छिप गए। दिन भर वे समुद्र में छिपे रहते और रात को बाहर निकलकर ऋषिमुनियों का वध कर वापिस समुद्र में छिपने चले जाते। लम्बे अरसे तक तो रहस्य ही मालूम नहीं पड़ा। अगस्त्य मुनि से इसके लिए अनुरोध किया गया तो उन्होंने सारा समुद्र पी लिया और खाली उघड़े समुद्र-धरातल पर कालेय असुर दिख गए और उनका संहार कर दिया गया। महाभारत के वनपर्व और कई पुराणों में उपलब्ध इस कथा पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं। क्या राम-समकालीन अगस्त्य का इन्द्र-वृत्र संग्राम से कोई लेना-देना हो सकता है? क्या कोई समुद्र में छिप सकता है? क्या कोई समुद्र पी सकता है? यहां पर इस कथा की वैज्ञानिकता की दृष्टी से देखा जाये तो संभव है। अगस्त नाम के कई पुरुष हुए है इस भुमंडलपर। पहले ऐसी परंपरा थी। कि लोग एक नाम से उनकी पिढ़ी को बरकरार रखने के लिये उनके नाम से ही कार्य करते थे। जैसा कि सारे पुराणों को व्यास के नाम से जानते जबकि व्यास के बाद बहुत से पुराणों को उनके नाम से लिखा गया है। जिसको रोकने के लिये राजा भोज ने कई ऐसे लेखको के ङाथ कटवा लिया था। जिस अगस्त ने समन्दर को पिया था। राम कालिन अगस्त नहीं थे । वह प्रथम अगस्त ऋषि थे जिन्होने विज्ञान कि सहायता से बहुत दुर्लभ और असंभव जैसे लगने वाले कार्यों को अपने जीवन में सिद्ध किया था। जिसमें से एक यह भी कार्य है कि उन्होने समन्दर के पानी को पुरी तरह से सुखा दिया था। और जो समन्दर के अन्दर राक्षस आदि छुपे थे, अपने निवास अस्थान को बना कर, उनको देवताओं के द्वारा मार गया था। यह घटना यहां पृथ्वी पर नहीं हुई थी मंगल ग्रह पर हुई थी। इस वजह से मंगल ग्रह का सारा वायु मंडल नष्ट हो गया था। और वहां रहना बहुत मुस्किल हो गया था। क्योंकि वहां पर बहुत सारे खतरनाक परमाणु और हाईड्रोजन बमों को वरसाया गया था। इस कहानी में जो वृता सुर राक्षस नाम का दैत्य है। यह वादलों का नेतृत्व करने वाला और इन बादलों को अपनी इच्छा से प्रयोग करने वाला एक वृतासुर नाम का राक्षसों का राजा था। जो वैज्ञानिक विधियों के द्वारा जब उसकी इच्छा हो मंगल ग्रह पर वारिष होने देता था। और जब इच्छा होता वह बन्द कर देता था। इसके अतिरिक्त वह सभी बादलों को एक जगह किसी एक शहर के उपर एकत्रित करके, उस शहर पर इतना वारिस करता की वह शहर पुरी तरह से डुबों कर निस्तोनाबुत कर दिया जाता था। यह आज भी आधुनिक तकनिक के सहायता से वैज्ञानिक कर सकते है। इसके अतिरीक्त भी वैज्ञानिक कहीं पर भी भुकंप ला सकते है और कई प्रकार के प्राकृतिक आपदा को लाकर पृथ्वी के किसी एक हिस्से को तबाह कर सकते है। वृता सुर के ऐसा ही करने से सभी देवता और इन्द्र आदि बहुत दुःखी थे। जिसका वध इन्द्र ने दधिची की अस्थियों से बने वज्र से प्रहार करके उसके साराज्य को नष्ट कर दिया था। जिसके कारण जान बचा कर जो राक्षस वचे थे वह समन्दर के अन्दर रहते थे। और देवताओं से वह छुप कर गोरिल्ला युद्ध करते थे। वह समन्दर में उनको लुट लेते थे। जैसे आज के समय में सोमालिया आदि देशों के लुटेरे बहुत सारे देशों की पानी के जहाजों को लुट लेते है। और यहां पर जो बात कही जा रही है कि दधिची की हड्डी से वज्र बनाया गया है। यह सत्य नहीं है, वज्र दधिची ऋषि के द्वारा बनाया गया था वह एक बड़े वैज्ञानिक थे जिन्होनें यह वज्र एटम बम बनाया था। जो उनकी इच्छा के विपरीत इन्द्रादि देवताओं ने जिनकी मंगल ग्रह पर सरकार थी, उन्होने दधीचि से ले लिया था। और उसका उपयोग वृतासुर के राज्य पर कर दिया था। यहां जिसे वज्र कहा जा रहा है। वह खतनाक परमाणु बम था। जिस प्रकार से जर्मनी का रहने वाला महान वैज्ञानिक आइन्सटिन था। जिसने एटम बम की खोज थी और वह नहीं चाहता था कि इस तकनिकी का प्रयोग करके हिटलर जन संहार करे । इसलिये उसने अमेरिका में सरण ले ली थी। कि इस तरह से वह एटम के संहार से दुनिया बच जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ अमेरिका ने परमाणु बम बनाया उसके सुत्रों कि सहायता से और उसका दूसरे विश्वयुद्ध में प्रयोग किया। जिससे जापान के दो बड़े शहर हिरोसिमा और नागांसाकि मिट्टि में मिल गये। और वहां सब कुछ समाप्त हो गया। वह एटम बम बहुत छोटा था उसका नाम वैज्ञानिकों ने लिटिल व्वाय रखा था। आज उससे बहुत बड़े बड़े बम बन चुके है। जिनका उपयोग करने पृथ्वी के समुद्र को सुखाया जा सकता है। जिसको यहां कहा जा रहा है कि अगस्त ने समन्दर के पानी को पी लिया था।   

     अगर पहली गाथा का सम्बन्ध मंगल ग्रह के भारत के समुद्र से है। तो दूसरी गाथा का रिश्ता मध्यभारत के विंध्य पर्वत से है। यह गाथा भी महाभारत के वनपर्व और कई पुराणों में मिलती है। एक बार विंध्य पर्वत को गुस्सा आ गया कि क्यों नहीं सूर्य मेरी भी वैसे परिक्रमा करता जैसे वह मेरू पर्वत की किया करता है। सूर्य ने कोई ध्यान नहीं दिया तो विंध्य ने ऊपर आकाश की तरफ अपना आकार बढ़ाना शुरू कर दिया। इतना बढ़ा लिया कि सूर्य की गति रुक गई। त्राहि-त्राहि करते लोग अगस्त्य के पास गए और ऋषि ने एक अद्भुत तरीका सोचा। वे विंध्य के पास गए और कहा कि थोड़ा नीचे हो जाओ क्योंकि मुझे तुम्हें पार कर उस ओर जाना है। विंध्य नीचे हो गया और उसे पार कर अगस्त्य ने कहा कि बस, जब तक मैं लौटूं नहीं, तुम नीचे ही रहना और वे कभी लौटे ही नहीं। तब से विंध्य नीचे ही नीचे है। यह कहानी भी अपने अन्दर वैज्ञानिकता को समेटे हुए है। यह संभव है कि कोई ग्रह या जिसे हम पर्वत कहते है। वह अन्तरिक्ष में उपस्थित हो जाये और वह सूर्य के प्रकाश को कुछ समय के लिये पृथ्वी पर आने से रोक दे। कुछ समय के लिये मान लेते है कि यह चन्द्रमा जब पृथ्वी से अलग हुआ तो पृथ्वी पर अंधकार छाने लगा जिससे और जो लोग मंगल ग्रह पर रहते थे। उनको अपने ग्रह पर खतरा नजर आया की किसी तरह यह हमारे ग्रह से टकरा गया तो यहां का जिवन समाप्त हो सकता है। इसलियें उन्होने वैज्ञानिक तरिके से उसको अपने रास्ते हटा कर उसे पृथ्वि की कक्षा में स्थापित कर दिया हो। क्योकि वह यहां पर अपने नया निवास स्थान बनाने वाले थे। आज के समय में वैज्ञानिको के लिये यह संभव है कि पृथ्वी की तरफ आने वाले किसी विशाल पर्वत के समान एश्ट्रायोड को उसके मार्ग हटा कर किसी दूसरे ग्रह के कक्षा में स्थापित कर सकते है। और जो दूसरी बात है पहले ऐसे व्यक्ती थे। और उनकी तकनिकी आज के तकनिकी से बहुत अधिक विकसित थ। वह पर्वतों से भी बात कर सकते थे। पहले के समय में यह जो आज के समय हमें जण पर्वत दिखाई देते है। वह भी चेतन की तरह कार्य करते थे। आज के वैज्ञानिक यह मानते है कि यह संभव है जिसके कुछ प्रमाण उनको मिले है। जहां तक सूर्य के प्रकाश को रोकने कि बता है किसी पर्वत के द्वारा यह एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार विंध्य पर्वत और मेरु पर्वत के मध्य यह प्रतिस्पर्धा हुई। कि दोनों में से कौन इतना ऊँचा बढ़ता है कि सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर सके। तब ऋषि अगस्त्य ने विंध्य पर्वत से नीचे झुकने का आग्रह किया ताकि वे देश के दक्षिणी भाग की यात्रा पर जा सकें। ऋषि अगस्त्य के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए विंध्य पर्वत ने अपनी ऊँचाई कम कर ली और उन्हें यह वचन भी दिया कि जब तक वे अपनी यात्रा से वापस उत्तर दिशा में नहीं लौटेंगे, तब तक विन्ध्य अपना आकर नहीं बढ़ाएंगे। ऐसा माना जाता है कि इस घटना के पश्चात् ऋषि अगस्त्य ने दक्षिण में ही निवास कर लिया और विंध्य पर्वत ने भी अपना वचन निभाते हुए पुनः कभी अपना आकर नहीं बढ़ाया।

    जैसे पहली गाथा को लेकर कई सवालों का जवाब नहीं मिलता, वैसे ही कई सवाल इस गाथा के बारे में भी हो सकते हैं। पर उन्हें यहीं छोड़कर असली सवाल पूछते हैं कि आखिर इन गाथाओं का निहितार्थ क्या हैं? दूसरी गाथा का निहितार्थ तलाशना कोई मुश्किल काम नहीं। आराम से कहा जा सकता है कि ऋषि अगस्त्य ने विंध्य पार जाने के किसी सुविधाजनक मार्ग का निर्माण अपनी देखरेख में कराया होगा। जैसे सगर के वंशजों ने, अंशुमान से लेकर भागीरथ तक ने भारी मेहनत से गंगा का भव्य मार्ग बनवाया और उस पूरे महत् प्रयास को गंगावतरण की गाथा में संजो दिया गया, वैसे ही अगस्त्य के विंध्य-मार्ग-निर्माण के जटिल कार्य को इस गाथा में संजो कर रख दिया गया हो तो क्या आश्चर्य? उत्तर में आने-जाने की कठिनाई को आसान बनाने के वृहत अगस्त्य-कर्म को हमारे पुराणकारों ने इस तरह का गाथा आकार दे दिया हो तो क्या आश्चर्य? पर देश में जब मानसून थम जाता है, सावन और फिर भादों के बादलों का पानी खत्म हो जाता है तो उस वक्त खगोल विज्ञान के अनुसार दक्षिण दिशा में अगस्त्य नामक नक्षत्र का उदय होता है। दक्षिण में अगस्त्य का उदय होने का अर्थ ही यह मान लिया जाता है कि बस, अब वर्षा खत्म और सुहाने दिन आ गए हैं-उदित अगस्त्य पन्थ जल सोखा (रामचरित मानस)। हमें तो बस यही एकमात्र समझ में आने वाला कारण लगता है कि पानी सोखने वाले अगस्त्य नक्षत्र के उदय को हमारे पुराणकारों ने अगस्त्य द्वारा समुद्र पी जाने की गाथा में वैसे ही रंगबिरंगा बना दिया है जैसे सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण की खगोल वैज्ञानिक घटनाओं को राहु केतु के चोरी-छिपे अमृत पीने की गाथा में रख दिया गया है।

     क्या निष्कर्ष निकला? यह कि दक्षिण के इस दण्डकारण्यवासी महामुनि का कोई ऐसा दबदबा था कि नैमिषारण्य में सुनाई गई पुराणगाथाओं पर यह विराट् व्यक्तित्व छाया रहा और अगर मान लिया जाए कि अगस्त्य ने विंध्य को पार कर उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर जाने का आसान रास्ता बनवाया तो इस दबदबे का उचित कारण भी हमारी समझ में आ जाता है।

     'विंध्य' शब्द की व्युत्पत्ति 'विध्' धातु से कही जाती है। भूमि को बेध कर यह पर्वतमाला भारत के मध्य में स्थित है। यही मूल कल्पना इस नाम में निहित जान पड़ती है। विंध्य की गणना सप्तकुल पर्वतों में है। वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा काण्ड में विंध्य का उल्लेख 'संपाती' नामक गृध्रराज ने इस प्रकार किया है-

    अस्य विंधस्य शिखरे पतितोऽस्मि पुरानद्य सूर्यतापपरीतांगो निदग्धः सूर्यरश्मिभिः, ततस्तु सागराशैलान्नदीः सर्वाः सरांसि च, वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता हृष्टपक्षिगणाकीर्णः कंदरादरकूटवान् दक्षिणस्योदधेस्तीरे विंध्योऽयमिति निश्चितः।'

  महाभारत, भीष्मपर्व में विंध्य को कुलपर्वतों की श्रेणी में परिगणित किया गया है। 'श्रीमद्भागवत' में भी विंध्य का नामोल्लेख है-

वारिधारो विंध्याः शुक्तिमानृक्षगिरि पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः।' कालिदास ने कुश की राजधानी कुशावती को विंध्य के दक्षिण में बताया है। कुशावती को छोड़कर अयोध्या वापिस आते समय कुश ने विंध्य को पार किया था-व्यलंङ्घयद्विन्ध्यमुपायनानि पश्यन्मुलिन्दैरुपपादितानि। विष्णुपुराण में नर्मदा और सुरसा आदि नदियों को विंध्य पर्वत से उद्भूत बताया गया है-नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विंध्याद्विनिर्गताः।' पुराणों के प्रसिद्ध अध्येता पार्जिटर के अनुसार मार्कण्डेय पुराण में जिन नदियों और पर्वतों के नाम हैं, उनके परीक्षण से सूचित होता है कि प्राचीन काल में विंध्य, वर्तमान विंध्याचल के पूर्वी भाग का ही नाम था, जिसका विस्तार नर्मदा के उत्तर की ओर भोपाल से लेकर दक्षिण बिहार तक था। इसके पश्चिमी भाग और अरावली की पहाड़ियों का संयुक्त नाम पारिपात्र था। पौराणिक कथाओं से सूचित होता है कि विंध्याचल को पार करके अगत्स्य ऋषि सर्वप्रथम दक्षिण दिशा गए थे और वहां जाकर उन्होंने आर्य संस्कृति का प्रचार किया था।

   विन्ध्य क्षेत्रं सम क्षेत्रं, नास्ति ब्रह्माण्ड गोलके’’ जगत जननी मूल प्रकृति त्रिगुणात्मिका माँ विन्ध्यवासिनी की परमप्रिय एवं त्रिलोक्य पूज्यस्थली है। विन्ध्याचल साधकों के लिए भी परम पावन सिद्धपीठ तपोभूमि है। पर्यटकों के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर विन्ध्य क्षेत्र का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहाँ के अनूठे प्राकृतिक सौन्दर्य, आसमान को छूते पहाड़ झरने, जल-प्रपात तथा पुरात्तव में रुची रखने वालों के लिये पहाड़ों में बने गुफाँओं में भित्ति चित्र के इतिहास को समेटे विन्ध्यक्षेत्र गाथाओं से परिपूर्ण है। भौगोलिक दृष्टि से विन्ध्याचल सम्पूर्ण भारतवर्ष का मध्य बिन्दु है। इतिहास के प्रमुख धर्म-ग्रन्थ व पुस्तकों में श्री विन्ध्यवासिनी देवी व विन्ध्य क्षेत्र की चर्चा की गयी है। विन्ध्य क्षेत्र की सर्वाधिक चर्चा औशनस उपपुराण के विन्ध्यमहात्म्य खण्ड में प्राप्त होती है। वैसे तो वाल्मिकी रामायण में सुग्रीव द्वारा विन्ध्य क्षेत्र व सम्पूर्ण भारतवर्ष का भौगोलिक वर्णन प्राप्त होता है। विन्ध्याचल मण्डल के ही जिला सोनभद्र क्षेत्र में प्राप्त जीवाश्म एक अरब पचास साल करोड़ वर्ष प्राचीन माना गया है। विन्ध्य क्षेत्र की श्रृंखला भारत वर्ष के सभी पर्वत श्रृंखलाओं से सबसे लम्बी व विस्तृत है। यह श्रृंखला बंगाल से होते हुये बिहार, झारखण्ड, विन्ध्याचल, (मीर्जापुर) उत्तर प्रदेश होते हुए मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र तक अपनी अनुपम छटा बिखेर रही है। विन्ध्य पर्वत के ऐशान्य कोंण विन्ध्य क्षेत्र में ही माना जाता है इस कोंण पर आदि शक्ति माँ विन्ध्यवासिनी विराजमान है। जहाँ पतित पावनी माँ गंगा विन्ध्य पर्वत को स्पर्श करते हुए जगत जननी का पाँव पखारती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार ऐशान्य कोंण धर्म का कोंण माना जाता है जहाँ भक्तों का कल्याण के लिए वास करनें वाली शक्ति अपने भक्तों का मनोरथ पूर्ण कर रही है। एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले इस देश की घडि़यों का मानक (समय) चाहे जम्मू-काश्मीर, कन्याकुमारी, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र मुम्बई या दिल्ली हो, इन सब स्थानों का समय विन्ध्याचल से निर्धारित होता है। यही पर भारतीय मानक समय ( आई.एस.टी.) का आधार बिन्दु है। इसी लिए विन्ध्यवासिनी को बिंदुवासिनी भी कहा जाता है। भगवान भुवन भाष्कर की प्रथम रश्मिया सर्वप्रथम विन्ध्याचल की ही धरती पर पड़ती है 27 जनवरी 2007 दिल्ली से आयी हुई स्पेश नामक संस्था की टीम ने अपना शोध पूर्ण करके एक बोर्ड लगाया है और उल्लेखित किया है कि 82.5 पूर्वी देशान्तर पर विन्ध्याचल स्थित है, जो भारतवर्ष का मध्य बिंदु है। यही से पूरे देश का मानक समय निर्धारित होता है। यह बोर्ड विन्ध्यवासिनी मन्दिर से दक्षिण अमरावती चैराहा इलाहाबाद मीरजापुर मार्ग पर लगाया गया है जो विन्ध्य क्षेत्र के त्रिकोण परिक्रमा के अन्तर्गत आता है। भौतिक दृष्टि से देखने पर तो यह विन्ध्य पर्वत पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक फैला है इससे यह जिज्ञासा और सहज रुप से प्रकट होती है कि माँ विन्ध्यवासिनी का वह परम् स्थान कौन सा है जहाँ माँ अपने सम्पूर्ण श्री विग्रह से आसीन हैं। बृहद नीलतंत्र के अनुसार ’’ संगमे विन्ध्य गंगाया विन्ध्य विन्ध्य निवासिनी’’ से यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि नागाधिराज विन्ध्याचल तथा देवनदी गंगा का जहाँ मिलन स्थल है उसी स्थान पर माँ विन्ध्यवासिनी का दिव्य धाम है। संम्पूर्ण भारत में दृष्टिपात करने पर विन्ध्य पर्वत तथा गंगा जी का संगम इसी क्षेत्र में हुआ है माँ विन्ध्यवासिनी का यह पीठ शक्तिपीठ न होकर सिद्धपीठ व महाशक्तिपीठ है। शक्तिपीठ वे है जो सती के अंग गिरा हैं। यह महामाया का सनातन पीठ है जो अपने पूरे श्री विग्रह से विराजमान हैं। माँ विन्ध्यवासिनी की जो अन्य दस शक्तियाँ हैं वो दस महाविद्या के नाम से जानी जाती है। उनका ही वाममार्ग से पूजन का विधान है। माँ विन्ध्यवासिनी की ये दस महाशक्तियाँ भी विन्ध्य क्षेत्र के दस दिशाओं में विराजमान है जिसका पूजन वाममार्ग से इस क्षेत्र में होता है।

     मिर्ज़ापुर शहर, दक्षिण-पूर्व उत्तर प्रदेश राज्य, उत्तर-मध्य भारत, वाराणसी (पहले बनारस) के दक्षिण-पश्चिम में गंगा नदी के तट पर विन्ध्याचल की कैमूर पर्वत श्रेणियों में स्थित है। इसके आसपास के क्षेत्र में उत्तर में गंगा के कछारी मैदान का हिस्सा और दक्षिण में विंध्य पर्वतश्रेणी की कुछ पहाड़ियाँ हैं। यह क्षेत्र सोन नदी द्वारा अपवाहित होता है। इसकी सहायक धारा रिहंद पर बांध बनाया गया है, जिससे विशाल जलाशय का निर्माण हो गया है और इसमें जलविद्युत उत्पादन भी होता हैं। यहाँ नदी तट पर कई मंदिर और घाट हैं। विंध्याचल में काली का प्राचीन मंदिर है, जहाँ तीर्थ्यात्री जाते हैं।

     मिर्ज़ापुर की स्थापना संभवतः 17वीं शताब्दी में हुई थी। 1800 तक यह उत्तर भारत का विशालतम व्यापार केंद्र बन गया था। जब 1864 में इलाहाबाद रेल लाइन की शुरुआत हुई, तो मिर्ज़ापुर का पतन होने लगा, लेकिन स्थानीय व्यापार में इसका महत्त्व बढ़ता रहा। मिर्जापुर क्षेत्र में सोन नदी के तट पर लिखुनिया, भलदरिया, लोहरी इत्यादि सौ से अधिक पाषाणकालीन चित्रों से युक्त गुफ़ाएँ तथा शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं। ये चित्र लगभग 5000 ई.पू. के माने जाते हैं। यहाँ शिकार के सर्वाधिक चित्र बने हुए हैं। जलती हुई मशाल से बाघ का सामना करता हुआ मानव लोहरी गुफ़ा में चित्रित किया गया है। लिखुनिया गुफ़ा में कुछ घुड़सवार पालतू हथिनी की सहायता से एक जंगली हाथी को पकड़ते हुए चित्रित हैं। इन घुड़सवारों के हाथों में लम्बे-लम्बे भाले चित्रित किए गए हैं। यहाँ पर मृत्यु के कष्ट से कराहता हुआ ऊपर की ओर मुँह किए हुए सूअर, जिसकी पीठ पर नुकीला तीरनुमा हथियार घुसा हुआ है, स्वाभाविक रुप से चित्रित किया गया है।

     अधिकांश भूमि नहर द्वारा सिंचत है तथा यहाँ चावल, जौ और गेहूँ की खेती होती है। यह व्यापार का एक बड़ा केन्द्र है। विशेषकर कपास और लाख का, यह अच्छे कालीनों, कम्बलों तथा रेशमी कपड़ों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर ताँबे, काँसे तथा अन्य धातु के बर्तन भी बनाए जाते हैं। प्रमुख रेल लाइन और सड़क जंक्शन पर स्थित यह स्थान औद्योगिक केंद्र भी है, जहाँ कपास मिल, बलुआ पत्थर की कटाई और पीतल के बर्तन व क़ालीन निर्माण उद्योग स्थित हैं।

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